नहीं लगती तबियत रहुँ तो कैसे
झूठ न बोलू सच कहुँ तो कैसे
उसने मुझे दूसरों से ज्यादा दिया
मै उसे बुरा कहुँ तो कैसे
भगवान ने उसे जल्दी बुला लिया
मै उसे बुरा कहुँ तो कैसे
जिसने हमेशा बेवफाई का पैगाम दिया
उसे एहल ऐ वफा कहुँ तो कैसे
जिंदगी मे खुशियाँ दी हमेशा
अब गम सहुँ तो कैसे
उड़ता रहा आजाद परिंदे सा
अब पिंजरे मे रहुँ तो कैसे
मलंगों ने तबियत सुधार दी
इस मस्ती को कहुँ तो कैसे
"बुत" हुँ खडा़ रहुँगा इंतिजार में
बेवजह खुद ढ़हुँ तो कैसे
आलोक मिश्रा "बुत"
mishraalokok@gmail.com
No comments:
Post a Comment