रास्ता लम्बा था
जाना ही था
यहाँ भूख थी तो
वहाँ सहारा था कि
सहारे को
छोड़ आया था
कभी पैसे की चाह में
मौत ने तांड़व मचाया
पैसा तो दूर
एक एक कौर के लाले पड़ गए
अब सहारा याद
आ गए
बस निपट
अकेले मिल गए और भी
फिर बिछड़ते। भी होने के
रास्ते खिंचाव था
कुछ के साथ
कुछ साथ
देते
कुछ दे दे फोटो लेते कुछ थे जाते
चुपचाप
कुछ
बस बोल देते प्यार से
लगता आंसू निकल पड़ेगें
चलते हुए
मिला तो
अब सूनी सड़कें सोने की थी
हम अपने भविष्य से
भूत की ओर जा रहे थे।
लगा ये सफर खत्म न कभी होगा
हुआ एक दिन
अपने पास थे आस पास
अब कोई ड़र नहीं
अब मौत से भी ड़र नहीं
भूख
बाँट
लेंगे कौर- कौर
यही अतीत
अब था कि भविष्य है।
आलोक मिश्रा
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