कितने तोते कितने मालिक ?
सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वोच्च जांच एजेन्सी को तोता करार देते हुए जो कहा उससे जहां सत्ता पक्ष के तोते ही उड़ गए वहीं विपक्ष को लगने लगा है कि उसके तो तोते-तोते हो गए है। अब जनता के सामने प्रष्न यह है कि पूरे देष में क्या एक ही तोता है ?
देष में संविधान के अनुसार कार्यों का विभाजन तीन भागों में किया गया था । आजादी के कुछ समय बाद तक तो विधायिका ,कार्यपालिका और न्यायपालिका अपना- अपना स्वतंत्र असितत्व दिखाने में कामयाब रही । बाद मे चुने हुए लोगों ने कार्यपालिका और न्यायपालिका को प्रभावित करना प्रारम्भ कर दिया । कार्यपालिका के नौकरषाहों ने व्यकितगत स्वाथोर्ं के चलते चुने हुए लोगों से गठजोड़ करने लगे वहीं न्यायपालिकाओं में भी अघोषित रुप से इन निर्वाचित लोगों को विषेष सुविधाएं दी जाने लगी । आज सिथति यह है कि नीचे से ले कर ऊपर तक सभी कार्यालयों में तोते बैठे है और उनके मालिक लाल बतितयों में घूमते है । न्यायालयों को बंधक बनाने के लिए ये मालिक खाकी वर्दी वाले या काले कोट वाले तोतों का प्रयोग करते है ।
प्रषासनिक कार्यक्षमता में गिरावट के पीछे मुख्य रुप से इन मालिकों का ही हाथ है। छोटे चपरासी से वरिष्ठतम अधिकारी तक सब किसी न किसी के तोते है । छोटे-बड़े कार्यालयों में होने वाले कामकाजों , स्थानांतरणों और पदोन्नतियों तक में इन मालिकों का पूरा ही दखल होता है । सिथति का अंदाज इससे लगता है कि यदि कोर्इ अधिकारी किसी बाबू की टेबल ही बदल दे तो तुरन्त ही बाबू तोते का मालिक अधिकारी को चेतावनी देता है । इस पूरी व्यवस्था में तोतों के छोटे-छोटे तो मालिकों के बड़े-बडे़ स्वार्थ छुपे है । तोते रोज कमाते है तो मालिक समय-समय पर बड़ी वसूलियाेंं करते है । इस प्रकार यदि देखा जाए तो व्यवस्था बहुत ही अच्छी तरह चल रही है । लेन-देन के इस खेल में सभी पूरी एकता का परिचय देते है । सब एक दूसरे को हमेषा ही खुष रखते है । भ्रष्टाचार वास्तव में तोतों और मालिकों के बीच का सदाचार है । ऐसे वातावरण में तोते अपने मालिकों की भाषा न बोलें ऐसा कैसे हो सकता है ।
आप ऐसा तो नहीं सोच रहे कि तोते अपने मालिक के प्रति वफादार है या मालिक ही हमेषा ही तोतों का ध्यान रखेंगे । सोचिए .... तोतों को तो अपनी आधी जिंदगी कार्यालय रुपी पिंजरे में ही गुजारनी है । मालिकों का क्या है वे तो पांच-पांच साल में आते- जाते रहते है । ये तोते गिरगिट की ही तरह रंग बदलना जानते है । इधर मालिक बदला और तोतों ने अपना रंग बदला । तोते आवष्यकता के अनुसार ही कभी हरे ,कभी नीले और भगवा रंगों में देखे जा सकते है । तोतों के उदघोष और कार्यकलाप भी मालिक के रंग में रंगे हुए होतं है । इधर मालिकों को भी मालुम है कि ये तोते केवल पांच ही साल के लिए उनकी कैद में है इसलिए इनके माध्यम से वो जो कुछ करा सकते है, कराते है । कुछ तोते र्इमानदार और बगैर मालिक के होने का भ्रम पैदा करते है । जब छोटे तोते बड़े तोते के सामने होते है तो बड़ा तोता उसे र्इमानदारी का पाठ पढाता है । इसी प्रकार का ज्ञान छोटा तोता भी अपने नीचे वालों को बांटता हुआ दिखता है । एक मजेदार बात और है कि आप सभी कार्यालय घूम आइए कोर्इ भी नहीं मानेगा कि वे किसी मालिक के तोते है । आप स्वयम भी अगर कार्यपालिका का किसी न किसी रुप में हिस्सा है तो शायद आप भी न मानें कि आप किसी के तोते हो और आपका कोर्इ मालिक है । अब आप याद करने की कोषिष करें कि आप अपने किसी काम के लिए किसके पास गए थे किसके माध्यम से किसे अपना मालिक बनाया था। आप को याद न आया हो तो थोड़ा याद दिला दूं कि आपके मालिकों में या तो चुने हुए नेता या नेता का चमचा या फिर आपसे बड़ा तोता भी आपका मालिक हो सकता है । मालिक वो जिसकी याद आप को अपनी सरकारी परेषानियों के साथ ही आती है।
न्यायालय भी केवल तोतों और मालिकों की बात ही करता है आगे कुछ कहने से बचते हुए जाच एजेंसी की स्वतंत्रता के विषय पर आ जाता है । अब आप ही सोचें एक तोता अगर आजाद हो भी जाए तो फर्क क्या पड़ेगा ? करोड़ों तोते तो पिंजरे के बाहर निकलना ही नहीं चाहते और उनके मालिक भी उन्हें छोड़ना नहीं चाहते । तोतों और मालिकों के इस गठबंधन ने पूरे देष की आम जनता को ही पिंजरों में कैद कर दिया है । पिंजरों में कैद देष प्रगति कैसे कर सकता है ? यहां तो बस मालिकों को ही प्रगति का अधिकार प्राप्त है । अब ''हर शाख पे उल्लू के स्थान पर कहना होगा कि ''हर शाख पे तोते बैठे है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा ?
आलोक मिश्रा