Wednesday, April 17, 2024

गरीबी और झूठ ( व्यंग्य )

     मंडी के पास एक हम्माल दीनू और ठेला चलाने वाला छोटू कुछ देर बैठे थे । दीनू बोला "आज तो मंडी में माल ही नहीं आया, काम है ही नहीं।  है ....कि ...नहीं ।" छोटू ने उसकी हां में हां मिलाई और बोला " आज तो मुझे भी कोई काम नहीं मिला ;न जाने आज क्या होगा? " दीनू सर हिलाते हुए बोला " होगा क्या..... जो कुछ घर में है घर में बचा हो, वह बच्चों का खिलाओ और खुद भूखे सो जाओ; हमेशा की तरह‌। है.... कि.... नहीं। " हाथ ठेले वाला सर तो  हां में हिला रहा था लेकिन उसकी आंखें अनंत में कुछ तलाश कर रही थी ।  वह धीरे से बोला "  सुना है. ... कहीं पांच रूपये में खाना मिलता है वह भी पेट भर । " दीनू हम्माल ठहाके के साथ बोल पड़ा " लो कल्लो बात पांच रूपय में खाना..... हा हा हा । तुम्हारा दिमाग तो ठीक है?  है.... कि.... नहीं।" छोटू भी अपनी बात पर अड़ गया " मैंने सेठ जी की दुकान में टी वी. पर ऐसा कुछ सुना था।" दीनू ने भी जमाना देखा था । वह समझाने पर उतर आया " पहली बात तो यह कि ऐसा हो नहीं सकता; दूसरे तुमने सुना ही है तो वह जरूर ही किसी नेता का भाषण होगा । है‌...  कि . ..नहीं ‌। " छोटू को अपने देखे पर विश्वास था । वह बोला " नहीं यार.... वो तो  चिल्ला-चिल्ला कर बोल रहा था ....दिल्ली में पांच रूपय  में भर पेट खाना । हम्माल बीच में ही बोल पड़ा "  तो खाना खाने दिल्ली चलें ?  है...  कि... नहीं । " छोटू खींझ कर बोला 
" सुनता वुनता तो है नहीं  । दिल्ली हम क्या जाएंगे  ? दिल्ली तो हम भेजते हैं ।  वे जरूर ही सस्ता में खाने के लिए चुनाव लड़ते होंगे है ! खैर.... टी.वी.  पर वह बोल रहा था मुंबई में बारह रूपय में खाना...... । "  अपने शहर का भाव बताया क्या ? "  दीनू बात काटते हुए बोल पड़ा । छोटू को लगा कि दीनू उसका मजाक उड़ा है,वो  तेज आवाज में बोला "  तेरे कूं तो मजाक लगता है तो चल सेठ जी से  पूछवा देता हूं । "  दीनू हम्माल फीकी सी हंसी के साथ हंस दिया और बोला " यार मैं और तू क्या मजाक करेंगे और क्या समझेंगे ? हमारा मजाक तो ये लोग ही उड़ाते हैं । है ...कि... नहीं । "  छोटू को कुछ समझ नहीं आया उसने पूछ लिया " वो कैसे ? " दीनू  की आंखों के सामने झोपड़ी दिखने लगी वह धीरे-धीरे बुदबुदाने  लगा " ये लोग कहते हैं कि हम गरीब लोग कम हो रहे हैं ।  है.... कि... नहीं ‌।  मुझे तो नहीं लगता जहां पहले दो झोपड़े थे वहां आज चालीस- पचास हैं । पहले शहर में दो भिखारी थे । अब गिनना मुश्किल है ...और ये  कहते हैं गरीब कम हो रहे हैं । है  ...कि ...नहीं।"  छोटू को अब कुछ समझ में आने लगा वो कैसे पीछे रहता हाथ मटका कर बोला  " यार तू सही कहता है, पिछली बार वो मुझे और मेरे ठेले के मालिक दोनों को ही गरीब कहते थे ‌। अब मैं गरीब नहीं हूं ...लेकिन वो गरीब है । "  हम्माल को उस पर तरस आने लगा वह बोला  " तेरे पास साइकिल है ...कि... नहीं  । छोटू ने जवाब दिया " है न कबाड़ेवाले  से ली थी  न यार .....‌ ।" दीनू समझदारों की तरह बोलने लगा  " जब तेरे घर सरकारी आदमी..... अरे यार तुम्हारे स्कूल के मास्टर जी आए थे तो तुमने सच ही बोला होगा। है... कि... नहीं । "  छोटू को तो अपनी सच्चाई और ईमानदारी पर बहुत ही नाज है बोला "  हां ...  कैसी बात करता है यार; हम और सच न बोलें । हम गरीबों के पास और है ही क्या ? " दिनू ठेंगा दिखाते हुए बोला " अब चाट अपने सच को .. । अब तू गरीब नहीं रहा ... । है ...कि... नहीं । "  ठेलेवाला छोटू बोला "  हां यार.. झूठ बोल देता तो आज मैं भी गरीब ही रहता । सच बोलने से तो कई गरीब अमीर हो गए होंगे... तो...तो  फिर जो बच गए वह कौन है यार ?है ... कि... नहीं ।  " छोटू जोर से हंसा और ताली ठोकते हुए बोला  "झूठे... हा हा हा...झूठे....हा हा हा ...। " दिनू अपना हिसाब- किताब लगाए जा रहा था  ।  धीरे-धीरे बोला  "अबे  तो फिर सब सच बोलने लगे तो देश में गरीबी नहीं रहेगी ! अबे यार देश अमीर हो जाएगा ....अमीर ...। है. .. कि... नहीं ‌ ।" उन्हें लगने लगा जैसे भी समस्या की जड़ में पहुंच गए । छोटू को देश की सोने की चिड़िया वाली बात याद आ गई । वह बोला " अब समझ में आया कि सोने की चिड़िया इन झूठ बोलने वालों के कारण उड़ गई है । तू क्या कहता है ?  देश की असली समस्या क्या है  झूठ या गरीब ?"।  दीनू दार्शनिक अंदाज में बोला " अबे हम क्यों देश के बारे में सोचें ? जब वह हमारे बारे में नहीं सोचता ।  हम गरीबों को मानव न मान कर एक संख्या माना जाता है  । फिर भी मुझे लगने लगा है ; असली समस्या की जड़ में तो वह भिखारी हैं जो हर पांच साल बाद हमारे दरवाजों पर भीख मांगने आ जाते हैं । असली गरीब तो वे ही हैं  । ....है ...कि... नहीं...। छोटू ने आते हुए ट्रक को देखा और बोला छोड़ यार माल आ गया चल कुछ काम धंधा कर लेते हैं ।
      आलोक मिश्रा "मनमौजी "

जुगाड़ ( व्यंग्य )

         अरे.....आप शीर्षक पढ़कर क्या सोचने लगे? चलिए तो फिर आपकी और हमारी सोच को ही आगे बढ़ाते हैं । हमारा समाज कुछ खास नियमों से चलता है। इन नियमों से हट कर यदि आपको कुछ करना हो तो करना होता है.. " जुगाड़" . . ।    गरीब हमेशा ही अपनी रोजी-रोटी के तो अमीर और पैसे के जुगाड़ में लगा रहता है । नेता वोट के, अभिनेता प्रसिद्धि के और बाबा लोग भक्तों के जुगाड़ में लगे रहते हैं ‌। देखा जाए आप और मैं भी कोई कम तो नहीं । आप इसी क्षण समय काटने के और मैं आपके द्वारा प्रशंसा के जुगाड़ में हूं । इस प्रकार हर कोई किसी न किसी जुगाड़ में लगा हुआ है ।
        इस शब्द के भाषाई विश्लेषण हेतु अनेकों भाषा शास्त्री एक दूसरे के बाल नोच कर और कपड़े फाड़ कर अपने वाद को भाषा के क्षेत्र में स्थापित करने और प्रसिद्धि पाने के जुगाड़ में हैं। यह भी अभी तक शोध का विषय ही है कि यह शब्द भाषा में पहले  आया या प्रयोग में ।
       अब भाषा के क्षेत्र में मेरे इस महान प्रयास के फलस्वरूप अनेकों लोग इस शब्द से जुड़े विषयों जैसे "शोध प्रबंधों में जुगाड़ की भूमिका"," हिंदी भाषा में जुगाड़ का महत्व" और "जुगाड़ू लेखन" आदि पर अपने  गाईड के घर की सब्जियां लाकर और बच्चे खिला कर डॉक्टर अवश्य बन जाएंगे । हमने सोलह कलाएं पढ़ी थी । उन कलाओं में जुगाड़ का उल्लेख भी नहीं था परंतु आज ऐसा लगता है कि इसे सत्रहवीं कला के रूप में मान्य करना ही होगा । इसे कला मान लेने मात्र से ही महामानव, सोलह कलाओं में निपुण कृष्ण से आज का आम आदमी एक कला आगे निकलता हुआ दिखाई देता है । खैर ....साहब सोलह कलाओं की बारीकियां कम ही लोगों को मालूम होगी लेकिन इस सत्रहवीं कला में तो बच्चा - बच्चा पारंगत दिखाई देता है। बीवी को साड़ी चाहिए ;जुगाड़ के लिए रूठ जाती है। पति भी मनाते हुए फंस जाता है । अब उसे भी पैसे का जुगाड़ करना होगा । वो दफ्तर में ही तो पैसे का जुगाड़ कर सकता है । दफ्तरों में भी भटकते, धक्के खाते और चप्पल चटकाते के लोग भी तो आखिर अपने - अपने कामों के जुगाड़ में होते हैं। इन सबके बीच बेचारा पति पैसों का और वे लोग अपने कामों का जुगाड़ बैठा ही लेते हैं । इस प्रकार आप समझ ही गए होंगे की जुगाड़ एक दूसरे से जुड़े होते हैं और पूरे भी होते हैं ।
      कुछ विघ्नसंतोषी लोग इस महति कला को  भ्रष्टाचार आदि नामों से जोड़कर देखते हैं लेकिन वह भूल जाते हैं कि इस कला ने ही तो हमें सामाजिक प्राणी बनाए रखा है । देखिए ना होली ,दिवाली जैसे समय पर बड़े - बड़े अफसरों को मिठाई आदि नहीं खरीदनी पड़ती  क्योंकि सारे जुगाड़ू महापुरुष अफसर के जुगाड़ को पूरा करने में अपना जुगाड़  पूरा होता देखते हैं  । ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएंगे जिन से जुगाड़ के कारण ही सामाजिकता का अनुभव होता है ।
       पिछले कुछ दिनों से हम एक बड़े देश से आर्थिक मदद लेने के जुगाड़ में थे । उनके बड़े नेताओं की खातिरदारी से आखिर जुगाड़ हो ही गया । बस फिर क्या था.... योजनाओं पर योजनाएं बनाई । इन योजनाओं के बहाने सब अपने-अपने जुगाड़ में लग गए  । नीचे बैठे गरीबों को लगा उसका भी जुगाड़ हो ही जाएगा  । बस इस तरह जुगाड़ के चलते ही पराया माल पूरा ही बट गया । ऊपर से लेकर नीचे तक चलने वाले इस अर्थशास्त्र  में जुगाड़ की भूमिका को नकार दें ऐसे निकम्मे को कोई भला अर्थशास्त्री कैसे कह सकता है ? 
      पिछले कुछ समय से देश की जनता कुछ अजीब मूड में है । वह किसी एक पार्टी को बहुमत देने से कतराती है । बस फिर क्या था सब नेता अपनी डफली अपना राग के तर्ज पर छोटी-छोटी पार्टियों में बंट गए लेकिन सरकार में बने रहने के जुगाड़ के साथ । इस प्रकार सरकारें भी जुगाड़ के भरोसे ही बनने लगी । अब नेता एक दूसरे के केवल और केवल जनता के सामने विरोधी दिखाई देते हैं । अब जुगाड़ूओं के दल मिलकर ही सरकार चलाते हैं जो जुगाड़ नहीं कर पाते वे सार्थक विपक्ष की भूमिका निभाते हैं । संसद में लड़ने झगड़ने के साथ ही साथ सड़कों पर धरने और  प्रदर्शन और आंदोलन करते रहते हैं । जब सरकारें ही जुगाड़ से चलने लगी हो तो राजनीति के क्षेत्र में इसके महत्व को नकारना नामुमकिन हो जाता है । 
      विज्ञान के क्षेत्र में केवल और केवल जुगाड़ का ही एहसानमंद होना चाहिए । आज विज्ञान की सारी प्रगति इंसानी जुगाड़ का नतीजा है । हमें जब भी कोई कमी महसूस हुई ,उसके जुगाड़ के लिए हमने अपने ज्ञान का प्रयोग किया । जुगाड़ करते - करते अब हम मंगल पर जाने का जुगाड़ करने में लगे हुए हैं । इस महत्वपूर्ण शब्द को अभी तक उपेक्षा ही झेलनी पड़ी है इसलिए वैज्ञानिक  सम्मान का और जुगाड़ू होना हिकारत का प्रतीक है । इस क्षेत्र में प्रयास करके आम जनता का इसमें कौशल विकास करना समाज के हित में ही होगा क्योंकि  अब समाज पढ़े-लिखे प्रतिभा संपन्न लोगों से अधिक जुगाड़ुओं की ओर देखता है । जुगाड़ू लोग ऊंचाइयां छूते हैं और प्रतिभाएं चप्पले चटका की घूमती हैं । आपको एक नेक सलाह दूं क्या  ? यदि आप भी प्रतिभावान हैं जैसा कि आप अपने आप को समझते हैं तो प्रतिभा को जुगाड़ के क्षेत्र में लगा कर देखिए... और फिर देखिए आप कहां से कहां पहुंचते हैं । आप कहीं भी हो इस मित्र को मत भूलिएगा कभी हमारे जुगाड़ भी एक दूसरे से पूरे हो सकते हैं ।
     आलोक मिश्रा "मनमौजी" 

ईमानदारी का कीड़ा

      हमारे आस-पास सामान्य लोगों की संख्या बहुत अधिक है । आज के समय में सामान्य वही है जो खुद खाता है औरों को खाने देता है। ले- दे के अपने और दूसरों के काम-काज निपटाना ही सामान्य व्यवहार है । बहुत ही थोड़ी संख्या में ही सही हमारे आसपास ईमानदार  के कीड़े से ग्रस्त बीमार लोग दिखाई देते रहते हैं । ऐसे लोग समाज, राजनीति और अर्थशास्त्र को बहुत बुरी तरह से प्रभावित करते हैं । ऐसे ही लोगों के कारण कुछ अच्छे लोगों को अनावश्यक रूप से जेलों में रहने के लिए विवश होना पड़ता है । ऐसे ही लोगों के कारण अक्सर अच्छी-खासी कुर्सियों से कुछ लोगों को हाथ धोना पड़ता है । ऐसे ही बीमार लोगों के कारण देश और विदेश की जनता को सत्ता के गिर जाने के कारण चुनाव जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है ।  इस भयानक बीमारी को लेकर बड़े-बड़े नेताओं ,अधिकारियों और उनके दलालों में चिंता व्याप्त है ।
     अभी-अभी विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त खबरों के अनुसार, वैज्ञानिकों ने भी इस रोग पर चिंता व्यक्त की है । उन्होंने यह निर्णय लिया है कि चेचक, पोलियो और मलेरिया की ही तरह ईमानदारी नामक इस रोग का उन्मूलन आवश्यक  है  । आज  मानव सभ्यता के विकास के लिए यह आवश्यक है कि प्रगति के पथ पर हम और आप  ईमानदारी नामक रोग से मुक्त होकर आगे बढ़े । वे इस रोग का टीका खोजने का प्रयास कर रहे हैं । वैसे जब तक वे ईमानदारी का टीका खोज नहीं लेते, तब तक हमें और आपको ईमानदारी के लक्षण वाले लोगों से सावधान रहने की चेतावनी दी गई है ।
     वैसे यदि इस रोग के इतिहास में जाएं तो पिछली शताब्दी में यह रोग महामारी की तरह फैला हुआ था परंतु न जाने कैसे इस के कीड़े कुछ कम सक्रिय हो गए । अब इस रोग के रोगी बहुत ही कम संख्या में हैं । पिछली शताब्दी में चूंकि यह सभी ओर फैला हुआ था इसलिए इससे ग्रसित व्यक्ति सामान्य ही माना जाता था। इसी कारण इसे रोगों की सूची में स्थान प्राप्त नहीं हो सका । अब क्योंकि ऐसे लोगों के कारण देश को प्रति वर्ष करोड़ों रुपए की हानि उठानी पड़ती है ;साथ ही अक्सर ही कार्यालयों में ऐसे लोगों के द्वारा शासकीय कार्य के बाधित होने से  रोग की भयावहता का अंदाज होता है।
       इस रोग के मुख्य लक्षण के रूप में रोगी का फटेहाल दिखाई देना ।अपने आप को सच्चा समझना । बात-बात पर नियमों और कानूनों का हवाला देना और किसी भी शासकीय  कार्य के मुफ्त में होने का दावा करना ।  ऐसे रोगी अक्सर लड़ते - झगड़ते हुए पाए जाते हैं  । ऐसे रोगियों को उनके यार -दोस्त ,नाते -रिश्तेदार और परिवार के लोग भी पसंद नहीं करते । जब यह रोग प्रारंभिक अवस्था में होता है तो वे केवल सच्चाई का और ईमानदारी का भाषण करने लगता है । दूसरी अवस्था में ऐसे रोगी स्वयं का अहित करते हुए सब काम ईमानदारी से करने का प्रयास करते हैं । इससे वे स्वयं को अपने और अपने समाज से काट लेते हैं और कभी कभी तनावग्रस्त हो जाते हैं । तीसरी और अंतिम अवस्था में ऐसा रोगी इस रोग को और फैलाने का संकल्प लेते हुए पूरे समाज को बदलने का प्रयास करने लग जाता है  । इस समय रोगी अपने दुश्मनों की संख्या बढ़ाने लगता है । जब लोग उसे समझाते तो उसे धमकी समझ कर और हट पर उतर आता है । इस तरह देखा जाए तो ऐसे लोग घोषित और अघोषित तरीके से आत्महत्या करने पर उतारू हो जाते हैं ।
      वैसे तो यह रोग अक्सर वंशानुगत ही होता है परंतु कभी-कभी कुछ सामान्य लोगों के परिवार में भी ऐसे बच्चे पैदा हो जाते हैं । कभी-कभी ना जाने किन कारणों से इस रोग से अचानक ही कुछ लोगों को ग्रस्त होते देखा गया है  । इस संबंध में कुछ लोगों का मत है कि हमारे आस पास कोई इमानदारी का कीड़ा पाया जाता है, जिसके काटने से यह रोग अचानक उत्पन्न हो जाता है । अभी तक ऐसे किसी कीड़े को खोजा नहीं जा सका है । यह रोग वैसे तो संक्रामक नहीं है लेकिन यदि ऐसे रोगियों की संगत अधिक समय तक की जाए तो यह रोग आपको भी छूत की बीमारी की तरह लग सकता है । कुछ ऐसे मरीज हैं जिनमें कभी तो इस रोग के लक्षण दिखते हैं और कभी एकदम गायब हो जाते हैं । ऐसे लोगों के बारे में यह कहना कठिन होता है कि वे रोग ग्रस्त है भी या नहीं । शोध करने पर ज्ञात हुआ कि इन मरीजों के व्यवहार के लिए उनकी कुर्सी में भेद छुपा है । मौका मिलते ही ये लोग सामान्य और बाकी समय रोगी बने रहते हैं । इनके विषय में यह कहना कि वह वास्तव में ईमानदारी के कीड़े से ग्रस्त हैं या नहीं कठिन हो जाता है । पिछले कुछ समय से सामान्य लोगों द्वारा भी इस रोग के रोगी होने का दिखावा करने का फैशन निकला है । नेता ,अधिकारी और कर्मचारी अक्सर ही इस रोग से ग्रस्त होने का दिखावा करते हैं लेकिन हद तो तब हो जाती है जब पुलिस वाले भी इस रोग के रोगी होने का दिखावा करने लगते हैं । इन मिलावटी मरीजों के कारण ही असली मरीजों को खोज पाना और कठिन हो जाता है । इस रोग से पूरी तरह मुक्ति पाने के लिए आज -कल असली रोगियों की खोज की जा रही है।  कुछ का इलाज तो हो सकता है लेकिन जो लाइलाज हैं उन्हें लोक कल्याण के लिए बलिदान कर दिया जाता है । इन रोगियों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा । एक दिन अवश्य आएगा जब मानवता ईमानदारी के रोग से पूरी तरह मुक्त हो जाएगी और इन लोगों को याद करेगी । अब समय आ गया है कि इस रोग और इसके कीड़े को जड़ से नष्ट कर दिया जाए अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब देश का अर्थशास्त्र जाए तेल लेने.... ‌ हमारे घरों का अर्थशास्त्र अवश्य बिगड़ जाएगा। वह दिन दूर नहीं जब हमें मजबूरन ही सही सारे काम इमानदारी से करने पड़ सकते हैं । अब हमें अपने भविष्य की चिंता है तो सबको मिलकर इस रोग और इस के कीड़े को नष्ट करने के प्रयास में लग जाना चाहिए यदि हम यह करने में सफल होते हैं तो कह सकेंगे कि हम सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे हैं ।
      आलोक मिश्रा "मनमौजी"