Monday, June 28, 2021
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Monday, June 21, 2021
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Saturday, June 12, 2021
अभी तो ये अंगड़ाई है ....( व्यंग्य )
अभी तो ये अंगड़ाई है ....
एक दिन शहर की एक रैली में लोग जोर-जोर से नारे लगा रहे थे ‘‘ अभी तो ये अंगड़ाई है.....आगे और लड़ाई है ।’’ सड़क के किनारे एक दुकान पर उतनी ही जोर से गाना बज रहा था ‘‘ अंगड़ाईयाॅं लेती हूॅं जो मैं जोर-जोर से ......।’’मैं सोचने लगा कि किसकी अंगड़ाई पर कंसन्ट्रेट करुॅं ? मेरे बुद्धिवादी होने के भ्रम के कारण मेरा ध्यान रैली की ओर मुड़ गया । हम और आप बचपन से ही राजनैतिक,सामाजिक,मजदूर और कर्मचारी आंदोलनों के समय नारा ‘‘ अभी तो ये ....’’ सुनते आ रहे है । हम तो बचपन से जवान हो कर बुढापे की ओर कूच भी करने लगे और वे है जो तब से ले कर आज तक अंगड़ाईयाॅं ही ले रहे है । हम इतिहास को बनते देखने के लिए दम साधे बैठे है कि बस लड़ाई अब शुरु हुई कि तब शुरु हुई । वे है कि लड़ाई- वड़ाई करते ही नहीं ।
नारा वीर आंदोलनकर्ता हमेशा ही धमकियों से भरे हुए नारों का प्रयोग बमों और मिसाइलों की ही तरह करते है । ये सारे नारे आपने कभी न कभी तो अवश्य ही सुने होगें जैसे - ‘‘ जो हमसे टकराएगा ... मिट्टी में मिल जाएगा ’’, ‘‘हमें नहीं तो तुम्हें नहीं .... चैन नहीं आराम नहीं ’’,‘‘माॅंग हमारी पूरी होे....... चाहे जो मजबूरी हो ’’, ‘‘जो हिटलर की चाल चलेगा..... वो कुत्ते की मौत मरेगा’’ । इनके अलावा वे बीच-बीच में अपनी एकता को भी जिन्दाबाद करते रहते है । ऐसे स्थानों पर नारे लगाने में विशेषज्ञता रखने वालों की पूछ-परख अधिक ही होती है । ये विशेषज्ञ भी अपनी पूरी प्रतिभा,लगन और खास स्टाइल के साथ नारे लगवा कर अपनी विशेषज्ञता का प्रर्दशन करते है। ऐसे ही एक विशेषज्ञ एक खास नारा ‘‘कर्मचारी एकता ....’’ अपने विशेष अंदाज और स्वर में लगाते तो सुनाई देता ‘‘ चाय गरम समोसा ....’’ बाकी लोग जोर से साथ देते ‘‘.... जिन्दाबाद .. जिन्दाबाद ’’ । नारे लगाने वाले भी अलग- अलग प्रकार के होते है । कुछ अतिउत्साहियों को लगता है कि इधर जोर से नारा लगाया और बस मांग पूरी हुई । ऐसे लोग अपनी मांग पूरी करवाने के लिए महिला हो या पुरुष पूरा जोर लगा कर नारे लगाते है। कुछ लोग तो बस दूसरों को दिखाने के लिए ही नारे लगाते है ; दिखावा बंद तो नारे भी बंद । कुछ तो इतनी बार अंगड़ाईयाॅं ले चुके होते है कि उनके लिए लड़ना तो दूर नारा लगाना भी भारी पड़ता है । यह पूरा का पूरा समुदाय दो प्रकार के लोगों का होता है । एक हाथ लहराते या नमस्कार की मुद्रा के नेता या नेता जैसे लोग ; दूसरे उनके पीछे चलते नारे लगाने वाले लोग ।
प्रश्न वहीं का वहीं है कि ये आंदोलन कर्ता केवल अंगड़ाईयाॅं ही क्यों लेते रहते है ?
आप तो जानते ही है कि हम जहाॅं है जो कर रहे है उसमें कुछ न कुछ समस्याऐं जरुर है यदि समस्याऐं न भी हों तो कुछ तो ऐसा है जिसे हम पसंद नहीं करते । हमारी इसी मानसिकता के चलते आंदोलन , धरने और प्रर्दशनों को आधार प्राप्त होता है । ऐसे में कुछ लोग हमारी भावनाओं को बल देकर नेता बन जाते है । कभी-कभी नेता उसी समुदाय का होता है जिसकी समस्या है । अक्सर तो नेता न जाने कैसे, क्यों और कब बाहर से आकर समूह का नेता बन जाता है । इसके उदाहरण के लिए अपने आस-पास नजर दौड़ा कर देखें तो आपको मजदूर संगठन के नेता के रुप में कर्मचारी और कर्मचारी संगठन के नेता के रुप में राजनैतिक व्यक्ति दिखाई दे जाएंगे । ऐसे नेता मांग करने वालों और मांग पूरी करने वालों के बीच हमेशा ही संपर्क में रहते है । वे अक्सर तो इन दोनों के बीच अपने दलाली के धंधे को चलाते हुए ही दिखाई देते है । उन्हें जब भी ऊपर वालों से कुछ घोषणा के संकेत प्राप्त होते है तो उनका दिल नेतागिरी चमकाने की नियत के साथ अंगड़ाईयाॅं लेने का मचलने लगता है । बस वे ढेर सारी मांगों के साथ अंगड़ाईयाॅं लेने लगते है । बस सधे-बधे तरीके से दो-चार मांगे पूरी होने का दिखावा हो जाता है और अंगड़ाई से लड़ाई टल जाती है ।
चुनाव के पहले कुछ सोए और कुछ कब्र में गड़ें संगठन भी अचानक ही अंगड़ाई लेने लगते है । ऐसे समय देने वाले मजबूर और लेने वाले बिना लड़े केवल दिखावे से मिलने की अपेक्षा रखते है । इस आंदोलन या अंगड़ाई के मंचन मात्र से दो पक्षों के रिश्ते मजबूत होते ही है उनका महत्व भी बढ जाता और नेतागिरी भी चमक जाती है । अब तो स्थिति इतनी खराब है कि अपने वेतन ,भत्ते और मजदूरी के लिए भी अंगड़ाई लेने की चेतावनी देनी पड़ सकती है । चूंकि इस तरीके से देने वाले का महत्व भी बढता है इसलिए कुछ समय बाद कोई भी किसी को कुछ भी तभी देगा जब वो अंगड़ाई लेने की धमकी देगा ।
नारे लगाना हमारा राष्ट्रीय गुण होता जा रहा है । हम विश्व में नारे लगाने और बनाने में सबसे आगे है । अभी अनौपचारिक रुप से स्कूल और काॅलेजों में समय-समय पर नारे लगाने का प्रशिक्षण दिया जाता है । हमारे छात्रों को रैलियों की प्रेक्टिस भी बचपन से ही करवाई जाती है । हो सकता है भविष्य में इन्हें पाठ्यक्रम में शामिल ही कर लिया जाए । अब तक राजनैतिक लोग समाज के नारे लगाने और आंदोलन करने जैसे गुणों का उपयोग अपने हित में करते रहे हैं । अब लोग उन्हें धमकियाॅं देने लगे है तो वे संवैधानिक पदों की आड़ में छुपे-छुपे फिरते है ।
अब आप अंगड़ाई वाला गाना और नारा साथ -साथ सुनें तो मेरे समान भ्रमित न हो और बुद्धिवादी बनने की कोशिश न करे । गाने पर कंसन्ट्रेट करे कुछ मनोरंजन तो हो ही जाएगा । बेवकूफ बनने से अच्छा तो मनोरंजन करना हो ही सकता है ।
आलोक मिश्रा
Thursday, June 10, 2021
गरीबी सम्मेलन
Wednesday, June 9, 2021
भैंस की उड़ान ( व्यंग्य )
Monday, June 7, 2021
कोई समाचार नहीं...(व्यंग्य )
Saturday, June 5, 2021
नो गधा बनाइंग ( व्यंग्य )
Thursday, June 3, 2021
समाज सेवक जी ( व्यंग्य )
"समाज सेवा का मजा मेवा जिसने चखा, उसकी जिंदगी धन्य हो गई।" यह वाक्य हमारा नहीं मेवालाल जी का है। मेवालाल वैसे तो एक व्यापारी हैं लेकिन उन्हें सब लोग समाज सेवक के नाम से जानते हैं। मेवालाल ऐसी सभी जगह पर पाए जाते हैं ,जहां सेवा करने का कोई अवसर हो । वे कभी सड़क पर पानी पिलाते पिला रहे होते हैं , कभी दरिद्र नारायण का भोज करा रहे होते है और कभी सार्वजनिक कार्यक्रमों में पत्तलें उठा रहे होते हैं। उनको देख कर कभी ऐसा नहीं लगा कि उनकी सेवा में कोई स्वार्थ हो सकता है । वैसे शहर के नेता हमेशा ही उन से आशंकित रहते हैं । छुटभैया नेता अक्सर उन्हें या तो सेवा के अवसर से वंचित रखना चाहते हैं या फिर सेवा के बाद उनका गुणगान न हो इसलिए अपने नामों को आगे बढ़ाते हैं ।
मेवालाल ठहरे सीधे और सरल आदमी । उन्हें तो बस अपने कर्मों पर विश्वास है । उनके लिए तारीफ और निंदा कोई मायने नहीं रखती। एक दिन उनके मन में ख्याल आया क्यों न गरीब कन्याओं का सामूहिक विवाह करवाया जाए ? अपने इस विचार को अमलीजामा पहनाना चाहते थे । ये उनके अकेले के बूते की बात तो थी नहीं ,सो वे आस-पास के नेताओं, अधिकारियों और तथाकथित सामाजिक संगठनों से संपर्क करने लगे। वे सुबह -सवेरे ही एक नेता जी के घर पहुंच गए । नेता जी मन ही मन बुदबुदाए" आ गया ....समाज सेवक कहीं का .....। " प्रगट में मुस्कुराते हुए बोले "अरे भाई मेवालाल जी सुबह-सुबह दर्शन देकर हमें धन ही कर दिया। मेवालाल बोले "आप तो शर्मिंदा कर रहे हैं । दरअसल हम कुछ काम लेकर आए थे । नेताजी बुदबुदाए "अब आया ऊंट ...पहाड़ के नीचे ।" परंतु उनके मुंह से उच्चारण निकले " हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं ? " मेवालाल जी ने अपनी योजना बता डाली। नेता जी धीरे से बोले " काम तो अच्छा है . ...लेकिन इससे हमें क्या लाभ होगा ?" मेवालाल जी को इस जवाब की आशा नहीं थी । वे बुदबुदाए "लाभ....?" और बोले " सेवा और लाभ का क्या संबंध है?" नेता जी बोले "देखिए ... आपको तो समाज सेवा का कीड़ा है
लेकिन हम लोगों को राजनीति देखनी होती है। अभी तो चुनाव को भी बहुत समय है और इसमें कोई आर्थिक लाभ भी तो नहीं है ।" मेवालाल को लगा इन तिलों से तेल नहीं निकलने वाला । बस वे वहां से खिसक लिए फिर भी कई नेताओं से मिले । नेताओं को ऐसे कार्यों में चुनाव के दूर होने के कारण कोई रुचि नहीं थी । कुछ ने कहा "आप आगे बढ़ो हम दो-चार हजार की मदद कर दे ।" एक-दो छोटे नेताओं ने इसे चंदे की अच्छी योजना के रूप में देखा और मेवालाल को सेवा का मेवा बांट कर खाने की भी सलाह दे डाली ।
अब मेवालाल ने अधिकारियों की ओर रूख किया । कुछ ने उनके काम में अरुचि दिखाई । कुछ ने दिखावटी रुचि के साथ इस काम में सहयोग के नाम पर इस योजना के अर्थतंत्र को समझने का प्रयास किया । कुछ ऐसे थे जो अपनी सरकारी नौकरी का हवाला देकर कन्नी काट गए । एकाध को लगा मेवालाल छुटभईया पत्रकारों की भांति उनसे चंदा वसूलने आए हैं । उन्होंने सीधे पूछ " लिया आप कितना चंदा चाहिए? " कुछ लोगों ने पूछा " आप किस पार्टी से हैं ? " मेवालाल को लगने लगा कि ये किसी मकड़ी के जाले में उलझते जा रहे हैं । जितने अधिकारी उतने बातें शर्मा जी बोले " मेवालाल जी आपके इस काम के लिए बड़ा पर चंदा चाहिए । हमारी सीट तो कमाई वाली है नहीं । आप वर्मा जी के पास क्यों नहीं जाते ?" वर्मा जी बोले " देखिए हमने मंत्री जी को लंबा पैसा दिया है तब यह सीट मिली है । नेताओं ,पत्रकारों और ऊपर के अधिकारियों का हिस्सा निकालकर हमारे पास शर्मा जी से कम बचता है । आप शर्मा जी के पास क्यों नहीं जाते ? " एक अधिकारी तो गिड़गिड़ाने लगे " मेवालाल जी आपका परिचय तो ऊपर तक होगा । हमारा स्थानांतरण करवा दीजिए । हम आपकी योजना और आपकी पूरी सेवा के लिए तैयार है । " मेवालाल ऑफिसों में घूमती फाइल की तरह इधर से उधर भटकते रहे । वे निराश होने वालों में से तो थे नहीं । उन्होंने सोचा शायद कोई समाज सेवी संगठन इस काम के लिए आगे आए । अब ऐसे संगठनों के स्वयंभू अध्यक्षों और सचिवों से मिलकर अपनी योजना समझाने लगे एक अध्यक्ष ने पूरी योजना ध्यान से सुनी फिर बोले " मेवालाल जी बजट बनाया है क्या ? मेवालाल जी ने "न " में मुंडी हिला दी । वे बोले " खैर .... बजट कुछ भी हो हम अपने लोगों को दोगुना करके बता देंगे । बस शहर भर में चंदा होगा । आयोजन की सफलता की गारंटी हमारी । मुख्य अतिथि भी हमारे नेता जी होंगे । अधिकारी कर्मचारियों की तो आप हम पर छोड़ दो इनकी तो हम नस-नस से वाकिफ है । बस आप यह बताओ आप क्या करना चाहते हो । मेवालाल जी बोले "सामूहिक विवाह.....।" अध्यक्ष बोले "अरे...आप समझे नहीं इस सेवा के मेवे के रूप में आपको क्या चाहिए?" मेवालाल उनका मुंह देखते रहे । बाकी अध्यक्ष और सचिव इस काम के लिए तैयार थे लेकिन अपने-अपने अर्थशास्त्री विवेचना के साथ किसी को पद की, किसी को मान की और किसी को माया की बिसात पर ही सेवा दिख पा रही थी । मेवालाल की सेवा के इस कुरूक्षेत्र में अपने आप को अकेला पा रहे थे । हर किसी को सेवा के लिए मेवा चाहिए । समाज में कोई भी किसी भी काम को शायद निस्वार्थ भाव से करना भूलता जा रहा है । अब जब दो व्यक्ति मिल रहे होते हैं तो वास्तव में वह दो व्यक्ति न हो कर दो स्वार्थ होते हैं जो अपनी अपनी भाषा में अपने ही लिए काम कर रहे होते हैं । इन परिस्थितियों में मेवालाल जैसे लोगों को भी शक की नजरों से न देखें तो क्यों ?
आलोक मिश्रा " मनमौजी"
Wednesday, June 2, 2021
फाईल दौड़ (व्यंग्य)
फाईल दौड़
हमारे बाबू साहब अपने ऑफिस में बैठे पान की जुगाली कर रहे थे कि बस अचानक चार फाईलें में अपने आरंभ स्थल यानी स्टार्टिंग प्वाइंट यानी टेबल पर पहुंचकर स्थान लेने लगी। शाम होते ना होते फाईलें वार्म अप होकर दौड़ के लिए तैयार होने लगी । फाईलों को लग रहा था कि यह एक साधारण दौड़ है जिसमें अपनी दौड़ को समाप्त करके अपने लक्ष्य तक सामान्य तरीके से पहुंच जाएंगी । इन फाईलों को यह नहीं मालूम था की टेबलों के दूसरी ओर बैठे हुए उतने सज्जन नहीं है ,जितने भी दिखाई देते हैं । ये सारे महाशय फाईलों को दौड़ाने नहीं रोकने में माहिर है । बाबू साहब ने शाम होते ही सारी फाईलों को बांध कर रख दिया ।
दूसरे दिन बाबू साहब काम ना होने के कारण बोर हो रहे थे । इस पूरे बोरियत को दूर करने के लिए वे दो बार पान दुकान के चक्कर लगा आए है । उसने सोचा चलो इन बंधी फाईलों को देखा जाए । अब उन्हें फाइलों में चेहरे देखने लगे । पहली फाईल उठाई तो उसमें उन्हें कुर्ता और धोती पहने सर पर गमछा बांधे झुर्रियों से भरा दीन-हीन सा चेहरा हाथ जोड़ता हुआ सा महसूस हुआ । बाबू साहब जानते हैं कि ऐसे हाथ जोड़ने वाली फाईलों का क्या होता है । दूसरी फाईल में उन्हें आप जैसा एक मध्यमवर्गीय चेहरा दिखाई देने लगा । आपका चेहरा जब भी बाबू साहब देखते हैं वे जानते हैं कि आप अपने छोटे-मोटे काम तो परिचय और बड़े लोगों के संपर्क की ड़ींगों के आधार पर करवाने का प्रयास करते हैं । उसके बाद कुछ रुपए पैसे की बात करते हैं । कुछ तो ईमानदारी का पुतले बन कर लड़ने -झगड़ने और शिकायत वगैरह पर उतारू हो जाते हैं, वैसे इन सब से ना तो फाईलें दौड़ती हैं और ना आज दौडेंगी ।
तीसरी फाईल का पेट कुछ मोटा सा है ;हाथ में सूटकेस और टैब है । यह सब ठेकेदार सा ठाठ लगता है। इस फाईल को अधिक रोका नहीं जा सकता । हां यह जरूर है कि इस फाईल के एक-एक दिन की कीमत अच्छी होगी । बाबू के मुंह से निकल निकल ही गया "यह तो काम की चीज है ।" चौथी फाईल को छूते ही वे झटका खा गए ,उन्हें तो बस चक्कर ही आ गए । फाईल का चेहरा देखकर कांपने लगे । उन्हें अब लगने लगा कि कल इसको ना देख कर बहुत बड़ी गलती हो गई। बिना कुछ बोले और देर किए फाईल के साथ मझोले बाबू के पास पहुंचे फाइल को दिखाते हुए बोले "क्या करते हो यार.... इतनी देर कर दी; अभी ही मंत्री जी का फोन बड़े साहब को आया था और हां और ठेकेदार वाली फाइल भी जल्दी कर देना ।"
लो साहब फाईलों की दौड़ प्रारंभ हो गई । कुछ फाईलें अभी भी प्रारंभ स्थल पर और कुछ फर्राटा दौड़ लगाने लगी । नेताजी की फाईल शाम होते ना होते चार-पांच टेबल पार कर बड़े साहब की टेबल पर थी । ठेकेदार की फाईल अब छोटे साहब के पास है । आप पाठक याने मध्यम वर्ग की फाईल आवक -जावक पार कर पाई है । बेचारी फाईल अभी भी वही पड़ी है ।
धोती कुर्ते वाले बुजुर्ग कुछ दिनों से रोज ही दफ्तर आते हैं । उनके सामने उनकी फाइल ढूंढी जाती है । फाईल है कि मिलती नहीं । वे बेचारे चले जाते हैं । फाईल अभी भी वहीं है पहली टेबल की दाहिनी दराज में । नेताजी वाला काम तो तीसरे दिन ही हो गया लेकिन नेताजी नाराज हैं । वे कहते हैं "बताइए हमारे काम को तीन दिन लग गए ये लोग आम जनता को कितना परेशान करते होंगे।" नेताजी के ऑफिसिया चमचों ने छोटे बाबू पर देर होने का दोष माढ़ दिया और बताया कि उसने एक दिन फाईल अपने पास रखी थी । उस छोटे बाबू की तो शामत आ गई अब वह अपना स्थानांतरण रुकवाने के लिए रोज ही नेता जी के पैर छूता रहता है।
ठेकेदार को कोई जल्दी और कोई देर का सवाल नहीं था। एक दिन कार से सीधा ऑफिस पहुंचा छोटे ,मझोले और बड़े जितने प्रकार के बाबू होते हैं से मिला। मिलना क्या लिफाफे थे और कुछ मिठाइयां डिब्बे सबको खैरात सा बांटता जा रहा था। उसके सामने सब भिखमांगों की तरह खड़े थे। यह सब उसने ऑफिस के छोटे ,मझोले और बड़े साहबों के साथ भी किया । जाते-जाते उसने पूछा "कब आऊं?" बड़े साहब बोले "अरे आपको तकलीफ करने की जरूरत नहीं है। हम तो दो-तीन दिन में कागज पहुंचा देंगे ।"
अब साहब एक फाईल जो मिलती ही नहीं और दूसरी है जिसमें लगातार आपत्तियां लगाई जाती है । एक दिन कहा गया एक कागज कम है। अगले दिन बताया यहां "का" के स्थान पर "की" होना चाहिए । आदि ....आदि.... इस दौड़ को प्रारंभ हुए बहुत समय हो गया । दो फाईलें दौड़ खत्म कर आराम कर रही है । वो बुजुर्ग जब भी आता है उसकी फाईल खोजी जाती है या खोजने का नाटक किया जाता है । आप मध्यम वर्ग की फाईल कछुए की गति से अभी भी दौड़ में शामिल है । जब उसके सारे "का" और "की" समाप्त होंगे तब वह अपने लक्ष्य पर पहुंचेगी लेकिन "का" और "की" है कि खत्म होने का नाम ही नहीं हो रहे । अब आप या मैं परेशान होकर क्या करते हैं ? बस फाईल के पीछे उस मध्यमवर्ग ने भी शिकायत का सहारा लिया । आफिस में शिकायत की फाइल पहले वाली फाइल से भी मोटी हो गई। वह मध्यमवर्गीय चेहरा बड़ा ही ठीढ़ है । अब वह धरना ,आंदोलन और भूख हड़ताल जैसी धमकियां देने लगा है । ऑफिस के अंदर बैठे लोग जानते हैं कि इन हथकंड़ों से कितना काम बनता है और कितना बिगड़ता है । ये सब अभी जारी है और रहेगा । कई छोटे, मझोले और बड़े बाबू और साथ ही साथ छोटे ,मझोले और बड़े साहब मुझसे नाराज हैं । आखिर मेरी हिम्मत कैसे हुई उनके इस पुनीत कर्म को सार्वजनिक करने की । अब देखना होगा कि मेरी कोई फाईल कैसे दौड़ती है ?