Monday, September 7, 2020

चलते रहे ( गज़ल )

 

छोड़ चले उस शहर को जिसका हिस्सा थे
हमने बसाया था इसे  पर हम कुछ नहीं थे ।

उन ईमारतों में सर छुपाने की जगह न मिली
जिनकी नींव में ईटों पर  उंगलियों के निशान थे ।


   शहर बसा रहे थे पूरी मेहनत के साथ
   तबाही के आलम हम ही रहे बेघर थे ।


सब तो हमारे बारे में ही सोचते रहे
बस कभी हम तक वे पहुँचे नहीं थे ।


       सड़क लम्बी थी बनाई हमने
       बस हम ही पटरियों से लौटे थे ।


      कैमरे की नजरों से दूर बच्चों के साथ
      चल पडे नंगे पैर छुपते छुपाते बेघर थे ।


    फिक्र किसे थी हमारी अपनों की थी मारामारी
    सरेआम घूम रहे थे केले दे कर फोटो ले रहे थे ।


तुम्हारे झंडे लेकर फिरते रहे हम
बहुत हुआ सब हम ही बेवकूफ थे ।


भूखा बच्चा लपक खाना ले आया
निवालों में बांट लिया भूखे सब थे ।


         वो चिल्लाया माँ खाना मिल गया
         थकी माँ की आखों में आँसू थे ।


  
चलो शुक्रिया आखिर घर पहुँचे तो
हम तो पैसे लिए बने बेघर बंजारे थे ।


जो मन में आया बस लिखता रहा
लोग उसमें गज़ल के शेर खोजते थे ।


न उसूल न मक्ता न मसला काफिया भी गायब
वक्त ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा जो इंसान थे ।


बुत" हो गई दुनिया उनके गम से
जो सारे जहाँ  के संगराश थे ।

आलोक मिश्रा " बुत"


मै वैश्या हुँ

 

मेरी पवित्रता पर प्रश्न उठाने वालों ।
मेरे कपड़े उतारने पर प्रश्न उठाने वालों ।
सोचो मेरे होने पर भी तुम ,
अपनी बहन, बेटी और मासूम को नोच खाते हो ।
हम न हो तो ,
तुम्हारी माँऐं भी न बचेंगी ।
मेरी पवित्रता पर प्रश्न उठाने वालों।
दिन के उजाले में उजले लोगों ।
अंधेरों में कोठों के चक्कर लगाने वालों ।
तुम्हारी वासना हवस तुम पर हावी है ।
मेरा मोल भाव करने वाले लोगों।
तुम्हारी हैवानियत तुम पर हावी है ।
हमसे पहले
अंधेरे में खुद का नाड़ा खोलने वाले लोगों ।
मै तुम्हारी ही गंदगी का आईना हुँ।
हाँ मै वैश्या हुँ ।
हाँ मै गाली हुँ ।
हाँ मै नाली हुँ ।
मै हुँं स्त्री पुरूष संबंधों का बाज़ार ।
इस बाज़ार में तुम खरीददार।
मै माल हुँ।
शरीर मेरा बिकता है ।
आत्मा तुम्हारी बिकती है ।
ओ मेरे बाज़ार की रौनक ।
मेरे हैवान ग्राहक ।
मै तुम्हारी सच्चाई हुँ ।
मै तुम्हारा सुलभ हुँ ।
मै रास्ते का घूरा हुँ ।
मै आवश्यकता हुँ ।
मेरे बाज़ार रौनक ।
तुम से है ।
मेरे पास आने वाले लोगों ।
तुम ही हो मेरे जन्म दाता ,
ओ भूखे भेड़ियों।
मेरी पवित्रता पर प्रश्न उठाने वालों।।
  आलोक मिश्रा बुत


सूत्रों के हवाले से ....( व्यंग्य )

 

        अभी - अभी सूत्रों के हवाले से खबर लगी है कि "फलाना" भी कोरोना पोजेटिव हो गया । ये फलाने हमारे पूर्वपरिचित थे । हमने सोचा कुशलक्षेम पूछने के बहाने ही सही सूत्रों से मिली खबर की पुष्ठी की जाए । बस हमने उन्हें फोन लगा दिया । पहली बार कोरोना संदेश सुना , फोन नहीं लगा ; दुबारा में बात हुई । हमने औपचारिकता में उनकी कुशलता पूछी तो वे भड़क गए " क्या मिश्रा जी सीधे-सीधे पूछो ना कि हमें कोरोना है या नहीं !" हम हड़बडा़ गए और अपनी सफाई देने लगे ,वे हमारी बात काट कर बोले " आप पहले नहीं है  ; सुबह से पचासों फोन आ चुके है । सब यही जानना चाहते है कि हमें कोरोना है या नहीं ? वैसे आपको किसने बताया ? " मै धीरे से बोला " हमें सूत्रों से ज्ञात हुआ था । " वे तो भरे बैठे थे ,हम आगे कुछ बोलते ,वे बात काट कर बोलने लगे " ऐसी- तैसी सूत्रों की..... ये आपके सूत्र हमें मिल जाऐ तो हम उन्हे पूरा ही हल कर दें । " हमनें क्षमा-याचना और लल्लो-पत्तो करके फोन काट दिया । अब खबर का मज़ा जाता रहा ।
            हम सोचने लगे आखिर ये सूत्र होते क्या है ? ये गणित के सूत्र जैसे तो न होंगे जो हमेशा ही सही हल देते है । इन सूत्रों को खोजना और इनके बारे में मालूम करना आवश्यक है । हमारी खोजी प्रवृति हमेशा ही हमें कुछ बकवास से काम करने को मजबूर करती है । वैसे आजकल मुम्बई में एक कथित आत्महत्या को चैनलों द्वारा सूत्रों के हवाले से हत्या बता कर जैसे हल किया जा रहा है , उसे देख कर लगता है कि देश में सी.बी.आई. जैसी संस्थाओं की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारे चैनल सूत्रों के हवाले सब पता करने में सक्षम है । बस अबकी बार देश में कोई बड़ा केस हो तो इन्हीं चैनलों को जांच दी जाने की मांग होनी चाहिए । वे हल भी कर ही देंगे अपने सूत्रों के हवाले से ; बस सब अलग-अलग व्यक्तियों को दोषी करार देंगे । ये भी कोई बड़ी समस्या नहीं है । इसके लिए एक परिचर्चा याने ड़िबेट (क्या दिन आ गए हिन्दी के ? ) आयोजित कर लेंगे । इसमें जो सबसे अधिक चिल्लाएगा ,दूसरों को बोलने नहीं देगा वही सही होगा । बस मिल गया न दोषी ।
   बात सूत्र और हमारी खोजी प्रवृत्ती की थी । हमने एक पत्रकार मित्र से बात की और पूछा " भाई सहाब पत्रकारिता में ये सूत्र क्या होते है ? " हमारे मित्र बोले " बात औपचारिक करनी है या पान ठेले वाली ?" हमने उन्हें आश्वस्थ किया " भाई समझ लो कि हम पान ठेले पर ही है ।"  वे वोले " देखो मिश्रा जी कभी पत्रकारिता के अपने सूत्र होते थे ,पत्रकार खुद उन्हीं सूत्रों पर चलते थे और बाद में एक सफल पत्रकार फटेहाल मर जाता था । अब पत्रकारिता के कोई सूत्र नहीं होते । हाँ .. पत्रकारों के होते है । " हमने जिज्ञासू छात्र की तरह कहा " हम समझ नहीं पाए थोड़ा खुल कर बताऐं । " वे वैसे भी बोलने के मूड़ मे थे " बता ही तो रहा हुँ । अब यह एक व्यवसाय है ...व्यवसाय .... कमाई का साधन । बस छोटे-बड़े कार्यालयों के छोटे-बड़े अधिकारी -कर्मचारी अक्सर जाने-अनजाने सूत्र बध जाते है । " वे रूके और फिर बोलने लगे " जैसे अभी का कपड़ा घोटाला ,इसमें एक बाबू सूत्र बना क्योंकि उसे कमीशन में हिस्सा नहीं मिला । बस ऐसे ही हमारे सूत्र आते जाते रहते है ।
हम बोले " प्रभू इस सम्बन्ध में कुछ और ज्ञान दें।  "  वे बोले मिश्राजी आप कोई शोध- वोध तो नहीं कर रहे हो । खैर , सूत्रों के हवाले से खबर देनें से खबर के सारे सूत्र ही हमारे हाथों में होते है । अब मान लो आपको आतंकवादी बनाना है " हम तो चीख ही पड़े " अब हम से क्या दुश्मनी हो गई भाई ? " वे तो बस बोले ही जा रहे थे " मान लो ना... वैसे आप तो नेक आदमी है । बस सूत्रों कै हवाले से खबर चलाऐंगे कि आपके घर में बम मिला । "  "बम ....... बम"  हमारी तो चीख ही निकल गई जैसे हम पर ही गिरा हो । वे संयत स्वर में बोले जा रहे थे " आपने विरोध किया तो खण्ड़न ,नहीं तो चार दिन तक चटखारेदार खबर । " हम धीरे से बोले " और सूत्र ... ?" वे अधिकार से बोले " आप भी बड़े भोले हो नहीं समझे ...... , भाई सूत्र कोई हो भी सकता है और नहीं भी । अक्सर तो समाचार को चटपटा करने के लिए काल्पनिक सूत्रों का तड़का लगाया जाता है । सूत्र तो बस पढ़ने और देखने वालों का भ्रम है । लोग इसी भ्रम को सच मान कर खबरों पर विश्वास करते है । " हमने अपने जिज्ञासा प्रगट की " अंत में यह भी बता दो कि इस भ्रम रूपी सूत्र का प्रयोग क्यों होता है ?" वे हंस दिए " सब जान लोगे आज ही । मुझे पैसे मिले आपको अपराधी साबित करने के,  बस कुछ हो या न हो सूत्र तो है आपको अपराधी साबित करके ही दम लेंगे । " हम अब घबरा गए " आप लोग तो खतरनाक हो । आपके पास तो ब्रम्हास्त्र है । " इधर- उधर की बात के बाद चर्चा समाप्त कर दी ।
              अब हमें समझ में आ गया है कि सूत्र तो स्वार्थ ,राजनीति और  पूर्वाग्रह का मानसपुत्र है जिसके पैदा होने पर लोग मजे ले कर नई कहानियों को सुनते और कहते है ।
    आलोक मिश्रा " मनमौजी "


खुद


लड़ता रहा खुद से खुद की औकात पर
जीतता  रहा  खुद  से  खुद की बात पर 


लोग  खुद   हारते  रहे  मुझे  जिता  कर
हंसता  रहा  खुद  ही  खुद  की मात पर

आलोक मिश्रा मनमौजी 

भगवान बेचने वाला

 

             भगवान ले लो .....भगवान, रंग-बिरंगे भगवान...., फैंसी भगवान..... ,भगवान ले लो...। हाथठेलेवाला हाथठेले पर  मूर्तियां सजाकर और जोर जोर से आवाज लगाता है। उसके भगवान बहुत ही चटक रंगों से रंगे हुए मिट्टी के बने हुए हैं । इस ठेले पर जाति और धर्म का भेद समाप्त हो जाता है । जहाँ उसके पास शंकर-पार्वती हैं , वही ईसा मसीह भी है। जहां वह बाबा की चौखट बेच रहा है, वही बुद्ध भी बिक रहे हैं । सब अपने-अपने पूजा घरों में अलग-अलग तरीकों से पूजे जाएंगे परंतु आज वह सब एक साथ एक ही वाहन पर बिकने को तैयार हैं । भगवान बेचने वाले के लिए भगवान की कोई परिभाषा मायने नहीं रखती । वह तो सोचता है   उसकी मूर्तियाँ ही असली भगवान है क्योंकि वही तो उसके पूरे परिवार के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया है वह एक बार फिर जोर से हाका लगाता है भगवान ले लो.... भगवान .....,सभी धर्मों के भगवान ......ले लो.. ...,रंग-बिरंगे भगवान... ले लो ....। एक व्यक्ति ठेले के पास रुकता है । बड़े गौर से मूर्तियों को देखता है ठेले वाले को आशा है कि शायद कोई मूर्ति खरीदेगा। ठेलेवाला बोला "आपको क्या चाहिए राम-सीता दिखाऊं । "नहीं " वो बोला; उसने कोने में रखी एक मूर्ति को बड़े आदर के साथ उठाया और  माथे पर लगाया फिर मूर्ति को उसने उतने ही आदर के साथ वापस रख दिया ठेलेवाला बोला "यह लेंगे आप पैक कर दूं।" वह बोला " नहीं भाई मैं बेरोजगार हूँ । भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि आज कोई काम मिल जाए।"  इतना कहकर वह चलता बना भगवान बेचने वाला सोचने लगा कि क्या उसकी मूर्तियों में ऐसा कुछ कर सकने की शक्ति है यदि ऐसा ही है तो मैं भी इन्हीं से प्रार्थना करता हूं कि आज यह सब बिक जाए।
       एक साहब आए और मूर्तियों को उलट-पुलट कर देखने लगे । फिर बोले "यह तो कच्ची मिट्टी की बनी है । " भगवान बेचने वाला बोला " हां हां साहब यह मिट्टी की बनी है  । " वह बोला " यह कौन सी कंपनी की है ? " ठेलेवाला उसका मुंह देखने लगा वो फिर बोला  " मैंने पूछा कौन सी कंपनी की है  ?" ठेलेवाला बोला " साहब हमने बनाई  है । " वह खरीदार अब मूर्ति को हाथ में लेकर उसका मोलभाव करने लगा ; सौ से चल कर बात चालिस पर अटक गई । आखिर ग्राहक ने अपनी मनमानी कर ही उसने चालिस  में मूर्ति ले ली । ठेले वाले ने अखबारी कागज में मूर्ति को लपेट कर धागे से बांध कर ग्राहक को देते हुए कहा " साहब आप इसे पूजा घर में रखिएगा  । " ग्राहक कड़क कर बोला " मैं पूजा- वूजा नहीं करता मैंने तो बस सजावट के लिए मूर्ति  ली है । " ठेलेवाले को महान आश्चर्य हुआ उसने पूछा "आप पूजा नहीं करते । " ग्राहक बोला " बताया ना नहीं करता मैं नास्तिक हूँ , नास्तिक ;  तुम ही बताओ इनको पूजने से कुछ होता है क्या ?"  वह और कुछ भी बोलने वाला था । ठेलेवाला बीच में बोल पड़ा   "साहब भगवान के बारे में ऐसा नहीं बोलते पाप लगता है पाप । "  ग्राहक बोला " बस यही डर ही तो भगवान के अस्तित्व का आधार है; खैर तुम नहीं समझोगे ।" वह आगे बात नहीं करना चाहता था ।  अपनी मूर्ति ली और चला गया ठेलेवाला सोचने लगा क्या दुनिया में ऐसे लोग भी होते हैं इस विषय में ऐसा क्या है जो वो समझ नहीं सकता।
     वह फिर जोर से चिल्लाकर हाका लगाने लगा भगवान ...... ले लो....., भगवान ....पूजा के ......भगवान , ....सजावट..... के भगवान, भगवान ... .ले लो..... भगवान । तभी एक   सज्जन चिल्लाने लगे " यह क्या लगा रखा है ? भगवान ले लो भगवान ले लो भगवान भी कभी बिकते हैं ? तुम को तमीज -तमीज है कि नहीं ? बड़ा आया भगवान बेचने वाला । "  सज्जन बहुत गुस्से में थी ठेलेवाले के चिल्लाने से शायद उनकी धार्मिक आस्था को ठेस पहुंची थी । उनका बस चलता तो ठेला ही उलट देते मगर उसमें भगवान थे । ठेलेवाला धीरे से बोला " मैं आपसे माफी मांगता हूँ । लेकिन क्या करूं इन से मेरा परिवार चलता है । इन्हें बेचना मेरा शौक नहीं, मेरी मजबूरी है। मूर्ति ले लो चिल्लाने से बिक्री कम होती है। तो भगवान ले लो चिल्लाने लगा ।" सज्जन कड़क कर बोले " तुम जानते हो इससे भगवान का अपमान होता ही है । हम जैसे लोगों का दिल भी दुखता है  । ठेलेवाला जवाब देने लगा "  साहब मैं किसी का दिल नहीं दुखाना चाहता  । मैं तो मूर्तियाँ बेचता हूँ । भगवान बेचने की हैसियत मेरी कहाँ ? भगवान बेचने का काम तो बड़े-बड़े धर्मगुरु करते हैं । बिना हाका लगाए ,उनसे कोई मोलभाव नहीं करता ;उनसे कोई नहीं पूछता भगवान क्यों बेच रहे हो । " सज्जन बड़ बड़ने  लगे और वैसे ही बड़ बडाते हुए चले गए। भगवान बेचने वाले को लगा केवल भगवान का नाम लेने से भी किसी की धार्मिक आस्थाऐं आहत हो सकती हैं क्योंकि कुछ लोग शायद भगवान पर एकाधिकार चाहते हैं । अब ऐसा लगता है कि देश में एक सौ पच्चीस करोड़ भगवान की आवश्यकता है । सबका अपना अलग भगवान । सब का भगवान के प्रति अपना नजरिया है किसी का भगवान मूर्ति में बसता है तो किसी का निराकार होकर लोक में विचरण करता है। किसी का भगवान ईमान सिखाता है तो किसी का शायद मारना काटना। किसी का भगवान मेहनत करना सिखाता है तो किसी का बेईमानी करना ।
     विचारों की तंद्रा टूटी तो उसने फिर से हाका लगाया भगवान ले लो  ..... भगवान..... आपके अपने ..... भगवान.... भगवान ....ले लो ....।मुझे लगने लगा कि शायद मुझे ही नहीं पूरी मानव जाति को भगवान बेचने वाले के साथ आगे जाना चाहिए पर क्या आपके पास समय और सहनशक्ति है।

आलोक मिश्रा  "मनमौज"