दूरीयों को बड़ा कहना छोड़ दिया ।
मजबूरियों को बड़ा कहना छोड़ दिया ।
हम पहुँच ही जाऐंगे अपने घर ।
तुम पर भरोसा करना छोड़ दिया ।
दूरीयों को बड़ा कहना छोड़ दिया ।
मजबूरियों को बड़ा कहना छोड़ दिया ।
हम पहुँच ही जाऐंगे अपने घर ।
तुम पर भरोसा करना छोड़ दिया ।
नहीं लगती तबियत रहुँ तो कैसे
झूठ न बोलू सच कहुँ तो कैसे
उसने मुझे दूसरों से ज्यादा दिया
मै उसे बुरा कहुँ तो कैसे
भगवान ने उसे जल्दी बुला लिया
मै उसे बुरा कहुँ तो कैसे
जिसने हमेशा बेवफाई का पैगाम दिया
उसे एहल ऐ वफा कहुँ तो कैसे
जिंदगी मे खुशियाँ दी हमेशा
अब गम सहुँ तो कैसे
उड़ता रहा आजाद परिंदे सा
अब पिंजरे मे रहुँ तो कैसे
मलंगों ने तबियत सुधार दी
इस मस्ती को कहुँ तो कैसे
"बुत" हुँ खडा़ रहुँगा इंतिजार में
बेवजह खुद ढ़हुँ तो कैसे
आलोक मिश्रा "बुत"
mishraalokok@gmail.com
ओ दीन-ओ-ईमान
को मानने वालों
ओ ईसू के दर्द
में दुखी लोगों
ओ गो माता
की संतानों
ओ पंचशील
को पालने वालों
ओ नबी के दुख
से दुखी लोगों
इन मजदूरों को देखो
क्या इनमें
ईश्वर
अल्लाह
जीजस
बुद्ध
नहीं दिखा ।
रास्ता लम्बा था
जाना ही था
यहाँ भूख थी तो
वहाँ सहारा था कि
सहारे को
छोड़ आया था
कभी पैसे की चाह में
मौत ने तांड़व मचाया
पैसा तो दूर
एक एक कौर के लाले पड़ गए
अब सहारा याद
आ गए
बस निपट
अकेले मिल गए और भी
फिर बिछड़ते। भी होने के
रास्ते खिंचाव था
कुछ के साथ
कुछ साथ
देते
कुछ दे दे फोटो लेते कुछ थे जाते
चुपचाप
कुछ
बस बोल देते प्यार से
लगता आंसू निकल पड़ेगें
चलते हुए
मिला तो
अब सूनी सड़कें सोने की थी
हम अपने भविष्य से
भूत की ओर जा रहे थे।
लगा ये सफर खत्म न कभी होगा
हुआ एक दिन
अपने पास थे आस पास
अब कोई ड़र नहीं
अब मौत से भी ड़र नहीं
भूख
बाँट
लेंगे कौर- कौर
यही अतीत
अब था कि भविष्य है।
आलोक मिश्रा
बादशाह बच जाएगा
जागीरदारों पे तोहमद ठोक के ,
जागीरदार भी खुश
गुनाह वजीरों के सर ठोक के।
फिर सब कहेंगे एक साथ
गुनाह तो हुआ ही नहीं,
जनता सहेगी बेबस रहेगी
खुश थाली ठोक के।
गमों मे भी रोते रोते मुस्कुराना होता है
जिंदगी में हर पल को यूं बिताना होता है
अब तो हाल ये है कि कोई हाल पूछे
बेहतर से पहले अश्क छुपाना होता है
तमाम अश्कों को छुपा कर मुस्कुराना
तहज़ीब का तकाज़ा यही होता है
ड़र लगता कमजोर की रूसवाई का
अश्क भी कमजोरी का निशां होता है
अश्क उमड़ के आते है बारिश की तरह
काम बहुत है फुर्सत में रोना होता है
हंसा लिया जिंदगी भर जमाने को
जोकर का आंसू ही खजाना होता है
चेहरा वीरान है ऐहसास की नुमाईश नहीं
गम को आंसू बन के छलक जाना होता है
हंसता हुआ कोई चेहरा अश्कों डूब जाए
उसे मुस्कुरा के मिलना या चेहरा छुपाना होता है
यूं रो रो कर क्या मिलेगा तुझे "बुत "
जमाने से सब भिड़ कर लेना होता है
"बुत" दूर है दुनियावी ऐहसासों के तूफान से
चेहरे पर शिकन न अश्क छलकना होता है
आलोक मिश्रा "बुत "