Friday, May 3, 2013

विज्ञपित वीर ( व्यंग्य )


विज्ञपित वीर
        भारत वीरों की धरती है । यहां सच्चे सपूत पहले सर कटा कर ,कालांतर में उंगली कटा कर शहादत देते रहे है । अब आपके हमारे आस-पास वीरों की एक नर्इ ही फसल  लहलहाने लगी है । ये है प्रचार वीर ,वो भी कुछ किए बिना । ऐसे वीर को विज्ञपित वीर कहा जाता है। हालाकि वीरों की इस प्रजाति पर अभी शोध की आवष्यकता है । सामान्य रुप से इन में भी बहुत से वाद अपवादों के साथ ही साथ वर्गीकरण मौजूद है । ऐसे विज्ञपित वीरों के स्थानीय पत्रकारों और संपादकों से इतने प्रगाढ़ सम्बन्ध होते है कि वे अक्सर देर रात किसी ढाबे पर हमप्याला दिखार्इ दे जाते है । इन विज्ञपित वीरों में खास और आम सभी वर्ग के लोग समिमलित पाए जाते है । बड़े नेताओं की तो छोड़ ही दीजिए ,उनकी रोजी-रोटी का तो जरिया ही विज्ञपित है । छोटे नेता,कर्मचारी नेता , अधिकारी, निठल्ले व्यापारी और तो और बहुत से बेरोजगारी भी विज्ञपित वीरों में शामिल है । कुछ बड़ें और प्रसिद्ध नेता, समाज सेवक और अधिकारी जो पहले विज्ञपितयां बाटते-बाटते इस हैसियत को प्राप्त कर चुके है कि वे आज पत्रकार वार्ता आयोजित कर सकें ; अब गाहे बगाहे पत्रकार वार्ता के द्वारा विज्ञपितयों का आदान- प्रदान करते है । इन्हीं में से कुछ लोग छोटे-छोटे मुददों पर अपनी राय फोन और चमचों के द्वारा जारी विज्ञपितयोंके माध्यम से सुर्खियों में बने रहने का प्रयास करते है।
          कुछ नीचे के स्तर पर अनेक लोग अपने थैलों और जेबों में विज्ञपितयां लिए घूमते रहते है । ऐसे लोग अपने आस-पास छोटी - बड़ी बैठकों,कार्यक्रमों और धरना प्रदर्षनों में बुलाने पर या बिना बुलाए भी अपनी उपसिथति दर्ज कराते रहते है । उनका प्रयास होता है कि उक्त कार्यक्रम की विज्ञपित में उनका नाम अंत में ही सही ''कार्यक्रम मे......... भी उपसिथत रहे ...या '' ......ने कार्यक्रम में सहयोग प्रदान किया ....जैसी पंकितयों में अवष्य ही छप जाए । वे इसके लिए सारी जोड़-तोड़ करते है । आयोजन के दौरान चार बार आयोजक से मिलते है , विज्ञपित लिखने वाले सज्जन को पान खिलाते है और फिर भी यदि नाम शामिल न हुआ तो समाचार पत्रों के दफतरों में जा कर जुड़वाने का प्रयास करते है । तब आप उनका नाम दूसरे दिन के समाचार में देख और सुन पाते है । वैसे देखा जाए तो उनका यह प्रयास किसी परम वीर योद्धा से कम तो नहीं लगता है ।
           हमारे एक विज्ञपित वीर को कैमरे के कोणों  का विषद ज्ञान है । वे हमेषा ही किरी भी आयोजन में ऐसे स्थान पर पाए जाते है जहां पत्र,पत्रिका या चैनल का कैमरा उन्हें देख ही ले । वैसे कभी -कभी ऐसा स्थान ग्रहण करने के लिए वे धक्का-मुक्की या गाली-गलौज जैसे प्रभावषाली शस्त्रों का प्रयोग करते हुए भी देखे जाते है । उनका शस्त्र प्रयोग समाचारों में हो या न हो पर अस्त-व्यस्त अवस्था में फटे कपड़ों के साथ प्रमुख व्यकितयों के पीछे सप्रयास मुस्कुराते हुए अवष्य ही वे दिख जाते है ।  उन्हें इस तरह की घटनाओं से और अधिक सकि्रय बने रहने की प्रेरणा ही मिलती है ।
         वैसे विज्ञपित वीरों के लिए यह भी आवष्यकता नहीं की कोर्इ बड़ा आयोजन ही हो ; वे तो रास्ता चलते ही समाचार गढते रहते है । एक मोहतरमा के गलत तरह से गाड़ी चलाने से एक युवक सड़क पर गिर पड़ा । मोहतरमा ने केवल उसे अपनी बोतल से पानी पिला दिया । बस साहब स्वयम जारी करवार्इ गर्इ विज्ञपितयों के माध्यम से उनकी तारीफों के पुल बांधे गए और वे समाज सेवी हो गर्इ ।  एक विज्ञपित वीर ने स्थानीय समाचार पत्र को फोन घन घनाया कि उन्हें पुत्र रत्न की प्रापित हुर्इ है। दूसरी तरफ पत्रकार मजा लेने के मूड़ में था बोला '' विज्ञपित भेज दो छाप देगें । दूसरे दिन के अखबार में छपा '' लल्लन जी को पुत्ररत्न की प्रपित हुर्इ ।........... इस पुनीत कार्य में पूरे मोहल्ले के लोगों ने सराहनीय सहयोग प्रदान किया । समाचार पढ़ कर लल्लन जी तो खुष हुए ही मोहल्ले वालों ने भी भरपूर आनन्द प्राप्त किया ।
            मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि  प्रचार पाने की चाहत में कुछ लोगों को छपास रोग हो जाता है जिसके साइड इफेक्ट के रुप में वे विज्ञपितयां लिखने लगते है । जो भी हो हमारे आस-पास ऐसे केमिकल लोचे के साथ अनेकों लोग घूम रहे है । वे आत्मसम्मान से जिए या न जिए समाज में सम्मान से जीते हुए दिखार्इ देते है । मेरा मन तो ऐसे परमप्रतापी , परमज्ञानी और सर्वव्यापी विज्ञपित वीरों को इन शब्दों से नमन करने  को  करता है
                 
                नमों नमों विज्ञपित वीरा ।
                तुम हरो सबहीं की पीरा ।।
      छपते रहना तुम को भावे
      फोटो भी चहुं ओर दिखावे
      वीडि़यो पर भी तुम छा जावे
      चारों ठाव है तुम्हरी क्रीड़ा
                नमों नमों विज्ञपित वीरा ।
                तुम हरो सबहीं की पीरा ।।
    जो कछु दिन छप न पावों
    हो अधीर उदास कहलाओं
    दूजे के कांधे तुम तोप चलाओं
   छपवे को तुम बहुत अधीरा
                नमों नमों विज्ञपित वीरा ।
                तुम हरो सबहीं की पीरा ।।
  जो संपादक नाम न छापे
  प्रेस पर रोज ही पड़े छापे
  बीबी भागे उसकी दूजा छापे
  संपादक हो जाए फकीरा
                नमों नमों विज्ञपित वीरा ।
                तुम हरो सबहीं की पीरा ।।
           सभी जोर से बोलो ... विज्ञपित वीरों की.......जय
     
                                    आलोक मिश्रा

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