Sunday, May 20, 2018

चुनावी काॅंव- काॅंव (व्यंग्य )



            आजकल चुनावी वातावरण है । हर तरफ चुनावी खिचड़ी,पुलाव और बिरयानी पक रही है । नेताओं ने पारंपरिक सुअर पार्टी और गधा पार्टी का टिकट प्राप्त करने के लिए एड़ी- चोटी लगा दी ।  सफलता  तो एक-एक को ही मिलनी थी , शेष सब असफल हो गए । असफल लोगों के लिए विकल्प खुले थे वे चाहें तो पार्टी में रहते हुए उसका कबाड़ा कर सकते थे या निर्दलीय खड़े हो कर शक्ति प्रदर्शन कर सकते थे । ऐसे लोगों के पास दूसरी पार्टियों जैसे उल्लू पार्टी , गिद्ध पार्टी और जूता पार्टियों के विकल्प भी  है । वास्तव में राजनीति कभी भी र्निविकल्प नहीं होती । जिन लोगों ने अपनी अपनी खेमेबाजी, चालबाजी और कलाबाजियों से टिकट का जुगाड़ कर ही लिया है अब वे ही असंतुष्टों को मनाने में लगे है । असंतुष्ट भी रुठी पत्नी की तरह बिना कुछ लेन-देन के कहाॅं मानते है ।

        चुनावी संग्राम का बिगुल बज गया । छोटे कार्यकर्ता अपनी खिचड़ी पकाने में लगे है । सुबह के समय वे गधा पार्टी के दफ्तर में होते है तो शाम को वे सुअरों के साथ घूम रहे होते है । ऐसे कार्यकर्ता तो केवल टोपी और गमछे बदल कर इस अवसर को रोजगार के रुप में देखते है और कुछ कमा लेना चाहते है । पार्टियों को भी भाड़े की भीड की आवश्यकता होती है सो दोनों अपने-अपने कामों को साधने में लग जाते है । इस महासमर में सभी सेनाएॅं तैयार हो चुकी है । इन सेनाओं के प्रमुख एक दूसरे पर आरोपों के तीर चलाने लगे है । ये आरोप उन्हें पिछले पांच सालों में दिखाई नहीं दिए थे । इस युद्ध की भीषणता का अंदाज चर्चाओं, रैलियों और प्रचार से होने लगता है । अब इनके प्रचार और भाषणों से यह मालूम होता है कि हम जनता को क्या कुछ मिलना चाहिए था मगर मिल नहीं पाया । वादों की घनघोर वर्षा के बीच यह समझना कठिन हो जाता है कि कौन सही है और कौन गलत । हेलीकाप्टर वालों की रैलियों को छोटे शहरों में बहुत सफलता प्राप्त होती है । हमारे लल्लन जी एक ऐसी ही रैली से लौटे तो हमने पूछा ‘‘ रैली में क्या हुआ ?’’ वे बोले ‘‘अरे .... मिश्राजी... आज हमने हेलीकाप्टर देखा ..... सच में बहुत ही बड़ा था ।’’ हमने पूछा ‘‘नेताजी क्या बोले ?’’ वे अपनी ही धुन में थे ,बोले ‘‘ नेता क्या बोलते है ? वे जब हेलीकाप्टर से उतरे तो हमने देखा कि अंदर सोफे लगे है । ’’ हमें ऐसी रैलियों की सफलता का राज़ समझ में आ गया ।

        निर्दलीय नेकीराम बेचारे अब चुनाव में खड़े हो कर भी पछता रहे है । कल वे भी मिल ही गए तो हम पूछ ही बैठे ‘‘ इस बार कैसे खड़े हो गए ?’’ वे बोले ‘‘हमें पता लगा था कि बैठने के भी पैसे मिलते है ।’’ हम बीच में ही बोल पड़े ‘‘ फिर ......।’’ वे बोले ‘‘ फिर क्या......? हमें कोई बैठालने के लिए आया ही नहीं । बस अब हम खड़े है । ’’ हम सोचने लगे कि जिन्हे अपने ही परिवार के भी चार वोट पूरे न मिलने वाले हो उन्हें कोई क्यों बैठाने के लिए पैसे देगा ।

           चुनावों का वातावरण बहुत ही मजेदार होता है । आप कहीं भी निकल जाऐं कोई परिचित हो या अपरिचित बस एक जुमला उछाल दीजिए ‘‘ किसका जोर चल रहा है ?’’ बस किसी चैनल के वाद-विवाद की ही तरह चर्चा प्रारम्भ हो जाती है ।

पहला कहता है ‘‘ सुअर का जोर है ।’’

दूसारा बोला ‘‘ कैसे मुझे तो नहीं लगता ।’’

पहला पूरी विद्वता के साथ बताता है ‘‘ सुअरों की संख्या अधिक है तो उन्हें जातिगत लाभ मिल रहा है और दूसरा कोई जाति वाला न खड़ा होने से भी सुअर के जीतने के चांस अधिक है ।’’

तीसरा जो अब तक चुप था चर्चा में कूद पड़ा ‘‘लेकिन सुअर ने किया ही क्या है ?’’

पहला फिर शुरु हो गया ‘‘ देखिए चुनाव में कोई काम-वाम नहीं देखता । फिर वे हर शादी- ब्याह और जलसों में नाचे भी तो बहुत है । ’’

दूसरा बोला ‘‘ लेकिन गधा भी तो कोई कम नहीं ।’’

चौथा जो अब तक खामोश था बोला ‘‘ गधे की पार्टी वाले ही उसे धोखा दे रहे है । उसके पास तो कार्यकर्ता ही नहीं है । उसे तो लोग डमी मानते है । ’’

पहला पक्का सुअरवादी था बोला ‘‘ नहीं....नहीं सुअर की टक्कर गधे से ही है । ’’

दूसरा बोला ‘‘ लेकिन मैने सुना है कि गिद्ध इन दोनों पर भारी पड़ रहा है ।’’

तीसरा बोला ‘‘ हाॅं.... हाॅं  मुझे भी लगता है कि गिद्ध , सुअर और गधे को पीछे छोड़ देगा ।’’

पहला फिर विद्वान बन गया और तेज-तेज बोलने लगा ‘‘ ये सब फालतू की बाते है गधा और गिद्ध एक ही जाति के है तो इनके वोट आपस में कट जाएंगें । जीत तो सुअर की ही होनी है ।’’

चैथा बोला ‘‘ जाति -जाति तो क्या दूसरे लोग तेल लेने जाएंगें ?’’

            ऐसी चर्चाऐं कभी पूरी नहीं हो पाती है। इनमें कुछ लोग तो अपना काम ही कर रहे होते है याने प्रचार और कुछ लोग जनता की नब्ज़ टटोलने की कोशिश कर रहे होते है । ऐसी चर्चाऐं गली ,मोहल्ले और नुक्कड़ों पर आज कल आम है । यहाॅं हम ऐसी ही चर्चाओं से अपने शहर का मूड़ समझने की कोशिश पिछले कई दिनों से कर रहे है और बड़ी-बड़ी चैनल वाले न जाने कब आकर सर्वे करके चले गए ? अब  हमें एक बताता  है कि सुअरों का बहुमत होगा और दूसरा गधों का तीसरा गिद्धों के सहयोग से सरकार बनाने की बात करता है । ऐसे अदृश्य सर्वे वाले न जाने कैसे इतने अच्छे ज्योतिष हो जाते है ? न जान हमें कौन धोखा दे रहा  नेता ,पार्टी या ये चैनल वाले ? ऐसा भी तो हो सकता है कि सब मिल कर हमें धोखा दे रहे हो ? बस अब सोच समझ कर मतदान करना ही हमारे हाथ में है।



                                    आलोक मिश्रा

                                 व्याख्याता ,मोहझरी 

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