छोड़ चले उस शहर को जिसका हिस्सा थे
हमने बसाया था इसे पर हम कुछ नहीं थे ।
उन ईमारतों में सर छुपाने की जगह न मिली
जिनकी नींव में ईटों पर उंगलियों के निशान थे ।
शहर बसा रहे थे पूरी मेहनत के साथ
तबाही के आलम हम ही रहे बेघर थे ।
सब तो हमारे बारे में ही सोचते रहे
बस कभी हम तक वे पहुँचे नहीं थे ।
सड़क लम्बी थी बनाई हमने
बस हम ही पटरियों से लौटे थे ।
कैमरे की नजरों से दूर बच्चों के साथ
चल पडे नंगे पैर छुपते छुपाते बेघर थे ।
फिक्र किसे थी हमारी अपनों की थी मारामारी
सरेआम घूम रहे थे केले दे कर फोटो ले रहे थे ।
तुम्हारे झंडे लेकर फिरते रहे हम
बहुत हुआ सब हम ही बेवकूफ थे ।
भूखा बच्चा लपक खाना ले आया
निवालों में बांट लिया भूखे सब थे ।
वो चिल्लाया माँ खाना मिल गया
थकी माँ की आखों में आँसू थे ।
चलो शुक्रिया आखिर घर पहुँचे तो
हम तो पैसे लिए बने बेघर बंजारे थे ।
जो मन में आया बस लिखता रहा
लोग उसमें गज़ल के शेर खोजते थे ।
न उसूल न मक्ता न मसला काफिया भी गायब
वक्त ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा जो इंसान थे ।
बुत" हो गई दुनिया उनके गम से
जो सारे जहाँ के संगतराश थे ।
आलोक मिश्रा " बुत"