Friday, May 25, 2018

अंतर्विरोध ( कविता )


हम अंतर्विरोधों में जीते है ।
अमृत के साथ जहर पीते है ।
कहने को तो बुध्दिमान  है हम,
दिमाग आज भी रीते के रीते है ।।

शिक्षक बच्चों को पढ़ाते है ।
सब शिक्षकों को पढ़ाते है ।
उसी के सम्मान में एक दिन,
शिक्षक दिवस मनाते है ।।
हम अंतर्विरोधों में जीते है ...........

अंग्रेजी का बोल-बाला है ।
हिन्दी गली-गली अंग्रेजी की कुर्सी है ।
अंग्रेजी में पत्र है आया,
हिन्दी दिवस जो मनाना है ।।
हम अंतर्विरोधों में जीते है .............

राधा-कृष्ण का प्रेम पूज्य है ।
प्रेम कहानियाॅं स्वीकार्य है ।
अपने ही बच्चों के प्रेम पर,
वेलेन्टाईन-डे से ऐतराज है ।।
हम अंतर्विरोधों में जीते है .............

गणतंत्र दिवस आफिस मनाते है ।
शिक्षक दिवस बच्चे मनाते है ।
बड़े ही अबोध है बेचारे,
बाल दिवस भी खुद ही मनाते है ।।
हम अंतर्विरोधों में जीते है .............

वो बिलखती रही, रोती रही ।
पुलिस चैन से सोती रही ।
आज इंतेजाम है चाक-चैबंद,
महिला दिवस पर आये मंत्री चंद ।।
हम अंतर्विरोधों में जीते है .............
कुछ सज्जन बंद कमरे में है ।
वे धीरे-धीरे फुस्फुसाते है ।
ये क्या तमाशा है हो रहा,
यहाॅं मानव अधिकार दिवस मन रहा है ।।
हम अंतर्विरोधों में जीते है .............

दिवसों की महिमा अपरंपार  है ।
रोज ‘‘डे’’ - दिवसों की बहार है ।
करने को तो कुछ भी नहीं,
मनाना और भूल जाना है ।।
हम अंतर्विरोधों में जीते है .............

अब तो मदर, फादर भी लाईन में है ।
हसबैंड और वाईफ भी डिजाईन में है ।
अब रोज एक दिवस मनाऐंगे,
जिंदगी के दुख-दर्द भूल जाऐगें ।।
हम अंतर्विरोधों में जीते है .............



                                               (आलोक मिश्रा)

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