Friday, December 6, 2013

मित्र ( मुक्तक )

 जब भी पास किसी के जाओ ,
        उसको अपना मित्र बनाओ ।
सच है वो भी शत्रु बनेगा ,
            पर तुम दोषी क्यों कहलाओ 


Thursday, December 5, 2013

हाइकू

                         गुरू    प्रेरणा
                                 
                                       वंदन   तेरा    करूं
                                                            

                                                        करूं     प्रणाम



Saturday, May 11, 2013

कितने तोते कितने मालिक ? ( व्यंग्य )


कितने तोते कितने मालिक ?

        सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वोच्च जांच एजेन्सी को तोता करार देते हुए जो कहा उससे जहां सत्ता पक्ष के तोते ही उड़ गए वहीं विपक्ष को लगने लगा है कि उसके तो तोते-तोते हो गए है। अब जनता के सामने प्रष्न यह है कि पूरे देष में क्या एक ही तोता है ?
         देष में संविधान के अनुसार कार्यों का विभाजन तीन भागों में किया गया था । आजादी के कुछ समय बाद तक तो विधायिका ,कार्यपालिका और न्यायपालिका अपना- अपना स्वतंत्र असितत्व दिखाने में कामयाब रही । बाद मे चुने हुए लोगों ने कार्यपालिका और न्यायपालिका को प्रभावित करना प्रारम्भ कर दिया । कार्यपालिका के नौकरषाहों ने व्यकितगत स्वाथोर्ं के चलते चुने हुए लोगों से गठजोड़ करने लगे वहीं न्यायपालिकाओं में भी अघोषित रुप से इन निर्वाचित लोगों को विषेष सुविधाएं दी जाने लगी । आज सिथति यह है कि नीचे से ले कर ऊपर तक सभी कार्यालयों में तोते बैठे है और उनके मालिक लाल बतितयों में घूमते है । न्यायालयों को बंधक बनाने के लिए ये मालिक खाकी वर्दी वाले या काले कोट वाले तोतों का प्रयोग करते है ।
         प्रषासनिक कार्यक्षमता में गिरावट के पीछे मुख्य रुप से इन मालिकों का ही हाथ है। छोटे चपरासी से वरिष्ठतम अधिकारी तक सब किसी न किसी के तोते है । छोटे-बड़े कार्यालयों में होने वाले कामकाजों , स्थानांतरणों और पदोन्नतियों तक में इन मालिकों का पूरा ही दखल होता है । सिथति का अंदाज इससे लगता है कि यदि कोर्इ अधिकारी किसी बाबू की टेबल ही बदल दे तो तुरन्त ही बाबू तोते का मालिक अधिकारी को चेतावनी देता  है । इस पूरी व्यवस्था में तोतों के छोटे-छोटे तो मालिकों के बड़े-बडे़ स्वार्थ छुपे है । तोते रोज कमाते है तो मालिक समय-समय पर बड़ी वसूलियाेंं करते है । इस प्रकार यदि देखा जाए तो व्यवस्था बहुत ही अच्छी तरह चल रही है । लेन-देन के इस खेल में सभी पूरी एकता का परिचय देते है । सब एक दूसरे को हमेषा ही खुष रखते है । भ्रष्टाचार वास्तव में तोतों और मालिकों के बीच का सदाचार है । ऐसे वातावरण में तोते अपने मालिकों की भाषा न बोलें ऐसा कैसे हो सकता है ।
           आप ऐसा तो नहीं सोच रहे कि तोते अपने मालिक के प्रति वफादार है या मालिक ही हमेषा ही तोतों का ध्यान रखेंगे । सोचिए .... तोतों को तो अपनी आधी जिंदगी कार्यालय रुपी पिंजरे में ही गुजारनी है । मालिकों का क्या है वे तो पांच-पांच साल में आते- जाते रहते है   । ये तोते गिरगिट की ही तरह रंग बदलना जानते है । इधर मालिक बदला और तोतों ने अपना रंग बदला । तोते आवष्यकता के अनुसार ही कभी हरे ,कभी नीले और भगवा रंगों में देखे जा सकते है । तोतों के उदघोष और कार्यकलाप भी मालिक के रंग में रंगे हुए होतं है । इधर मालिकों को भी मालुम है कि ये तोते केवल पांच ही साल के लिए उनकी कैद में है इसलिए इनके माध्यम से वो जो कुछ करा सकते है, कराते है । कुछ तोते र्इमानदार और बगैर मालिक के होने का भ्रम पैदा करते है । जब छोटे तोते बड़े तोते के सामने होते है तो बड़ा तोता उसे र्इमानदारी का पाठ पढाता है । इसी प्रकार का ज्ञान छोटा तोता भी अपने नीचे वालों को बांटता हुआ दिखता है । एक मजेदार बात और है कि आप सभी कार्यालय घूम आइए कोर्इ भी नहीं मानेगा कि वे किसी मालिक के तोते है । आप स्वयम भी अगर कार्यपालिका का किसी न किसी रुप में हिस्सा है तो शायद आप भी न मानें कि आप किसी के तोते हो और आपका कोर्इ मालिक है । अब आप याद करने की कोषिष करें कि आप अपने किसी काम के लिए किसके पास गए थे किसके माध्यम से किसे अपना मालिक बनाया था। आप को याद न आया हो तो थोड़ा याद दिला दूं कि आपके मालिकों में या तो चुने हुए नेता या नेता का चमचा या फिर आपसे बड़ा तोता भी आपका मालिक हो सकता है । मालिक वो जिसकी याद आप को अपनी सरकारी परेषानियों के साथ ही आती है।
               न्यायालय भी केवल तोतों और मालिकों की बात ही करता है आगे कुछ कहने से बचते हुए जाच एजेंसी की स्वतंत्रता के विषय पर आ जाता है । अब आप ही सोचें एक तोता अगर आजाद हो भी जाए तो फर्क क्या पड़ेगा ? करोड़ों तोते तो पिंजरे के बाहर निकलना ही नहीं चाहते और उनके मालिक भी उन्हें छोड़ना नहीं चाहते । तोतों और मालिकों के इस गठबंधन ने पूरे देष की आम जनता को ही पिंजरों में कैद कर दिया है । पिंजरों में कैद देष प्रगति कैसे कर सकता है ? यहां तो बस मालिकों को ही प्रगति का अधिकार प्राप्त है ।    अब ''हर शाख पे उल्लू के स्थान पर कहना होगा कि  ''हर शाख पे तोते बैठे है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा ?
                                                                आलोक मिश्रा

Friday, May 3, 2013

विज्ञपित वीर ( व्यंग्य )


विज्ञपित वीर
        भारत वीरों की धरती है । यहां सच्चे सपूत पहले सर कटा कर ,कालांतर में उंगली कटा कर शहादत देते रहे है । अब आपके हमारे आस-पास वीरों की एक नर्इ ही फसल  लहलहाने लगी है । ये है प्रचार वीर ,वो भी कुछ किए बिना । ऐसे वीर को विज्ञपित वीर कहा जाता है। हालाकि वीरों की इस प्रजाति पर अभी शोध की आवष्यकता है । सामान्य रुप से इन में भी बहुत से वाद अपवादों के साथ ही साथ वर्गीकरण मौजूद है । ऐसे विज्ञपित वीरों के स्थानीय पत्रकारों और संपादकों से इतने प्रगाढ़ सम्बन्ध होते है कि वे अक्सर देर रात किसी ढाबे पर हमप्याला दिखार्इ दे जाते है । इन विज्ञपित वीरों में खास और आम सभी वर्ग के लोग समिमलित पाए जाते है । बड़े नेताओं की तो छोड़ ही दीजिए ,उनकी रोजी-रोटी का तो जरिया ही विज्ञपित है । छोटे नेता,कर्मचारी नेता , अधिकारी, निठल्ले व्यापारी और तो और बहुत से बेरोजगारी भी विज्ञपित वीरों में शामिल है । कुछ बड़ें और प्रसिद्ध नेता, समाज सेवक और अधिकारी जो पहले विज्ञपितयां बाटते-बाटते इस हैसियत को प्राप्त कर चुके है कि वे आज पत्रकार वार्ता आयोजित कर सकें ; अब गाहे बगाहे पत्रकार वार्ता के द्वारा विज्ञपितयों का आदान- प्रदान करते है । इन्हीं में से कुछ लोग छोटे-छोटे मुददों पर अपनी राय फोन और चमचों के द्वारा जारी विज्ञपितयोंके माध्यम से सुर्खियों में बने रहने का प्रयास करते है।
          कुछ नीचे के स्तर पर अनेक लोग अपने थैलों और जेबों में विज्ञपितयां लिए घूमते रहते है । ऐसे लोग अपने आस-पास छोटी - बड़ी बैठकों,कार्यक्रमों और धरना प्रदर्षनों में बुलाने पर या बिना बुलाए भी अपनी उपसिथति दर्ज कराते रहते है । उनका प्रयास होता है कि उक्त कार्यक्रम की विज्ञपित में उनका नाम अंत में ही सही ''कार्यक्रम मे......... भी उपसिथत रहे ...या '' ......ने कार्यक्रम में सहयोग प्रदान किया ....जैसी पंकितयों में अवष्य ही छप जाए । वे इसके लिए सारी जोड़-तोड़ करते है । आयोजन के दौरान चार बार आयोजक से मिलते है , विज्ञपित लिखने वाले सज्जन को पान खिलाते है और फिर भी यदि नाम शामिल न हुआ तो समाचार पत्रों के दफतरों में जा कर जुड़वाने का प्रयास करते है । तब आप उनका नाम दूसरे दिन के समाचार में देख और सुन पाते है । वैसे देखा जाए तो उनका यह प्रयास किसी परम वीर योद्धा से कम तो नहीं लगता है ।
           हमारे एक विज्ञपित वीर को कैमरे के कोणों  का विषद ज्ञान है । वे हमेषा ही किरी भी आयोजन में ऐसे स्थान पर पाए जाते है जहां पत्र,पत्रिका या चैनल का कैमरा उन्हें देख ही ले । वैसे कभी -कभी ऐसा स्थान ग्रहण करने के लिए वे धक्का-मुक्की या गाली-गलौज जैसे प्रभावषाली शस्त्रों का प्रयोग करते हुए भी देखे जाते है । उनका शस्त्र प्रयोग समाचारों में हो या न हो पर अस्त-व्यस्त अवस्था में फटे कपड़ों के साथ प्रमुख व्यकितयों के पीछे सप्रयास मुस्कुराते हुए अवष्य ही वे दिख जाते है ।  उन्हें इस तरह की घटनाओं से और अधिक सकि्रय बने रहने की प्रेरणा ही मिलती है ।
         वैसे विज्ञपित वीरों के लिए यह भी आवष्यकता नहीं की कोर्इ बड़ा आयोजन ही हो ; वे तो रास्ता चलते ही समाचार गढते रहते है । एक मोहतरमा के गलत तरह से गाड़ी चलाने से एक युवक सड़क पर गिर पड़ा । मोहतरमा ने केवल उसे अपनी बोतल से पानी पिला दिया । बस साहब स्वयम जारी करवार्इ गर्इ विज्ञपितयों के माध्यम से उनकी तारीफों के पुल बांधे गए और वे समाज सेवी हो गर्इ ।  एक विज्ञपित वीर ने स्थानीय समाचार पत्र को फोन घन घनाया कि उन्हें पुत्र रत्न की प्रापित हुर्इ है। दूसरी तरफ पत्रकार मजा लेने के मूड़ में था बोला '' विज्ञपित भेज दो छाप देगें । दूसरे दिन के अखबार में छपा '' लल्लन जी को पुत्ररत्न की प्रपित हुर्इ ।........... इस पुनीत कार्य में पूरे मोहल्ले के लोगों ने सराहनीय सहयोग प्रदान किया । समाचार पढ़ कर लल्लन जी तो खुष हुए ही मोहल्ले वालों ने भी भरपूर आनन्द प्राप्त किया ।
            मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि  प्रचार पाने की चाहत में कुछ लोगों को छपास रोग हो जाता है जिसके साइड इफेक्ट के रुप में वे विज्ञपितयां लिखने लगते है । जो भी हो हमारे आस-पास ऐसे केमिकल लोचे के साथ अनेकों लोग घूम रहे है । वे आत्मसम्मान से जिए या न जिए समाज में सम्मान से जीते हुए दिखार्इ देते है । मेरा मन तो ऐसे परमप्रतापी , परमज्ञानी और सर्वव्यापी विज्ञपित वीरों को इन शब्दों से नमन करने  को  करता है
                 
                नमों नमों विज्ञपित वीरा ।
                तुम हरो सबहीं की पीरा ।।
      छपते रहना तुम को भावे
      फोटो भी चहुं ओर दिखावे
      वीडि़यो पर भी तुम छा जावे
      चारों ठाव है तुम्हरी क्रीड़ा
                नमों नमों विज्ञपित वीरा ।
                तुम हरो सबहीं की पीरा ।।
    जो कछु दिन छप न पावों
    हो अधीर उदास कहलाओं
    दूजे के कांधे तुम तोप चलाओं
   छपवे को तुम बहुत अधीरा
                नमों नमों विज्ञपित वीरा ।
                तुम हरो सबहीं की पीरा ।।
  जो संपादक नाम न छापे
  प्रेस पर रोज ही पड़े छापे
  बीबी भागे उसकी दूजा छापे
  संपादक हो जाए फकीरा
                नमों नमों विज्ञपित वीरा ।
                तुम हरो सबहीं की पीरा ।।
           सभी जोर से बोलो ... विज्ञपित वीरों की.......जय
     
                                    आलोक मिश्रा

Friday, April 19, 2013

HAIKU

                               गुरू    प्रेरणा
                                   
                                                           वंदन   तेरा    करूं
                                                              
                                                                                                           करूं     प्रणाम
              एक   सवाल
                              
                                                           ठेकेदार   कौन   है
                                  
                                                                                                     हुआ     बवाल
              गोरी   आती   है
                                      
                                                            यौवन    मधुरस
                                         
                                                                                               माया    लाती   है
             भूखा   गरीब
                                               
                           रोटी  के  लिए  लडा
                                                   
                                                 मौत    करीब
            जिन्‍दगी    मेरी
                  
                             कट  गई  यूहीं  तो
                                                             
                                                  लडते    हारी
 जिन्‍दगी यूहीं
कट गई मेरी तो
मिला न स्‍नेही
7
मधुशाला थी
पिया मधु कर्म का
पाठशाला थी
8
राजनीति में
दल पद नेता है
जोड तोड में
9
गुलाब बोला
सीखो कुछ कॉंटों से
मै  तो हॅुं भोला
10
चुनाव आए
अब नेता फिर से
दिखे टर्राए

11
ये मेघदूत
विरहणी नार का
है यमदूत
12
तारणहार
उर बसाएं राम
जीवन सार
13
आतंकवादी
समाप्त ही होनी है
तेरी आबादी
14
मॉंगे से नहीं
सम्‍मान मिलता है
बिना मॉंगे ही
15
फैलाते दंगे
राजनीतिबाज़ ही
लुच्‍चे लफंगे

16
भूखे व नंगे
मरते है दंगों में
हंसे लफंगे
17
तेरा मिलना
एक सपना ही है
अब अपना
18
एक सच्‍चा ही
काफी है हुजूम में
बने सिपाही
19
गॉंधी विचार
सत्य अहिंसा खादी
करो आचार
20
तेरे सहारे
चला था मै मगर
लूटा तूने ही

21
करे मुज़रा
नापाक गली बीच
पाक गजरा
22
महात्‍मा गॉंधी
जनता की अवाज
सच की आंधी
23
विदेश यात्रा
शासन की पूंजी में
हो भारी मात्रा
24
रंगीली नार
दे दर्शन दूर से
एडस की मार
25
हमारा प्‍यार
सहता ही रहेगा
जग की मार

26
थी वो बेचारी
असहाय निरीह
अबला नारी
27
बात हमारी
महल न अटारी
भूख बेगारी
28
विज्ञानलोक
सभ्‍यता का आईना
मिला आलोक
29
था मै अकेला
मिली सफलता तो
साथ था मेला
30
सब के बीच
अपनी ही सोचता
मै एक नीच
                                                               
31
सुबहा शाम
दीवाना हॅुं पागल
तेरे ही नामो
32
चॉंद चॉदनी
निराले साजन की
प्‍यारी सजनी
33
है  समाचार
बम धमाके से
मरे हजार
34
आतंकराज
बेगुनाहों को मारे
पाने ताज़
35
बॉस नाराज
गलती खुद की है
खुला जो राज़

36
हाथों की रेखा
बनाती तकदीरें
ऐसा भी देखा
37
तदबीर से
होता है और कुछ
तकदीर से
38
ब्रम्‍हण्‍ड झूमे
अपनी ही धुन में
दुनिया घूमें
39
नई उमंगें 
इठलाती बावली
युवा तरंगें
40
बनें खबरें
मरे दो या हजार
खूब अखरें

41
सांसदगण
करें वहीं वर्षों से
वृक्षारोपण
42
बना वो नेता
गुण्‍डा डाकू लफंगा
कल था दल्‍ला
43
वृक्ष बचाओ
रोको प्रदूषण को
पृथ्‍वी बचाओ
44
बनी योजना
घर भरे ठेके से
पुल न बना
45
चॉंदनी चीखी
रोई गिडगिडाई
किस्‍मत चूकी

46
शादी के नाम
दहेज में बिका वो
खुद के दाम
47
चॉंद की दीद
खुशियों की सौगात
मनाओ ईद
48
जवानी मस्‍त
अलसाई उदास
हो गई पस्‍त
49
सुरम्‍य वन   
निर्जन अनजान
अति सघन
50
सीता का दुख
स्‍वामी विमुख भए
कहॉं का सुख

51
गिरी दामिनी
सहमी भौच्‍चकी सी
डरी कामिनी

52
उम्र के साथ
अनुभव ही साथ
छूटे वो साथ
53
जीने की आशा
कराती रही










Wednesday, January 9, 2013