Wednesday, May 9, 2018

यादों की रौनक अभी बाकी है ..( गज़ल )


यादों की रौनक अभी बाकी है ..
कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।
वो बीते वक्‍त के पैरों के निशां अभी बाकी है ।
        वो  तेरी  महक , चूड़ीयों  की  खनक  बाकी है ।
        वो तेरे चेहरे की रंगत,फुसफुसाती चहक बाकी है ।
        कई  साल  हुए , गुज़रे चुके  है यादों के जलसे ।
                          वक्‍त  के  पैरों  के  निशां  अभी  बाकी  है ।
कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।
वो बीते वक्‍त के पैरों के निशां अभी बाकी है ।
        वो दीवर की ओट से झांकता चेहरा ।
        वो शर्म ओ हया से लाल सा चेहरा ।
                        आईने पे तेरे लबों की लाली अभी बाकी है ।
कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।
वो बीते वक्‍त के पैरों के निशां अभी बाकी है ।
        वो दीदार के इंतजार को तरसती आंखे ।
        मिलने पर शर्म से झुकी और मुंदी आंखे  
                      मेरे कुर्ते पर तेरे सूरमे के निशां अभी बाकी है ।
कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।
वो बीते वक्‍त के पैरों के निशां अभी बाकी है ।
          कमबक्‍खत वक्‍त ने दूर किया था जब हमें ।
          फिर मिला देने का झांसा दिया था जब हमें ।
                               उस बुरे वक्‍त की पीर अभी बाकी है ।
कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।
वो बीते वक्‍त के पैरों के निशां अभी बाकी है ।
          ये तस्‍सबुर कि मिले थे हम कभी ।
          महका जाता है मेरी शामों को आज भी ।
                            तू नही , तेरी यादों के सहारे अभी बाकी है ।
 कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।
वो बीते वक्‍त के पैरों के निशां अभी बाकी है ।
          वो वादे इरादे , वो आंसूओं की झड़ी ।
         टूट के बिखरती हुई वो बेनी की लड़ी ।
                            किताबों के सूखे फूलों में महक अभी बाकी है ।
 कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।
वो बीते वक्‍त के पैरों के निशां अभी बाकी है ।
गुमनाम हुआ हुँ मैं
बदनाम था तो मशहूर था अब गुमनाम हुआ हुँ मैं ।
शराफ़त से जीना क्‍या सीख लिया भीड़ में गुम हुआ हुँ मैं ।
सच्‍चा हुँ सच्‍चा हुँ सच बोलता हुँ मैं ।
ईमानदार  हुँ ईमान से रहता  हुँ मैं ।
ठगता रहा दूसरों को नहीं ख़ुद को ही
ख़ुद  से  ही  झूठ  बोलता  हुँ मैं ।
                                                               बदनाम था तो मशहूर था अब गुमनाम हुआ हुँ मैं ।
शराफ़त से जीना क्‍या सीख लिया भीड़ में गुम हुआ हुँ मैं ।

सब  सोचते है  बहुत  घूमता हुँ मैं ।
जमाने के हर प्रपंच में डोलता हुँ मैं ।
जो  दिखता  है  वो  कोई  और है
मन  के  पिंजरों में बंद रहता हुँ मैं ।
 बदनाम था तो मशहूर था अब गुमनाम हुआ हुँ मैं ।
शराफ़त से जीना क्‍या सीख लिया भीड़ में गुम हुआ हुँ मैं ।

लक्ष्‍य  से  आगे  सोचता  हुँ  मै ।
पराजय की आशंका से ड़रता हुँ मैं ।
विजय  के  स्‍वप्‍न की योजनाओं में
राह   से   भटक  जाता   हुँ  मैं ।
                                            बदनाम था तो मशहूर था अब गुमनाम हुआ हुँ मैं ।
शराफ़त से जीना क्‍या सीख लिया भीड़ में गुम हुआ हुँ मैं ।

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