Monday, May 28, 2018

नी.........ऽ.........ऽ.........च ( व्यंग्य )



           ‘‘ तू बड़ा ही नी......ऽ.....ऽ......च है ........रे .........;’’ माॅं बचपन में मेरी शरारतों से परेशान हो कर मुझे कहा करती थी । चूंकि मुझे बचपन में राजनीति नहीं आती थी , सो मैने कभी भी इस शब्द पर ध्यान ही नहीं दिया । बस शरारतों के बाद शरारतें ही करता गया । हालांकि मेरी माॅ प्यार से समझा कर यह भी बताती कि कोई व्यक्ति जन्म से नीच पैदा नहीं होता ; वो तो कर्मों से नीच बनता जाता है । आज फिर मेरे कानों में बार-बार नीच शब्द प्रतिध्वनित हो रहा है । अब मुझे भी अपनी माॅं के शब्दों को समझने का मौका प्राप्त हुआ है। मैं अब हैरान और अवाक् हुॅं कि मेरी माॅं मुझे बचपन में उस शब्द से संबोधित करती थी जिसे आज यदि मै राजनैतिक क्षेत्र में होता तो अपने वोट बैंक के रूप में भुना सकता था । ये भी हो सकता था कि मैं अपनी माॅं के विरूद्ध धरना ,रैली और प्रदर्शन करने और करवाने लगता। बचपन का प्यार और झिड़की भरा संबोधन आज मुझे महान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता था । मेरी माॅं को भी कहाॅ मालूम था कि उनके इस शब्द में इतनी ताकत है ,वर्ना वो भी अपने बेटे को महान बनाने में कोई कोर-कसर न रखते हुए इस शब्द को केवल और केवल मेरे ही लिए बचा कर रखती ।

           अब सोचता हुॅं कि मैं तो नासमझ था तो क्या मेरी माॅं मुझे नीच कह कर कोई लाभ लेना चाहती थी ? वो तो ठहरी एक सीधी-सादी ग्रहणी वो क्या अपने शब्दों का लाभ लेती ? एक और बात भी तो है .........; उस समय मीडिया भी तो केवल वास्तविक समाचारों तक ही सीमित रहता था । आज का मीड़िया तो शायद ब्रेकिंग न्यूज के साथ ही साथ इस बात पर वाद - विवाद याने डिबेट  (लो सहाब अब हिन्दी के ये दिन भी आ गए कि ......... ) ही आयोजित कर लेता कि माॅं-बेटे की नीच राजनीति कितनी उचित । ऐसे डिबेट में तेज-तर्रार संचालक ही सब कुछ  बोलता ,प्रतिभागी तो केवल अपना नाम और नमस्कार ही बोल पाते । इसके तुरन्त बाद ऐसे राजनैतिक लोग अपने-अपने बयान जारी करने लगते जिन्हे मेरी माॅं के कथन मात्र से अपने वोट बैंक पर ड़ाका पड़ता हुआ दिखता या नया वोट बैंक बनता हुआ दिखता । कुछ लोग मुझे अपनी माॅं के विरूद्ध आंदोलन आदि कर के राजनीति में आने का सुझाव भी देते या यूं कहें कि उकसाते । कुछ मेरी माॅं को राजनीति में आने की सलाह भी देते तो कुछ अन्य कहते कि ‘‘एक आम ग्रहणी को चैका-चूल्हा ही देखना चाहिए उन्हे राजनीति से दूर ही रहना चाहिए ।’’ याने यदि आज मेरी माॅं मुझे एक बार सार्वजनिक तौर पर ‘‘नी.......ऽ......ऽ.......च’’ कह देती तो न मैं मुफ्त में कलम  घिस रहा होता और न ही वो चूल्हे - चैके में खप रही होती । हम दोनों ही अलग- अलग दलों में ही सही महान नेता अवश्य ही होते ।

          इस शब्द के महत्व को आज के नेता बहुत ही अच्छी तरह से समझते है । वे जानते है कि यह शब्द दूसरों को घटिया साबित करने के लिए एक उत्तम हथियार तो है ही साथ ही यह जनता रूपी वोटरों के कुछ वर्गों पर प्रभाव भी छोड़ता है  । इस शस्त्र से बचाव  करने वालों के पास मौका होता है कि वे जाति और वर्ग रूपी सिखण्ड़ी के पीछे छुप कर इस के प्रभाव को आम जनता की ओर मोड़ दें । जरूरत के अनुसार इस सीधे- सादे और भोले - भाले शब्द के साथ जाति और वर्गों को जोड़ लेने मात्र से यह स्वार्थ सिद्धी का पर्याय बन जाता है । इस हथियार को प्रयोग करने वाले और बचाव में पुनः प्रयोग करने वाले दोनों  ही  यह शब्द केवल हवा में उछाल रहे होते है ; उस वर्ग के लिए जो अपने आप को इस शब्द के योग्य समझता है । यह मात्र समझ-समझ का फेर है ;वर्ना हमारे ऊपर के माले पर रहने वाले लोखण्ड़े जी भगवान हो गए होते और नीचे वाले वर्मा जी अपने आप को गलत तरह से परिभाषित करने लगते ।

              मैं सोचने लगा नीच होता कौन है ? मुझे फिर माॅं की बताई अच्छी बातें याद आ गई । अब मैं नीचों को खोजने निकला तो मुझे महान चेहरों के पीछे छुपे नीच कर्म दिखने लगे । उनकी महानता नीच हथकंड़ों का ही कमाल दिखाई देती है । फिर सोचता हुॅं, मुझ जैसा छोटा सा ‘‘ कलम घसीटू ’’ इतने बड़े-बड़े लोगों को नीच कह भी कैसे सकता है और अगर कह भी दूं तो बाद में वे मेरा क्या हाल  करेंगे यह सोच कर भी मै कांप जाता हुॅं। आम लोगों में नीचता खोजने का प्रयास करता हुॅं तो वे मुझे केवल रोजी- रोटी की मारा-मारी में ही दिखाई देते है । वे भला कैसे नीच हो सकते है ? फिर मुझे कबीर याद आ गए ‘‘ बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोय..........।’’अब मुझे लगता है कि मैं ही बहुत नी.......ऽ........ऽ......च हुॅं । लोग कितनी गंभीरता से अपने लिए साधन जुटा-जुटा कर राजनीति करते है । वे सागर में गोते लगा-लगा कर शब्द तलाश कर लाते है और मैं नी...........ऽ.........ऽ.......च उनकी तारीफ करने के स्थान पर व्यंग्य करता हुॅं । मुझ जैसे नीचों को तो देशद्रोही घोषित कर के सूड़ान भेज देना चाहिए । लो साहब लोग इस बात का भी गलत ही मतलब निकालेंगे । खैर ..... मुझे क्या फर्क पड़ता है जैसी जिसकी सोच...............।

                                             आलोक मिश्रा

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