रामभरोसे जी बहुत ही पुण्यात्मा थे । सब लोग कहते है ‘‘ उन्होंने नेकी के कामों से दोनों ही लोक सवांरे है ।’’ जैसा कि सबके साथ होना निश्चित है ; एक दिन रामभरोसे इस दुनियां से निकल लिए । भाषा पर ध्यान मत दीजिए ; आप को यदि सुसंस्कृत भाषा चाहिए तो उनकी आत्मा इस नश्वर देह को छोड़ कर ब्रम्ह तत्व परमात्मा में विलीन हो गई । सीधे-सीधे कहें तो वे अल्लाह, ईश्वर या गाॅड़ को प्यारे हो गए । काश ....... आत्मा और परमात्मा में इतना ही सीधा और सरल सम्बन्ध होता । आत्मा और परमात्मा के बीच दुनिया के सभी धर्मों ने पाप- पुण्य और स्वर्ग-नर्क जैसी दीवारें खड़ी कर रखी है । रामभरोसे की आत्मा उनके शरीर से तो अच्छी - भली निकल गई । अब उन्हें धर्म ग्रंथों की बातें याद आने लगी लेकिन उन्हे लेने के लिए फरिस्ते, एंजल और देवदूत कोई भी नही आए । वे अपने शरीर के आस- पास ही रहे ;उन्हें लगा कहीे कोई भैंस पर ही लेने आएगा परन्तु ऐसा भी नहीं हुआ । वे अपने शरीर के पास रोते- बिलखते लोगों से बोर हो चुके थे सो वे पैदल ही चल दिए । वे इस रास्ते पर पहले कभी नहीं आए थे लेकिन वैतरणी के होने का अंदेशा तो था । उन्हे कोई गाय और वैतरणी भी नहीें मिली । वे चलते रहे दूर कहीं रोशनी थी और शोर सुनाई दे रहा था । उन्हें लगा यही उनकी मंजिल होगी ।
वहाॅं पहुॅच कर देखा तो यहाॅं बहुत ही गहमा -गहमी थी । उन्होंने पूछा कि यहाॅं क्या हो रहा है? तो किसी ने बताया कि ‘‘ यही आत्माओं का दफ्तर है ।’’ रामभरासे सोचने लगे ‘‘ आत्माओं का दफ्तर ...... अच्छा सारी आने वाली आत्माओं को यहीं रिर्पोट करना होता होगा । ’’ उन्होंने चारों ओर नजर घुमाई तो देखा कि बहुत से लोग यहाॅं-वहाॅं घूम रहे थे , कुछ लोग बैठ कर हंसी-मजाक कर रहे थे और कुछ लोग चाय-पकौड़ियाॅं खा रहे थे । इसे देख कर तहसील कार्यालय के बाहर होने का भ्रम होता है । दफ्तर पुराना सा था ,जैसे धरती पर सरकारी स्कूल । कुछ लोग परिवाहन और तहसील कार्यालय की ही तरह बाहर टीन शेड़ में कुर्सियाॅं डाले बैठे थे । उनके पास भी अच्छी-खासी भीड़ थी । रामभरोसे को लगा उनमें से ही किसी से पूछा जाए कि ‘‘स्वर्ग किधर से जाते है । जिससे रामभरोसे ने यह पूछा वो भड़क गया और बोला ‘‘ स्वर्ग की वो लाईन है देख रहे हो न ..... खड़े हो जाओ,तीन साल बाद भी नम्बर आ जाए तो नाम बदल देना । बोलो आपको जाना है क्या ...?..... पैसे लगेंगे स्वर्ग के लिए भी और नर्क के लिए भी और कुछ अधिक करोगे तो नर्क में भी स्वर्ग का मजा मिल सकता है । ...... बोलो ..... तो फार्म भरें । रामभरोसे चोैक गए आत्मा और पैसा ....... ये कैसा बाजार है ? वे बोल पड़े ‘‘ हम तो खाली हाथ ही आए है ।’’ वो आदमी बोला ‘‘ यहाॅं तो सब खाली हाथ ही आते है । आप हाॅ करो आपके ‘‘हां’’ के स्कैन होते ही हम ई- पेमेन्ट से पैसे ले लेंगे । तब तक आप बस फार्म भरो ।
रामभरोसे ठहरे ईमानदार आदमी उन्होंने मना कर दिया । बहुत पूछताछ के बाद उन्हें पता लगा कि सभी आत्माओं को रजिस्ट्रेशन करवाना होता है । बस वे रजिस्ट्रेशन की लाईन में लग गए । कई घंटों के बाद उनका नंबर आया तो लंच टाईम हो गया था ;काउंटर बंद हो गया । वे सोचने लगे खड़े रहते है अब कोई काम भी तो नहीं है । बाबू साहब आराम से लौटे तो राम भरोसे ने अपना नाम बताया । बाबू अनसुना करते हुए बोला ‘‘ मृत्यु प्रमाणपत्र लाए हो ?’’ रामभरोसे भौचक्के से बोल पड़े ‘‘ नहीं..... नहीं ,अचानक ही आना हो गया ।’’ बाबू ने गौर से देखा और बोला ‘‘ देखो ये फार्म लो और भर कर दो ,मृत्यु प्रमाणपत्र और परिचय पत्र के साथ ही लाना ......न समझ में आए तो उधर किसी से मिल लेना ।’’ उसका इशारा दलाल शेड़ की ओर था । रामभरोसे कोरे फार्म के साथ लाईन से बाहर खड़े थे । ये सब लेने के लिए वापस धरती पर जाना पड़ेगा । किसी ने बताया ये सब आत्मालोक में फिर से बनवाने पड़ते है । वे फिर से दलाल से मिले , उन्होंने काम का रेट बता दिया । रामभरोसे की ईमानदारी और माया मोह टूटने लगा । उन्होंने दलाल को इधर हाॅं कहा और उधर कागज मिल भी गए ।
वे फिर लाईन में थे । बाबू ने फार्म चैक किया मृत्यु प्रमाणपत्र और परिचय पत्र देखा और बोला ‘‘ आरक्षित या अनारक्षित ’’ रामभरोसे ने जवाब दिया ‘‘ अनारक्षित ’’ बाबू ने स्टेटस चैक किया और बोला ‘‘पुण्य तो बहुत किए है लेकिन अभी आप के कोटे में स्वर्ग की वेटिंग चल रही है । ’’ राम भरोसे अचकचा गए ‘‘ वेटिंग ....... कितना ?’’ बाबू बोला ‘‘ दस साल ....... याने दस साल बाद ही आप को स्वर्ग मिल पाएगा । ’’ रामभरोसे ने पूछा ‘‘ तब तक .....?’’ बाबू बोला तब तक दलाली करो यहाॅं या धरती के आफिसों में ; नही ंतो भूत बन के लोगों को सताते फिरो ....ये अपना स्वर्ग का गेट पास लो और दूसरे को आने दो । ’’ अब रामभरोसे के हाथ में स्वर्ग का गेटपास था पर दस साल आगे का । वे अब मर कर भी परेशानी में थे । उन्हें लगा धरती लोक हो या आत्मा लोक असली भगवान तो दलाल ही है । वे पुनः एक एजेन्ट से मिले और अपना स्वर्ग का गेट पास दिखाया तो वो हंस पड़ा ‘‘छोड़ो साहब कहाॅं स्वर्ग-वर्ग की लगा रखी है यहीं बैठ जाओ और कुछ कमा लो ....... मेरा गेट पास देखो दस साल पहले का था मैं तो गया ही नहीं। ’’ वो बोले जा रहा था ‘‘ साहब रम्भा ,उर्वसी और मेनका तो अब हजारों बरस की बुढिया हो चुकी है । स्वर्ग से अधिक मजे तो आप जैसे नेक लोगों ने भी धरती पर ही कर लिए है ..... अब स्वर्ग में भी वो पहले वाली बात नहीं रही । खैर ...... मुझे क्या करना बोलो मेंरी कीमत दोगे ? ’’ रामभरोसे ने हाॅं में सिर झटका । बस आनन - फानन में काम शुरु हो गया । दलाल उन्हें ले कर दफ्तर के पीछे की तरफ गया । उसने बड़े बाबू से बात की ,बड़े बाबू ने साहब से , साहब ने बड़े साहब से और बड़े साहब ने मंत्री से इसके उल्टे क्रम में फैसला भी नीचे आया । बाबू ने कहा ‘‘ गरीबी रेखा का कार्ड़ लगा दो ’’ और रेट भी बता दिया । दलाल ने पहले रकम को दान के नाम पर प्राप्त किया और फटाफट गरीबी रेखा का कार्ड बन भी गया । पिछले दरवाजे से पूरे दस्तावेज अंदर गए । ससम्मान बुला कर स्वर्ग का गेट पास रामभरोसे को दिया गया । यह तत्काल का स्वर्ग का गेट पास था । रामभरोसे अब फूले नहीं समा रहे थे । यहाॅं धरती पर उनकी मुस्कुराती हुई फोटो पर माला टंगी है और लोग उस मृत व्यक्ति याने रामभरोसे के स्वर्ग में निवास करने की कामना कर रहे है ।
आलोक मिश्रा
मोहझरी
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