Sunday, December 23, 2012


विरोध क्‍यो ?

     पूरी दुनिया हमेशा से ही भेदभाव से भरी रही है ; गोरे-काले का भेद, स्‍त्री - पुरूष का भेद और जाति-विजाति का भेद । जिस तरह संसार परिर्वतनशील है उसी प्रकार भेदभाव के स्‍वरूप भी बदलते रहे है । भारत में दो सौ वर्षों के मुगल , डेढ़ सौ वर्षों के अंग्रेज शासन  और पैसठ वर्षों के आजाद भारत के बाद भी जब हम जातिगत व्‍यवस्‍था को कानूनी रूप से उचित ठहराते दिखते है तो बुद्धीवादियों की सोच पर ही तरस आता है । ऐसा लगता है कि कुछ लोग पुरानी जातिवादी व्‍यवस्‍था को समाप्‍त करके नवीन जातिगत व्‍यवस्‍था खड़ी करना चाहते है ।  
     संविधान के निर्माताओं का इन विसंगतियों का आभास था इसलिए उन्‍होंने आरक्षण की व्‍यवस्‍था केवल दस वर्षों के लिए ही लागू की थी । हमारी राजनैतिक इच्‍छाशक्‍ति के वाक्‍य चाहिए और करना है पर ही समाप्‍त होते है , इसलिए हम समयबद्ध तरीके से कानून सम्‍मत कार्य पूर्ण नहीं कर पाए । आज आरक्षण के विरूद्ध स्‍वर मुखर हो रहे है । इसके पीछे वह बड़ा वर्ग है जो अपने आप को उपेक्ष्‍िात और पीड़ित महसूस करता रहा है । एक मात्र आरक्षण ही है जिसका लाभ एक वर्ग बचपन से मृत्‍यु तक तो दूसरा कभी भी नहीं ले पाता । अनारक्षित वर्ग का छात्र कक्षा में बिना छात्रवृत्‍ति और पूरी फीस देकर अपने आप को उपेक्षित न माने तो क्‍यों ? कम अंक वाला इंजीनियर ,डॉक्‍टर और अधिक अंक वाला बेरोजगार रहता हो तो उसे कैसा महसूस होगा ? फिर नौकरी में भी पीछे से आने वाला कनिष्‍ठ जब केवल जाति के कारण ही वरिष्‍ठ हो जाता हो तो सोचिए कैसा लगता होगा ?
        आरक्षण के समर्थक आज  भी पुरानी जातिगत व्‍यवस्‍था की ही दुहाई देते है , जो आज लगभग समाप्‍त हो चुकी है । फिर इस नवजातिवाद को क्‍या नाम दिया जाए ? व्‍यवहारिक रूप से आज शासकीय अभिलेखों के अलावा शायद ही कोई किसी से जाति पूछता हो । शासकीय अभिलेखों में भी जाति की आवश्‍यकता केवल जातिगत दलित होने की पहचान मात्र है । इसका विरोध न करने के पीछे लाभ की मानसिकता ही काम कर रही होती है । क्‍या हम ऐसे समाज का निर्माण नहीं कर सकते जिसमें कोई किसी से जाति न पूछे ? खैर मेरे कुछ साथी जो इस व्‍यवस्‍था से लाभ प्राप्‍त कर रहे इस विचार से असहमत होने का दिखावा कर सकते है । उन्‍हे मैं यह याद दिला दूं कि डॉ. भीमराव आम्‍बेडकर ने कहा था हमें सहारे से अधिक बराबरी की जरूरत है ।
        पदोन्‍नति में आरक्षण के सम्‍बन्‍ध में यह बात समझ से परे है कि आज की परिस्‍थ्‍िातियों में क्‍यो जातिगत आधार पर किसी कनिष्‍ठ को वरिष्‍ठ से पहले पदोन्‍नति प्रदान की जानी चाहिए ? ऐसा करने से कार्यालयों के वातावरण पर क्‍या प्रभाव पड़ता है ,यह सर्वविदित है । आश्‍चर्य होता है कि तीन पीढ़ियों से पूरे के पूरे   परिवार को लाभ प्राप्‍त होने के बाद भी आज यदि इसकी आवश्‍यकता है तो इसके लिए दोषी कौन है ?
        विधिसम्‍मत रूप से मिलने वाले इस लाभ को कौन नहीं लेना चाहेगा ? वहीं पीड़ित भी अधिक दिनों तक चुप नहीं रह सकता । एक न एक दिन उसमें भी विरोध करने की शक्‍ति आ ही जाती है । यह बात भी समझने की है कि क्‍यों संगठित आरक्षित वर्ग को राजनैतिक लोग वोट बैंक के रूप में देखते है और असंगठित अनारक्षित वर्ग को नहीं ? अब तक कानून सम्‍मत और जनहितकारी समझे जाने वाले विचार को देश के सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा खारिज कर दिए जाने से भी आरक्षण विरोध को प्रबलता मिली है । राजनैतिक दलों के समर्थन और विरोध में जनहित से अधिक  चुनाव और वोट बैंक की राजनीति है ।
      देश में दलित उत्‍थान के लिए आजादी से आज तक चलाई गई योजनाओं के व्‍यय के आकलन के अनुसार आज अंतिम छोर पर बैठे व्‍यक्‍ति को भी प्रगति के पथ पर आज हमारे साथ होना चाहिए था । यह लाभ आज भी कुछ वर्गों तक नहीं पहॅुच पाया । इस लाभ के न पहुँच पाने के कारण जातिगत न हो कर दुर्गम इलाकों में निवास , गरीबी और अशिक्षा ही प्रमुख है । यदि वास्‍तविक दलितों को लाभ देना है तो ऐसे वर्गों को मुख्‍यधारा में लाना होगा ।ऐसे वर्गों तक पहुँचने वालो लाभों को भी उन्‍ही के वर्ग के दबंग लोग हथिया लेते है । अक्‍सर सरकारों पर आरक्षित पदों को रिक्‍त रखने और बैकलॉक पूर्ण न करने का आरोप लगता रहता है । यदि पर्याप्‍त संख्‍या में योग्‍य उम्‍मीदवार ही न मिले तो सरकार भी क्‍या करे ? अब समय आ गया है यह सोचने का कि आरक्षण जैसी नीतियों का लाभ कोई परिवार या व्‍यक्‍ति कितनी बार लेगा और कब दलित से गैरदलित माना  जाएगा  क्‍योंकि अब जातिवादि दलित होने का फार्मूला अब पुराना हो चुका है ? अब इस व्‍यवस्‍था में जातिवादी संघर्ष पैदा करने की मंशा साफ दिखाई देने लगी है। आपकी सहमति या असहमति आपके स्‍वार्थ का आईना हो सकता है लेकिन जातिवाद को समाप्‍त करने के लिए हम सबको मिलकर ईमानदारी से प्रयास करना होगा और आज का सही रास्‍ता नहीं है ।   

Sunday, December 16, 2012


गधादेश का मंत्रीमण्‍ड़ल
     गधादेश में अभी-अभी चुनाव हुआ है । जैसा की आप तो जाते ही है, आज कल अल्‍पमत सरकारों का जमाना  है । इसी से पता चलता है कि जनता को किसी पर भी भरोसा नहीं है, परन्‍तु उन्‍हें तो राजा बनना है, सो वे साम् ,दाम, दण्‍ड़ और  भेद का प्रयोग आंतरिक और बाहय सर्मथन के नाम पर सरकारें बनाते है । गधादेश में भी बाहरी और आंतरिक समर्थन के साथ सरकार बनाने की कवायद प्रारम्‍भ हो गई । लेकिन इस बार गधों का वास्‍ता सुअरों से था । सुअर पार्टी भी पूरा जोर लगा रही थी उन्‍होंने भालूओं,तेंदूओं और हाथीयों को पहले ही अपनी ओर कर लिया था अब अल्‍पमत को बहुमत बनाने के लिए मेमने महत्‍वपूर्ण हो गए । वे बेचारे कब तक बचते जिस दिन सदन में बहुमत साबित करना था उस सुबह दो मेमनों को शेर उठा ले गया । शेर अकेला ही था और उसे भी तो सरकार में शामिल होना था अब उसने अपना संख्‍याबल बढा लिया था । गधापार्टी के लिए शेर  का समर्थन जरूरी हो गया । दोनों में समझौता हुआ कुछ लेन-देन और मंत्री पद की बात अंदर ही अंदर और जाहिर में  सुअरवाद के विरोध में प्रतिद्धता दर्शाई गई । खैर सहाब गधों ने अपना बहुमत साबित कर ही दिया । स्‍वभाविक ही था कि गर्धबराज ही राष्‍ट्रमंत्री बनेंगे । वे तो अनेक आपराधिक मामलों में पहले से ही जेल में थे और उन्‍होंने जेल से ही चुनाव लड़ा था। यहॉं सब ने मिल कर उन्‍हे राष्‍ट्रमंत्री प्रस्‍तावित किया वहॉं जज को सदबुद्धि आ गई और उन्‍हे जेल से रिहा कर दिया गया। वे सीधे जेल से जलूस की शक्‍ल में राष्‍ट्रमंत्री की सपथ लेने पहुँचे । अब समय था मंत्री मण्‍ड़ल के गठन का , सब को खुश करने का और चुनाव के पहले और बाद किए गए वादों को निभाने का । यह भी दिखने का कि योग्‍यता के अनुरूप मंत्री बनाए गए है
        सरकार के बहुमत में शेर की महत्‍वपूर्ण भूमिका के साथ ही साथ अपने आप को कानून ,पुलिस और अदालत से  उपर समझने वाले इस बाहुबली को सुरक्षा मंत्रालय ही चाहिए था सरकार की भी मजबूरी थी तो शेर खान का मन चाहा मंत्रालय उन्‍हे दे दिया गया । चींटी रानी को संख्‍या और चुनाव पूर्व समझौते के आधार पर खाद्य मंत्रालय देना पूर्व से ही सुनिश्‍चित था। उनके सहायक के रूप में मूषक को उनके कालाबाजारी के अनुभव के आधार पर रखा गया । चींटी रानी ने अपने पहले वक्‍तव्‍य में कहा कि अब देश का खाद्यान्‍न बढ जाएगा क्‍योंकि जनता को उतना ही मिलेगा जितना खाद्य मंत्री को जरूरत है। जब बिजली मंत्री की बात चली तो यह भी बात उठी कि गधादेश में तो पिछले कई सालों से बिजली है ही नहीं  । इस पर राष्‍ट्रमंत्री ने समझाया कि अब आप लोग विपक्ष नहीं है आप अब सत्‍ता में है आप को सकारात्‍मक ही बोलना चाहिए । हमारी जनता को उजाले में रहने की आदत ही नहीं है और हम अपनी जनता का पूरा ध्‍यान रखते है उन्‍हे बिजली दे कर उनकी आदतें खराब नहीं करना है ।  उल्‍लू को इस विभाग के लिए उपयुक्‍त माना गया । कृषि मंत्री के लिए बैल का नाम उनके सीधे और सरल स्‍वभाव के कारण आया लेकिन ऐसा मंत्री जो अपनी जनता के दबाव में काम करता हों और कुछ भी न खाता हो सरकार के हित में नहीं होता । बकरी दिनदहाड़े किसी की फिकर किए बिना खेतों को खाने की योग्‍यता रखती थी ,इसलिए उसे ही यह विभाग दिया गया । लोमड़ी धूर्तता और मक्‍कारी के साथ हमेशा ही सत्‍ता में बनी रहते हुए पिछली अनेक सरकारों में कानून मंत्री रह चुकी थी , उसे यह विभाग न दिया जाता यह तो सम्भव न था । सार्वजनिक वितरण और सहकारिता की बंदरबांट के लिए बंदर का का नाम आते ही वो नाचने और कुलाटें खाने लगा । उसकी नजर तो विदेश मंत्रालय पर थी वो बोला मैने तो बाहर की दुनिया देखी ही नहीं, इसी बहाने कुछ सैर हो जाएगी । जहॉं कुछ समझ में आया तो ठीक नहीं तो टररा कर तो आ ही सकता हुँ । उनसे उपयुक्‍त और कोई था भी नहीं वे ही विदेश मंत्री बने । शेष विभागों में जेल और शिक्षा दस दिन की स्‍कूल शिक्षा प्राप्‍त और जेल में रहने के अनुभवी गर्धब राज ने अपने ही पास रखे और अन्‍य विभाग गधों में बांट कर चरने की खुली छूट दी गई ।
       आप के लिए यह सब नया नहीं है क्‍योंकि आप तो अनेकों बार गधादेश में यह सब देख चुके है । अब मंत्रीयों के जलूस उनके क्षेत्र जाति और पार्टी के अनुसार निकल रहे है। जनता को इनसे कोई वास्‍ता नहीं क्‍योंकि वो तो चुनाव रूपी हवन में अपने जला ही चुकी है ।        

Monday, December 10, 2012


गुमनाम हुआ हुँ मैं
बदनाम था तो मशहूर था अब गुमनाम हुआ हुँ मैं ।
शराफ़त से जीना क्‍या सीख लिया भीड़ में गुम हुआ हुँ मैं ।
सच्‍चा हुँ सच्‍चा हुँ सच बोलता हुँ मैं ।
ईमानदार  हुँ ईमान से रहता  हुँ मैं ।
ठगता रहा दूसरों को नहीं ख़ुद को ही
ख़ुद  से  ही  झूठ  बोलता  हुँ मैं ।
                          बदनाम था तो मशहूर था अब गुमनाम हुआ हुँ मैं ।
शराफ़त से जीना क्‍या सीख लिया भीड़ में गुम हुआ हुँ मैं ।

सब  सोचते है  बहुत  घूमता हुँ मैं ।
जमाने के हर प्रपंच में डोलता हुँ मैं ।
जो  दिखता  है  वो  कोई  और है
मन  के  पिंजरों में बंद रहता हुँ मैं ।
 बदनाम था तो मशहूर था अब गुमनाम हुआ हुँ मैं ।
शराफ़त से जीना क्‍या सीख लिया भीड़ में गुम हुआ हुँ मैं ।

लक्ष्‍य  से  आगे  सोचता  हुँ  मै ।
पराजय की आशंका से ड़रता हुँ मैं ।
विजय  के  स्‍वप्‍न की योजनाओं में
राह   से   भटक  जाता   हुँ  मैं ।
                         बदनाम था तो मशहूर था अब गुमनाम हुआ हुँ मैं ।
शराफ़त से जीना क्‍या सीख लिया भीड़ में गुम हुआ हुँ मैं ।

चरणवंदन  के  आग्रह थे बहुत ।
चारण के रिक्‍त पद भी थे बहुत ।
मैने  इंकार  करना  सीख  लिया
लो  अब  उनसे  आज़ाद  हुँ मैं ।
                            बदनाम था तो मशहूर था अब गुमनाम हुआ हुँ मैं ।
शराफ़त से जीना क्‍या सीख लिया भीड़ में गुम हुआ हुँ मैं ।

Sunday, October 7, 2012


गधों का संरक्षण
         

         आप तो जानते ही है कि कल्‍पनाओं के बीहड में कहीं गधादेश बसता है । आप शायद गधादेश के इतिहास से तो परिचित ही होंगे । इस गधादेश में पहले शेरों का राज था , वो भी बिखरा हुआ । शेर वर्तमान गधादेश में  अपने- अपने  क्षेत्रों में अलग- अलग नियमों और कानूनों के अनुसार राज करते थे । शेरों के राज में हुनरमंद घोड़े समाज में आगे निकल गए, शेरों ने भी घोड़ों को महत्‍व दिया अक्‍सर शेरों के दरबार में घोड़े ही नियम बनाते । आप तो जानते ही है कि रेवड़ी अंधे ही बांटते है और जिसे भी नियम बनाने का मौका मिलता है वो हमेशा ही पहले अपना , जाति और समाज का ध्‍यान रखकर नियम बनाता है। घोड़ों के बनाए नियमों ने उन्‍हें समाज में और अधिक महत्‍वपूर्ण स्‍थान दे दिया । अब घोड़े अपने घोड़ेपन पर इठलाने लगे ; उनके लिए अब गधे एक तिरस्‍कृत  जाति से अधिक कुछ नहीं थे । फिर शेरों के राज समाप्‍त होते गए लेकिन घोड़ों का समाज में कुशलता और सामाजिक सरोकारों के चलते दबदबा बना रहा । गधों को इस समय तक अपने गधे होने का कोई मलाल नहीं था ।
       
       फिर गधादेश के इतिहास ने पलटा खाया, शेरों के राज्‍य तो पहले ही समाप्‍त हो चुके थे । अब उनके राज्‍यों को मिला कर एक नए देश गधादेश का निर्माण हुआ । अब जब नया देश बना था तो उसके लिए नया कानून बनाना भी आवश्‍यक होगा । इस समय यह बात आम हो चुकी थी कि घोड़ों के बनाए नियम और कानून समतामूलक नहीं है इसलिए यह निश्‍चित हुआ कि गधादेश के कानून बनाने में घोड़ों की भूमिका नहीं होगी । काफी खोज के बाद ऐसे गधे खोजे गए जो विदेशों में पढ़े थे और विदेशी कानूनों की नकल करना जानते थे ।  अब उन्‍हीं गधों को गधादेश का कानून बनाने का काम सौंपा गया । उन्‍होंने विदेशी कानूनों की खूब नकल की और समतामूलक  समाज के नाम पर कानून में गधों को संरक्षण देने की बात रखी । गधादेश नए देश के बनने की खुशी में डूबा हुआ था और सामाजिक समानता जैसी बात को कौन नकारता . घोड़े अपने पुराने रूतबे और कौशल के मद में डूबे हुए थे इसलिए उन्‍होंने भी विरोध करना उचित न समझा । कानून अनुसार गधादेश में गधों को संरक्षित प्रजाति घोषित कर दिया गया । अब देश की प्रगति का मतलब गधों की प्रगति हो गया । घोड़ों के आगे बढ़ने के अवसरों को  कम योग्‍य  गधों को संरक्षण के नाम पर दे दिया गया । अब गधे का बच्‍चा दौड़ने वाले घोड़ों से आगे निकल जाता है यदि नहीं निकल पाता है तो घोड़ों को रोक कर उसे आगे निकाला जाता है । अब दौड़े कोई भी;जीतेगा तो गधा ही क्योंकि उन्‍हें घोड़ों की अपेक्षा सारी सुविधाओं के साथ आधी या और भी कम दूरी दौडनी होती है । कहीं- कहीं तो संरक्षण के नाम पर घोड़ों को दौड़ने ही नहीं दिया जाता ।

         गधे अब इस असमानता पूर्ण संरक्षण का अनेक दशकों से आनन्‍द ले रहे है और अब तो वे इसे अपना अधिकार ही समझने लगे है। घोड़े कानून के भय से इस असमानता को सहने के लिए मजबूर है । स्‍थिति इतनी खराब है कि घोड़ों के पास खाने को घास का एक तिनका भी नहीं है और गधे संरक्षण के नाम पर चारागाहों में आराम करते हुए घोड़ों की पिछली पीढ़ियों को कोसते रहते है । गधादेश की राजनीति में गधों का वोट उनके गधेपन के कारण किसी एक ओर गिरने की आशंका रहती है अत: सभी राजनैतिक दल गधों के संरक्षण का समर्थन करके उन्‍हें बेवकूफ बनाने का प्रयास करती है। गधे अब होशियार हो गए है वे भी इस राजनीति का भरपूर फायदा उठाना जानते है । यदि देखा जाए तो घोड़े अपनी होशियारी और कौशल के कारण ही गधों से मात खा गए क्‍योंकि अब शासकों को होशियार औार कुशल से अधिक मूर्ख और जी हुजूरी करने वाले पसंद है ।  अन्‍याय का यह रूप बिलकुल उसी तरह का है जैसा कभी घोड़ों ने किया था।

        गधादेश अपनी राजनीति के चलते घोड़ों के कौशल से वंचित होकर जिस राह पर चल रहा है उसे वो प्रगति मानता है । घोड़ों को मालूम है कि गधे गधादेश को किस खाई की ओर ले जा रहे है, लेकिन वे मौन है क्‍योंकि अब उनकी सुनता भी कौन है ?    

Saturday, September 15, 2012


हाइकू कविता
  हिन्दुस्तान में
     जो है ,वही तो सब
              पाकिस्तान में ।

मासूम बच्चा
     यहॉं और वहॉं भी
              बहुत सच्चा ।

दिलों में प्यार
     यहॉ और वहॉं भी
             होतीे बहार ।

भ्रष्टाचार में
     यहॉ और वहॉं भी
            खूब निखार ।

शस्त्र बहाल
     यहॉ और वहॉं भी
             शिक्षा बेहाल ।
बदनसीबी  
      यहॉ और वहॉं भी
               भूख ,गरीबी ।

सीमा पे डर
        यहॉ और वहॉं भी
                 मिटते घर ।

बंटते भाई
      यहॉ और वहॉं भी        
              बाद सगाई ।

नेता फरेबी
         यहॉ और वहॉं भी
                 रोते गरीबी ।

                             आलोक मिश्रा
                             

Friday, May 25, 2012

अधर्म का व्यापार

                                                       अधर्म  का  व्यापार
                   धर्म  के नाम  पर   जहाँ  देखिए पाखंड  फैला है । इससे कुछ  लोग  धर्म  पर  ही  उंगली  उठाने लगे है। सबसे पहला प्रश्न है की  धर्म   क्या है ? धर्म  की परिभाषा अनेकों विद्वानों  ने दी  है ।जैसे :- धर्म   जीवन  जीने की कला है ;धर्म  उस   प्रकृति के प्रति आभार प्रगट करने का तरीका है जिस ने हमें बनाया ।परन्तु गीता में दी गई परिभाषा ही सबसे उचित  ओर उत्तम  है । "जो  धारण  किया जाता है वही धर्म  है । धर्म  को यदि रसायन शास्त्र के गुण -धर्म   शब्द के साथ  देखा जाए तो  धर्म  मानव  का    गुण -धर्म  ही है । अनेक    लोग  धर्म  के इस  स्वरुप  से परिचित  भी  है  परन्तु  धर्म  अब  आस्था  ओर  विश्वास  से  भी अधिक  व्यापार  ओर लेन -देन  बन  गया है ।
             वास्तविक्ता यह है कि धर्म  मानव  को शांति प्रदान   है , सत्य के  मार्ग  पर  चलने के  लिए प्रेरित  करता है ।लेकिन   लोग  मंदिर, मस्जिद ओ र गुरुद्वारे शांति  ओर सत्य  की  खोज  के लिए नहीं  अपने लिए  कुछ  मांगने ही  जाते है ।    आप  जगह  के विषय  में यह प्रचारित  कर दे कि यहाँ तेल  चढ़ाने   से  मन  की मुराद  पूरी होती  है  तो सारे शहर का तेल  वही  चढ़  जाएगा । 
              आज  हर  व्यक्ति किसी  न  किसी  समस्या से ग्रस्त  है । ऐसी समस्याओं से  निकलने  के लिए  वो  "शार्ट  कट" तलाश  रहा है । जब  उसे  कोई विश्वास  दिलाता  है  कि  वो उसकी   समस्याएँ  हल  कर  सकता है तो  उसे वो  बड़े ही धार्मिक  भाव  से  स्वीकार  कर  लेता  है  । इसी  कमजोरी  का फायदा अनेक  लोग  उठाते  है । यहीं से  धर्म  में  अधर्म  का  पाखंड  प्रारम्भ  होता  है ।
               ऐसे लोगों कि  कोई  कमी नहीं  है  जो  शायद धर्म  को  ठीक  से  जानते  भी  न  हो लेकिन  अपनी  वाचलता और   भ्रमजाल  से अपने  चारों  ओर  ऐसा   ताना -बाना बुनते लेते  है कि   वे  ही  ईश्वर  के सच्चे दूत   है  और वे जैसा चाहते  है ईश्वर   वैसा ही  करता  है  । वे  अपने  इस  प्रपंच  को फ़ैलाने के  लिए  छोटे  स्तर पर  आस  पास  के  लोगों  का और   बड़े स्तर  पर  प्रचार माध्यम  ओर  इंटरनेट जैसे  साधनों  का प्रयोग  करते  है। इस  अधर्म  के पाखंड  से कोई  भी धर्म  सम्प्रदाय  अछूता  नहीं  है । अक्सर अनेक  लोगों  को  इस  पाखंड  की  जानकारी भी  होती  है  परन्तु वे धार्मिक  विरोधों  से  बचने  का   प्रयास  करते  है । राजनैतिक  लोग  भी पाखंडियों के द्वारा जुटाई  गई भीड़ का  अपने  स्वार्थ  के  लिए  करने में  नहीं हिचकते है ।  इस  पूरे वातावरण  के कारण  ऐसे कुछ  लोग  जो  विरोध  करने की  शक्ति रखते  है , निर्बल  होते है ।   
               इस  अधर्म  के  के व्यापार  से देश  ओर  विदेश  में अरबों की  मुद्रा काले  धन  के रूप  में परिवर्तित हो  जाती है । इससे संत ,महात्मा ओर बाबा कहलाने  वाले धनकुबेरों की  श्रेणी में आ  जाते  है । वे अपने व्यवसाय  राजनीति  ओर फैक्ट्रियां चलते है । उन्हें इस  बात  से  कोई वास्ता  नहीं कि  वे किसी व्यक्ति को  धोखा  दे रहे  है या ईश्वर  को ।इस  अधर्म  कि आड़ में  वे अपने  लिए  एशोआराम  के  ऐसे साधन  भी  जुटा लेते  है जो  शायद  धर्म  की  किताबों में  वर्जित  हो ।
                जब  ऐसे  पाखंडी धर्म  के ठेकेदार  बन  जाते  है तो उनमे से  कुछ  तो  स्वयम  को भगवान  कहलाने  से  भी  नहीं चूकते  है । आज  भारत में  ही केवल 70 भगवान है  पूरी दुनिया में  लगभग  200 से अधिक  भगवान  अपने पाखंडों  के साथ  काम  कर रहे है । ऐसे  भगवानों के  साम्राज्यों को  छेड़ने से  सरकारें भी  हिचकिचाती है । पूजास्थलों  को भी भक्तों ने मालामाल  कर  दिया है । यहाँ भी  लूट  का साम्राज्य पनपने लगा  है । कुछ  लोगो ने अपने व्यक्तिगत  हितों  को साधने के  लिए  मिशन  ही  बना डाले ।   वे  अब  मिशन  
की आड़ में  शांति ,स्वर्ग  और मनोकामना  पूर्ति का प्रलोभन  दे कर  अपने स्वार्थ  की पूर्ति  कर  रहे  है ।  
                  आप  कोई धर्म  को  मानते  हो ,किसी भी संप्रदाय  के हो  इससे कोई फर्क   नहीं  पड़ता  । आपको   
भी पाखंडियों  के व्दारा   धर्म  के नाम  पर अधर्म  की  घुट्टी पिलाने  का प्रयास  किया जा  रहा है ।    इन पाखंडियों   से  बच  कर कर्म  पर  विश्वास  रख  कर आगे बढ़े  ,आप  को सफलता  अवश्य प्राप्त होगी ।

Thursday, May 24, 2012

SAMACHAR MADHAYAM


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Monday, April 23, 2012


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