Monday, May 7, 2018

यादों की रौनक अभी बाकी है ..( व्यंग्य )

यादों की रौनक अभी बाकी है ..
कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।
वो बीते वक्ते के पैरों के निशां अभी बाकी है ।
        वो  तेरी  महक , चूड़ीयों  की  खनक  बाकी है ।
    वो तेरे चेहरे की रंगत ,फुसफुसाती चहक बाकी है ।

        कई  साल  हुए , गुज़रे चुके  है यादों के जलसे ।
           वक्त,  के  पैरों  के  निशां  अभी  बाकी  है ।
कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।
वो बीते वक्ते के पैरों के निशां अभी बाकी है ।

        वो दीवर की ओट से झांकता चेहरा ।
        वो शर्म ओ हया से लाल सा चेहरा ।
             आईने पे तेरे लबों की लाली अभी बाकी है ।
कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।

वो बीते वक्ते के पैरों के निशां अभी बाकी है ।
        वो दीदार के इंतजार को तरसती आंखे ।
        मिलने पर शर्म से झुकी और मुंदी आंखे
               
         मेरे कुर्ते पर तेरे सूरमे के निशां अभी बाकी है ।
कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।

वो बीते वक्ते के पैरों के निशां अभी बाकी है ।
          कमबक्खकत वक्ति ने दूर किया था जब हमें ।
          फिर मिला देने का झांसा दिया था जब हमें ।
                     उस बुरे वक्ता की पीर अभी बाकी है ।
कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।

वो बीते वक्ते के पैरों के निशां अभी बाकी है ।
          ये तस्सेबुर कि मिले थे हम कभी ।
          महका जाता है मेरी शामों को आज भी ।
             तू नही , तेरी यादों के सहारे अभी बाकी है ।

 कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।
वो बीते वक्तु के पैरों के निशां अभी बाकी है ।

          वो वादे इरादे , वो आंसूओं की झड़ी ।
         टूट के बिखरती हुई वो बेनी की लड़ी ।
        किताबों के सूखे फूलों में महक अभी बाकी है ।

 कई साल गुज़रे यादों की रौनक अभी बाकी है ।
वो बीते वक्तु के पैरों के निशां अभी बाकी है ।

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