Sunday, December 23, 2012


विरोध क्‍यो ?

     पूरी दुनिया हमेशा से ही भेदभाव से भरी रही है ; गोरे-काले का भेद, स्‍त्री - पुरूष का भेद और जाति-विजाति का भेद । जिस तरह संसार परिर्वतनशील है उसी प्रकार भेदभाव के स्‍वरूप भी बदलते रहे है । भारत में दो सौ वर्षों के मुगल , डेढ़ सौ वर्षों के अंग्रेज शासन  और पैसठ वर्षों के आजाद भारत के बाद भी जब हम जातिगत व्‍यवस्‍था को कानूनी रूप से उचित ठहराते दिखते है तो बुद्धीवादियों की सोच पर ही तरस आता है । ऐसा लगता है कि कुछ लोग पुरानी जातिवादी व्‍यवस्‍था को समाप्‍त करके नवीन जातिगत व्‍यवस्‍था खड़ी करना चाहते है ।  
     संविधान के निर्माताओं का इन विसंगतियों का आभास था इसलिए उन्‍होंने आरक्षण की व्‍यवस्‍था केवल दस वर्षों के लिए ही लागू की थी । हमारी राजनैतिक इच्‍छाशक्‍ति के वाक्‍य चाहिए और करना है पर ही समाप्‍त होते है , इसलिए हम समयबद्ध तरीके से कानून सम्‍मत कार्य पूर्ण नहीं कर पाए । आज आरक्षण के विरूद्ध स्‍वर मुखर हो रहे है । इसके पीछे वह बड़ा वर्ग है जो अपने आप को उपेक्ष्‍िात और पीड़ित महसूस करता रहा है । एक मात्र आरक्षण ही है जिसका लाभ एक वर्ग बचपन से मृत्‍यु तक तो दूसरा कभी भी नहीं ले पाता । अनारक्षित वर्ग का छात्र कक्षा में बिना छात्रवृत्‍ति और पूरी फीस देकर अपने आप को उपेक्षित न माने तो क्‍यों ? कम अंक वाला इंजीनियर ,डॉक्‍टर और अधिक अंक वाला बेरोजगार रहता हो तो उसे कैसा महसूस होगा ? फिर नौकरी में भी पीछे से आने वाला कनिष्‍ठ जब केवल जाति के कारण ही वरिष्‍ठ हो जाता हो तो सोचिए कैसा लगता होगा ?
        आरक्षण के समर्थक आज  भी पुरानी जातिगत व्‍यवस्‍था की ही दुहाई देते है , जो आज लगभग समाप्‍त हो चुकी है । फिर इस नवजातिवाद को क्‍या नाम दिया जाए ? व्‍यवहारिक रूप से आज शासकीय अभिलेखों के अलावा शायद ही कोई किसी से जाति पूछता हो । शासकीय अभिलेखों में भी जाति की आवश्‍यकता केवल जातिगत दलित होने की पहचान मात्र है । इसका विरोध न करने के पीछे लाभ की मानसिकता ही काम कर रही होती है । क्‍या हम ऐसे समाज का निर्माण नहीं कर सकते जिसमें कोई किसी से जाति न पूछे ? खैर मेरे कुछ साथी जो इस व्‍यवस्‍था से लाभ प्राप्‍त कर रहे इस विचार से असहमत होने का दिखावा कर सकते है । उन्‍हे मैं यह याद दिला दूं कि डॉ. भीमराव आम्‍बेडकर ने कहा था हमें सहारे से अधिक बराबरी की जरूरत है ।
        पदोन्‍नति में आरक्षण के सम्‍बन्‍ध में यह बात समझ से परे है कि आज की परिस्‍थ्‍िातियों में क्‍यो जातिगत आधार पर किसी कनिष्‍ठ को वरिष्‍ठ से पहले पदोन्‍नति प्रदान की जानी चाहिए ? ऐसा करने से कार्यालयों के वातावरण पर क्‍या प्रभाव पड़ता है ,यह सर्वविदित है । आश्‍चर्य होता है कि तीन पीढ़ियों से पूरे के पूरे   परिवार को लाभ प्राप्‍त होने के बाद भी आज यदि इसकी आवश्‍यकता है तो इसके लिए दोषी कौन है ?
        विधिसम्‍मत रूप से मिलने वाले इस लाभ को कौन नहीं लेना चाहेगा ? वहीं पीड़ित भी अधिक दिनों तक चुप नहीं रह सकता । एक न एक दिन उसमें भी विरोध करने की शक्‍ति आ ही जाती है । यह बात भी समझने की है कि क्‍यों संगठित आरक्षित वर्ग को राजनैतिक लोग वोट बैंक के रूप में देखते है और असंगठित अनारक्षित वर्ग को नहीं ? अब तक कानून सम्‍मत और जनहितकारी समझे जाने वाले विचार को देश के सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा खारिज कर दिए जाने से भी आरक्षण विरोध को प्रबलता मिली है । राजनैतिक दलों के समर्थन और विरोध में जनहित से अधिक  चुनाव और वोट बैंक की राजनीति है ।
      देश में दलित उत्‍थान के लिए आजादी से आज तक चलाई गई योजनाओं के व्‍यय के आकलन के अनुसार आज अंतिम छोर पर बैठे व्‍यक्‍ति को भी प्रगति के पथ पर आज हमारे साथ होना चाहिए था । यह लाभ आज भी कुछ वर्गों तक नहीं पहॅुच पाया । इस लाभ के न पहुँच पाने के कारण जातिगत न हो कर दुर्गम इलाकों में निवास , गरीबी और अशिक्षा ही प्रमुख है । यदि वास्‍तविक दलितों को लाभ देना है तो ऐसे वर्गों को मुख्‍यधारा में लाना होगा ।ऐसे वर्गों तक पहुँचने वालो लाभों को भी उन्‍ही के वर्ग के दबंग लोग हथिया लेते है । अक्‍सर सरकारों पर आरक्षित पदों को रिक्‍त रखने और बैकलॉक पूर्ण न करने का आरोप लगता रहता है । यदि पर्याप्‍त संख्‍या में योग्‍य उम्‍मीदवार ही न मिले तो सरकार भी क्‍या करे ? अब समय आ गया है यह सोचने का कि आरक्षण जैसी नीतियों का लाभ कोई परिवार या व्‍यक्‍ति कितनी बार लेगा और कब दलित से गैरदलित माना  जाएगा  क्‍योंकि अब जातिवादि दलित होने का फार्मूला अब पुराना हो चुका है ? अब इस व्‍यवस्‍था में जातिवादी संघर्ष पैदा करने की मंशा साफ दिखाई देने लगी है। आपकी सहमति या असहमति आपके स्‍वार्थ का आईना हो सकता है लेकिन जातिवाद को समाप्‍त करने के लिए हम सबको मिलकर ईमानदारी से प्रयास करना होगा और आज का सही रास्‍ता नहीं है ।   

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