Monday, September 7, 2020

चलते रहे ( गज़ल )

 

छोड़ चले उस शहर को जिसका हिस्सा थे
हमने बसाया था इसे  पर हम कुछ नहीं थे ।

उन ईमारतों में सर छुपाने की जगह न मिली
जिनकी नींव में ईटों पर  उंगलियों के निशान थे ।


   शहर बसा रहे थे पूरी मेहनत के साथ
   तबाही के आलम हम ही रहे बेघर थे ।


सब तो हमारे बारे में ही सोचते रहे
बस कभी हम तक वे पहुँचे नहीं थे ।


       सड़क लम्बी थी बनाई हमने
       बस हम ही पटरियों से लौटे थे ।


      कैमरे की नजरों से दूर बच्चों के साथ
      चल पडे नंगे पैर छुपते छुपाते बेघर थे ।


    फिक्र किसे थी हमारी अपनों की थी मारामारी
    सरेआम घूम रहे थे केले दे कर फोटो ले रहे थे ।


तुम्हारे झंडे लेकर फिरते रहे हम
बहुत हुआ सब हम ही बेवकूफ थे ।


भूखा बच्चा लपक खाना ले आया
निवालों में बांट लिया भूखे सब थे ।


         वो चिल्लाया माँ खाना मिल गया
         थकी माँ की आखों में आँसू थे ।


  
चलो शुक्रिया आखिर घर पहुँचे तो
हम तो पैसे लिए बने बेघर बंजारे थे ।


जो मन में आया बस लिखता रहा
लोग उसमें गज़ल के शेर खोजते थे ।


न उसूल न मक्ता न मसला काफिया भी गायब
वक्त ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा जो इंसान थे ।


बुत" हो गई दुनिया उनके गम से
जो सारे जहाँ  के संगराश थे ।

आलोक मिश्रा " बुत"


मै वैश्या हुँ

 

मेरी पवित्रता पर प्रश्न उठाने वालों ।
मेरे कपड़े उतारने पर प्रश्न उठाने वालों ।
सोचो मेरे होने पर भी तुम ,
अपनी बहन, बेटी और मासूम को नोच खाते हो ।
हम न हो तो ,
तुम्हारी माँऐं भी न बचेंगी ।
मेरी पवित्रता पर प्रश्न उठाने वालों।
दिन के उजाले में उजले लोगों ।
अंधेरों में कोठों के चक्कर लगाने वालों ।
तुम्हारी वासना हवस तुम पर हावी है ।
मेरा मोल भाव करने वाले लोगों।
तुम्हारी हैवानियत तुम पर हावी है ।
हमसे पहले
अंधेरे में खुद का नाड़ा खोलने वाले लोगों ।
मै तुम्हारी ही गंदगी का आईना हुँ।
हाँ मै वैश्या हुँ ।
हाँ मै गाली हुँ ।
हाँ मै नाली हुँ ।
मै हुँं स्त्री पुरूष संबंधों का बाज़ार ।
इस बाज़ार में तुम खरीददार।
मै माल हुँ।
शरीर मेरा बिकता है ।
आत्मा तुम्हारी बिकती है ।
ओ मेरे बाज़ार की रौनक ।
मेरे हैवान ग्राहक ।
मै तुम्हारी सच्चाई हुँ ।
मै तुम्हारा सुलभ हुँ ।
मै रास्ते का घूरा हुँ ।
मै आवश्यकता हुँ ।
मेरे बाज़ार रौनक ।
तुम से है ।
मेरे पास आने वाले लोगों ।
तुम ही हो मेरे जन्म दाता ,
ओ भूखे भेड़ियों।
मेरी पवित्रता पर प्रश्न उठाने वालों।।
  आलोक मिश्रा बुत


सूत्रों के हवाले से ....( व्यंग्य )

 

        अभी - अभी सूत्रों के हवाले से खबर लगी है कि "फलाना" भी कोरोना पोजेटिव हो गया । ये फलाने हमारे पूर्वपरिचित थे । हमने सोचा कुशलक्षेम पूछने के बहाने ही सही सूत्रों से मिली खबर की पुष्ठी की जाए । बस हमने उन्हें फोन लगा दिया । पहली बार कोरोना संदेश सुना , फोन नहीं लगा ; दुबारा में बात हुई । हमने औपचारिकता में उनकी कुशलता पूछी तो वे भड़क गए " क्या मिश्रा जी सीधे-सीधे पूछो ना कि हमें कोरोना है या नहीं !" हम हड़बडा़ गए और अपनी सफाई देने लगे ,वे हमारी बात काट कर बोले " आप पहले नहीं है  ; सुबह से पचासों फोन आ चुके है । सब यही जानना चाहते है कि हमें कोरोना है या नहीं ? वैसे आपको किसने बताया ? " मै धीरे से बोला " हमें सूत्रों से ज्ञात हुआ था । " वे तो भरे बैठे थे ,हम आगे कुछ बोलते ,वे बात काट कर बोलने लगे " ऐसी- तैसी सूत्रों की..... ये आपके सूत्र हमें मिल जाऐ तो हम उन्हे पूरा ही हल कर दें । " हमनें क्षमा-याचना और लल्लो-पत्तो करके फोन काट दिया । अब खबर का मज़ा जाता रहा ।
            हम सोचने लगे आखिर ये सूत्र होते क्या है ? ये गणित के सूत्र जैसे तो न होंगे जो हमेशा ही सही हल देते है । इन सूत्रों को खोजना और इनके बारे में मालूम करना आवश्यक है । हमारी खोजी प्रवृति हमेशा ही हमें कुछ बकवास से काम करने को मजबूर करती है । वैसे आजकल मुम्बई में एक कथित आत्महत्या को चैनलों द्वारा सूत्रों के हवाले से हत्या बता कर जैसे हल किया जा रहा है , उसे देख कर लगता है कि देश में सी.बी.आई. जैसी संस्थाओं की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारे चैनल सूत्रों के हवाले सब पता करने में सक्षम है । बस अबकी बार देश में कोई बड़ा केस हो तो इन्हीं चैनलों को जांच दी जाने की मांग होनी चाहिए । वे हल भी कर ही देंगे अपने सूत्रों के हवाले से ; बस सब अलग-अलग व्यक्तियों को दोषी करार देंगे । ये भी कोई बड़ी समस्या नहीं है । इसके लिए एक परिचर्चा याने ड़िबेट (क्या दिन आ गए हिन्दी के ? ) आयोजित कर लेंगे । इसमें जो सबसे अधिक चिल्लाएगा ,दूसरों को बोलने नहीं देगा वही सही होगा । बस मिल गया न दोषी ।
   बात सूत्र और हमारी खोजी प्रवृत्ती की थी । हमने एक पत्रकार मित्र से बात की और पूछा " भाई सहाब पत्रकारिता में ये सूत्र क्या होते है ? " हमारे मित्र बोले " बात औपचारिक करनी है या पान ठेले वाली ?" हमने उन्हें आश्वस्थ किया " भाई समझ लो कि हम पान ठेले पर ही है ।"  वे वोले " देखो मिश्रा जी कभी पत्रकारिता के अपने सूत्र होते थे ,पत्रकार खुद उन्हीं सूत्रों पर चलते थे और बाद में एक सफल पत्रकार फटेहाल मर जाता था । अब पत्रकारिता के कोई सूत्र नहीं होते । हाँ .. पत्रकारों के होते है । " हमने जिज्ञासू छात्र की तरह कहा " हम समझ नहीं पाए थोड़ा खुल कर बताऐं । " वे वैसे भी बोलने के मूड़ मे थे " बता ही तो रहा हुँ । अब यह एक व्यवसाय है ...व्यवसाय .... कमाई का साधन । बस छोटे-बड़े कार्यालयों के छोटे-बड़े अधिकारी -कर्मचारी अक्सर जाने-अनजाने सूत्र बध जाते है । " वे रूके और फिर बोलने लगे " जैसे अभी का कपड़ा घोटाला ,इसमें एक बाबू सूत्र बना क्योंकि उसे कमीशन में हिस्सा नहीं मिला । बस ऐसे ही हमारे सूत्र आते जाते रहते है ।
हम बोले " प्रभू इस सम्बन्ध में कुछ और ज्ञान दें।  "  वे बोले मिश्राजी आप कोई शोध- वोध तो नहीं कर रहे हो । खैर , सूत्रों के हवाले से खबर देनें से खबर के सारे सूत्र ही हमारे हाथों में होते है । अब मान लो आपको आतंकवादी बनाना है " हम तो चीख ही पड़े " अब हम से क्या दुश्मनी हो गई भाई ? " वे तो बस बोले ही जा रहे थे " मान लो ना... वैसे आप तो नेक आदमी है । बस सूत्रों कै हवाले से खबर चलाऐंगे कि आपके घर में बम मिला । "  "बम ....... बम"  हमारी तो चीख ही निकल गई जैसे हम पर ही गिरा हो । वे संयत स्वर में बोले जा रहे थे " आपने विरोध किया तो खण्ड़न ,नहीं तो चार दिन तक चटखारेदार खबर । " हम धीरे से बोले " और सूत्र ... ?" वे अधिकार से बोले " आप भी बड़े भोले हो नहीं समझे ...... , भाई सूत्र कोई हो भी सकता है और नहीं भी । अक्सर तो समाचार को चटपटा करने के लिए काल्पनिक सूत्रों का तड़का लगाया जाता है । सूत्र तो बस पढ़ने और देखने वालों का भ्रम है । लोग इसी भ्रम को सच मान कर खबरों पर विश्वास करते है । " हमने अपने जिज्ञासा प्रगट की " अंत में यह भी बता दो कि इस भ्रम रूपी सूत्र का प्रयोग क्यों होता है ?" वे हंस दिए " सब जान लोगे आज ही । मुझे पैसे मिले आपको अपराधी साबित करने के,  बस कुछ हो या न हो सूत्र तो है आपको अपराधी साबित करके ही दम लेंगे । " हम अब घबरा गए " आप लोग तो खतरनाक हो । आपके पास तो ब्रम्हास्त्र है । " इधर- उधर की बात के बाद चर्चा समाप्त कर दी ।
              अब हमें समझ में आ गया है कि सूत्र तो स्वार्थ ,राजनीति और  पूर्वाग्रह का मानसपुत्र है जिसके पैदा होने पर लोग मजे ले कर नई कहानियों को सुनते और कहते है ।
    आलोक मिश्रा " मनमौजी "


खुद


लड़ता रहा खुद से खुद की औकात पर
जीतता  रहा  खुद  से  खुद की बात पर 


लोग  खुद   हारते  रहे  मुझे  जिता  कर
हंसता  रहा  खुद  ही  खुद  की मात पर

आलोक मिश्रा मनमौजी 

भगवान बेचने वाला

 

             भगवान ले लो .....भगवान, रंग-बिरंगे भगवान...., फैंसी भगवान..... ,भगवान ले लो...। हाथठेलेवाला हाथठेले पर  मूर्तियां सजाकर और जोर जोर से आवाज लगाता है। उसके भगवान बहुत ही चटक रंगों से रंगे हुए मिट्टी के बने हुए हैं । इस ठेले पर जाति और धर्म का भेद समाप्त हो जाता है । जहाँ उसके पास शंकर-पार्वती हैं , वही ईसा मसीह भी है। जहां वह बाबा की चौखट बेच रहा है, वही बुद्ध भी बिक रहे हैं । सब अपने-अपने पूजा घरों में अलग-अलग तरीकों से पूजे जाएंगे परंतु आज वह सब एक साथ एक ही वाहन पर बिकने को तैयार हैं । भगवान बेचने वाले के लिए भगवान की कोई परिभाषा मायने नहीं रखती । वह तो सोचता है   उसकी मूर्तियाँ ही असली भगवान है क्योंकि वही तो उसके पूरे परिवार के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया है वह एक बार फिर जोर से हाका लगाता है भगवान ले लो.... भगवान .....,सभी धर्मों के भगवान ......ले लो.. ...,रंग-बिरंगे भगवान... ले लो ....। एक व्यक्ति ठेले के पास रुकता है । बड़े गौर से मूर्तियों को देखता है ठेले वाले को आशा है कि शायद कोई मूर्ति खरीदेगा। ठेलेवाला बोला "आपको क्या चाहिए राम-सीता दिखाऊं । "नहीं " वो बोला; उसने कोने में रखी एक मूर्ति को बड़े आदर के साथ उठाया और  माथे पर लगाया फिर मूर्ति को उसने उतने ही आदर के साथ वापस रख दिया ठेलेवाला बोला "यह लेंगे आप पैक कर दूं।" वह बोला " नहीं भाई मैं बेरोजगार हूँ । भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि आज कोई काम मिल जाए।"  इतना कहकर वह चलता बना भगवान बेचने वाला सोचने लगा कि क्या उसकी मूर्तियों में ऐसा कुछ कर सकने की शक्ति है यदि ऐसा ही है तो मैं भी इन्हीं से प्रार्थना करता हूं कि आज यह सब बिक जाए।
       एक साहब आए और मूर्तियों को उलट-पुलट कर देखने लगे । फिर बोले "यह तो कच्ची मिट्टी की बनी है । " भगवान बेचने वाला बोला " हां हां साहब यह मिट्टी की बनी है  । " वह बोला " यह कौन सी कंपनी की है ? " ठेलेवाला उसका मुंह देखने लगा वो फिर बोला  " मैंने पूछा कौन सी कंपनी की है  ?" ठेलेवाला बोला " साहब हमने बनाई  है । " वह खरीदार अब मूर्ति को हाथ में लेकर उसका मोलभाव करने लगा ; सौ से चल कर बात चालिस पर अटक गई । आखिर ग्राहक ने अपनी मनमानी कर ही उसने चालिस  में मूर्ति ले ली । ठेले वाले ने अखबारी कागज में मूर्ति को लपेट कर धागे से बांध कर ग्राहक को देते हुए कहा " साहब आप इसे पूजा घर में रखिएगा  । " ग्राहक कड़क कर बोला " मैं पूजा- वूजा नहीं करता मैंने तो बस सजावट के लिए मूर्ति  ली है । " ठेलेवाले को महान आश्चर्य हुआ उसने पूछा "आप पूजा नहीं करते । " ग्राहक बोला " बताया ना नहीं करता मैं नास्तिक हूँ , नास्तिक ;  तुम ही बताओ इनको पूजने से कुछ होता है क्या ?"  वह और कुछ भी बोलने वाला था । ठेलेवाला बीच में बोल पड़ा   "साहब भगवान के बारे में ऐसा नहीं बोलते पाप लगता है पाप । "  ग्राहक बोला " बस यही डर ही तो भगवान के अस्तित्व का आधार है; खैर तुम नहीं समझोगे ।" वह आगे बात नहीं करना चाहता था ।  अपनी मूर्ति ली और चला गया ठेलेवाला सोचने लगा क्या दुनिया में ऐसे लोग भी होते हैं इस विषय में ऐसा क्या है जो वो समझ नहीं सकता।
     वह फिर जोर से चिल्लाकर हाका लगाने लगा भगवान ...... ले लो....., भगवान ....पूजा के ......भगवान , ....सजावट..... के भगवान, भगवान ... .ले लो..... भगवान । तभी एक   सज्जन चिल्लाने लगे " यह क्या लगा रखा है ? भगवान ले लो भगवान ले लो भगवान भी कभी बिकते हैं ? तुम को तमीज -तमीज है कि नहीं ? बड़ा आया भगवान बेचने वाला । "  सज्जन बहुत गुस्से में थी ठेलेवाले के चिल्लाने से शायद उनकी धार्मिक आस्था को ठेस पहुंची थी । उनका बस चलता तो ठेला ही उलट देते मगर उसमें भगवान थे । ठेलेवाला धीरे से बोला " मैं आपसे माफी मांगता हूँ । लेकिन क्या करूं इन से मेरा परिवार चलता है । इन्हें बेचना मेरा शौक नहीं, मेरी मजबूरी है। मूर्ति ले लो चिल्लाने से बिक्री कम होती है। तो भगवान ले लो चिल्लाने लगा ।" सज्जन कड़क कर बोले " तुम जानते हो इससे भगवान का अपमान होता ही है । हम जैसे लोगों का दिल भी दुखता है  । ठेलेवाला जवाब देने लगा "  साहब मैं किसी का दिल नहीं दुखाना चाहता  । मैं तो मूर्तियाँ बेचता हूँ । भगवान बेचने की हैसियत मेरी कहाँ ? भगवान बेचने का काम तो बड़े-बड़े धर्मगुरु करते हैं । बिना हाका लगाए ,उनसे कोई मोलभाव नहीं करता ;उनसे कोई नहीं पूछता भगवान क्यों बेच रहे हो । " सज्जन बड़ बड़ने  लगे और वैसे ही बड़ बडाते हुए चले गए। भगवान बेचने वाले को लगा केवल भगवान का नाम लेने से भी किसी की धार्मिक आस्थाऐं आहत हो सकती हैं क्योंकि कुछ लोग शायद भगवान पर एकाधिकार चाहते हैं । अब ऐसा लगता है कि देश में एक सौ पच्चीस करोड़ भगवान की आवश्यकता है । सबका अपना अलग भगवान । सब का भगवान के प्रति अपना नजरिया है किसी का भगवान मूर्ति में बसता है तो किसी का निराकार होकर लोक में विचरण करता है। किसी का भगवान ईमान सिखाता है तो किसी का शायद मारना काटना। किसी का भगवान मेहनत करना सिखाता है तो किसी का बेईमानी करना ।
     विचारों की तंद्रा टूटी तो उसने फिर से हाका लगाया भगवान ले लो  ..... भगवान..... आपके अपने ..... भगवान.... भगवान ....ले लो ....।मुझे लगने लगा कि शायद मुझे ही नहीं पूरी मानव जाति को भगवान बेचने वाले के साथ आगे जाना चाहिए पर क्या आपके पास समय और सहनशक्ति है।

आलोक मिश्रा  "मनमौज"


Sunday, August 30, 2020

कराह सकूं इतनी तो मोहलत दे दे ।

 

कराह सकूं  इतनी तो   मोहलत दे दे ।
सज़दा कर सकूंं इतनी तो ताकत दे दे ।


मालूम   है   आज  तू  नाराज़  है  बहुत
मुझे मेरा खुदा कहने की इजाजत दे दे ।


आस पास तकलीफों का रोज़ ही मंजर है
सह लुंगा जो तू मुझे सहने की ताकत दे दे ।


तेरे  रूसवा  होनें  से बदल गया ज़माना
मुझे भी थोड़ा बदलने की फितरत दे दे ।


पत्थरों पर सर फोड़े एहसास भी न रहे
आएगी  बहार  फिर  ये  हसरत  दे  दे ।


खुलूस  से मिला जमाने से नेकी भी की
अब जमाने की तरह तू भी तहमत दे दे ।


बहुत हुआ छौने को ड़रान धमकाना
अब  तो  थोड़ी  सी  मुहोब्बत  दे  दे ।


लड़ेने की तुझसे कूवत नहीं मेरी
बस  तू  मुझे  मेरी जरुरत दे दे ।


बुत है .. बुत है तू कोई खुदा नहीं
खुद ही खुदा होने का सबूत दे दे ।

       आलोक मिश्रा मनमौजी 


मंत्री जी पोजेटिव हो गए ( व्यंग्य )

 


मंत्री जी पोजेटिव हो गए   ( व्यंग्य )


    आप का चौंकना स्वाभाविक ही है । ये अंग्रेजी भाषा का शब्द “ पोजेटिव “  अचानक महामारी के चलते कितना खतरनाक हो गया । जो लोग पहले अपने पोजेटिव होने का ढिंढोरा पीटते थे अब बिलकुल शांत हो कर घरों में इस डर से बैठे है कि कहीं वे पोजेटिव न हो जाए । चूंकि बात मंत्री जी की हो रही है तो आप को तो मालूम ही होगा कि मंत्री जी, मंत्री जी बने कैसे ? जाति का , क्षेत्र का समीकरण पूरा करना जब आवश्यक हो गया और कतार में आखरी खड़े हुए बन्दे पर जब निगाह गई तो वे हमारे मंत्री जी ही थे । बस जैसे चुनाव में टिकट मिला था वैसे ही वे मंत्री भी बन गए । वैसे राजनीति के लिए हमारे मंत्री जी बिलकुल फिट नहीं है । उनका अधिकांश समय सोने में ही बीतता है । वे बहुत ही भले से आदमी थे । कोई भला आदमी राजनीति में जाता है क्या परन्तु वे गए । जब वे कुछ नहीं थे तब लोगों के छोटे – मोटे काम वे स्वयम् करवा देते थे । लोगों में उन की छवि अच्छी थी । राजनीति में उन्हें जाति के आधार पर टिकट मिला और थोड़े से प्रयास से छवि के कारण चुनाव जीत भी गए । अब वे मंत्री हैं ।  मंत्री बन कर भी वे उतने अधिक सक्रिय नहीं हो पाए । अक्सर लोग समस्याऐं ले कर जाते वे आश्वासन तो देते परन्तु काम करवा नहीं पाते । इसका कारण कुछ भी क्यों न हो,  लोगों को लगता कि उनकी पकड़ नहीं है । अब तक उनके मंत्री रहते शहर और जिले को भी कोई लाभ नहीं हुआ है । पुल, पुलिया और सड़कें जैसी पहले थी वैसी ही रहीं ।
     मंत्री जी अक्सर उद्घाटन और भूमिपूजन जैसे कार्यक्रमों में देखे जाते । यह और बात है कि उनके द्वारा किए गए उद्घाटन और भूमिपूजन के बाद भी ये परियोजनाऐं कछुए की गति से ही चलती रहीं । कौशल की कमी के चलते उनके भाषणों के दौरान लोग उबासी लेने लगते । वो तो भला हो चमचों का जो समय – समय पर तालियां बजा कर लोगों को जगाते रहते । देखा जाए तो मंत्री जी केवल कुछ कार्यक्रमों में आतिथी बनने की योग्यता ही रखते थे और बस कहने भर को ही मंत्री थे ।
  एक दिन खबर आई कि हमारे प्यारे मंत्री जी पोजेटिव हो गए । पूरे शहर में हल्ला था लो मंत्री जी भी पोजेटिव हो गए । विपक्ष के छोटे और बड़े नेता बयान जारी करने लगे । वे इसे सरकार की नाकामी बता रहे थे । जनता तो अपने मंत्री के पोजेटिव होने से आश्चर्यचकित थी । वे तो महामारी के इस दौर में अपनी नकारात्मकता की हद तक चले गए थे । उनके पी. ए. ने भी उन्हें एक माह से देखा नहीं था । देखा जाए तो इस महामारी में लोगों को चौदह दिन के लिए संगरोध ( कोरेंटीन ) किया जा रहा है , हमारे मंत्री जी पिछले एक माह से संगरोध में रह रहे थे ,फिर उनका पोजेटिव होना आश्चर्यजनक था ।
        हम ठहरे पक्के खोजी हमें भी हमारे प्रिय मंत्री जी का पोजेटिव होना पच नहीं रहा था । बस हमने अपने सूत्रों को काम पर लगा दिया । सूत्र तो सूत्र होते है , बस गणित के किसी कठिन प्रश्न की ही तरह उन्होंने समस्या को हल करने का काम प्रारम्भ कर दिया । उन्होंने पाया कि मंत्री जी किसी भी कोरोना केंद्र में नहीं हैं । फिर वो है कहाँ ? वो अपने निवास पर भी नहीं है । अब तो समस्या बिकट हो गई । वो अपने राजधानी स्थित निवास पर भी नहीं हैं । याने मंत्री जी उन समस्त ठिकानों पर नहीं है जहाँ उन्हें होना चाहिए था  तो वे गए कहाँ ? सूत्र अपना काम कर रहे थे । सूत्रों को पता करना था कि मंत्री जी पोजेटिव है या नहीं लेकिन वे तो उनको खोजने में ही लगे थे ।
       काफी खोज के बाद  हमारे सूत्रों ने जो बताया उससे हम तो भौच्चके ही रह गए । मंत्री जी पड़ोस के जिले के रेस्टहाउस में देखे गए । आप तो बस गलत ही समझने लगते हो वे कोई गलत काम नहीं कर रहे थे । बस हमारे पोजेटिव मंत्री जी घूम रहे थे इस जिले से उस जिले । सूत्रों ने विस्तार से बताया तो मामला समझ में आया । सूत्रों ने बताया की अब हमारे मंत्री जी नकारात्मक न हो कर सकारात्मक हो गए है । भाई सहाब चुनाव हो रहे हो और नेता सकारत्मक याने पोजेटिव न हो ये कैसे हो सकता है ! पास के जिले में उपचुनाव है बस  मंत्री जी भी पोजेटिव हो गए है । वैसे हमे यह जान कर अच्छा लगा कि चुनाव के कारण ही सही हमारे नेगेटिव मंत्री पोजेटिव तो हुए । काश वे हमेशा ही इतनें ही पोजेटिव बने रह पाते ।  अब वे जनता के बीच इस सकारात्मकता के साथ जाने वाले है , भगवान उन्हें पोजेटिव होने से बचाए ।
                         आलोक मिश्रा "मनमौजी"


Tuesday, June 2, 2020

भरोसा छोड़ दिया

दूरीयों को बड़ा कहना छोड़ दिया ।
मजबूरियों को बड़ा कहना छोड़ दिया ।


हम  पहुँच  ही  जाऐंगे अपने  घर ।
तुम पर भरोसा करना छोड़ दिया ।



कैसे

नहीं लगती तबियत रहुँ तो कैसे
झूठ न बोलू  सच  कहुँ तो कैसे


उसने मुझे दूसरों से ज्यादा दिया
मै    उसे    बुरा   कहुँ  तो   कैसे


भगवान ने उसे जल्दी बुला लिया
मै    उसे    बुरा   कहुँ   तो   कैसे


जिसने हमेशा बेवफाई का पैगाम दिया
उसे   एहल  ऐ   वफा  कहुँ   तो   कैसे


जिंदगी  मे खुशियाँ दी हमेशा
अब     गम     सहुँ   तो   कैसे


उड़ता रहा आजाद परिंदे सा
अब   पिंजरे   मे रहुँ  तो कैसे


मलंगों ने तबियत सुधार दी
इस मस्ती को कहुँ तो कैसे


"बुत" हुँ खडा़ रहुँगा इंतिजार में
बेवजह   खुद   ढ़हुँ   तो  कैसे

आलोक मिश्रा "बुत"
mishraalokok@gmail.com



ईश्वर

ओ दीन-ओ-ईमान
को मानने वालों
ओ ईसू के दर्द
में दुखी लोगों
ओ गो माता
की संतानों
ओ पंचशील
को पालने वालों
ओ नबी के दुख
से दुखी लोगों
इन मजदूरों को देखो
क्या इनमें
ईश्वर
अल्लाह
जीजस
बुद्ध
नहीं दिखा ।


आलोक मिश्रा

कोरोना 6

रास्ता लम्बा था
जाना ही था
यहाँ भूख थी तो
वहाँ सहारा था कि
सहारे को
छोड़ आया था
कभी पैसे की चाह में
मौत ने तांड़व मचाया
पैसा तो दूर
एक एक कौर के लाले पड़ गए
अब सहारा याद आ गए
बस निपट
अकेले मिल गए और भी
फिर बिछड़ते। भी होने के
रास्ते खिंचाव था
कुछ के साथ
कुछ साथ
देते
कुछ दे दे फोटो लेते कुछ थे जाते
चुपचाप
कुछ
बस बोल देते प्यार से
लगता आंसू निकल पड़ेगें
चलते हुए
मिला तो
अब सूनी सड़कें सोने की थी
हम अपने भविष्य से
भूत की ओर जा रहे थे।
लगा ये सफर खत्म न कभी होगा
हुआ एक दिन
अपने पास थे आस पास
अब कोई ड़र नहीं
अब मौत से भी ड़र नहीं
भूख
बाँट
लेंगे कौर- कौर
यही अतीत
अब था कि भविष्य है।

आलोक मिश्रा 


गुनाह नहीं हुआ

बादशाह बच जाएगा
               जागीरदारों पे तोहमद ठोक के ,
जागीरदार  भी खुश 
               गुनाह  वजीरों  के सर ठोक के।
फिर  सब  कहेंगे  एक  साथ
                          गुनाह तो हुआ ही नहीं,
जनता  सहेगी  बेबस  रहेगी  
                          खुश  थाली  ठोक  के।

अश्क





गमों  मे भी रोते रोते मुस्कुराना   होता है
जिंदगी में हर पल को यूं बिताना होता है


अब तो हाल ये है कि कोई हाल पूछे
बेहतर से पहले अश्क छुपाना होता है


तमाम अश्कों को छुपा कर मुस्कुराना
तहज़ीब    का  तकाज़ा  यही  होता है


ड़र लगता कमजोर की रूसवाई  का
अश्क भी कमजोरी का निशां होता है


अश्क उमड़ के आते है बारिश की तरह
काम  बहुत  है  फुर्सत  में रोना होता है


हंसा लिया जिंदगी  भर जमाने  को
जोकर का आंसू ही खजाना होता है


चेहरा वीरान है ऐहसास की नुमाईश नहीं
गम को आंसू बन के छलक जाना होता है


हंसता  हुआ   कोई   चेहरा   अश्कों  डूब  जाए
उसे मुस्कुरा के मिलना या चेहरा छुपाना होता है

यूं रो रो कर क्या मिलेगा तुझे "बुत "
जमाने से सब भिड़ कर लेना होता है


"बुत" दूर है दुनियावी ऐहसासों के तूफान से
चेहरे पर शिकन न अश्क छलकना होता है


आलोक मिश्रा "बुत "



चलते रहे (गज़ल)


वो तवायफ की तरह मोल भाव करते रहे
हम गर्म सड़कों पर यूं नंगे पांव चलते रहे

वो कहते रहे खतरा है जान का घर में रहो
हम बस जहां में अपना घर ही खोजते रहे

वो लाते रहे सात समुंदर पार से लोगों को
हम  सड़कों पर खून की लकीरें बनाते रहे

वो   मौत   के  ड़र  से  छुप  गए  घरों  में
हम भूख से ड़र कर सड़कों पर चलते रहे

वो  वादे  पर  वादे  करते  रहे रोज रोज
हम खुदगर्ज बेवजह ही यकीन करते रहे

रोटी  के  टुकडों  ने  छुड़ाया  था गाँव
रोटी  के लिए गाँव की ओर चलते रहे

लोगों  ने  दया  की  खाना भी दिया
फिर भी साथ के लोग रोज मरते रहे

मौत से  लड़ना था दोनों  ही  सूरत में
घर में रहे या राहों पर यूं ही चलते रहे

तमाशा बना रहे है फिक्र किसे है हमारी
बीमारी  ही मार दे या भूख  से मरते रहे

जब सारा जहाँ  हमारे ही खिलाफ हो गया
जिंदा  रहने  के लिए खुद से हम लड़ते रहे

भरोसा था उनसे उम्मीद थी मदद की
वो "बुत " बन   कर खड़े  अकड़ते रहे

आलोक मिश्रा "बुत"
mishraalokok@gmail.com


Wednesday, March 11, 2020

मोबाईल से ( हाईकू कविता )






बदले लोग
बदल गया जमाना
मोबाईल से

मिस्ड़काल है
फैसन में
मोबाईल से

चार के साथ
एक दूजे से दूर
मोबाईल से

अपने दूर
दूजे हुए अपने
मोबाईल से

भाषा बदली
संदेश हुए लघु
मोबाईल से

सब आसान
धोखा,झूठ, फरेब
मोबाईल से

बाद सगाई
व्यस्त हुए वे दोनो
मोबाईल से

अफवाहें भी
खूब है अब आम
मोबाईल से

रिश्ते जुड़ते
टूटते है रोज ही
मोबाईल से

ज्ञान का साथ
नेट है हर हाथ
मोबाईल से

बुड्ढे जवान
चैट हुआ आसान
मोबाईल से
आलोक मिश्रा "मनमौजी"


Tuesday, March 10, 2020

प्रवक्ता जी ( व्यंग्य )

      हाँ तो साहब बात को प्रारम्भ से ही प्रारम्भ करते है , हम आप से पूछना चाहते है कि क्या आप सखाराम को जानते है ? हमने इतना कठिन प्रश्न तो नहींं पूछा ...... अरे...   वही सखाराम जो आजकल बड़ी- बड़ी चैनलों पर अपनी पार्टी का बचाव करते दिखाई देते है । अरे आप तो जानते ही है उन्हें ; अरे वही हमारे शहर के पुराने प्रवक्ता जी । सखाराम को हमारा पूरा शहर आज से नहीं तब से जानता है जब वे हमारे शहर में सायकिल पंचर की दुकान चलाया करते थे और सारा शहर उन्हे प्रवक्ता जी के नाम से जानता था । इधर सखाराम सायकिल का ट्युब खोलता उधर उनका मुह खुलता तो जब तक ग्राहक चला न जाए खुला ही रहता । कुछ ग्राहक  तो उनके अधिक बोलने से परेशान हो कर उधर न आने की कसमें खाते । कुछ पूरा शहर पार कर के केवल हवा भरवाने मुफ्त के मनोरंजन के चक्कर में आते ।वैसे हमारे शहर में उनके शब्द बांणों के सामने टिकने की हैसियत किसी भी "मुख योद्धा" में नहीं थी सिवाय उनकी धर्मपत्नि के । कुछ लोगोंके अनुसार सखाराम घर में मौन साधे रहते थे । यहाँ दो सौ किलो की एक अदद् बीबी मुखयोद्धा बन कर दनादन बांण छोड़ती रहती । इन सभी प्रहारों को सखाराम अपनी मौन की ढ़ाल पर झेल जाते । करीबी लोगों के अनुसार मुखयोद्धा सखाराम की असली गुरू उनकी पत्नी ही थी ।
          वैसे तो सखाराम छोटी से दुकान चलाते थे परन्तु उनका मुह बहुत बड़ा था सो वे अनेक छोटे और बड़े संगठनों में सक्रिय दिखाई देते । वो किसी भी संगठन में हो रहते प्रवक्त ही । अक्सर संगठनों मे सारे पद बांटने के पश्चात प्रवक्ता पद सखाराम के लिए बचा रहता । ऐसा भी भी कहा जाता है कि प्रवक्ता पद के लिए उन्हें चुनौती देने वाला न कभी था और न कभी होगा । सखाराम पंचर जोड़ते , प्रवक्तागिरी करते और जो समय बचा रहता उसका प्रयोग मंच संचालन में करते । शहर में मंत्री-संत्री आऐं , कव्वाली हो या दशहरे का जलूस मंच संचालक के रूप में सखाराम हर जगह ड़टे रहते । अब शहर के लोग उन्हे " माईक का भूखा " या " प्रवक्ता जी " जैसे उपनामों से संबोधित करने लगे ।
          हमने सुना था मुहजोर के गधे भी बिकते है ।बस हमारे प्रवक्ता जी के गधे बिकने लगे और वो धीरे -धीरे राजनैतिक होते गए । वे छोटे से बड़े और बड़े से और बड़े स्तर पर पहुँच गए । अब वे अक्सर हमें समाचार चैनलों पर शाम के समय वाद - विवाद करते नज़र आते है । गोल -गोल उल्लू सी आंखें , रंग बिरंगे कुर्ते में सजे वे कभी इस चैनल पर तो कभी उस चैनल पर दिखाई देते है ।  वे कभी इस विषय पर बोल रहे होते और कभी उस विषय पर । अब हम उन्हें और उनकी वाचालता को देख कर ही दंग रह जाते है । कभी - कभी व्याख्याता और प्रवक्ता के मध्य तुलना करके हमें उधसे जलन होने लगती । अक्सर तो वे वही बोलते जो उधकी पार्टी द्वारा उन्हे बताया जाता । इन पत्रकारों से भगवान बचाए कभी - कभी वे कुछ भी उटपटांग पूछ लेते है । बस ऐसे ही समय हमारे प्रवक्ता जी की वाकपटुता काम आती है  और वे अपनी बातों को जलेबी की तरह घुमाने लगते है । उनसे बार - बार पूछने पर भी वे अपनी बातें बोलते जाते और मूल प्रश्न को छूते भी नहीं । शाबाश ........ प्रवक्ता जी ....... शाबाश ।
             कभी- कभी ऐसे अवसर भी आते जब किसी चैनल पर हमारे प्रवक्ता जी जैसे शेर को सवा शेर मिल ही जाता है । यहाँ प्रवक्ता जी तार्किक रूप से जब उस सवा शेर से हारने लगते है तो चैनल पर चल रहे वाद-विवाद को संसद के किसी हंगामा सत्र के रूप में बदलने में देर नहीं लगाते । ऐसे समय वे लागातार बोलने और बोलते जाने की पद्धति अपनाते है । जिसके करण सुनने वाला किसी की भी बात ठीक से सुन नहीं पाता ।प्रवक्ता जी को क्रोध कम ही आता है  परन्तु उनके पास दूसरों को क्रोध दिला कर पटरी से उतारने के भी हथियार मौजूद है । वे अक्सर ही वाद-विवाद के दौरान इन अस्त्र -सस्त्रों का प्रयोग करते हुए नजर आते है । जब कोई उनकी पार्टी पर बेईमानी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाताहै तो प्रवक्ता जी उनके ही गड़े मुर्दे उखाड़ने लगते । जब कोई उनके शीर्ष नेताओं पर आरोप लगाता तो वे पलट कर विपक्षियों के आदर्श पुरूषों पर ही कटाक्ष करने लगते । हमारे प्रवक्ता जी शहर से चले तो प्रवक्ता थे आज भी प्रवकँता ही है । वे अब इतना उठ गए है कि प्रवक्ता बन सकें लेकिन इतना नहीं कि किसी को अपना प्रवक्ता बना सकें। चाहे कुछ भी हो हमारे शहर का पंचर जोड़ने वाला सखाराम जिसकी बक-बक कोई सुनना नहीं चाहता था ;आज उन्ही बक-बक पूरा देश सुन रहा है ।
       आलोक मिश्रा