चीखें और किलकारियॉ
मॉओं की चीखें गलों में फंस गई |
गोलियों के बीच किलकारीयॉ दब गई |
लाल थे सपूत थे,
शांति के दूत थे,
हो रहा था भोर,
पुष्पदल खूब थे,
कलियॉ थी बिखर गई |
मॉओं की चीख गलों में फंस गई |
गोलियों के बीच किलकरीयॉ दब गई |
वो मान से भर गए,
वो ग्यान ड़र गए,
वो प्रकाश से ड़र गए,
अंधेरा वो कर गए,
पुस्तकें यूं बिखर गई |
मॉओं की चीख गलों में फंस गई |
गोलियों के बीच किलकरीयॉ दब गई |
कापीयों पे खून था ,
किताबों पे खून था,
खून सब ओर था ,
खून सवार जो था ,
इंसानियत ही ड़र गई |
मॉओं की चीख गलों में फंस गई |
गोलियों के बीच किलकरीयॉ दब गई |
सरों पे संगीन थी ,
मौत की मशीन थी ,
कायरों की जमीन थी ,
न कोई उम्मीद थी ,
चिर नींद उन्हें ले गई |
मॉओं की चीख गलों में फंस गई |
गोलियों के बीच किलकरीयॉ दब गई |
वो शमा जला गए ,
वो फूल एक चढ़ा गए,
वो गम भी जता गए ,
फिर उनसे ही मिल गए,
क्यों दुनियॉ दोगली हो गई |
मॉओं की चीख गलों में फंस गई |
गोलियों के बीच किलकरीयॉ दब गई |
आलोक मिश्रा
मॉओं की चीखें गलों में फंस गई |
गोलियों के बीच किलकारीयॉ दब गई |
लाल थे सपूत थे,
शांति के दूत थे,
हो रहा था भोर,
पुष्पदल खूब थे,
कलियॉ थी बिखर गई |
मॉओं की चीख गलों में फंस गई |
गोलियों के बीच किलकरीयॉ दब गई |
वो मान से भर गए,
वो ग्यान ड़र गए,
वो प्रकाश से ड़र गए,
अंधेरा वो कर गए,
पुस्तकें यूं बिखर गई |
मॉओं की चीख गलों में फंस गई |
गोलियों के बीच किलकरीयॉ दब गई |
कापीयों पे खून था ,
किताबों पे खून था,
खून सब ओर था ,
खून सवार जो था ,
इंसानियत ही ड़र गई |
मॉओं की चीख गलों में फंस गई |
गोलियों के बीच किलकरीयॉ दब गई |
सरों पे संगीन थी ,
मौत की मशीन थी ,
कायरों की जमीन थी ,
न कोई उम्मीद थी ,
चिर नींद उन्हें ले गई |
मॉओं की चीख गलों में फंस गई |
गोलियों के बीच किलकरीयॉ दब गई |
वो शमा जला गए ,
वो फूल एक चढ़ा गए,
वो गम भी जता गए ,
फिर उनसे ही मिल गए,
क्यों दुनियॉ दोगली हो गई |
मॉओं की चीख गलों में फंस गई |
गोलियों के बीच किलकरीयॉ दब गई |
आलोक मिश्रा
No comments:
Post a Comment