Monday, December 10, 2018

प्रश्‍नों के चक्रव्‍युह

प्रश्‍नों के चक्रव्‍युह

वो कौन थी ?

वो कैसे मरी ?

उसके साथ क्‍या हुआ ?

क्‍या ऐसा रोज होता है ?

ऐसा कब तक होता रहेगा ?

ये लोग कौन है ?

क्‍या उस लड़की के रिश्‍तेदार है ?

ये क्‍यों नाराज है ?

क्‍यों इनके हॉथ हवा में लहराते है ?

ये क्‍यो नारे लगाने को मजबूर है ?

क्‍या ये जनता है ?

क्‍या इसका गुस्‍सा नाजायज है ?

क्‍या ये नासमझी है ?

क्‍या इन्‍हें किसी ने भडकाया है ?

क्‍या इसमें  विदेशी ताकतों का हॉथ है ?

क्‍या ये माओवादी है ?

क्‍या ये आतंकवादी है ?

क्‍या ये देशद्रोही है ?

फिर इनसे उन्‍हे डर क्‍यों लगता है ?

वे जनता पर लाठी क्‍यों चलवाते है ?

क्‍यो आवाज दबाते है ?

फिर वे मांफी क्‍यों मांगते है ?

क्‍या वे जनता से डरते है ?

क्‍या वे जनता से बात करने से डरते है ?

क्‍या वे जनता के बीच आने से डरते है ?

फिर वे जनता के कैसे प्रतिनिधी है ?

क्‍या जनता उन्‍हें अपना प्रतिनिधी मानती है ?

वे क्‍यों डरते है ?

वे  मौन क्‍यों है ?

वे कुछ करते क्‍यों नहीं ?

क्‍या वे कुछ करना नहीं चाहते ?

क्‍या वे कुछ कर ही नहीं सकते ?

क्‍या उनकी इच्‍छाशक्‍ति ही न कहीं है ?

वे किसे बचा रहे है ?

क्‍या वे अपने आप को बचा रहे है ?

वे अपने आप को क्‍यों बचा रहे है ?

उन पर कितनी हत्‍याओं के केस है ?

क्‍या वे हत्‍यारे है ?

क्‍या वे हत्‍यारों के दलाल है ?

उन पर कितनी महिलओं ने आरोप लगाए है ?

उन का कितनी बार डीएनए टेस्‍ट हुआ ?

क्‍या वे बलात्‍कारी है ?

क्‍या वे बलात्‍कारीयों के दलाल है ?

क्‍या वे खदानों के दलाल है ?

क्‍या वे संसद के लड़ाके लाल है ?

क्‍या वे संसद में नोट लहराते है ?

क्‍या वे सरेआम घूस खाते है ?

   क्‍या वे फर्जी कम्‍पनीयॉं बनाते है ?

          क्‍या वे देश का पैसा विदेश पहुँचाते है?

क्‍या दंगे करवाते है ?

क्‍या वे बंदे मरवाते है ?

क्‍या वे देशद्रोही है ?

क्‍या वे देशप्रेमी है ?

क्‍या वे  पकड़े जाऐंगे ?

वे कब तक बच पाएंगे ?

क्या तब समस्‍या का हल होगा ?

क्‍या फिर अमन होगा ?

प्रश्‍न ?

प्रश्‍न ?

प्रश्‍न ?
    मूल प्रश्‍न क्‍या है ?

क्‍या घटना प्रश्‍न है ?

क्‍या लड़की प्रश्‍न है ?

क्‍या जनता प्रश्‍न है ?

क्‍या व्‍यवस्‍था प्रश्‍न है ?

क्‍या राजनीति प्रश्‍न है ?

क्‍या देश प्रश्‍न है ?

क्‍या संसद प्रश्‍न है ?

क्‍या राष्‍ट्रप्रेम प्रश्‍न है ?

क्‍या राष्‍ट्रद्रोह प्रश्‍न है ?

प्रश्‍नों के उत्‍तर कहॉं है ?

उत्‍तर क्‍या हैं ?

तो क्‍या उत्‍तर खोजना है ?

तो क्‍या प्रश्‍नों को फिर से पढ़ना होगा ?

आलोक मिश्रा

बालाघाट म.प्र.

Saturday, December 8, 2018

गड्ढा (व्यंग्य)

                गड्ढा

    पहले चुनाव और अब कौन जीतेगा या कौन हारेगा के शोर में हम और आप लोकतंत्र की सड़क पर पड़े उस बड़े से गड़्ढे को भूल ही गए थे , जिसका इतिहास है कि सरकार कोई भी बनें वो तो वहीं रहता है ।  हाॅ उसका भूगोल अवष्य ही बदलता रहता है । वैसे कुछ लोगों का कहना है कि यह गड़्ढा तब भी वहीं था जब ये सड़क नहीं बनी थी । गड़्ढा है तो उसका सड़क के बीचांे बीच होना तो लाजमी है । बस इस गड़्ढे की महिमा के चलते अक्सर कुछ लोग जो इस गड़्ढे में जाते है  सीधे अस्पताल ही पहुॅचते हैं, कुछ लोग तो उससे भी आगे निकल गए और सीधे स्वर्ग पहुॅच गए । वैसे यदि आप इस गड़्ढे को ध्यान से देखेंगे तो आपको दुनिया के सारे विज्ञान इसी में दिख जाऐंगे । जैसे इस गड़्ढे का रसायन नम मौसम में विलयन के रूप में तो सूखे मौसम में कीचड़ के रूप में होता है । वैसे इसकी भौतिकी भी हमेषा ही गति के नियमों को चुनौती देने में लगी रहती है । बारीकी से देखेंगे तो इस गड़्ढे में गणित, सांख्यिकी, समाजषास्त्र और मनोविज्ञान भी दिखाई दे जाऐंगे । वैसे इस गड़्ढे का जनक तो अर्थषास्त्र ही है , यह वही अर्थषास्त्र है जिसका प्रयोग ठेकेदार अधिकारियों को और अधिकारी नेताओं और मंत्रियों को खुष करने में करते है । ऐसे अर्थषास्त्र से अक्सर ही गड़्ढों का जन्म होता है ।

      इस गड़्ढे पर राजनीति तब प्रारम्भ हुई जब एक विपक्षी नेता की उपपत्नी इस गड़्ढे से होते हुए अस्पताल पहुॅच गई । बस चैनलों को मसाला मिल गया उनके लिए यह खबर देष की समस्याओं में सबसे पहले दिखने लगी । बस वाद-विवादों का दौर प्रारम्भ हो गया । सरकार के प्रवक्ता ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि ‘‘ यह गड़्ढा उस समय का है जब वर्तमान विपक्ष सत्ता में था इस कारण इस गड़्ढे को भरने में कम से कम दस - पंद्रह साल तो लगेंगे ही । ’’ उनका कहने का मतलब बिलकुल ही साफ था कि गड़्ढा तो हम भरेंगे लेकिन दो- तीन बार सत्ता का सुख भोगने के बाद । विपक्ष के प्रवक्ता का कहना था ‘‘ हम स्वीकार करते है कि यह गड़्ढा हमारे समय का ही है लेकिन ये रोड़ भी तो हमने ही बनवाई थी । ’’ बहस और तेेेेेेेेेेज हुई तो गड़्ढे का जाति और धर्म भी बताया जाने लगा । इस बहस की दिषा ऐसी बदली कि कुछ लोगों ने इस गड़्ढे को सांप्रदायिक साजिष बता दिया । ऐसा करके वे केवल और केवल अपनी- अपनी भेेड़ों को अलग करने का प्रयास कर रहे थे । इस गड़्ढे पर जितना समय चैनलों पर वाद-विवाद हुआ उस से कम समय में वो गड़्ढा भरा भी जा सकता था । इन लम्बी -लम्बी बहसों में अक्सर तो गड़्ढा दृष्य से गायब ही रहता । कभी- कभी नेता आपस में गाली-गलौज करते , एक दो बार तो वे हाथापाई पर भी उतर आए। चैनलों को यह मसाला दिन भर दिखाने के लिए पर्याप्त होता ।

          बहस से कहीं गड़्ढे भरते है बस गड़्ढा वहीं का वहीं है, जस का तस । फिर किसी ने उस गड़्ढे पर एक बोर्ड लगा दिया ‘‘दुनिया में अभियांत्रिकी का अजूबा --- यह सड़क बिना गड़्ढा हटाए बनाई गई । ’’ बेरोजगारी के कारण लोगों के पास फुरसत भी बहुत है और लोगों को तमाषा देखने का शौक भी । बस अब उस गड़्ढे के आस-पास भीड़ जमा होने लगी । एक बोला ‘‘यार मै तो रोज इधर से जाता हूॅ मेरा कभी ध्यान ही नहीं गया । ’’ दूसरा बोला ‘‘ मैं तो एक दो बार गिर भी चुका हूॅ।’’ अब लोगों का उस गड़्ढे से जुड़ाव होने लगा , देखते - देखते वो गड़्ढा दर्षनिय हो गया ।

      सरकार भी इस मौके को कैसे अपने हाथ से जाने देती प्रवक्ता जी बोले ‘‘ देखिये ये गड़्ढा तो सालों से यहाॅ था लेकिन हम ही है जिसने उसे आज इज्जत दिलाई । ’’ विपक्ष कब चुप रहने वाला था वे बोले ‘‘ आप हमारी उपलब्धि को अपना बता रहे है यह तो हमारा था और हमारा ही रहेगा।’’ गड़्ढा वहीं है । यह गड़्ढा ठीक वहीं है जहाॅ लोकतंत्र की सड़क के पहले हुआ करता था । यह गड़्ढा अब बड़ा और बड़ा होता जा रहा है । कुछ लोग इस गड़्ढे को भरना भी नहीं चाहते बस वे सेवा का कालीन इसी गड़्ढे पर बिछाकर बैठते है ।

                                      आलोक मिश्रा   


..
थ्त्व्ड रू.
                  ।स्व्ज्ञ डप्ैभ्त्।
             
                 ठ।स्।ळभ्।ज् ;डण्च्ण्द्ध
   
                डव्ण्छव्ण् .9425138926

बिना मुद्दे की बकवास ( व्यंग्य)


बिना मुद्दे की बकवास      ( व्यंग्य)
    नमस्ते ....आदाब....सत्तश्रीअकाल....आज फिर शाम के छः बज रहे है और मैं खवीश हाजिर हुँ बिना मुद्दे की बकवास के साथ । आप को बता दें कि यही एक शो है जिसमें मुद्दे को छोड़ कर बाकी सब बातें होती हैं । आज हमेशा की ही तरह हमारा मुद्दा वही है बेरोजगारी,महंगाई,भ्रष्टाचार और विकास । आज हमारे बीच में सरकार की तरफ से बकवास करने के लिए है सम्मानित जी , विपक्ष से सूरपनखा जी और साथ ही साथ कुछ दिखावे के ऐक्सपर्ट होगें जसलोक जी, नोकमेंट जी और बड़बोले जी ।
       तो हम प्रारम्भ करते है मुद्दे को भटकाने के लिऐ सम्मानित जी से " तो सम्मानित जी आपका इन मुद्दों पर क्या विचार है ?" सम्मानित जी ने अपनी जवाबदारी को निभाते हुए प्रारम्भ से ही मु्द्दे को भटकाने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया वे बोले "देखिए ये समस्याऐं हमेशा से ही रही हैं। इन समस्याओं पर बोलनें से चुनाव के समय अच्छे वोट मिलते हैं लेकिन अगर हम इन समस्याओं को हिन्दूओं में हल कर  दें देश प्रगति करेगा और हम ही है जिसने यह करने का साहस किया है ।..."  सूरपनखा जी बीच में कूद पड़ी और बोलने लगीं " आप यहाँ भी हिन्दू-मुस्लिम ले आए और मुस्लमानों का क्या ?" सम्मानित जी बात काटते हुए बोले " देखिए ....देखिए .... हिन्दू शब्द सुन कर ही इनके पेट में दर्द होने लगा । देखो हिन्दू भाईयों ये आपका भला नहीं चाहते ।.... " वे बोले जा रहे थे । सूरपनखा जी भी बोलने लगी "ये मुद्दे से भटका रहे हैं ... हम है उनके हितैषी ......" दोनों बोले जा रहे थे । उनके लिए महत्वपूर्ण यह नहीं था कि उन्हें कोई सुने ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह था कि दूसरे को कोई भी न सुन पाए । खबीश पहले तो मजा लेते रहे फिर चिल्ला-चिल्ला कर दोनों को चुप कराया ।
       अब खबीश को दोनों को फिर से लड़वाना था । खबीश बोला " देखिए बहस बहुत ही सार्थक हो रही है । अब यह बताईए कि इन मुद्दों का मंदिर -मस्जिद से क्या संबंध है । पहले सम्मानित जी बोलें ।सम्मानित जी बोले " देखिए मंदिर-मस्जिद पूरी तरह से इन मुद्दों से जुड़े है । वे लाखों बेरोजगार ही तो है जो मंदिर - मस्जिद पर लड़ने मरने को तैयार हैं और आप को बता दें कि मंदिर-मस्जिद में फंसे लोग महंगाई और भ्रष्टाचार की तो बात भी नहीं करते । मंदिर मस्जिद ही है जिसके कारण देश में दूसरी समस्याओं पर लोग धरना,प्रदर्शन और आंदोंलन करने से बचे रहते है.....।" सूरपनखा जी " बस....बस... आप लोगों को भटकाते है । आपके लिए मंदिर-मस्जिद मुद्दा है महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है । " सम्मानित जी चिल्लाते हुए बोल पड़े " देखिए....देखिए देश की आस्था से खिलवाड़ करने वालों को , चोरी करके घर भरने वालों को ,इनके लिए मंदिर-मस्जिद मुद्दा नहीं है । अच्छा इतना ही बता दें कि मंदिर बनाना है या मस्जिद ? " सूरपनखा जी फिर फंस गई बोली" देखिए ये हमारे लिए भी आस्था का प्रश्न है लेकिन यहाँ यह मुद्दा नहीं ..... " सम्मानित जी चीख पड़े "देखिये इनके पास जवाब नहीं है । ये तो जलेबी बना रहीं है ......। " फिर दोनों में सरेआम तू तू मैं मैं होने लगी ।
    बिचारे एक्सपर्ट खिड़कियों से झांकते विद्वता का परिचय देने के प्रयास में लगे थे । अब खबीश को उन पर तरस आ ही गया । खबीश बड़बोले जी की ओर इशारा कर के बोले " देखिए इस सार्थक बहस में आप भ्रष्टाचार पर बोलिए ।" बड़बोले जी तैयारी के साथ आए थे बोलने लगे " देश में महंगाई की दर.... प्रतिशत है ,बेरोजगारी की दर ....प्रतिशत है और भ्रष्टाचार को नापने का कोई पैमाना नहीं है ....। " खबीश बीच में ही बोल पड़े " बड़बोले जी हमारा दर्शक मनोरंजन के लिए बैठा है और आप है कि उसे आंकड़ों में उलझा रहे है । साफ-साफ बताईए कि इन समस्याओं का हिन्दू- मुस्लमान से क्या संबंध है ? " बड़बोले जी की विद्वता की सीमा के बाहर का प्रश्न होने के कारण वे चुप ही रहे । खबीश जी ने नोकमेंट  जी से राय मांगी तो वे बोले " देखिए हिन्दू मुस्लिम से देश का भला ही हो रहा है । देश की सारी योजनाओं को धर्म, जाति और साम्प्रदाय में ही चलाना चाहिए । इससे वोटों का गणित सही रहता है । " अब बड़बोले जी को बुरा लग गया वे बोले " ये क्या बात हुई इससे तो देश धर्म, जाति और सम्प्रदायों में बंट जाएगा । सम्मानित जी और सूरपनखा जी को कोई समझ नहीं है ।   " अब विद्वान भी आपस में लड़ने लगे ।
          सूरपनखा जी और सम्मानित जी भी चिल्लाने लगे बड़बोले ने उनके विषय में जो आपत्तिजनक शब्द कहें हैं वापस लें। खबीश भी चिल्ला-चिल्ला कर सब को शांत करने का प्रयास करता रहा ।
             और अंत में खबीश संयत मुद्रा में " तो यह था हमारा शो बिना मुद्दे की बकवास । यह शो दर्शकों के मनोरंजन के लिए था । इसमें कही गई किसी भी बात को दर्शक गंभीरता से न लें । कल फिर मिलेंगे किसी नए मुद्दे में हिन्दू -मुस्लिम तलाशने । नमस्कार ..... आदाब...... सतश्रीअकाल ।
                             आलोक मिश्रा"मनमौजी"
   

Tuesday, June 5, 2018

भगवान फॅस गए.....( व्यंग्य )

भगवान फॅस गए.....

      हमारे रामलाल जी हमेशा ही परेशानियों में रहते है । कुछ लोगों कहते है कि उनका और परेशानियों का चोली-दामन का साथ है तो कुछ लोग रामलाल को पैदायशी परेशान आदमी मानते है । रामलाल भी ऐसे कि अब वे छोटी-छोटी बातों पर भी परेशान हो जाते है ; आज घर में अखबार नहीं आया .... परेशानी , घरवाली ने सब्जी लाने को कह दिया ....... परेशानी और तो और आफिस में बाॅस ने अभिवादन का जवाब नहीं दिया....... परेशानी । रामलाल जिदंगी क्या है पूरी की पूरी परेशानियों का मकड़जाल है । ये अलग बात है कि कुछ परेशानियाॅ वास्तविक है और कुछ आभासी है । वैसे रामलाल किसी भी आम आदमी की ही तरह अपनी परेशानियों के लिए स्वयम् से अधिक अपने भाग्य और ग्रह नक्षत्रों को दोषी मानते है । बस ऐसे ही परेशान लोगों के लिए ही कई दरबार खुले होते है । रामलाल भी कभी एक दरबार में माथा टेकता तो कभी दूसरे में ।

    रामलाल अपनी परेशानियों को किसी रोग की ही तरह मानता है जिन्हे यदि एक ड़ाॅक्टर ठीक नहीं कर पाया तो शायद दूसरा ठीेक कर दे ।  इस आशा में रामलाल कभी गंडे-ताबीज बांधता तो कभी रत्नों की अंगूठीयाॅ धारण करता । रामलाल को एक बाबा ने बताया कि रात को घर के दरवाजे खुले रख कर सोया करो । उसने किया .....चोरों का लाभ हो गया और रामलाल की परेशानियाॅ और बढ़ गई । उसे एक बााबा ने पाॅच हजार रुपये ले कर बताया कि रोज चार समोसे खाया करो कृपा आने लगेगी । रामलाल ने पूरी आस्था और विश्वास के साथ समोसे खाने के इस धर्मिक अनुष्ठान को दस दिनाें तक किया फिर दस दिनों तक सरकारी अस्पताल में भर्ती रहे ।

      बेचारे रामलाल परेशानियाॅ पीछा छोड़ें तो कैसे ... कोई अच्छा गुरु ,भगवान या बाबा तो मिले । फिर उन्हें किसी ने भगवान बाबा का नाम बताया । भगवान बाबा के विषय में कहा जाता है कि वे जो कह देते है वही होता है । भगवान बाबा मानव की लीला करने के लिए मानव की देह में भगवान ही पैदा हुए है । भगवान बाबा के चरणों में बड़े-बड़े मंत्री-संत्री भी झुकते है । कहा तो यहाॅ तक जाता है कि भगवान बाबा के आर्शिवाद से कुछ राज्यों की सरकारें भी चल रही है । रामलाल को लगा कि शायद ये ही वे भगवान है जो उसके जीवन की परेशानियों का दूर कर सकते है । रामलाल ने इस बार परखने के लिए एक ही परेशानी बताने का निश्चय किया ।

      भगवान के दरबार में हजारों भक्त थे । सब पहले से ही अपने नाम पते लिखवा कर अपने लिए निर्धारित स्थान पर बैठे थे । मंच पर भगवान किसी भजन की धुन पर कुछ गोपीयों के साथ नाच रहे थे । जब वे रुके तो वहीं से इषारा करते हुए आवाज लगाई ‘‘ रामलाल .........ओ.......... रामलाल ।’’ रामलाल चमत्कृत हो गया भगवान ने उसे बुलाया इतने सारे लोगों में ........चमत्कार ....... चमत्कार । रामलाल ने मंच पर ही सब के सामने अपनी परेशानी बताई । भगवान बाबा बोले ‘‘ जा सात दिन में सब ठीक होगा । ’’ रामलाल की वह परेशानी सात दिनों में संयोग से जाती रही ।

           रामलाल अब भगवान बाबा का अनन्य भक्त है । उसके लिए भगवान से भी बढ़ कर अब भगवान बाबा है । अब वो अक्सर भगवान बाबा के आश्रम जाता दो-चार दिन ए.सी. कमरों में मुफ्त में रुकता , अच्छा भोजन करता वो भी मुफ्त में और प्रवचन सुन कर अपने आप को परेशानियों से मुक्त होता हुआ पाता । भगवान बाबा के फोटो, प्रवचन और साहित्य अब उसकी दिनचर्या का हिस्सा हो गए है ।

          फिर पता लगा कि भगवान बाबा पर कोई केस 15-20 सालों से चल रहा था । अब उसका फैसला होने वाला है । रामलाल ने सोचा ‘‘ सबको नेक रास्ता दिखाने वाले भगवान गलत काम कैसे कर सकते है ? भगवान को सजा कैसे हो सकती है ? हो भी जाए तो भगवान अपना स्वरुप दिखा ही देंगे । ’’ भगवान बाबा ने अपने भक्तों को दिलासा दी और बताया कि वे निर्दोष है लेकिन मानव लीला तो करनी ही होगी । फैसले का दिन भी आ गया । भक्तों को अपने भगवान पर भरोसा था लेकिन भगवान को अपने ऊपर नहीं था । भगवान को अपने बारे में सब मालूम था वे जानते थे कि सब के सामने भगवान रुप धर कर घूमने वाला वो कभी भी आपने जीवन में तुच्छ मानव से ऊपर नहीं उठ पाया । वो जानता है उसे उसके केवल एक ही पाप की सजा मिल रही है ऐसे और न जाने कितने जिन्हें प्रमाणित भी नहीं किया जा सकता ।

       आखिर फैसला आ ही गया भगवान को फंसना था और वे फंस ही गए । लाखों भक्तों को गहरा आघात लगा । वो जिस भोलेपन से उसे भगवान मान रहे थे अचानक वो भगवान ,भगवान न रहा  । भगवान तो अब जेल में निवास करते है । सब ओर उनके किस्से आम है । परन्तु रामलाल जैसे भक्तों की ओर किसी ने देखा तक नहीं । रामलाल जिसे अपनी परेशानियों में रोने के लिए भगवान की आवश्यकता है  अब वो फिर भगवान विहीन हो गया है । अब उसकी सारी परेशानियों से भी बड़ी परेशानी है कि उसके पास भगवान नहीं है । करोड़ों भगवान वाले देश में तब तक भगवान बाबा पैदा होते रहेंगे जब तक रामलाल अपने लिए एक अदद भगवान ढूढता रहेगा ।

                                                            आलोक मिश्रा 



                  
                
                 
     
       .9425138926

Wednesday, May 30, 2018

व्हीप............ व्हीप............... व्हीप’’ ( व्यंग्य )

‘‘



          ‘‘आज के समाचार यह है कि राम प्रसाद जो कि गधा पार्टी के नेता हैं, से सुअर पार्टी पर प्रहार करते हुये व्हीप.......व्हीप.......व्हीप कहा। इसके जवाब में सुअर पार्टी के प्रवक्ता ने पत्रकार वार्ता में राम प्रसाद के बयान की निन्दा करते हुये व्हीप.......व्हीप........व्हीप कहा।’’ 

          आप तो समझ ही गए होंगे कि हमने व्हीप के पीछे वो सब छुपाया है जो शोभनीय नहीं है। ये वो भाषा हैं जो बाजारू लोग एक दूसरे पर सरेआम प्रयोग करते हैं। अब हमारी मजबूरी है कि हमें उन बाजारू लोगों द्वारा बोले गये बजारू टाइप के शब्दों को अपने परिवार के साथ बैठ कर सुनना पड़ता है। कभी-कभी लगता है ये गलती उनकी नहीं हमारी है हमने ही तो ऐसी ओछी मानसिकता के लोगों को अपना नेतृत्व प्रदान किया है।

          वैसे देखा जाय तो किसी भी व्यक्ति की जुबान उसके मन का आईना होती है। कोई व्यक्ति क्या सोचता है, किन विषयों पर सोचता है, और कितनी गहराई तक सोचता है। यह उसकी वाणी में स्पष्ट दिखाई देता है। बहुत कम लोग होते हैं जो अपने वाकचातुर्य से अपनी मनःस्थिति को छुपा लेते हैं। आप सोच कर देखिये आपके सबसे बड़े दुश्मन के विषय में, फिर किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में आपसे कोई उसके संबंध में कुछ कहने को कहे तो आप क्या और कैसे बोलेंगे ? आप एक समझदार व्यक्ति हैं इसलिए आपक वक्तव्य को व्हीप......व्हीप.....व्हीप से छुपाना नहीं पडे़गा। लेकिन इन असभ्यों का हम क्या करें ?

          बहुत सोचा तो समझ में आया शायद कहीं चुनाव होने वाला है। अब छोटे-बड़े नेता बरसाती मेढ़कों की तरह निकलकर टर्राने लगे हैं। उनको लगता है जनता तो भेड़-बकरी है हुर्र....हुर्र बोलो और जिधर चाहें हांक लो। बस वे अपनी-अपनी भेड़ों-बकरियों के समुह को अलग-अलग करने में लगे हैं। अब इसके लिए गालियाँ देनी हो, मोर्चे करने हो या दंगे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इन्हीं भेड़-बकरियों के समूह को वे वोट बैंक कहते हैं। एक ने गाली देकर अपने वोट बैंक को जमा करने का प्रयास किया, तो दूसरा प्रतिउत्तर में गालियाँ देकर अपने समुह को सजाने लगा।

          अब डर लगने लगा है कि जो गालियाँ जुबान पर बचपन से आज तक आ न सकी। कहीं उन्ही को रोज शाम को विभिन्न चैनलों पर होने वाले वाद-विवाद में सुनना जरूरी न हो जाए या ये भी हो सकता है कि अब नेताओं को भी सेंसर बोर्ड प्रमाण-पत्र देने लगे। हो सकता है   राम प्रसाद को सेंसर बोर्ड व्यस्कों के लिए वाला प्रमाण पत्र प्रदान कर दे। बस उन्हें गालियाँ देने की पूरी छूट होगी, लेकिन केवल व्यस्कों के सामने। शैल कुमारी जी के यू.ए. प्रमाण पत्र प्रदान दिया जा सकता है, याने इनके भाषण बच्चे भी सुन सकेंगे अपने माता-पिता के साथ। बस जब ये आपे से बाहर हो जाए तो माता-पिता को बच्चे के कान बंद करने होंगे। इन परिस्थितियों में हर पार्टी में अपने कुछ नेताओं को ‘‘ए’’ प्रमाण पत्र दिलाने की होड़ लगी रहेगी।

          एक विचार आता है कि गालियों का एक शोध संस्थान होता। इसमें पुराने किस्म की गालियों के स्थान पर नई-नई गालियों की खोज की जाती। गालियाँ ऐसी जिनका प्रयोग घर से लेकर संसद तक किया जा सकें। ऐसे गालियों के बमों को व्हीप.....व्हीप.....व्हीप के पीछे छुपाने की आवश्यकता न पडे़। तब खोज करने वालों को गाली वीर, गाली रत्न जैसे पुरस्कार प्राप्त होना आम हो सकता है।

          अब मैं भी सोच रहा हूँ कि अध्ययन-अध्यापन तो हमें आता ही है। भविष्य में गालियों की कोचिंग देने वाली संस्थाओं का बोल-बाला हो सकता है क्योंकि जो जितना बड़ा गालीबाज वो उतना बड़ा नेता। बस अब गालियों की कोचिंग खोली जाए। इससे अच्छा खासा धन तो कमाया ही जा सकता है। साथ ही देश के बड़े-बड़े गाली बाजों के गुरू होने का रूतबा भी हासिल हो जाएगा।

          अब आप क्या सोच रहे हैं वो गालियाँ दे रहे हैं सुनिये...........सुनिये। ‘‘व्हीप..........व्हीप.........व्हीप.........।’’ बस आप उन्हीं को चुनिये। यही तो आपके नेता हैं।



                                                  आलोक मिश्रा

दावत - अदावत ( व्यंग्य )





                     

           दावत शब्द सुनते ही लज़ीज पकवानों के की महक से मुंह में पानी आना स्वाभाविक ही है । शादी - ब्याह हो , जन्म दिवस या कोई और ही दिवस बिना दावत के सब अधूरा ही रहता है । दावत न हो तो उत्सवों की रौनक ही अधूरी रहती है । आप और हम भी किसी अवसर की सफलता और असफलता को स्वाद के पैमानें पर ही नापते है । अब दावतों के इस चलन ने समुह भोज का रूप ले लिया है ।

      हम तो ठहरे ठेठ देहाती टाईप के आदमी , कहीं शादी - ब्याह का निमंत्रण मिला कि बस बालों में तेल - फुलेल ड़ाल कर टीप -टाप तैयार होकर समय से पहले ही पहुॅच जाते है । साथ ही घरैतिन को ताकीद भी कर देते है कि आज हमारा खाना न बनाए और हो सके तो वो भी साथ ही चले । स्कूलों से लाई हुई टाट पट्टी बीच में परोसने वालों के लिए स्थान छोड़ कर बिछाई गई होती है । हम अपनी पारखी नज़रों से जयजा लेकर यह अंदाज लगाने का प्रयास करते है कि एक बार में कितने लोगों को बिठाल कर खिलाया जा सकता है । दूल्हा - दुल्हन को देखनें के बजाए एक बार रसोई का चक्कर लगा कर यह भी पता करना जरूरी होता है कि खाने में क्या - क्या है । पहली पंगत प्रारम्भ होते ही जल्दी से टाट पट्टी पर पहले अपना स्थान सुरक्षित किया ,फिर अपनी चरण पादुका अर्थात चप्पल को भी तो सुरक्षित करना होता है सो उन्हे रख कर उसी पर बैठ जाना सबसे सरल और सहज उपाय है । अब खाना परोसने वाले पत्तलों और दोनों में खाना परोसने लगे । मिठाई परोसने वाला एक - .एक ही दे रहा था , हमनें  दो की दरकार की तो उसने हमें खा जाने वाली नजरों से देखा । हमें  क्या ..... हमने अपनी पत्तल पर ध्यान केन्द्रित कर लिया । हमने अपने पीछे देखा तो चार लोग खड़े थे और वे रास्ता देख रहे थे कि कब हम उठे और वे हमारा स्थान ग्रहण करें । हुआ भी ऐसा ही हम ठीक से उठ भी नहीं पाए थे कि उन चारों में हमारे स्थान को पाने के लिए धक्का -मुक्की प्रारम्भ हो गई ।

      एक दावत में देसी और विदेशी मेल का तड़का देखने में आया । दावत देने वाले  का समाज बड़ा था और बफे का सलीकेदार भी नहीं था उनके लिए पंगत में भोजन कराना मजबूरी हो गई । परन्तु परोसने वालों का सूटेड़- बूटेड़ दल किराए से बुलवा लिया । परोसने वाले लड़के और लडकियाॅ बेरोजगारी के मारे । लड़के चुस्त जींस , शर्ट और टाई में और लड़कियाॅ शर्ट ,शार्ट और टाई में । बेचारे खाना परोसते तो टाई दाल और सब्जी का आनंद लेती ।  लड़कियाॅ एक पंगत में परोसती तो उनके पीछे की पंगत वाले दादा जी कहते बेटा कपड़े तो ठीक से पहन लेती ।

     दावतें तो हमने बहुत सी उड़ाई । एक दावत दावत कुर्सी- टेबल पर परोस कर खिलने वाली थी । देसी खाना ठेके पर था । ठेकेदार को अपनी बचत की चिंता थी और मेजबान को अपनी । ठेकेदार के परोसने वाले हाथ में दो रोटी पकड़ते और और टेबल के सामने  निकलते हुए कहते ‘‘ पोड़ी........पोड़ी......... ’’ ,जब तक हम कहें ‘‘दो ’’ तब तक वो चार लोगों को पार कर चुका होता  । हमें वो हल्के से ले रहा था । हम ठहरे घाघ दावतिए सो हमने आराम से रोटीयों को खत्म की और बैठ गए । उसको दूर से आते देख कर अपने हाथ को टेबल से बाहर किसी चुंगी नाके की तरह निकाल दिया । उसने रूक कर रोटी दी और जाते - जाते हमें बेशर्म होने का सम्मान देता गया ।

      अब जमाना बदलने लगा है । जहाॅ देखिए ‘‘ बफे ’’ याने वृषभ भोज है । जैसे भैसों को सानी लगाई जाती है उसी तरह आप को आमंत्रित कर आपके लिए सानी लगाई जाती है । उस पर तुर्रा ये कि खाना भी अपनी सहूलियत से ही प्रारम्भ होता है । बस भीड़ इतनी की खाने तक पहुॅचना भी मुस्किल होता है । ऐसे में शर्मा जी की दाल वर्मा जी के कोट पर , ठाकुर सहाब की आइस्क्रिम के निशान श्रीमती जैन की साड़ी पर दिखाई देते है । यहाॅ तक तो गनीमत है कुछ लोग वहीं नींचे बैठ कर खा रहे  हैं । चोपड़ा जी किसी वीर योद्धा की तरह पूरी प्लेट भरने का जंग जीत कर बचते- बचाते बाहर निकल ही रहे थे कि नीचे बैठ कर खाती हुई एक महिला से टकरा ही गए । उनका और उनकी प्लेट का संतुलन बिगड़ गया बड़ी मुस्किल से उन्होंने प्लेट को सम्भालते हुए संतुलन तो बना लिया लेकिन प्लेट में रखी पूड़ीयों को वे सम्भाल नहीं पाए । वे उनकी प्लेट से उछल कर खुद ही उस महिला की प्लेट में स्थापित हो चुकी थी । इस भीड़ का यही तो मंत्र है जिसने जो पाया वो उसका । कभी - कभी तो प्लेटें ही कम पड़ जाती है । कुछ लोग खा रहे होते और कुछ लोग प्लेटों का इंतिजार । हमारे बोहरा जी ऐसे मौके पर अंदर जा कर प्लेट धो कर अपनी व्यवस्था स्वयम् ही कर लेते है । एक साहब ने पहले रबड़ी खाई , फिर काफी पी और आइस्क्रिम भी खाई । उनका सिद्धांत एक दम सरल है भाई प्रिपेड दावत है , लिफाफे में पेमेंट किया है तो पूरा चुकता करना होगा ।

    कुछ तो ऐसे भी है जो इस पूरे वातावरण में भोजन तक पहुॅच भी नहीं पाए है । ऐसे लोगों से भी बिदाई के समय मेजबान पूछता अवश्य है ‘‘ भोजन किया ....... भोजन ठीक तो था न........।’’ ऐसे लोग भी महान होते है भूख से कुलबुलाते हुए पेट के साथ भी सभ्यता के दायरे में रहते हुए मुस्कुरा कर भोजन लेने और अच्छा होने का औपचारिक बयान दे का घर की ओर खिचड़ी खाने हेतु चल देते है । ये अलग बात है कि हम जैसे कम महान व्यक्तियो के साथ एक तो ऐसा हादसा होता ही नहीं और अगर हो भी जाए तो तैयार हो कर तो घर से निकले ही है घर में खाना भी नही बना है , सो कोई और पंड़ाल या मेजबान देख कर पेट पूजा करके ही हम घर की ओर प्रस्थान करते है। अब हम कर भी क्या सकते है आखिर दावत है  पेट से अदावत तो नहीं । 
                   आलोक मिश्रा






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गमछे की आत्मकथा ( व्यंग्य )



        
      हाॅं तो साहब मैं गमछा हुॅं । वही गमछा जो कभी आपके कटिप्रदेश  की तो कभी उत्तर प्रदेश  की शोभा बढाता हुॅ । गमछा याने पटुका और आधुनिक लोगों का स्टाल भी मै ही हुॅ । रुमाल मेरा छोटा भाई है वो केवल उस समय ही आप की लाज बचा पाता है जब आपकी नाक से कुछ बाहर आने का प्रयास कर रहा होता है । हम चूंकि बड़े भाई है इसलिए रुमाल के द्वारा किये जाने वाले कार्यों के अलावा भी आपकी दैनिक जिंदगी में आपके साथ होते है । वैसे हमारा परिवार बहुत बड़ा है । दस्तार और पगड़ी के साथ ही साथ कफन भी हमारे परिवार के सदस्य है । धोती और साड़ी हमारे परिवार में सबसे बड़ी बहनें है । उपयोग की दृष्टि से देखा जाए तो आप अपने घर में अधोवस्त्र में हों और कोई आ जाए तो आप तुरन्त ही हमारी शरण में आ जाते है । चिलचिलाती धूप में खोपड़ी बचानी हो तो आप का हमसे अच्छा साथी और कौन हो सकता है । साहब आज कल लोग अच्छे कामों से अधिक गलत काम करते है इसलिए उन्हें मॅुह भी छुपाना होता है बस ऐसे लोग दिन हो या रात मुझे अपने मुॅह लपेटे हुए आप को यहाॅ-वहाॅ दिख जाऐंगे ।

    अब आप सोचने लगे हांेगे कि आत्मकथा तो महान लोगों की होती है अब इस फटीचर गमछे की आत्मकथा में क्या रखा है । आपको बता दें आज - कल हमारी बहार है । बड़े -बड़ों का रुतबा हमसे ही जुडा होता है । अनेंक महान लोगों की मूर्ति या तस्वीर बिना हमारे अधूरी लगती है । हम अनेंक रंगों और डिजाईनों में पाए जाते है । आप मुझे अपनी प्रकृति के अनुसार ही चुनते है । मुझे बांधनें या कंधे पर लटकाने का तरीका भी सबका अपना और विशेष होता है ।  कुछ लोग हमें हमेंशा ही अपनी खोपड़ी के आस - पास लपेटे रहते है तो कुछ पूरा सर ढ़ांकते है । कुछ कंधे पर सलीकेदार तहों के साथ लटका कर रखते है तो कुछ मुझे गले में टाई के पर्याय के रुप में बांधे फिरते है । इन सब से मैं उनके व्यक्तित्व की एक झलक आपको अवष्य ही देता हुॅ ।

    पहले मैं पुरुषों में सफेद और महिलाओं में रंग-बिरंगे रुप में प्रचलित था । पिछले कुछ समय से आप हमारे रंग के आधार पर ही मुझे धारण करने वाले के राजनैतिक और सामाजिक झुकाव के विषय में जान सकते है । पिछले कुछ समय से मेरे सफेद रुप का स्थान केसरिया ने ले लिया है । अब केसरिया धारण किये युवक पान ठेलों पर ,राह- चैराहों पर और शराब के ठेकों पर दिखाई दे जाऐंगे । मेरे केसरिया रुप के प्रचलन से अब हरे और नीले रुपों में भी मेरा प्रचलन बढ़ने लगा है । अब मुझे विषेष अवसरों के लिए बनवाया जाने लगा है । अब हम पर नेताओं की फोटो , चिन्ह और नारों को छाप कर भी बाॅटा जाने लगा है । अब स्थिति ऐसी है कि यदि एक ही स्थान पर दो रंग के गमछे वालों की भीड़ जमा होने लगे और आप शरीफ आदमी हो तो समझ लेना चाहिए कि कोई लफड़ा होने वाला है , आप अपनी जान की सलामती चाहते है तो तुरन्त ही वहाॅं से खिसक लें ।

      मैं इन रंगों के झमेले में कब फसा यह तो मुझे भी ज्ञात नहीं लेकिन मेरा राजनीतिकरण अवष्य हो गया है । मैं तो सीधा-सादा एक-ड़ेढ मीटर का कपड़ा मात्र हुॅं लेकिन रंगों के चक्कर में गर्व और घमंड़ का प्रतीक बन गया हुॅं । कुछ लोग कुछ खास रंग में मुझे धारण करके अपने आप को पुलिस और प्रशासन से ऊपर समझनें लगे है । यही कारण है कि यदि आज-कल कुछ लोग खास रंग के गमछों में शहर में निकलते है तो आम आदमी सोचने लगता है कि आज किसी की सामत आई है । इन परिस्थितियों में मेरा धारण करना उग्रता का पर्याय होता जा रहा है और राजनैतिक रसूख का भी । इन स्थितियों का लाभ वे लोग ले रहे है जो जेबकतरे, चोर और लुटेरे है , जिनका किसी भी रंग विशेष  की ओर कोई झुकाव नहीं है ,वे अपनी वारदातों के समय विशेष  रंग के गमछों का प्रयोग करने लगे है । पुलिस थानों में भी मेरे रंग के आधार पर ही यह निर्णय होता है कि कार्यवाही होगी या नहीं ।

      मैं सोचता था कि मैं एक सदभावना की मिसाल हुॅ । हर धर्म या जाति के व्यक्ति के सर या कंधों पर इठलाता हुॅं । समय के साथ-साथ मेरा यह गुमान भी जाता रहा । मुझे सबसे अधिक गर्व उस समय होता है जब मैं किसी किसान के सर पर मुकुट की तरह सजा होता हुॅ । वो मुझे सर पर बांधता है ,पसीना पोछता है और जरुरत के अनुसार लपेटता और बिछाता भी है । मैं गंदा और गंदा होता जाता हुॅ लेकिन खुश  रहता हुॅ । अब तो मैं वो झंड़ा हो गया हुॅ जो हर व्यक्ति अपने शरीर पर लहरा कर यह बताता है कि वो किस खास सांप्रदाय या विचारधारा का है ।  अब मुझे पहन कर उन्हें भले ही गर्व होता हो मगर मुझे तो स्वयं पर बहुत ही शर्म आती है ।

     

                     आलोक मिश्रा


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ैीवू ुनवजमक जमगज

Tuesday, May 29, 2018

हमारे घर में छापा (व्यंग्य )

    

    एक दिन अचानक ही मेरे मोहल्ले में हड़कम्प मच गई । पुलिस के एक बड़े से दस्ते का एक बड़ा सा फौज-फाटा हमारे मोहल्ले में दाखिल हुआ । हमें लगा , पड़ोस के वर्मा जी के घर आज छापा पड़ा । वर्मा जी कहने को तो सरकारी मुलाजिम है वो भी तीसरी श्रेणी के मगर उनके ठाट-बाट से पूरा महोल्ला ही जलता है । हमारे महोल्ले में बस एक वो ही है जिन्हे किसी छापे का ड़र हो सकता है । हम जैसे लोग तो सपने में भी छापे की कल्पना नहीं कर सकते । पुलिस के इस लावलश्कर से हमें न कोई चिन्ता होनी थी और न हुई । चिन्ता उस समय होने लगी जब चार पुलिस वाले हमारे दरवाजे पर आ कर रूके और बाकी ने हमरे घर को ऐसे घेर लिया जैसे हम भागने वाले हो । एक सफेद कार से चार लोग उतरे और उन्होंने पूछा ‘‘ यही है मिश्रा का घर है ? ’’ हमारी तो घिघ्घी ही बंध गई हमने हाॅ में सिर हिलाया । बस क्या था वे सीधे घर में अंदर दाखिल हो गए । वे बोले ‘‘ सब मोबाईल यहाॅ ला कर रख दो । ’’ मुझे लगा मोबाईल मेरे पास भी रहें तो भी मै क्या कर लुंगा , जादा से जादा अपने फटीचर रिश्तेदारों को फोन करता या अपने उन कमीने दोस्तों को जो ऐसे समय पर कभी साथ देने वाले नहीं है । पूरे मोबाईल टेबल पर पहुॅचनें के बाद वे बोले ‘‘ फोन है ?’’ हमनें कहा ‘‘ नहीं ..... बिल अधिक आता था कटवा दिया । ’’

          वे बोले ‘‘ देखिए आपके यहाॅ छापा पड़ा है । हमें मालूम हुआ है कि आपके पास बहुत सा काला धन है । ’’ हम बड़ी मुस्किल से बोल पाए ‘‘ साहब यहाॅं तो गुलाबी नोट के भी लाले पड़े है , ये काला नोट कब जारी किया सरकार ने । ’’ वे कड़क कर बोले ‘‘ होशियारी नहीं .....अब आपके घर के कोने -कोने की तलाशी होगी । ’’ इस बीच हमारी पत्नि उनके लिए चाय और नाश्ता ले कर ऐसे आई जैसे उसे इनकी ही प्रतिक्षा रही हो । मैने उसकी ओर देखा और पूछा ‘‘ ये क्या है ?’’ वो धीरे से फुसफुसा से बोली ‘‘ देखो इनके आने से अब हमारा सम्मान बढ़ेगा । हमारी लड़कियों के रिश्ते फटाफट हो जाऐंगे और अब वर्मा की बीबी भी ड़ींग नहीं मार पाऐगी । ’’ नाश्ता उन्होंने छुआ भी नहीं , तलाशी चालू हो गई ।

        उन्होंने पूछा ‘‘ तिजोरी कहाॅं है ? ’’ हम बोले ‘‘ तिजोरी तो नहीं है ..... तिजोरी कहाॅ ....... दो-तीन लोहे की अल्मारी है , उनमें कपड़े रखते है । ’’ वे बोले ‘‘ फिर होशियारी .... चाभी दो ।’’ मैने जवाब दिया ‘‘ साहब चाभी तो नहीं है ....... कपड़ों की अल्मारी है , खुली ही रहती है । बे अल्मारीयों से कपड़े निकाल कर फेकने लगे । उनमें हमारी पत्नि के अधोवस्त्र भी बाहर आ गिरे उन्हें उसनें जल्दी से उठा कर अपने पल्लू में छुपा लिया । वे कड़क कर बोले ‘‘ ऐ क्या छुपा रही है .... दिखा ..... दिखा क्या छुपा रही है ? ’’ वो क्या बोलती दिखाया और आॅखों में पानी लिए वहाॅ से चली गई । उन्हे अल्मारी में दो पुराने पाॅच सौ के नोट मिले । वे बोले ‘‘ये क्या है ? ’’ मै अब तक संयत हो चुका था बोला ‘‘ साहब ये मेरे पिता की निशानी है अब भले ही ये आपके लिए काला धन हो मेरे लिए ये मेरे पिता की याद है । ’’ उन्होंने अल्मारी पूरी उलट-पुलट ड़ाली अब वे घर के बाकी सामानों को उलट-पुलट रहे थे । उन्हें कुछ न मिलने पर वे और बौखलाहट में सामानों को फेक-पटक रहे थे । उन्होंने मेरी किताबों की अल्मारी देखी बोले ‘‘ इसमें क्या है ?’’ मैं बोला ‘‘किताबें ।’’ बोलते-बोलते ही मैने उसे खोल दिया । अब वे एक-एक पुस्तक का एक-एक पन्ना पलट कर सरस्वती नहीं लक्ष्मी ढूंढ रहे थे । सरस्वती पुत्र के घर उन्हें लक्ष्मी मिलती भी तो कैसे ? उन्होंने हमारे गद्दे - रजाईयाॅ फाड़ कर देखी , फर्श भी जहाॅ से पोला लगा खोद ड़ाला । अब हमारा घर किसी कबाड़खानें की तरह लग रहा था । उन्हें अब भी आशा थी , उन्होनें पानी कर टंकी , टी.व्ही. , फ्रिज और कुलर तक को नहीं छोड़ा ।

        आखिर वे हार गए । वो बोले ‘‘ तू या तो बहुत ही बड़ा बदमाश है या फिर बड़ा भिखारी । ’’ मै बोला ‘‘ साहब आप कुछ भी समझे कुछ भी कहें पर आपको भी सोचना चाहिए आप एक सरकारी कर्मचारी के घर महिनें की अंतिम तिथियों पर छापा मार रहे है । ’’ मेरी पत्नि विनम्रता से बोली ‘‘ साहब अब आप नाश्ता तो लें । ’’ वे नाश्ता करने लगे तब मेरी पत्नि बोली ‘‘ साहब अब आप मीड़िया से क्या बोलेगें ?’’ वे बोले ‘‘ बता देगें कि हम गलती से आप जैसे कड़के के यहाॅ आ गए थे । ’’ वो फिर बोली ‘‘ आपने इतनी मेहनत की है तो एक मेहरबानी और कर दें ।’’ वो बोले ‘‘ कहिए ।’’ मेरी पत्नि बोली ‘‘ आप मीड़िया को कुछ तो जप्ति बता ही दें नही तो हमारी बहुत बेइज्जती हो जाएगी । ’’ वे बोले ‘‘ ऐसा कैसे हो सकता है ........ खाली-फोकट में ? ’’ मेरी पत्नि ने हाथ जोड़े तो हमनें भी जोड़ दिए । वे बोले ‘‘ आपके पास तो कुछ है भी नहीं फिर......।’’ मेरी पत्नि बाहर जाने लगी , पुलिस वाले रोकने लगे और मीड़िया वाले उसकी ओर बढ़ने लगे । साहब के इशारे पर पुलिस की सुरक्षा में वो बाहर गई और कुछ ही क्षणों में वापस भी आ गई । उसनें नोटों की एक गड्डी साहब की ओर बढ़ा दी । बस सब के सब हमें हमारे कबाड़ा बने घर के साथ छोड़ कर चले गए ।

          बाद में पत्नि ने मुझे बताया कि उसनें वर्मा जी की पत्नि से पैसे उधार ला कर साहब को केवल और केवल अपनी इज्जत बचाने के लिए दिए । रात को रजाई गद्दों के बगैर आग के आस-पास बैठ कर पूरे परिवार ने रात काटी । दूसरे दिन हम समाचारों में थें मगर साहब की दया से चोर साबित नहीं किए जा रहे थे । हाॅ इससे हमें जो लोग फटीचर समझते थे अब हैसियतदार समझनें लगे है।

                                               आलोक मिश्रा


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Monday, May 28, 2018

यमराज का आगमन ( व्यंग्य )



    अचानक एक धमाकेदार खबर सुर्खियाॅ बन गई । बनती भी क्यों न , खबर ही ऐसी थी । खबर आई कि यमदूत आने वाले है । बस , सब तरफ कोहराम मच गया । यमदूत कब आते है और कब चले जाते है ,किसी को कुछ पता भी नहीं चलता परन्तु आज ऐसा क्या हुआ कि वे आ भी रहे है और पूरे तामझाम और शगूफेबाजी के साथ । लोग कयास लगाने लगे कि शायद कोई बड़ी आफत आने वाली है । कुछ लोगों ने मौके का फायदा उठा कर दुनिया के अंत की भविष्यवाणी भी कर  दी । कुछ इसे कोरी गप्प और समाचार माध्यमों की टी.आर.पी. के लिए की जाने वाली कारस्तानी बताने लगे । समाचार चैनलों पर कथित समाचार वाचक चीख-चीख कर बता रहे थे कि ‘‘ उनका ही चैनल है जिसने यह खबर सबसे पहले दी है ।’’ कुछ चैनल इस मुद्दे पर जोरदार वाद - विवाद करवा रहे थे कि आखिर यमदूत आ क्यों रहे है ? ऐसे वाद-विवादों में जैसा कि हमेषा ही होता है वही हो रहा था , याने सूत न कपास जुलाहे से लट्ठम लट्ठा । विरोधी दलों के नेता यमदूत के आगमन को सरकार की नाकामी से जोड़ रहे थे ,वहीं सत्ता पक्ष के लोग इसे भी अपनी उपलब्धियों में शामिल करने से नहीं चूक रहे थे ।

       खबर तो बस इतनी ही थी ,यमदूत आ रहे है । कब ,कहाॅ और क्यों , किसी को कुछ नहीं मालूम । अजीब स्थिति थी आगे की खबर के लिए कोई जरिया भी तो नहीं था । खबर के इस धागे में कुछ तो मनके सजाने जरूरी थे , बस फिर क्या था समाचार माध्यम सूत्रों का सहारा लेने लगे । खुफिया तंत्र जो इस खबर से पहले से ही हैरान था ,अब समाचार माध्यमों के सूत्रों से शर्माने लगा । खैर साहब दो-तीन दिन के शोरगुल के बाद जैसे ही कहानी का मजा कम हुआ वैसे ही कहानी बासी हो गई । जनमानस भी चैन की सांस लेने लगा । खबर जिसने यहाॅ आग लगा दी थी ,वो कुछ देर से ही सही वहाॅ भी पहुॅच ही गई जहाॅ से कहा जाता है कि यमराज आते है । अब यमराज को भी अपने यमदूतों पर संदेह होने लगा । वे सभी यमदूतों से इस खबर के सम्बन्ध में पूछताछ करने लगे ।  एक यमदूत बोला ‘‘ सर आपने वहाॅ वैसे ही स्थाई रूप से यमदूतों की नियुक्ति आतंकवादियों के रूप में कर रखी है । हम तो बस छोटी-मोटी घटनाओं पर ही वहाॅ जाते है । ’’ यमराज बोले ‘‘ तो कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारा कोई वहीं का यमदूत याने आतंकवादी कहीं आ-जा रहा हो लेकिन हमने तो ऐसा कोई आर्डर नहीं किया ।’’ यमराज के सामने समस्या बड़ी  थी । उन्हंे लगा कि यदि अब विभाग की इस प्रकार की खबरें भी बाहर आने लगी तो विभाग की छवि का क्या होगा ? वे इस बात से चिंतित थे कि इस प्रकार तो किसी दिन ये चैनल वाले यह भी जान लेंगे कि कब कौन मरने वाला है । यमराज के जीवन में ऐसा मौका पहली ही बार आया था । वे उपायों के विषय में सोचने लगे । बहुत विचार-विमर्ष के बाद वे सोचने लगे कि आखिर ये ‘‘सूत्र ’’ कौन है ? वे सोचने लगे कि यदि ‘‘सूत्र’’ मिल जाए तो निष्चित रूप से समस्या हल हो सकती है । उन्होंने अपने यमदूतों को भेजा और कहा ‘‘ इस सूत्र का पता लगाए ।’’अब यमदूत समाचार चैनलों के दफ्तरों के आस-पास धक्के खा कर ‘‘सूत्र’’ को खोजने की कोषिष करने लगे । इस ‘‘सूत्र’’ का कोई सूत्र होता तो इन्हें मिलता न । निराष थके-हारे यमदूतों ने यमराज के पास वापस जा कर अपनी -अपनी नाकामी की कथा सुनाई । यमराज बोले ‘‘ भाई वे समाचारों में ‘‘सूत्र’’ का हवाला देते है ,वो होगा तो जरूर । तुम खोज नहीं पाए ये तुम्हारी नाकामी है । अब मंै स्वयम् जाउंगा इस सूत्र को खोजने । ’’ यमराज ने बाकायदा विज्ञप्ति जारी कर अपने आने की पुष्टि कर दी ।

      लो साहब,जो खबर दब गई थी वो फिर से जीवित हो गई । अब तो चैनलों के पास सूत्रों की खबर को पुष्ट करने वाली यमराज की विज्ञप्ति भी थी । विज्ञप्ति में आने का समय और स्थान का भी उल्लेख था । सारे समाचार क्षेत्र से जुड़े लोग निर्धारित समय और स्थान पर यमराज के स्वागत के लिए जमा थे । यमराज आए , वही पुरानी वेषभूषा , वही गदा , वही मुकुट और वही बलिष्ठ सी काया ।  किसी को भी उन्हें पहचानने में कोई असुविधा नहीं हुई।  सभी ने अपने - अपने घरों में टी.वी. चैनल बदल-बदल कर ष्यमराज को जीते जी लाईव देखा । वे जैसे ही आगे बढ़े ,बहुत से कैमरों के साथ माइक भी उनकी ओर बढ़ने लगे। एक पत्रकार ने पूछा ‘‘ व्हाट इज द रीजन टु कम हियर ?’’ यमराज ने उसकी ओर ध्यान ही नहीं दिया । बहुत से पत्रकार पास पहुॅच कर उनसे कुछ न कुछ कहलवा लेना चाहते थे । यमराज एक पल को रूके तो एक ने पूछ लिया ‘‘ सर.....सर..... आपके आने का कारण क्या है ? ’’ यमराज अब उनकी तरफ मुखातिब हुए और बोले ‘‘ हम अपने आने का कारण भी बताएंगे लेकिन पहले आप लोगों से हमें पूछना है कि यमदूत के आने की पिछली खबर आप में से सबसे पहले किसने दी थी । ’’ पत्रकारों में गदर मच गया । सारे चैनल और अखबार अपने आप को सबसे तेज बताना चाहते थे । इस गदर में यह निष्चित नहीं हो पा रहा था कि वास्तव में सबसे तेज कौन है ,कम से कम इस खबर के मामले में । अब यमराज को लगा यहाॅ तो सब ही तेज है तो जरूर ‘‘सूत्र’’ भी बहुत से होंगे । पत्रकार भी अधीर हो रहे थे वे एक साथ बोले ‘‘ सर.... सर.... आप अपने आने का कारण तो बताइए । ’’ यमराज ने सोचा अब अधिक फुटेज खाना ठीक नहीं है इसलिए बोले ‘‘  देखिए पहले हमारे आने का कोई प्रोग्राम नहीं था हो सकता है हमारे किसी यमदूत का रहा हो लेकिन आप लोगों ने यह खबर चलाई अपने ‘‘सूत्रों ’’ के हवाले से । हमें लगता है कि आपके ‘‘सूत्र’’ के कारण हमारी गोपनियता भंग हो रही है। बस हम यहाॅ आए है आपके इस ‘‘सूत्र’’ को अपने साथ ले जाने के लिए । न रहेगा बंास और न बजेगी बांसुरी ।

           अचानक  ही सब ओर सन्नाटा छा गया । पत्रकार जिस तेजी से आए थे उसी तेजी से खिसक लिए । किसकी सामत आई थी जो वहाॅ रूकता । जिस ‘‘सूत्र’’ की बात दिन-रात वे करते है वह उन्हीं में तो छुपा था । यदि यह सूत्र गया तो हो चुकी पत्रकारिता । यमराज आज भी ‘‘सूत्र’’ खोज रहे है और समाचार आज भी उन्ही सूत्रों के हवाले से चल रहे है।

                                                           आलोक मिश्रा

लोटन का शौचालय (व्यंग्य कथा)





          एक गाँव में एक बुजुर्ग रहते थे, नाम था लोटनलाल। पहले उनका भरा-पूरा परिवार था। फिर धीरे-धीरे सब साथ छोड़ते गए, कुछ मौत के कारण और कुछ लोग शहर की ओर दौड़ के कारण। आज लोटन छोटी-सी झोपड़ी में अकेले रहते हैं। दिन में एक पंप के सहारे हवा भरते तथा पंचर बना कर अपने पेट का जुगाड़ कर लेते हैं। अब लोटन खाते हैं तो जाना भी होता है। वे हमेशा ही लोटा लेकर निकल जाते हैं। सुबह शाम की सैर की सैर और काम का काम। एक दिन सुबह सूरज निकलने से पहले वे नित्यक्रिया हेतु लोटा लेकर सड़क के किनारे बैठे थे। अचानक किसी ने टार्च की रोशनी उन पर डाली। वे हड़बड़ा कर खड़े हो गये। टार्च के उस ओर गाँव के गुरूजी थे। वे बोले ‘‘क्या गुरूजी.....मजाक करते हो।’’ गुरूजी बोले ‘‘मजाक तो हमारे साथ हो रहा है हमें तो यह देखने की ड्यूटी मिली है कि कौन-कौन गाँव को गंदा करता है।’’ लोटन बोले ‘‘गुरूजी अब आप ही बताओ खायें यहाँ और गंदा करने दूसरे गाँव जायें क्या ?’’

          लोटन को बातों-बातों में यह मालूम हुआ कि उनक गाँव अब स्वच्छ गाँव हो गया है। ऐसे गाँव में सबके घरों में संडास याने शौचालय बन गये होते हैं, ऐसा माना जाता है। लोटन उसी दोपहर में पंचायत गया और पता किया तो मालुम हुआ कि गाँव में सभी घरों में शौचालय बन चुके हैं। लोटन सोचने लगा ‘‘ये भूल गये होंगे मेरे घर में बनाना।’’ उसने प्रधान से पूछा ‘‘मेरे घर में शौचालय कब बनाओगे ?’’ प्रधान बोले ‘‘दादा सठिया गया है क्या....... तुम्हारे घर में तो बन भी गया है।’’ लोटन को लगा शायद प्रधान ही सही होगा। उसने घर आकर झोपड़ी के आस-पास शौचालय खोजने का बहुत प्रयास किया परन्तु होता तो मिलता ना। वो फिर प्रधान के पास गया ‘‘प्रधान जी शौचालय तो नहीं है वहाँ..........आप लोगों ने कहाँ बनवाया है बता देते तो........।’’ प्रधान बोला ‘‘क्या दादा अब हमारे ये दिन आ गये कि हम तुम्हें शौचालय दिखायें, जाओ और ढूंढ लो।’’ लोटन का अब लगने लगा कि दाल में जरूर कुछ काला है।

          लोटन ने गाँव में पता किया तो और बहुत से घर थे जहाँ शौचालय नहीं बने थे। प्रधान के कागज पर बने थे। अब गाँव स्वच्छ होता तो कैसे ? लोटन पुरानी सातवी तक पढ़े थे सो अपने शौचालय का आवेदन लेकर तहसील पहुँच गये। दो-तीन दफ्तरों में धक्के खाने के बाद पता लगा कि कौन अफसर इसके लिए जिम्मेदार है। लोटन ने अफसर को अपनी समस्या बताई। अफसर मुस्कुराये, फिर एक बाबू से गाँव की फाईल बुलवाई। अफसर बोले ‘‘लोटन पिता महेतलाल तुम्हारे यहाँ तो बन गया है ना।’’ लोटन ने न में मुंडी हिलाई और बोले ‘‘नहीं साहब नहीं बना है।’’ अफसर और बाबू धीरे-धीरे बात करने लगे। लोटन के कुछ शब्द सुनाई दिये जैसे ठेका, ठेकेदार और मंत्री का साला। अफसर ने कहा ‘‘अच्छा हम देखते हैं क्या हो सकता है।’’ कई महिने बीत गये कुछ नहीं हुआ। अब लोटन ने जिले की ओर रूख किया, दृश्य वैसा ही था वही बाबू, वही फाईल, वही फूसफूसाहट और वही जवाब।

          लोटन अब तक अनेकों दफ्तरों में अपने घर का शौचालय मांगने जा चुका है। जहाँ वो जाता है उसे फर्स और दिवारें तो साफ-सुथरी दिखाई देती है परन्तु वो फुसफुसाहटों की गंदगी को महसूस करता है। उसे लगता है कि कुछ लोगाें को यह अच्छा नहीं लगता कि आम आदमी सड़क के किनारे बैठकर गंदा करे। भले ही वे कुर्सी पर बैठकर वह सब करते रहें। लोटन को अब अपने घर के अलावा सभी कुर्सीयों अपना शौचालय दिखाई देता है।

                                                                आलोक मिश्रा

नी.........ऽ.........ऽ.........च ( व्यंग्य )



           ‘‘ तू बड़ा ही नी......ऽ.....ऽ......च है ........रे .........;’’ माॅं बचपन में मेरी शरारतों से परेशान हो कर मुझे कहा करती थी । चूंकि मुझे बचपन में राजनीति नहीं आती थी , सो मैने कभी भी इस शब्द पर ध्यान ही नहीं दिया । बस शरारतों के बाद शरारतें ही करता गया । हालांकि मेरी माॅ प्यार से समझा कर यह भी बताती कि कोई व्यक्ति जन्म से नीच पैदा नहीं होता ; वो तो कर्मों से नीच बनता जाता है । आज फिर मेरे कानों में बार-बार नीच शब्द प्रतिध्वनित हो रहा है । अब मुझे भी अपनी माॅं के शब्दों को समझने का मौका प्राप्त हुआ है। मैं अब हैरान और अवाक् हुॅं कि मेरी माॅं मुझे बचपन में उस शब्द से संबोधित करती थी जिसे आज यदि मै राजनैतिक क्षेत्र में होता तो अपने वोट बैंक के रूप में भुना सकता था । ये भी हो सकता था कि मैं अपनी माॅं के विरूद्ध धरना ,रैली और प्रदर्शन करने और करवाने लगता। बचपन का प्यार और झिड़की भरा संबोधन आज मुझे महान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता था । मेरी माॅं को भी कहाॅ मालूम था कि उनके इस शब्द में इतनी ताकत है ,वर्ना वो भी अपने बेटे को महान बनाने में कोई कोर-कसर न रखते हुए इस शब्द को केवल और केवल मेरे ही लिए बचा कर रखती ।

           अब सोचता हुॅं कि मैं तो नासमझ था तो क्या मेरी माॅं मुझे नीच कह कर कोई लाभ लेना चाहती थी ? वो तो ठहरी एक सीधी-सादी ग्रहणी वो क्या अपने शब्दों का लाभ लेती ? एक और बात भी तो है .........; उस समय मीडिया भी तो केवल वास्तविक समाचारों तक ही सीमित रहता था । आज का मीड़िया तो शायद ब्रेकिंग न्यूज के साथ ही साथ इस बात पर वाद - विवाद याने डिबेट  (लो सहाब अब हिन्दी के ये दिन भी आ गए कि ......... ) ही आयोजित कर लेता कि माॅं-बेटे की नीच राजनीति कितनी उचित । ऐसे डिबेट में तेज-तर्रार संचालक ही सब कुछ  बोलता ,प्रतिभागी तो केवल अपना नाम और नमस्कार ही बोल पाते । इसके तुरन्त बाद ऐसे राजनैतिक लोग अपने-अपने बयान जारी करने लगते जिन्हे मेरी माॅं के कथन मात्र से अपने वोट बैंक पर ड़ाका पड़ता हुआ दिखता या नया वोट बैंक बनता हुआ दिखता । कुछ लोग मुझे अपनी माॅं के विरूद्ध आंदोलन आदि कर के राजनीति में आने का सुझाव भी देते या यूं कहें कि उकसाते । कुछ मेरी माॅं को राजनीति में आने की सलाह भी देते तो कुछ अन्य कहते कि ‘‘एक आम ग्रहणी को चैका-चूल्हा ही देखना चाहिए उन्हे राजनीति से दूर ही रहना चाहिए ।’’ याने यदि आज मेरी माॅं मुझे एक बार सार्वजनिक तौर पर ‘‘नी.......ऽ......ऽ.......च’’ कह देती तो न मैं मुफ्त में कलम  घिस रहा होता और न ही वो चूल्हे - चैके में खप रही होती । हम दोनों ही अलग- अलग दलों में ही सही महान नेता अवश्य ही होते ।

          इस शब्द के महत्व को आज के नेता बहुत ही अच्छी तरह से समझते है । वे जानते है कि यह शब्द दूसरों को घटिया साबित करने के लिए एक उत्तम हथियार तो है ही साथ ही यह जनता रूपी वोटरों के कुछ वर्गों पर प्रभाव भी छोड़ता है  । इस शस्त्र से बचाव  करने वालों के पास मौका होता है कि वे जाति और वर्ग रूपी सिखण्ड़ी के पीछे छुप कर इस के प्रभाव को आम जनता की ओर मोड़ दें । जरूरत के अनुसार इस सीधे- सादे और भोले - भाले शब्द के साथ जाति और वर्गों को जोड़ लेने मात्र से यह स्वार्थ सिद्धी का पर्याय बन जाता है । इस हथियार को प्रयोग करने वाले और बचाव में पुनः प्रयोग करने वाले दोनों  ही  यह शब्द केवल हवा में उछाल रहे होते है ; उस वर्ग के लिए जो अपने आप को इस शब्द के योग्य समझता है । यह मात्र समझ-समझ का फेर है ;वर्ना हमारे ऊपर के माले पर रहने वाले लोखण्ड़े जी भगवान हो गए होते और नीचे वाले वर्मा जी अपने आप को गलत तरह से परिभाषित करने लगते ।

              मैं सोचने लगा नीच होता कौन है ? मुझे फिर माॅं की बताई अच्छी बातें याद आ गई । अब मैं नीचों को खोजने निकला तो मुझे महान चेहरों के पीछे छुपे नीच कर्म दिखने लगे । उनकी महानता नीच हथकंड़ों का ही कमाल दिखाई देती है । फिर सोचता हुॅं, मुझ जैसा छोटा सा ‘‘ कलम घसीटू ’’ इतने बड़े-बड़े लोगों को नीच कह भी कैसे सकता है और अगर कह भी दूं तो बाद में वे मेरा क्या हाल  करेंगे यह सोच कर भी मै कांप जाता हुॅं। आम लोगों में नीचता खोजने का प्रयास करता हुॅं तो वे मुझे केवल रोजी- रोटी की मारा-मारी में ही दिखाई देते है । वे भला कैसे नीच हो सकते है ? फिर मुझे कबीर याद आ गए ‘‘ बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोय..........।’’अब मुझे लगता है कि मैं ही बहुत नी.......ऽ........ऽ......च हुॅं । लोग कितनी गंभीरता से अपने लिए साधन जुटा-जुटा कर राजनीति करते है । वे सागर में गोते लगा-लगा कर शब्द तलाश कर लाते है और मैं नी...........ऽ.........ऽ.......च उनकी तारीफ करने के स्थान पर व्यंग्य करता हुॅं । मुझ जैसे नीचों को तो देशद्रोही घोषित कर के सूड़ान भेज देना चाहिए । लो साहब लोग इस बात का भी गलत ही मतलब निकालेंगे । खैर ..... मुझे क्या फर्क पड़ता है जैसी जिसकी सोच...............।

                                             आलोक मिश्रा

ऐ मेरे वतन के लोगों ..... ( व्यंग्य )

       

         हमारे पोपटलाल जी वैसे तो देशभक्त है लेकिन स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर उनकी देशभक्ति चरम पर पहुॅंच जाती है । उस पर जैसे ही लता जी ‘‘ ऐ मेरे वतन के लोगों .....’’ की अलाप लगाती है ;पोपटलाल का मन कुछ कर गुजरने को होने लगता है । पोपटलाल को यह भी समझ में आ गया कि वे कितने भी बड़े राष्ट्रभक्त हों यदि उनका खून सीमा पर नहीं बहा तो सब बेकार है । पहले पहल तो सीमा याने सरहद पर जाने हेतु अपनी पत्नी सीमा से समझौता वार्ता पर विचार किया । वे यह भी जानते है कि ऐसी द्विपक्षीय वार्ताओं में उनकी पत्नी ‘‘वीटो’’ जैसे शस्त्र का प्रयोग करने से भी नहीं चूकती है । सोच-विचार के बाद उन्हें देश की सीमा पर जाने के लिए घर की सीमा से पूछना उचित नहीं लगा ।

       पोपटलाल देश के ह्नदय स्थल में रहते है । कुछ ही घंटों की दूरी पर अन्य राज्य की सीमा लगती है । उन्हें तो उस ओर जाने में भी ड़र लगता है  क्याेंकि उस क्षेत्र के लोग जय कह कर अपने प्रदेश का उद्घोष देश के उद्घोष से उच्च स्वर में करते है । यहीं कुछ लोग भी नहीं मालूम तो आप को कैसे मालूम होगी ? अब ऐसा बिना जाति का मानव इस प्रदेश में घुसा तो उसका क्या हाल होगा यह तो कोई भी नहीं बता सकता । पोपटलाल दयनीय भाव से मेरी ओर ताकने लगे जैसे कह रहे हो ‘‘ अरे ओ लेखक ............. मुझे कोई जाति तो दे दो ।’’ लेखक कभी अपने पात्र की इच्छा पूरी करता है क्या? पोपटलाल बिना जाति के देश की सीमा पर जाने के पहले इस प्रदेश में जाने के विषय में सोच भी नहीं सकते है ।

           उन्होंने दूसरी दिशा से जाने पर विचार किया । इधर तो पढ़े-लिखे बेरोजगारों की भीड़ है । यहाॅं तो विकास का बजट भ्रष्टाचार पर ही लग जाता है । यहाॅं सूटकेस पहुॅंचाओ ,रोजगार पाओ योजना प्रचारित है । अधिकारी नेताओं के चरण छूते है और नेता भी अस्थाई रुप से जेलों में निवास करते है । बेरोजगार युवा चोरी-चकारी,ड़कैती और अपहरण जैसे स्वरोजगारों में अपना भविष्य तलाशते देखे जाते है । पोपटलाल को अपहरण से बहुत ड़र लगता है क्योंकि लाख-दो लाख तो घर में है ही नहीं और कहीं अपहरणकर्ताओं ने ‘‘पेट्रोल’’ जैसी महंगी चीज ही मांग ली तो...........? अब इधर से जाने का विचार भी कैन्सिल ......कैन्सिल तो बस कैन्सिल ।

             ‘‘इधर से चलते है’’ उन्होने सोचा । अब वे जिधर को मुड़े उधर तो भाषाओं की बहस आम है । यहाॅं भाषाओं से ही आदमी और इंसान की पहचान होती है । भाषाआें के आधार पर दंगे होते है , बंदे मरते है और बंद तथा हड़तालें होती है । भाषाओं के आधार पर ही चुनाव होते है ,नेता बनते है और सरकारें बनती है । प्रदेश में दूसरी भाषाऐं विदेशी भाषाओं की ही तरह तुच्छ है । ऐसी भाषा बोलने वाला तो उस भाषा में गालियाॅं खाता है जिसे वो समझ भी नहीं सकता । पोपटलाल ने सोचा कि यदि वे उधर जाकर रास्ता भूल ही गए तो भाषा की समस्या के कारण उनका भटकना निश्चित ही है । याने.......... इधर से भी नहीं जाया जा सकता है ।

          पोपटलाल को कुछ कर गुजरने के लिए सीमा पर जाना जरुरी है । उनके इस महान कार्य में  अनेंको भौगोलिक और आंतरिक सीमाऐं बाधा बन कर खड़ी है । उन्हें इन भौगोलिक , राजनैतिक और सैद्धान्तिक सीमाओं से हट कर महिला अत्याचार ,अशिक्षा ,गरीबी और भुखमरी जैसी समस्याओं के रुप में भी दिखने लगी । अब पोपटलाल को  देश के अंदर ही लकीरों के रुप में अनेकों सीमाऐं दिखने लगी है । वो अपने आप को सीमाओं से घिरा हुआ पाता है। उसे लगता है कि हर व्यक्ति अपनी सीमाओं में बंधा है ।  पोपटलाल के लिए अगला कदम भी किसी सीमा को लांघने के समान ही लगने लगा । अनेकता में एकता देखने वाले पोपटलाल को एकता में ...... अनेकता दिखने लगी । उसे लगा कि उसे देश की सीमा पर जाना है तो इन सीमाओं को लांघना होगा लेकिन यहाॅं से बिना कुछ किए कायरों की तरह निकलें तो कैसे ? सीमाओं के इस जाल को काट कर भी तो देश के लिए कुछ किया ही जा सकता है । अब पोपटलाल अपनी क्षमताओं को आंकने में लगे है कि किस सीमा को पहले पार करें । दूर कहीं भावुक और मधुर स्वर गूंज रहा है ‘‘ ऐ मेरे वतन के लोगों ...................।’’

                                           आलोक मिश्रा

                                             मोहझरी

Sunday, May 27, 2018

छुक - छुक गाड़ी ( लेख )



      बचपन की छुक-छुक गाड़ी अब रेल गाड़ी हो गई है । हमें याद है  कि बचपन में भाप इंजन से चलने वाली रेलगाड़ीयों में इंजन से दूर वाले ड़िब्बों में भीड़ अधिक होती थी कारण सिर्फ इतना कि हवा में उड़ते कोयलों से ये ड़िब्बे बचे रहते थे । अब जब हम बुलेट ट्रेन की बात करने लगे है । तब भी देश के बहुत से क्षेत्रों में रेलगाड़ी की पहुॅच नहीं है या छोटी लाईन के खिलौना ड़िब्बों में यात्रा कर रहे है । दुनिया का सबसे बड़ा रेल पथ होने के बावजूद भी दस प्रतिशत आबादी कभी भी रेल में नहीं बैठी है । हमारे देश में रेलों की गति बढने के साथ ही साथ दुर्घटनाओं की संख्या भी बढी है ।

     हम रेलों से क्या चाहते है और हमारा रेलों का सफर कैसा हो ? इस विषय पर अनेक विद्वान सोचते तो होंगे ही और वे सोच कर योजनाऐं भी बनाते ही होंगे । इन्ही योजनाओं के चलते पैसेंजर,गरीब रथ ,राजधानी और संपर्क क्रंति जैसे नाम सामने आए है । नाम कुछ भी क्यों न हो एक आम आदमी या तो पैसेंजर में या फिर किसी रेल के आगे और पीछे की ओर लगे दो ड़िब्बों में भेड़-बकरीयों की तरह यात्रा करने को मजबूर है। किसी आम ट्रेन में दो जनता ड़िब्बों में कुल 144 यात्रीयों की ही बैठक व्यवस्था होती है जिसमें अक्सर ही 800 से 1000 यात्रीयों को सफर करत हुए देखा जा सकता है । आपको ऐसे ड़िब्बों में शौचालय तक में चार-पाॅंच लोग बैठे मिल जाऐंगे । गरीबों के लिए घोषित गरीब रथ में शायद ही कोई गरीब दिखाई दे । स्टेशनों पर भी इन आम लोगों के लिए प्रतिक्षलयों को भगवान भरोसे ही सुविधाविहीन   छोड़ा गाया है ।

     हमारी योजनाऐं गरीबों को केन्द्रित करके बनाई जाती है लेकिन रेल के सफर में आपको ऐसा नहीं लगेगा । ऐसे लोग जो कुछ अधिक पैसे देकर योजना बना कर यात्रा कर सकते है वे आरक्षित ड़िब्बों में यात्रा करते है । यहाॅं भी अनावश्यक लोगों के होने उन्हें प्राप्त सुविधाएं प्राप्त नहीं हो पाती है । देखा जाए तो रेलगाड़ीयों में भी आपको देश में फैल रहा वर्गभेद स्पष्ट ही दिखाई दे जाएगा । यह वर्गभेद आय के साधन के रूप में स्विकार्य है और इसका समाप्त होना असम्भव ही दिखाई देता है और मेट्रो या बुलेट ट्रेन इस वर्ग भेद की रेखा को और गहार ही करेगी ।

     मैने बहुत खोजने की कोशिश  की लेकिन मुझे कोई भी एक्सप्रेस या सुपरफास्ट ट्रेन ऐसी नहीं मिली जिसमे सभी ड़िब्बे सामान्य के यात्रियों के लिए ही हो । इससे यह पता चलता है कि सब लोग यह मान बैठे है कि एक सामान्य व्यक्ति को कहीे भी जाने की कोई जल्दी नहीं होती ,उसे सुविधा देना भी कोई जरूरी नहीं है । अक्सर रेलें सफाई और पानी के आभाव में भी चलती रहती है । जिसका खमियाजा यात्रीयों का ही भुगतना पड़ता है । मैने कई ट्रेनों में सफाई करके भीख मांगते बच्चों भी देखा है । स्टेशनों पर और ट्रेनों में घटिया सामानों के बेभाव बिकने के पीछे कौन है ? यह जानना और उसे रोकना भी जरूरी है ।

     ट्रेनों में आरक्षण की अवैध वसूली करने वाले कोटधारी यह कार्य बड़ी ही बेशर्मी के साथ सब के सामने करते देखे जा सकते है । सामान्य दर्जे में बैठा यात्री पूरी यात्रा के दौरान यह सोचता रहता है कि कोई उसका टिकट देखेगा ,लेकिन वो स्टेशन से बाहर भी आ जाता है और उसका टिकट कोई नहीं देखता ।  ऐसे टिकटधरी से रेल राजस्व को तो फायदा होगा शायद काटधारी को न हो । इन ड़िब्बों में टिकट को सही तरह से न देखने से बिना टिकट यात्रियों को बढावा ही मिलता है । बिना टिकट यात्रा से राजस्व का जो नुकसान होता है उसकी भरपई ईमानदारी से टिकट पर यात्रा करने वालों को असुविधाओं और किराय की बढोतरी के रूप में करनी पड़ती है । ड़िब्बों में सुरक्षा के नाम पर शायद ही कोई कर्मचारी तैनात हो । अक्सर ऐसे कर्मचारी बकरा तलासने के लिए रूकी हुई गाडीयों के आस-पास देखे जा सकते है ।

       आज भी देश में मानव रहित रेलवे क्रासिंगों की संख्या सामान्य से अधिक है । कुछ ऐसी रेलें है जिन्हे क्रासिंग के पहले रोक कर फाटक को बंद किया जाता है और पूरी रेल के निकलने के बाद रेल में मौजूद कर्मचारी पुनः उसे खोल कर आगे बढता है । ये आपको हास्यस्पद लग रहा होगा लेकिन यह व्यवहारिक रूप में हो रहा है । इस व्यवस्था के चलते रेलों कि गति के साथ ही साथ राजस्व भी प्रभावित होता है । कुछ क्रासिंग तो मानव रहित के साथ ही साथ फाटक रहित भी है । यहाॅं रेल  और सड़क यात्रीयों को सुरक्षा की दृष्टि से भगवान भरोसे ही छोड़ गया है । किसी दुर्घटना के होने पर कुछ दिन शोर-शराबा होता है फिर वही ढांक के तीन पांत ।

     रेल किराये की बढोतरी और आम जनता की सुविधाओं के बीच तालमेंल का आभाव अनेंक वर्षो से देखा जा रहा है । अब अच्छे दिनों के रेल बजट में शायद आम जनता के अच्छे दिन आ सकते है । 

                        आलोक मिश्रा

                         मोहझरी

घोषणा मंत्रालय( व्यंग्य )



         आपको तो यह मालूम ही होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में आपका क्या स्थान है । यदि आप नेता नहीं है ,यदि आप जीवन भर चुनाव लड़ कर जीत नहीें सकते तो आप आम आदमी है । अरे... अरे... भाई आप अपने आपको नई नवेली पार्टी का आम आदमी न समझ लेना । आम आदमी वही होता है ,जिसे आवेदन- पत्र लिखना आता है । जिसे झिड़कियाॅं सुनना आता है । जो किसी भी लाईन में घंटों तक बिना शिकायत खड़ा रह सकता है ; जिसके चुनाव के समय खास लोग पैर छूते घूमते रहते है । ऐसे अवसरों पर आम आदमी के कल्याण के लिए खास लोग घोषणाएॅं किया करते है । ये अलग बात है कि घोषणाएॅं केवल घोषणाओं के लिए ही होती है , अमल में लाने के लिए नहीं । गरीबी और महंगाई समाप्त करने की घोषणा तो पैसठ सालों से वैसी की वैसी ही है । ऐसा लगने लगा है कि ये भी नेताओं की ही तरह स्थाई समस्या है ।
       राजनैतिक लोगों को चुनाव की गंध वैसे ही मिलने लगी है जैसे कि मेंढकों को बारिश की मिलती है । अब वे उछल-कूद करने लगे है अरे... अरे... मेंढक नहीं। नेताओं ने अपनी टोपियों की धूल झाड़ ली है । बाज़ार में कुर्तों के दाम बढने लगे है । वे अब घूम-घूम कर सब को याद दिला रहे है कि वे कब-कब किस-किस के काम आए है । सत्ता में बैठे लोग  हमेशा की ही तरह जनता के टैक्स की कमाई का उपयोग स्वयम् के विकास के पोस्टर ,बैनर और विज्ञापनों पर खर्च करने को अपना अधिकार मानते हुए, अब फिर करने लगे है । 
        एक  समाचार के अनुसार यह फैसला लिया गया है कि आगामी चुनावों को देखते हुए चुनाव के पूर्व विधिवत् अस्थाई घोषणा मंत्रालय गठित किया जा रहा है।घोषणा मंत्री का काम होगा कि यह देखे कि किस क्षेत्र विशेष में किस प्रकार की घोषणाओं से वोट प्राप्त किए जा सकते है । वे अब जनता के बीच से घोषणाओं हेतु मुद्दे खोज कर अपने मंत्रियों तक पहुचाते है । चुनाव की व्यस्तता के कारण अक्सर तो मंत्रीजी उन्हे पढ और समझ भी नहीं पाते । वे सभा के दौरान ही पढते है । इससे अजीब-अजीब घोषणाएॅं भी हो जाती है । इसी तरह वे एक शहर में घोषणा करते-करते चूक गए । उन्हें बोलना था कि मै घोषणा करता हुॅं कि मेरी और मेरी पत्नी की सम्पत्ति सार्वजनिक की जावेगी । वे बोल गए ‘‘ मेरी पत्नी सार्वजनिक की जावेगी। ’’   कहीं वे महिलाओं को फ्री में बेलन देने की बाते कर गऐ तो कहीं पत्नी पीड़ित पतियों को आरक्षण देने की । घोषणा मंत्रालय की रिसर्च टीम के अनुसार लोगों को बिजली ;सड़क; पानी और शिक्षा की समस्याओं के साथ ही साथ भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए । मंत्री जी अपने पी.ए. से बोले ‘‘ बिजली ,पानी,सड़क और शिक्षा की जितनी और जो-जो घोषणाए लिखनी हो लिख लेना लेकिन भ्रष्टाचार की बात न करना वर्ना चुनाव लड़ने का फायदा ही क्या । यह भी कि चुनाव के बाद घोषणा मंत्रालय को ही तो भ्रष्टाचार मंत्रालय में बदलना है ।
           जनता को मालूम है कि पिछले चुनाव के पहले दो सौ स्थानों पर विभिन्न निर्माण कार्याें की घोषणा और भूमि पूजन एक ही स्थान पर हुआ था । उसमें से अनेकों सड़के पहले तो कुछ चलने योग्य भी थी अब वे पाॅंच साल से निर्माण की बाट जोहती  उखड़ी हुई पड़ी है । पिछले बार जब मंत्री जी ने लगातार बिजली देने की घोषणा की तो उनके जाते ही सब लोग चार दिन तक अंधेरे में रहे थे । पानी की तो कोई कमी नहीं है बस उसे लाने के लिए दो किलोमीटर जाना पड़ता है । शिक्षा बहुत ही अच्छी है बच्चे खाना खाने स्कूल आते है । पढने-पढाने की तो कोई बात ही नहीं है । शिक्षा सुविधा का चारा  वोट रुपी मछली के गले में अटका ही समझो ।
              आम आदमी उनकी घोषणाओं का भरपूर आनन्द लेने को तैयार है । किसी सभा में उनकी किराए की भीड़ के बीच जब वे घोषणाएॅं कर रहे होते  है तब आप अपने बच्चों के साथ घूम-घूम कर चने और चाट आदि का आनन्द ले रहे होते है । आप को तो उन की घोषणाओं में कोई रुचि नहीं है । वे भी अपनी की हुई घोषणाओं को दुबारा पलट कर देखते भी है या नहीं ? यदि देख लेते तो उन्हें बार-बार वही सब न कहना पड़ता ।   कुछ भी हो घोषणा मंत्रालय की सक्रियता देखते ही बनती है । जो भी हो ये घोषणाएॅं अगले कुछ दिनों तक तो आपको बताती रहेंगी कि हम सुनहरे कल की ओर बढ रहे है । बस चुनाव के बाद यह कल पाॅंच साल बाद ही आएगा । आज तो मजे ले ही लो ।  कल इन घोषणावीरों के आपको और हमें दर्शन हों या न हों ; आप इन घोषणाओं  का लेखा-जोखा रख सकते है लेकिन उन्हें कुछ भी याद नहीं रहेगा । यही तो लोकतंत्र की मूलभूत विशेषता है ।  
                                                      आलोक मिश्रा                     
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     

छोटा सट्टा बड़ा सट्टा( लेख )



     एक छोटे से चाय के टपरे के पास खड़े एक आदमी को एक बच्चा पैसे देकर  ‘‘ओपन और क्लोज लगाने ’’के लिए कहता है । बस दूसरे दिन वो बच्चा किसी अखबार के कोने में अलग- अलग कोड नामों के साथ लिखे अंकों को देख कर समझ जाता है कि उसे कुछ पैसा मिलेगा या नहीं । एक अन्य दृश्य में एक सभ्य सा दिखने वाला आदमी अपने आलीशान आफिस से ही मोबाईल पर ही आज हो रहे मैच में टीमों और प्रत्येक गेंद पर लगने वाले चौके और छक्कों के ‘‘भाव’’ पता करता है । अपनी सुविधा के अनुसार चुनी हुई टीमों और समय पर पैसा लगाता है । परिणाम तो उसे मैच का मजा लेते-लेते ही प्राप्त हो जाते है।

        ये दोनों ही दृश्य बहुत ही आम है । कानून के अनुसार जुआं-सट्टा अवैधानिक है। छोटे - बड़े शहरों में हर कोई जानता है कि गली के किस मोड़ पर , किस टपरे में या किस आदमी के पास सट्टा लगाना है । बस यह बात  उन्हे ही नहीं मालूम होती जिन पर यह सब रोकने का दायित्व होता है । दरअसल में यह एक ओपन सीक्रेट है कि हमारे यहाॅ सट्टा खेला और खिलवाया जाता है । इस मामले में जाति ,धर्म , राजनीति और तो और अमीरी-गरीबी की दीवारें नहीं रह जाती ; जहाॅं गरीब रुपये -दो रुपये का सट्टा खेलता है वहीं अमीर लाखों का ।

        नीचे से चलने वाला एक-एक रुपया ऊपर जा कर करोड़ों में बदल जाता है । बिना बोर्ड और विज्ञापन के चलने वाले इस धंधे में भी लाखों-करोडों रुपयों की आवक-जावक है । ‘‘कुबेर’’ ,‘‘राजधानी’’ और ‘‘खजाना’’ जैसे नामों के अलावा विभिन्न शहरों से चलने वाले सट्टे और मटकों के विभिन्न नाम है । उनके खुलने और बंद होने का समय भी निश्चित है । इन केन्द्रों पर नम्बर खुलते ही मोबाईल और फोन के अलावा इंटरनेट से भी नम्बर गाॅंव-गाॅंव तक पहुॅंचाए जाते  है । इसी काम के लिए समाचार पत्रों का छोटा सा कोना प्रतिदिन हजारों रुपयों के भाव से बिकता है ।  कुछ अखबार तो केवल इसलिए ही हाथों हाथ बिकते है क्योकि उनमें सट्टा बाजार के पूर्वानुमान भी नियमित स्तम्भ के रुप में प्रकाशित होते है ।

       इस धंधे को नीचे से लेकर ऊपर तक विभिन्न तरीकों से राजनैतिक और सरकारी अघोषित संरक्षण प्राप्त होता रहता है । कभी -कभी कुछ पुलिस अधिकारी नादानी में धौंस दिखाने  और हफ्ता बढाने के लिए कुछ छोटे-मोटे पर्ची लिखने वालों को पकड़ कर दो-चार हजार की बरामदगी कर लेते है । अक्सर तो ऐसे ठिकानों पर रात के अंधेरे में खाकी वर्दी वाले अपना हफ्ता वसूल करते देखे जाते है ।

            सट्टे का धंधा पूरा का पूरा दो नंबर का है, इसमें कोई शक नहीं लेकिन सट्टा खेलने वाले और  इससे किसी भी तरह से कमाई करने वाले जानते है कि यह बेईमानी का धंधा पूरी ईमानदारी के साथ चलता है । जीत - हार के लिए खेलों की ही तरह क्रिकेट पर भी शर्त लगाना पुरानी परंपरा रही है । मैचों पर लगने वाले सट्टे ने शर्तों को संगठित रुप दे दिया । यहाॅं ‘‘पट्टी लिखने वाला ’’‘‘कमीशन एजेंट’’ या ‘‘बुकी’’ कहलाता है । बुकी के ऊपर होता है ‘‘खाईवाला’’ ;  ये वो व्यक्ति होता है जो अपने आस-पास के रुझान के अनुसार ही ‘‘उतारी वाले’’ को सट्टा बुक करता है ।  इस  पूरे धंधे में बहुत ही छोटे स्तर को छोड़ कर पैसा या तो हवाला से आता है या फिर वादा से ।  पैसे के लेनदेन के विवादों को सुलह सफाई या गुण्ड़ागर्दी से सुलझाया जाता है । उतारी वालों के तार अपरोक्ष रुप से मुख्य संचालकों से जुडे़ होते है । कुछ संचालकों के नाम तो बच्चे भी जानते है लेकिन फिर भी इन तक पहुॅंच पाना नामुमकिन न भी तो कठिन तो है ही । यह भी हो सकता है कि वे भी किसी सफेदपोश के लिए काम कर रहे हों ।

          सट्टा किसी भी रुप में हो इसमें छोटे लोगों का सफेद और बड़े-बड़े लोगों का काला धन लग कर और अधिक काला धन उत्पन्न करता है । काले धन का बड़ा हिस्सा देशद्रोही, आतंकवादी और विघटनकारी ताकतों को ही मजबूत करता है । इस काले धन  से हथियारों ,नशीले पदार्थों और नकली नोटों जैसी चीजों केा देश में लाने के लिए प्रयोग किया जाता है । यही धन देश को अंदर ही अंदर खोखला करने के काम आता है । कुछ कालाधन  सफेद करने का भी प्रयास किया जाता है  ।  नंबर वाले सट्टे में लगाने वाले के जीतने के अवसर केवल एक प्रतिशत ही होते है । सट्टा संचालक के पास  99 प्रतिशत अवसर के साथ ही साथ यह सुविधा भी प्राप्त होती है कि वो अपने लाभ को देखते हुए ही नंबर निकाल कर जनता को ‘‘डब्बा’’ कर दे । जब जनता के पसंद का नंबर आता है तो इसे ‘‘जनतापटी’’ कहते है ।  अपने सट्टे को चलाए रखने और खेलने वालों के उत्साह को बनाए रखने के लिए कभी कभार संचालक ‘‘जनतापटी’’ के नंबर भी निकालते रहते है । मैचों पर लगने वाले सट्टे में संचालकों का अधिक लाभ तब होता है जब कम संभावना वाली टीम अच्छा प्रदर्शन करे ।  क्रिकेट चूंकि बहुत सारे आंकड़ों का खेल है इसलिए इसमें प्रत्येक आंकड़े पर सट्टा लगवा कर संचालक अपना लाभ बढाने का प्रयास करते है।

         संचालक और अधिक लाभ के लिए खेल को भी अपने अनुसार चलाना चाहते है । इसके लिए खेल अधिकारियों , खिलाडियों और एम्पायरों को खरीदने की कोशिश होती है । पैसे के इस युग में ईमान आसानी से खरीदे और बेचे जा सकते है ।  यहीं से प्रारम्भ होता है मैच फिक्सिंग और स्पाट फिक्सिंग का सिलसिला । इस पूरे गोरखधंधे में कौन है और कौन नहीं यह कहना आसान नहीं है क्योंकि जहाॅं कुएॅ में ही भांग घुली हो वहाॅं जो बगैर नशे के मिले वो तो बाहरी ही हो सकता है । बस पैसे के इस खेल में खेल खेल न हो कर व्यापार हो गया है । सट्टा नाम है पैसे जल्दी कमाने की सोच का , सट्टा नाम है शार्टकट तरक्की का और सट्टा नाम है पैसों के खेल का । इस खेल में हमेशा ही खिलवाने वाला ही जीतता है फिर भी रातों रात पैसा कमाने की चाहत ही इसकी ओर लोगों को खींचती है ।  इसकी ओर आकर्षित होने वाले गरीब और छोटे लोगों को चाहिए मुट्ठी में थोड़ा पैसा ; और पैसे के ढेर पर बैठे धन कुबेरों को चाहिए मुट्ठी भर और पैसा ।

                                                               आलोक मिश्रा

शराबी पति को खुला पत्र (व्यंग्य)











हे प्राणनाथ,

         यहाँँ सब लोग कुशल मंगल है। इस पत्र को लिखते हुए मुझे अपने वे दिन याद आ रहे है, जब हम पहली बार राशन की दुकान पर मिले थे। तुमने मुझे देखा और देखते रह गए, मैं सावली सी दुबली-पतली सी लड़की थी। जिसे देखकर शायद ही कोई आकर्षित होता, पर तुम हुए ,पहली ही नजर मे तुम भी मुझे अच्छे लगे। फिर मुझे अपनी मां से पता लगा कि वो तुम ही हो जिससे मेरी शादी की बात चल रही है। मेरे घर में सब तुम्हारी तारीफ करते थे, भाई ने बताया की तुम मकान मिस्त्री का काम सीख गए हो और थोड़ी बहुत कमाई भी करने लगे हो। हमारी शादी बहुत सामान्य तरीके से हुई। तुम अपनी सायकल के डण्डे पर बिठाकर मुझे बिदा कर लाए।

         घर पहुॅच कर मुझे मालूम चला कि तुम शराब का नशा भी करते हो। मैं अब कुछ कहने बोलने की स्थिति में नहीं थी। तुम्हारी नशे की आदत पहले कम थी मगर वो धीरे-धीरे बढ़ने लगी। नशा बढ़ा तो तुम्हारी कमाई हमारे परिवार के लिए कम पड़ने लगी। ऐसे में मुझे भी काम करने निकलना पड़ा। मैंने दो-चार घरों के बर्तन चौके का काम कर लिया। इससे तो तू और बेफ्रिक हो गया अब तो तूने घर पर पैसे देना ही बंद कर दिया। इस दौरान पहले पप्पू फिर मुनिया भी इस दुनियां में आ गए। कभी तू कसमें खाता कि आज आखरी दिन कल से नशा बंद कभी तू नशे में आकर मुझे पप्पू और मुनिया को मारता। अड़ोसी-पड़ोसी से तेरी लड़ाई होना तो रोज की बात हो गई थी। एक बार तू घर से निकला तो रात तक घर ही नही लौटा, मैंने और पप्पू तुझे शराब के ठेकों पर ढूंढ़ते रहे, तू दो दिन बाद आया। पूंछने पर तूने मूझे बहुत मारा पप्पू बीच-बचाव में आया तो उस मासूम को भी मारा। हम दोनों तेरे इस व्यवहार पर बहुत रोए। जब पड़ोसियों ने बीच-बचाव की कोशिश की तो तू उन्हे भी मारने के लिए दौड़ा। मोहल्ले के लोग तो अब तुझसे बात भी नहीं करना चाहते है। अब तू कभी घर आता कभी-कभी नहीं भी आता। हमें मालूम है जब तेरा नशा उतर जाएगा तू घर आ जाएगा इसलिए तुझे ढूंढने भी नही जाते हैै। उस दिन तो तूने हद ही कर दी पप्पू की स्कूल की किताबे रद्दी में बेच दी। उस रात तू नहीं आया पप्पू रात भर अपनी किताबों के लिए रोता रहा। तेरे घर आने की राह मैंने तीन दिन तक देखी तीसरे दिन तूने आते ही पप्पू को दो चपत लगा दी। मैं अपने गुस्से को काबू करती भी तो कैसे ? मैने गुस्से में आकर तूझे थप्पड़


      लगाना शुरू कर दिया। अब हम दोनों एक दूसरे को मार रहे थे और मोहल्ले के लोग हमारे घर के सामने जमा थे कुछ लोगाें ने हिम्मत की और हमें अलग किया। मैं तो शायद शांत भी हो जाती परन्तु तू तो पूरे मोहल्ले के सामने औरत से पिटा था, तेरा अहम तूझे और लड़ने को उकसाता रहा। तूने मूझे और आस-पास वालों को गालियां दी किसी को नहीं बख्सा। फिर भगवान के पास रखे पैसे लेकर चला गया। तब से तू अब तक नहीं लौटा। इस तरह तीन साल गुजर चुके है। मुझे मालूम है, तुम जहां भी होंगे दारू के ठेके के पास ही होंगे इसलिए इस पत्र को खुला रखकर दारू के ठेकों पर चिपकवाने की व्यवस्था करूंगी। तुम्हारे जाने के बाद से हमें ऐसा लगने लगा है कि हम भी जीवित है। मुनिया भी अब पढ़ने जाने लगी है। पप्पू अच्छा पढ़ रहा है। मुझे दो घर का काम ज्यादा करना पड़ता है। पड़ोसी भी ठीक से रहने लगे है जो रिश्तेदार पहले हमें पूछते नहीं थे अब पूछने लगे है। मैं अब कुछ पैसे बचा पाती हॅूं, जो पप्पू और मुनियां के भविष्य में काम आएंगें। कुल मिलाकर देखा जाए तो परिवार सुख से है। जब तक मुझे तुम्हारी मृत्यु की खबर नहीं मिलती मैं अपनी मांग में सिन्दूर के साथ तुम्हारी सुहागन ही रहूंगी। तुमनें परिवार से अधिक अपने नशे को महत्व दिया है। तुम भी जहां हो वहां पूरे नशे में मस्त और आनन्द में होंगे। तुमसे निवेदन है कि तुम अपने आनन्द को कम न होने देना, हमारी फिक्र बिलकुल न करना। हमने तुम्हें कभी भी ढ़ुंढने की कोशिश नहीं की है। यदि आप यह पत्र पढ़ रहे हो तो कृपया वापस आने की गलती मत करना। यदि वापस आना ही हो तो, अकेले ही आना नशे को वहीं छोड़कर आना।

                                     हमेशा आपकी                                               सुहागन

लेखक का निवेदन -  आपने यह पत्र पढ़ा यदि आप भी नशे की लत का शिकार है तो कृपया नशे                  को छोड़कर अपने परिवार के पास जाने का प्रयास करें।



                        आलोक मिश्रा "मनमौजी " 
    mishraalokok@gmail.com
















अमिताभ और मैं ( व्यंग्य )



यूं तो हम हमेशा से ही अमिताभ बच्चन के प्रशंसक रहे है लेकिन उनकी तुलना हमसे........ कहाॅं राजा भोज कहाॅं गंगू तेली । हम गंगू ही सही हमें भी जिंदगी स्टाईल से जीने का शौक रहा है । हमारा क्षेत्र छोटा सा कस्बा ही क्यों न हो, हम भी चर्चा-परिचर्चाओं में रहने के कारण कस्बे के विख्यात-कुख्यात लोगों में शामिल है । इसका फायदा बस इतना ही है कि कस्बे की सड़कों पर हमें कुछ अधिक ही हाथ उठाकर अभिवादन करना पड़ता है । कस्बों में विख्यात-कुख्यात होने के लिये स्थानीय केबल और अखबार वाले बड़ी भूमिका निभाते है । खैर........कुछ भी हो इस कस्बे में लोग हमें जानते-पहचानते हैं ।
ये मसला तब खड़ा हुआ जब हमारे कस्बेनुमा शहर में के.बी.सी. की टीम आई । साहब करोड़ों किसे नहीं खींचते, सो हम भी खिंचे चले गए । यहाॅं तो ऐसा लगा पूरा कस्बा ही जमा हो गया है । यहाॅं अमिताभ तो थे नहीं, उनके बड़े-बड़े कटआऊट लगे थे । हम एक कटआऊट को बड़े ध्यान से निहार रहे थे । न जाने कहाॅं से हमारा एक प्रशंसक नामुदार हुआ। वो बोला ‘‘आज मैं दो-दो अमिताभ को एक साथ देख रहा हॅूं ।’’ हम बोले ‘‘वो कैसे...........? वो बोला ‘‘अमिताभ जी तो है ही’’ आप भी शहर में अमिताभ बच्चन से कम है क्या ? ‘‘वो तो बोल गया लेकिन उसके ये शब्द हमारे दिमाग को खराब करने के लिए पर्याप्त थे।
हमनें  घर आकर शीशे में खुद को निहारा। फ्रेंच कट दाढ़ी, उनकी भी है हमारी भी। उनके घने बाल है, हमारे थोड़े कम .............भगवान झूठ न बुलवाए भाई साहब..........हमारे तो है ही नहीं। शीशे में अपने आपको कई कोणों से देखा, कहीं से अमिताभ की झलक तो दिखे। वो छः फुट के गबरू जवान और हम चार फुटिया अधेड़। दाढ़ी को छोड़ कर कुछ भी मैच नहीं करता है तो क्या हम अमिताभ बनने का प्रयास भी नहीं कर सकते। बस साहब अब हम अपनी आवाज के पीछे पड़ गए। गले में आवाज को अटका कर ‘‘हय......’’ और ‘‘विजय दीनानाथ चैहान...........’’ जैसे डायलाॅग बोलने का प्रयास करने लगे। अकेले में हम खुद ही बोलते और खुद ही हंस लेते। फिर खुद को ही दिलासा देते, आवाज तो मिलने लगी है। कहीं बोलना होता तो संभल कर गला बैठा कर ही बोलते । फिर ध्यान गया पत्नी की तरफ उनकी तो उनसे दो फुट छोटी है और हम ‘‘जिसकी बीबी लम्बी उसका भी बड़ा नाम है............’’ गा-गा कर स्टूल पर चढ़कर नज़रें मिलाने में लगे रहते है। सोचा बनारसी पान से बात बन जाए लेकिन यहाॅं भी पत्नी आड़े आ गई। हमारी पत्नी ने हमसे कुम्भ में पान न छुड़वाया होता तो आज हम माॅं कसम कम से कम होठों से अमिताभ होते ही। हमें अमित जी की अदाएं बहुत पसंद है। खासकर महिलाओं को सहारा दे कर कुर्सी पर बैठाने की। हमें लगा यही उनकी सभ्यता का प्रतीक है। बस..............हम भी जहाॅं किसी महिला को कुर्सी पर बैठते देखते अमिताभ बन जाते। ये और बात है कि हमारी यह सभ्यता लोगों को नागवार गुजरी। एक दो बार कपड़े फड़वाए और झापड़ भी खाए। कुछ महिलाएं तो हमारी सभ्यता की चपेट में आकर कुर्सी पर बैठने के स्थान पर गिर ही पड़ी । फिर उन्होंने हमारे सम्मान में जो कसीदे पढ़े वो यहाॅं लिख पाना सम्भव नहीं है। हमें लगने लगा कि हमें भी अमिताभ की तरह चैक बुक लेकर घूमना चाहिए। हमारे कस्बे में ‘‘कुर्ते के नीचे क्या पहना जाता है?’’ जैसे प्रश्नो के उत्तर बताने वाले भी नहीं मिलेंगे। वैसे हमारा बैंक बैंलेस भी इस बात की इजाजत नहीं देता। फिर हमारे चैकों के उछलने (बाऊंस) होने का खतरा भी हमेशा ही होगा, इसमें घाटा भी बहुत है।
फिर सोचा थोड़ा इतिहास खंगाला जाए। अमिताभ के पिताजी कवि थे.......हमारे भी। उनके पिताजी ने रूबाइयों का अनुवाद कर मधुशाला लिखी। हमारे पिताजी ने हाला...........मधुशाला को कभी देखा भी नहीं, वे तो राम चरित लिखते रहे। हम प्रयासरत रहे कि कहीं से हमारे प्रशंसक की बात लग ही जाए और हम में भी अमिताभ के कुछ अंश ही सही दिख तो जाए।
मुझे लगता है मेरी ही तरह अनेक लोग अपने प्रशंसको के हाथों मारेे जाते है। तारीफ करने वाला आपकी खुशी के लिए अच्छे से अच्छे शब्दों का चयन करता है। ये शब्द उसके लिए उतने महत्वपूर्ण नहीं होते जितने आपके लिए। आप अपनी प्रशंसा को ध्यान से सुनते है, अपने गले लगाते है और सिर पर बैठाते है। अक्सर उसमें मस्त भी हो जाते है। दूसरों की प्रशंसा हमें आत्मप्रशंसक बनाती है। आत्मप्रशंसा गर्व से घमंड का रास्ता खोलती है। अक्सर प्रशंसा के हथियार से घायल हुआ व्यक्ति उपहास का पात्र बनता है। दुनिया में हर व्यक्ति अपनी विशेषताओं के साथ पैदा हुआ है इसलिए न तो मुझे अमिताभ बनने की आवश्यकता है और न ही किसी गंगू को राजा भोज।

                                                    आलोक मिश्रा















Saturday, May 26, 2018

न्याय अन्याय ( व्यंग्य )



            कहते है देश मे कानून सर्वोपरि है, हो सकता है ,ऐसा ही हो लेकिन लगता तो नहीं है । जनता भ्रमित है कि कानून किसके लिए है या किसको न्याय दिलाने के लिए है जनता को या अमीरों को। ऐसा भी नहीं कि हमारे कानून मे कोई कमी है बस अब हममे ही उसे लागू करने कि इच्छाशक्ति नही रही । कानून को बनाने वाले अब उसमे छेद करना भी सीख गए है । वे उसे अपने अनुरुप बदलने का प्रयास भी करने लगे है । न्यायलय उनके इस कार्य को केवल देख सकता है ; कुछ कर नहीं सकता यह शायद हमारी सबसे बडी लाचारी ही है । इतने विशाल देश में न्याय भी एक व्यवसाय ही है । इसके कारण लाखें करोडों लोगों के घरों में चूल्हे जलते है लेकिन शिक्षा की ही तरह इस व्यवसाय ने भी अपनी पवित्रता को खो दी है । न्यायालयों से पहले पीड़ित पुलिस के पास गुहार लगाता है । प्राथमिकी दर्ज करने से लेकर साक्ष्य जुटाने तक में तोल - मोल होता है । कोई व्यक्ति न्यायालय में बचेगा या नहीं यह तो सबूतों और साक्ष्यों के आधार पर तय होता है परन्तु उन्हें जुटाना है या नहीं यह इस बात से तय होता है कि कौन सा पक्ष कितना दमदार ,पहॅुच वाला या पैसे वाला है । बहुत से मामले तो न्यायालय पहुंचने के पहले ही दम तोड़ देते है । यदि कभी आप सीधे न्यायालय पहुंच भी गए तो आपको न्यायालय के बाहर ही अनेक दलाल मिल जाएंगे । जो यह कहते पाए जाऐंगे कि ‘‘ अमुक जज से अपनी सेटिंग है आप का फैसला तो दो सुनवाई में हुआ समझो ’’ यहाॅं स्वरोजगारीयों की एक बहुत बड़ी जमात है, जो स्टे दिलवाने ,अंतरिम जमानत करवाने और छोटे - मोटे कागज निकलवाने के काम की दलालीे पर ही जीवन निर्वाह कर रहे है । ऐसे लोगों के लिए पीड़ित किसी बकरे से कम नहीं है । वे पीड़ित को धीरे- धीरे हलाल करते है । मामला हाथ में आने के बाद शायद ही कोई वकील उसे जल्दी निपटाना चाहता हो । इसमें उनकी मदद करते है, न्यायालय  में बैठे बाबू जो इस न्याय के मंदिर से पेशी बढ़वाने और अगली तारीख देने जैसे काम की दान-दक्षिणा में रोज ही हजारों रुपये घर ले जाते है। न्यायालय में न्याय के विलम्ब और आर्थिक परेशानियाें के चलते पीड़ित भी न्याय के प्रति उदासीन होने लगता है ।  न्यायालय में लम्बित मामलों कि बहुतायत के कारण उसका ध्यान शायद ही किसी आम मामले पर जाता है । परन्तु खास लोगाें के मामले में न्यायालय द्वारा होने वाली कार्यवाही की आम आदमी के साथ तुलना करने पर जनता का न्याय पर से भी विश्वास कम ही होता है । हमे हमेशा ही न्यायालयों की आवश्यकता होगी,ऐसे न्यायालयों की जहाॅं कुर्सी पर कोई कानून का जानकार इन्सान  बैठा हो ।                                    हम ऐसे न्यायालयों की कल्पना भी नहीं कर सकते जहां कोई कम्प्यूटर न्यायधीष की भूमिका मंे हो । पीड़ित न्याय के साथ मानवीय पक्षों को देखने वाले न्यायधीश की ओर आशा भरी नज़रों से देखता है । लेकिन जब न्यायालयों मे बैठे इन्सानी न्यायधीश मशियों कि तरह व्यवहार करने लगे हो तो पीड़ितों का उन पर विश्वास रहे भी तो कैसे । न्याय की राह मंे इन सब के अलावा भी अनेकों दाव पेंच है । इन दाव पेंचांे से हम रोज ही दो चार होते है । शायद यही कारण है कि पीड़ित के साथ न्याय के संघर्ष मे साथ देने वाले भी कम होते जा रहे है । अब तो लोग प्रत्यक्ष घटना ,स्वयम् के घर कि चोरी या अज्ञात शव को देख लेने पर भी पुलिस को सूचित नहीं करना चाहते । जिससे न्याय व्यवस्था के साथ जुड़े लोगाें कि विश्वसनीयता संदेह के घेरे मे खड़ी दिखती है । अंत मे न्याय को ठेंगा दिखाकर बच निकलने वाले सफेदपोश अपराधीयों ने  समाज को त्रस्त कर रखा है ।  जग जाहिर अपराधीयों के बच निकलने में कौन दोषी है । यह सोचना न आप चाहेंगे, न मै और न कोई अन्य।

                                       आलोक मिश्रा

                                        व्याख्याता