Thursday, May 10, 2018

क्यों बे बुडढे ... ( कहानी )



          ‘क्यों बे बुडढे ... ’  मैसेज था । उसने अपने ऑफिस के कम्प्यूटर में देखा । उसने हमेशा की ही तरह उसे अनदेखा किया । वो अपने ऑफिस  में कम्प्यूटर से हट कर दूसरे कामों को निपटाने लगा ।  वो पचास के पार हो चला था । उसकी उम्र के लोग अभी तक संचार की नई तकनीक का प्रयोग कम ही कर रहे थे लेकिन उसे जमाने के साथ चलने की ललक थी । वो हर नवीन ज्ञान को स्वीकार करता और ज्ञान की दृष्टि से अपने आप को युवा रखने का प्रयास करता । काल के इस ठहरे हुए क्षण में स्मार्ट मोबाईल , सोसल नेटवर्किंग साइटस् और कुछ मैसेंजरों से तेज होते चैट की बहार थी । वो इंटरनेट की दुनिया में अपने अभासी मित्रों से जुड़ा था । वो विचारों को अभिव्यक्त करने हेतु यहॉं स्थान खोजता । लोगों की तारीफ करता और खुद की सुन कर खुश होता । उसके आभासी दोस्तों की संख्या बढने लगी । उसके दोस्तों में स्त्री-पुरुष , देसी-विदेशी   तथा युवा और उम्रदराज लोग थे ।वो अब अपने आसपास वालों से कम इन दोस्तों  से अधिक संपर्क में रहता । लोग इस मायाजाल में छद्म नामों से आते और अपनी दमित इच्छाओं की पूर्ति करने का प्रयास करते । यहां पहचान के अभाव में वे गालियॉं बकते , झूठ बोलते और अपनी यौनेच्छाओं की पूर्ति आभासी दुनिया में करते ।

         इस आभासी दुनिया की दीवाले जहॉ पाठशालाओं की तरह ज्ञान का खजाना थीं, वहीं पुराने जमाने के मूत्रालयों की दीवालों सी गंदी अभिव्यक्तियों से भी भरी पडी थी । वो  इस वातावरण के बीच भी सोसल साइटों पर वास्तविक नाम और उम्र के साथ अपने विचार व्यक्त करने की कोशिश कर रहा था । उसके लिए यह माध्यम अबोध बालक की स्लेट था । प्रारम्भिक दौर मे उसने भी छद्म नामों से आनंद की अनुभूतियॉ की, परन्तु इससे उसका अभिमानी मन संतुष्ट न हुआ, सो वह आभासी दुनिया में वास्तविक हो गया । उसे पहले की ही तरह स्त्री और पुरुषों के प्रेम और यौन निवेदन आए । कुछ लोग उसकी ‘‘वाल’ पर जो उसके लिए स्लेट थी अश्लील चित्र और वीडियों डाल देते । वो उन्हें बडी शालीनता से अस्वीकार करता और हटाता चला गया । उसे जो काम का मिला लिया और बाकी छोड़ता चला गया । फिर एक दिन उसे वो मैसेज आया ‘‘ क्यों बे बुड्ढे ........’’ । उसे लगा इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए । फिर एक दो दिनों यह संदेष और अधिक अपशब्दों के साथ आने लगे । साईट पर कोई नाम था और किसी हीरो का फोटो । इस प्रोफाइल का कोेई मतलब न था । वो जानता है कि इस आभासी मुखौटे के पीछे कोई वास्तविक व्यक्ति ही है जो कहीं बैठा बटनो से खेल रहा होगा । उसके लिए उस छद्म नाम वाले व्यक्ति को पहचानने से अधिक उसके दिमाग को पढने की चुनौती थी ।

           उसने जवाब दिया ‘‘ आप क्यों नाराज है ? ’’ उस छद्म व्यक्ति को शायद केवल प्रतिक्रिया का इंतजार था ।  इस बात से तो जैसे छद्म व्यक्ति को पंख ही लग गए । उसने गालियों और संदेशों की गति और असभ्यता बढा दी । अब उसे तनाव होने लगा , उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि छद्म व्यक्ति उसे गालियॉं क्यों दे रहा है । वो इतनी आसानी से हार मानने को तैयार न था । उसने उसे मैसेज करके  ठीक से बात करने , सोच समझ कर बात करने और शालीनता के दायरे में रह कर बात करने को चेताया । इस सब का छद्म व्यक्ति पर न कोई प्रभाव पडना था और न पडा । वो लगातार गालियॉं देता रहा । हमारा नायक एक सामान्य आदमी ही था जिसे गुस्सा भी आता था । उसने गुस्से के आवेग में मैसेन्जर पर जवाब में गालियों की गोलियॉ दागने का फैसला किया लेकिन उसने तो कभी वास्तविक जीवन में भी कभी किसी को गाली नहीं दी थी । वो रुक जाता है और सोचने लगता है ‘‘ मै गाली नहीं दूंगा .... मै इस आभासी दुनिया में भी वास्तविक रुप में ही रहुॅंगा । कोई और विकल्प तो होगा ...।’’ इस काल में उस के पास अधिक विकल्प न थे , इस समय इस तरह की घटनाए अपराध के रुप में परिभाषित न थी और कोई इन्हें गंभीरता से नहीं लेता था ।

            नायक गाली-गलौज वाले संदेशों से परेषान था । हर संदेश उसे कही भीतर तक आहत कर जाता । वो अपने आप को ऑफ लाईन रखने लगा । उसके ऑन लाईन होते ही उसे वे संदेश प्राप्त होने लगते । काफी सोच विचार और खोज बीन के बाद उस छद्म दोस्त को अदोस्त किया जा सका । उसके मन का बोझ अभी कम नहीं हुआ था ,उसके मन में अभी भी उथल पुथल मची थी कि आखिर क्यों कोई किसी अन्जान व्यक्ति को इस तरह गालियॉं बकता है ? इससे उसे क्या प्राप्त होता है ? क्या यह कोई नई बीमारी है या कुछ और ? वो बहुत ही गंभीर मुद्रा में ऑफिस में अपनी कुर्सी पर बैठा सोच रहा था  ।  ऑफिस में ही किसी कुर्सी पर बैठा सहकर्मी मुस्कुरा रहा था ।

                                                                                        आलोक मिश्रा

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