Sunday, May 27, 2018

छुक - छुक गाड़ी ( लेख )



      बचपन की छुक-छुक गाड़ी अब रेल गाड़ी हो गई है । हमें याद है  कि बचपन में भाप इंजन से चलने वाली रेलगाड़ीयों में इंजन से दूर वाले ड़िब्बों में भीड़ अधिक होती थी कारण सिर्फ इतना कि हवा में उड़ते कोयलों से ये ड़िब्बे बचे रहते थे । अब जब हम बुलेट ट्रेन की बात करने लगे है । तब भी देश के बहुत से क्षेत्रों में रेलगाड़ी की पहुॅच नहीं है या छोटी लाईन के खिलौना ड़िब्बों में यात्रा कर रहे है । दुनिया का सबसे बड़ा रेल पथ होने के बावजूद भी दस प्रतिशत आबादी कभी भी रेल में नहीं बैठी है । हमारे देश में रेलों की गति बढने के साथ ही साथ दुर्घटनाओं की संख्या भी बढी है ।

     हम रेलों से क्या चाहते है और हमारा रेलों का सफर कैसा हो ? इस विषय पर अनेक विद्वान सोचते तो होंगे ही और वे सोच कर योजनाऐं भी बनाते ही होंगे । इन्ही योजनाओं के चलते पैसेंजर,गरीब रथ ,राजधानी और संपर्क क्रंति जैसे नाम सामने आए है । नाम कुछ भी क्यों न हो एक आम आदमी या तो पैसेंजर में या फिर किसी रेल के आगे और पीछे की ओर लगे दो ड़िब्बों में भेड़-बकरीयों की तरह यात्रा करने को मजबूर है। किसी आम ट्रेन में दो जनता ड़िब्बों में कुल 144 यात्रीयों की ही बैठक व्यवस्था होती है जिसमें अक्सर ही 800 से 1000 यात्रीयों को सफर करत हुए देखा जा सकता है । आपको ऐसे ड़िब्बों में शौचालय तक में चार-पाॅंच लोग बैठे मिल जाऐंगे । गरीबों के लिए घोषित गरीब रथ में शायद ही कोई गरीब दिखाई दे । स्टेशनों पर भी इन आम लोगों के लिए प्रतिक्षलयों को भगवान भरोसे ही सुविधाविहीन   छोड़ा गाया है ।

     हमारी योजनाऐं गरीबों को केन्द्रित करके बनाई जाती है लेकिन रेल के सफर में आपको ऐसा नहीं लगेगा । ऐसे लोग जो कुछ अधिक पैसे देकर योजना बना कर यात्रा कर सकते है वे आरक्षित ड़िब्बों में यात्रा करते है । यहाॅं भी अनावश्यक लोगों के होने उन्हें प्राप्त सुविधाएं प्राप्त नहीं हो पाती है । देखा जाए तो रेलगाड़ीयों में भी आपको देश में फैल रहा वर्गभेद स्पष्ट ही दिखाई दे जाएगा । यह वर्गभेद आय के साधन के रूप में स्विकार्य है और इसका समाप्त होना असम्भव ही दिखाई देता है और मेट्रो या बुलेट ट्रेन इस वर्ग भेद की रेखा को और गहार ही करेगी ।

     मैने बहुत खोजने की कोशिश  की लेकिन मुझे कोई भी एक्सप्रेस या सुपरफास्ट ट्रेन ऐसी नहीं मिली जिसमे सभी ड़िब्बे सामान्य के यात्रियों के लिए ही हो । इससे यह पता चलता है कि सब लोग यह मान बैठे है कि एक सामान्य व्यक्ति को कहीे भी जाने की कोई जल्दी नहीं होती ,उसे सुविधा देना भी कोई जरूरी नहीं है । अक्सर रेलें सफाई और पानी के आभाव में भी चलती रहती है । जिसका खमियाजा यात्रीयों का ही भुगतना पड़ता है । मैने कई ट्रेनों में सफाई करके भीख मांगते बच्चों भी देखा है । स्टेशनों पर और ट्रेनों में घटिया सामानों के बेभाव बिकने के पीछे कौन है ? यह जानना और उसे रोकना भी जरूरी है ।

     ट्रेनों में आरक्षण की अवैध वसूली करने वाले कोटधारी यह कार्य बड़ी ही बेशर्मी के साथ सब के सामने करते देखे जा सकते है । सामान्य दर्जे में बैठा यात्री पूरी यात्रा के दौरान यह सोचता रहता है कि कोई उसका टिकट देखेगा ,लेकिन वो स्टेशन से बाहर भी आ जाता है और उसका टिकट कोई नहीं देखता ।  ऐसे टिकटधरी से रेल राजस्व को तो फायदा होगा शायद काटधारी को न हो । इन ड़िब्बों में टिकट को सही तरह से न देखने से बिना टिकट यात्रियों को बढावा ही मिलता है । बिना टिकट यात्रा से राजस्व का जो नुकसान होता है उसकी भरपई ईमानदारी से टिकट पर यात्रा करने वालों को असुविधाओं और किराय की बढोतरी के रूप में करनी पड़ती है । ड़िब्बों में सुरक्षा के नाम पर शायद ही कोई कर्मचारी तैनात हो । अक्सर ऐसे कर्मचारी बकरा तलासने के लिए रूकी हुई गाडीयों के आस-पास देखे जा सकते है ।

       आज भी देश में मानव रहित रेलवे क्रासिंगों की संख्या सामान्य से अधिक है । कुछ ऐसी रेलें है जिन्हे क्रासिंग के पहले रोक कर फाटक को बंद किया जाता है और पूरी रेल के निकलने के बाद रेल में मौजूद कर्मचारी पुनः उसे खोल कर आगे बढता है । ये आपको हास्यस्पद लग रहा होगा लेकिन यह व्यवहारिक रूप में हो रहा है । इस व्यवस्था के चलते रेलों कि गति के साथ ही साथ राजस्व भी प्रभावित होता है । कुछ क्रासिंग तो मानव रहित के साथ ही साथ फाटक रहित भी है । यहाॅं रेल  और सड़क यात्रीयों को सुरक्षा की दृष्टि से भगवान भरोसे ही छोड़ गया है । किसी दुर्घटना के होने पर कुछ दिन शोर-शराबा होता है फिर वही ढांक के तीन पांत ।

     रेल किराये की बढोतरी और आम जनता की सुविधाओं के बीच तालमेंल का आभाव अनेंक वर्षो से देखा जा रहा है । अब अच्छे दिनों के रेल बजट में शायद आम जनता के अच्छे दिन आ सकते है । 

                        आलोक मिश्रा

                         मोहझरी

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