जब तुझे कहीं न पाऊंगा
मैं गीत विरह के गाऊंगा ।
खोजुंगा तुमको सपनों में ,
खोजुंगा तुमको अपनों में,
खोजुंगा बाज़ारों चौबारों में ,
जब तुझे कहीं न पाऊंगा
मैं गीत विरह के गाऊंगा ।
तू मेरे मन की ज्वाला में ,
तू मेरे जीवन की माला में ,
तू मेरे तन की हाला में ,
मैं तुझ से दूर न रह पाऊंगा ।
जब तुझे कहीं न पाऊंगा
मैं गीत विरह के गाऊंगा ।
अंर्तमन की अभिलाषा में ,
मेरे मन की हर आशा में ,
आषा और निराशा में ,
मैं तुझको ही पाऊंगा ।
जब तुझे कहीं न पाऊंगा
मैं गीत विरह के गाऊंगा ।
वीणा की झंकार में ,
वायु की बयार में ,
बारिश की फुहार में ,
तुझसे ही मिल पाऊंगा ।
जब तुझे कहीं न पाऊंगा
मैं गीत विरह के गाऊंगा ।
सरिता के संगम में ,
झरनों की छल-छल में ,
पंछियों की कल-कल में ,
स्वर तुम्हारे ही पाऊंगा ।
जब तुझे कहीं न पाऊंगा
मैं गीत विरह के गाऊंगा ।
आलोक मिश्रा
मोहझरी
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