Friday, May 11, 2018

नर्क की व्यवस्था (व्यंग्य )



           कुछ लोग कहते है स्वर्ग और नर्क भ्रम है और कुछ लोग मानते है कि स्वर्ग और नर्क इसी जीवन में भोगना होता है । हमारे चिंतामन जी कभी भी स्वर्ग और नर्क की बहस में नहीं पड़े । बस एक दिन वे इस पूरे झमेले से मुक्त हो गए याने हमारी और आपकी भाषा में स्वर्ग सिधार गए । हम लोगों का क्या है ...... हम तो नेताओं ,गुण्डों और ढोंगी बाबाओं को भी मरणोपरांत स्वर्गवासी ही कहते रहे है । चिंतामन जी ठहरे बड़े व्ही.आई.पी.सो उन्होने सोचा कि उन्हे मृत्यु के बाद भी  व्ही.आई.पी. सुविधाएं मिलेंगी । उनका सोचना उचित ही था ,उनको लेने भैंसें पर लालबत्ती लगा कर दूत आया । उन्हें भैसे की सवारी पसंद तो नहीं आई लेकिन वे लालबत्ती के कारण सवार हो गए । यहाॅं पहुॅंच कर सारी औपचारिकताओं के बाद ही उन्हें मालूम हुआ कि वे स्वर्गवासी न होकर नर्कवासी हुए है ।

        धर्म ग्रंथों में नर्क ,जहन्नुम और हेल के नाम से रोगंटे खड़े कर देने वाले वृतांतों से भरे पड़े है । उन्होंने लाईन में लग कर नर्क का द्वार पार किया । अंदर पहुॅंचते ही उन्हें बहुत सी महान विभूतियों के दर्शन हो गए । यहाॅं ऐसे भी महान लोगों की संगत उन्हे प्राप्त होने वाली थी जिनके नाम से धरती पर जयंतियाॅं और उत्सव मनाए जाते है । इनमें कुछ ऐसे लोग भी है जिनकी मूर्तियाॅं चैराहों पर खड़ी है । चिंतामन को इनके साथ होने का गर्व और इनके नर्कवासी होने का आश्चर्य भी हुआ । उन्हें दूतों ने बताया कि पहले पहल तेल में उबाला जाएगा । वे तो बहुत ही घबरा गए । चिंतामन को एक कमरे में लाया गया । यहाॅं तेल से भरी एक बड़ी कढाई रखी हुई थी । उनसे कहा गया उन्हें उस तेल में डुबकी लगाना है । उन्होंने ड़रते-ड़रते तेल को छुआ अरे ......... तेल तो एकदम ठंड़ा था ।  दूत बोला ड़रता ‘‘क्यों है......? क्या तुझे सरकार के कोयला और लकड़ी घोटाले के बारे में कुछ भी नहीं मालूम है ? तभी से तेल गर्म करने के लिए कुछ भी नहीं है । अब जलाने , भूनने और तपाने जैसी सजाए ठंड़ी पड़ चुकी है । चल तू तो डुबकी लगा और सजा की औपचारिकता पूरी कर ।’’ चिंतामन ने मन ही मन घोटाले और घोटालाखोरों की जय जयकार लगाई और सजा पूरी कर ली ।

          अब चिंतामन को एक कोठरी दे दी गई । इस कोठरी में भी पाॅंच लोग थे । एक साथी नर्कवासी ने कोठरी को पूर्ण सुविधायुक्त बना रखा था । फ्रिज ,ए.सी., और टी.व्ही. आदि सुविधाएॅं तो उसे प्राप्त ही थी साथ ही साथ वो दस-पंद्रह मोबाईल भी रखता था । इस कोठरी के बाकी लोग उसकी ही चमचागिरी करते थे । चिंतामन को लगा चम्मच बनने में ही फायदा है । यही स्थिति नर्क की अनेंकों कोठरियों में है । ऐसी कोठरियों में कुछ महान विभूतियाॅं नर्कवास काट रही है .............पूरे आराम के साथ ।  चिंतामन की कोठरी वाले महान व्यक्ति एक अंतर्राष्ट्रिय आतंकवादी है उन्हे लोग बाउद नाम से पुकारते है । उन्हें आज भी ग्यारह मुल्कों की पुलिस खोज रही है । उन्हें यहाॅं कोई असुविधा होती तो वे सीधे नर्क मंत्री को फोन लगाते और नर्क के बड़े-बड़े अधिकारी दौड़े-दौड़े आते । बाउद ने चिंतामन को अपना चेला बनाना स्वीकार कर लिया और पूछा ‘‘ स्वर्ग-वर्ग की यात्रा तो नहीं करनी है ? बोलो ... बोलो तो स्वर्ग का वीजा फटा-फट बन जाएगा । ’’ बाउद का जब मन करता वो स्वर्ग घूम आता । उसके पास स्वर्ग का स्थाई वीजा जो है । चिंतामन नर्क में रह कर स्वर्ग के बारे में सोचने लगता । उसे लगता जब नर्क ऐसा है तो स्वर्ग कैसा होगा ?

              बाउद के लोगों ने बताया कि मृत्यु लोक की सरकार सारी योजनाएॅं नर्क और नर्कवासियों के लिए ही बनाती है क्योंकि स्वर्ग में तो सभी सीधे और सरल लोग ही रहते है ; उन्हें जो भी सुविधा के नाम पर मिलता है वे उसमें ही खुश हो जाते है । मृत्यु लोक में नर्कवासी कल्याण योजना के नाम पर  अरबों-खरबों खर्च किए जाते है । इन योजनाओं का लाभ भी कुछ तिकड़मी नर्कवासी ही उठा पाते है । शेष लोग इस नर्क में भी धरती सा जीवन बिताने को मजबूर है । बाउद जैसों को नर्क में रहकर भी बाहर अपनी गतिविधियाॅं चलाने की छूट है । पिछले दिनों स्वर्ग में हुए बम विस्फोट में बाउद का नाम आया था लेकिन हुआ कुछ भी नहीं ।

             एक दिन नर्क के द्वार पर बहुत से स्वर्गवासी फूल-माला ले कर खड़े थे । चिंतामन को पता लगा कि आज बाउद को नर्क से पैरोल पर स्वर्ग जाना है । वैसे भी बाउद साल में छः महिने स्वर्ग में ही रहते है । उनके समर्थक जो उनके जुगाड़ से ही स्वर्ग में है उनके स्वागत् के लिए आए है । इस अवसर पर नर्क और स्वर्ग दोनों के ही मंत्री कोठरी में पधारें । उन्होंने  की ओर बड़ी ही याचना भरी दृष्टि से देखा । बाउद अपनी रुतबे भरी आवाज में बोला ‘‘आप लोग क्यों चिंता करते हो ? मै चुनाव की सारी व्यवस्था कर दुंगा।’’ वे दोनों बाउद के चरणों में गिर ही पड़े ।

             अब चिंतामन अपने आका के बगैर ही नर्क में थे । वे जब नर्क में घूमने निकले तो उनकी मुलाकात अनेक बदहाल नर्कवासियों से भी हुई । कुछ सड़ांध भरी कोठरियों में थे तो कुछ बिना भोजन के । नर्क में भोजन, कपड़े और सभी सुविधाओं में भ्रष्टाचार का आलम था । अनेक नर्कवासी तो केवल पाप करने के संदेह में ही पूरा जीवन नर्क में काटने को मजबूर थे । चिंतामन नर्क की तुलना धरती पर जेलों में चल रही व्यवस्था से करने लगा।

वो धरती पर अच्छे और बुरे लोगों को मिलने वाली सुविधाओं के विषय में भी सोचने लगा । उसका व्हीआईपीपन उस पर हावी होने लगा ;उसने अपने कंधे उचकाए और बोला ‘‘ ऐसा तो होता ही है । ’’

                                                              आलोक मिश्रा     

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