Monday, June 28, 2021

हिन्दी या हिग्लिश

        हिन्दी या हिग्लिश


         भाषाऐं रूप बदलती है, विलुप्त होती है और परिष्कृत होती हैं। भाषाओं के परिवर्तन का सिलसिला हमेशा जारी रहता है। वर्तमान में विश्व में लगभग सात हजार भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें से लगभग 1500 भाषाओं पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। जिन्हें विलुप्त होने से बचाने के लिए एण्टुरेन्स वाइस नाम का प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। बहुभाषी, सरल और अभिजात्य समझी जाने वाली भाषाएं अन्य भाषाओं के लिए विलुप्त होने का कारण बनती हैं। शोध के अनुसार कुछ भाषाएँ भौगोलिक परिस्थितियों, व्याकरण, बोलने वालों की अरूचि, लिपिगत कठिनाई और समय के साथ विकास न कर पाने के कारण लुप्त होती है। वर्तमान में हिन्दी के स्वरूप पर चिंतन आवश्यक हो गया है क्योंकि भले ही हिन्दी विलुप्त होने की  स्थिति में आज न भी हो, तो भी खतरे की ओर बढ़ती हुई दिखाई अवश्य दे रही हैं। हिन्दी के अंको का सर्वसम्मत तरीके से पठन पाठ्न से बाहर होना पहली कड़ी मे रूप में देख जा सकता है। साथ ही भारत में अभिजात्य समझी जाने वाली भाषा अंग्रेजी ने मोबाइल ओर कम्प्यूटर के माध्यम से हिन्दी को असामाजिक करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हैं। एस एम एस और ईमेल आदि में हिन्दी भाषा के लिए रोमन लिपी में लिखा जाना आम परंपरा हैं। इसके पीछे अंग्रेजी भाषा में टाइप करने की सरलता ही प्रमुख कारण हैं और दूसरा कारण हमारा अंग्रेजी प्रेम भी हैं। हिन्दी और अंग्रेजी के सम्मिश्रित रूप को न हिन्दी न इंग्लिश ; इसे तो हिंग्लिस कहा जा सकता हैं। जाने-अनजाने हम अपनी भाषा का रूप बदलने में सहायक हो रहे हैं। ऐसा नहीं कि दूसरी भाषा का प्रभाव किसी भाषा को नष्ट ही करता हो। ऐसे में भाषाएं परिष्कृत होती हैं या रूप भी बदल लेती हैं। पंद्रहवीं सदी में इंग्लैण्ड में फ्रैंच विद्वानों की
भाषा और अंग्रेजी अनपढ़ गंवारों की भाषा थी। आज हिन्दी में अंग्रेजी की ही तरह वे अंग्रेजी में फ्रैंच शब्द बोलकर विद्वता का परिचय देते रहते थे। बाद में फ्रैंच शब्द अंग्रेजी भाषा में घुलमिल कर उसे समृद्ध करने लगे। ऐसा ही आज हिन्दी व अंग्रेजी के संदर्भ में देखा जा सकता है। अंग्रेजी के अनेक शब्द ,हिन्दी भाषी अनपढ़ व्यक्ति भी सही अर्थ के साथ समझ लेता है। ऐसी स्थिती में संस्कृत भाषा की प्रतिबद्धता को तोड़कर हिन्दी ,इंग्लिश के साथ मिल कर हिग्लिश होने लगी है। अब आम बोलचाल के साथ ही सभी ओर हिग्लिश प्रचलित है, इस नवीन विकसित होती भाषा का व्याकरण स्वयं विकसित हो रहा है । जिसमें हिन्दी और अंग्रेजी के कठिन शब्द समाप्त होकर अनेक स्लेग प्रचलित हो रहे है जो शायद इस नवीन भाषा के लिए नींव का पत्थर साबित हो। इस भाषा की लिपी रोमन है क्योंकि इससे की पैड या की बोर्ड जैसी समस्याओं से निजात जो मिलता है। शब्दों के भाषाई बंधन से मुक्त हिग्लिश में क्षेत्रीय भाषाओं से लेकर अंग्रेज़ी तक के सरल और कठिन शब्दों का प्रयोग हो रहा है । नये समानंतर सिनेमा में मुख्य रूप से इसी भाषा का प्रयोग हो रहा है। धरावाहिक , समाचार माध्यम और लेखन के क्षेत्र में भी शुद्ध हिन्दी अपना स्थान खोती जा रही हैं। शुद्ध हिन्दी का प्रयोग करने वाला व्यक्ति अब परग्रहीय प्राणी सा लगता है। देश में भाषा के नाम पर एक दिवस मनाने से कुछ भी होगा ये सोचना बेईमानी हैं । अब तो इस चिंतन का समय हैं कि हमारी मूल स्वरूप खोती भाषा हिन्दी का क्या होगा .....विकास, विनाश या रूपांतरण।



आलोक मिश्रा "मनमौजी "

Monday, June 21, 2021

अवतार

                 अवतार


    आलेख सनातन अवतारवाद और विकासवाद के संबंध पर आधारित है । आख्यानों की अधिकता के बवजूद भी संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है । आख्यानों के विस्तार  को सुधी पाठक अलग से पढ़ सकते है ।आपका सहमत होना  जरूरी नहीं है ।  अपने अभिमत को अंकित अवश्य करें ।
       जीव विकास क्रम में वैदिक शास्त्रों के अनुसार जब-जब धर्म घटता है और अधर्म बढ़ता है तब-तब धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिये भगवान विष्णु अवतार लेते है। धर्म की व्याख्या यदि संक्षेप में की जाए तो जीवन जीने की वह कला जो सत्य व सनातन है, धर्म है।धर्म वो हो जो परिस्थितिगत कारणों से बदलता नहीं । धर्म वह स्थिर नियम है जो  किसी भी शृष्ठी के निर्माण के पूर्व ही बन जाता है । धर्म के लिए मानव की आवश्यकता नहीं है ।   विष्णु को जगत का पालनहार कहा जाता है, अतः विष्णु का स्वयं का धर्म जगत का पालन करता है। जीव तत्व को नवीन मार्ग दिखाना है, जिसके लिये ही वे बार-बार अवतार लेते हैं। कलियुग में होने वाले भविष्य के अवतार से पूर्व नौ अवतारों को यदि देखें तो वे जीवन के विकास क्रम के रूप में दिखते है। प्रथम मत्स्यावतार के रूप में सत्यव्रत को जीवन के प्रतीक रूप में बचाने का उल्लेख तो है ही विकासवादियों के दृष्टिकोण से भी जीवन को उत्पत्ति जलचर रूप से ही मान्य है। कच्छपावतार में भगवान अपनी पीठ पर मंदरांचल पर्वत को उठाकर समुद्र मंथन में सहभागी होते हैं। क्रमिक विकास की प्रक्रिया में मछली के पंख और गलफड़े का विकास, पैर और फेफड़े होने के साथ-साथ जल प्लावित धरती के समुद्र में खिसकने और नये क्षेत्रों से जुड़कर नयी और संभावनाओं को खोजा जाना दर्शाता है ‌। जैविक विकास के साथ ही साथ यह तत्थ आपको भूगोल और भूभौतिकि में भी विस्तार से मिल जाएगा । महाप्रलय का उल्लेख भी सभी धर्म के सहित्यों में मिलता है । वरहावतार के रूप में जलमग्न धरती के कारण जीवों के आवास हेतु समुद्र से धरती प्राप्त करना कथानक है। क्योंकि यहां जीवन समुद्र को छोड़कर चौपायों के रूप में धरती पर आश्रय बनाने लगे थे।  कछुआ या कच्छप इसका उत्तम प्रतीक हो सकता था । मानव रूप की सृष्टि से पूर्व है नरसिंहावतार, जो न मानव है और न ही पशु और जो दोनों का मिला-जुला रूप है , जो होमोसीपियंस की तरह अच्छे-बुरे विषय में है।  मानव विकासवादी डार्विन भी यही कहते है लेकिन वे मानव के विकास को बंदर से जोड़ते है ।  वामनावतार के रूप में मानव बौना अवश्य है परंतु ऊर्जावान इतना कि अपने पैरों से ही तीनों लोकों को नाप सकता है। यहां मानव निश्चित रूप से पैदल दुनिया को नापता रहा होगा और यदि आप वामन और मानव की शब्द सृष्टि पर ध्यान देंगे तो दोनों में भेद समाप्त होता दिखेगा।  अवतारवाद में यह इस शृष्ठि में वामनावतार मानव के रूप में भगवान विष्णु का प्रथम  अवतार था । जब मानव को अस्त्र-शस्त्र की आवश्यक्ता महसूस हुई होगी तब बलशाली विद्वान काया से परिपूर्ण, शस्त्रों को बनाने और चलाने की कला जानने वाला और शत्रुओं पर निर्दयतापूर्वक प्रहार करने वाले अवतार के रूप में परशुअवतार पूज्य है। विकसित होती मानव श्रंखला में वहीं तो विकास को प्राप्त कर सकता था जो बलशाली हो जो अपने बल और शस्त्रों से अपनी और अपने समुदाय की रक्षा कर सके ।  रामवतार इसी श्रृंखला को बढ़ाते हुए मानव को दस कलाओं में प्रवीण होने तथा कृष्ण को सोलह कलाओं के ज्ञाता होने के साथ आगे बढ़ता है। वस्तुत: कृष्ण को अवतारवाद  में परिपूर्ण मानव माना जा सकता । राम और कृष्ण में कलाओं का अंतर है जिन कलाओं को राम निसिद्ध मानते थे उन्हें ही कृष्ण की परिपूर्णता कहा जा सकता है ।  नवम अवतार के रूप में बुद्धावतार मान्य है। मानव की मुक्ति का मार्ग मानव देह में ही प्राप्त हो  बुद्धावतार यही करते दिखते है । कलियुग में ढाई हजार वर्ष पूर्व मानव समस्याओं के निदान खोजने के पृथक मार्ग ढूंढता हुआ दिखता है। आज भी नित नये अविष्कार, धर्म, पंथ, विचार धाराएं और वाद  बुद्धावतार की विचारवादी आस्थाओं का प्रतीक है। भविष्य के अवतार के रूप में कलकि अवतार घोर कलियुग के अंतिम चरण में ठीक उन्हीं परिस्थितियों में जिनमें भगवान अवतार लेते हैं अवतरित होंगे। उनके पैदा होने के स्थान का नाम संभल ग्राम, संभल का प्रतीक भी हो सकता है। उनका नाम विष्णु यश होगा। लेकिन उनके नाम के प्रथम व अतिम वर्ण का उच्चारण विनाशक विश (विष) है जो कि प्रतीक भी हो सकता है। वे अपने अस्त्र-शस्त्र से दुष्टों का नाश करेंगे परंतु तत्तसमय संतगुणी कोई न होगा अतः संपूर्ण विनाश या प्रलय के बाद नवीन अवतारों के साथ नयी धरती जीव का विकास होगा।

आलोक मिश्र "मनमौजी"

Saturday, June 12, 2021

अभी तो ये अंगड़ाई है ....( व्यंग्य )

अभी तो ये अंगड़ाई है ....


        एक दिन शहर की एक रैली में लोग जोर-जोर से नारे लगा रहे थे ‘‘ अभी तो ये अंगड़ाई है.....आगे और लड़ाई है ।’’ सड़क के किनारे एक दुकान पर उतनी ही जोर से गाना बज रहा था ‘‘ अंगड़ाईयाॅं लेती हूॅं जो मैं जोर-जोर से ......।’’मैं सोचने लगा कि किसकी अंगड़ाई पर कंसन्ट्रेट करुॅं ? मेरे बुद्धिवादी होने के भ्रम के कारण मेरा ध्यान रैली की ओर मुड़ गया । हम और आप बचपन से ही राजनैतिक,सामाजिक,मजदूर और कर्मचारी आंदोलनों के समय नारा ‘‘ अभी तो ये ....’’ सुनते आ रहे है । हम तो बचपन से जवान हो कर बुढापे की ओर कूच भी करने लगे और वे है जो तब से ले कर आज तक अंगड़ाईयाॅं ही ले रहे है । हम इतिहास को बनते देखने के लिए दम साधे बैठे है कि बस लड़ाई अब शुरु हुई कि तब शुरु हुई । वे है कि लड़ाई- वड़ाई करते ही नहीं ।
     नारा वीर आंदोलनकर्ता हमेशा ही धमकियों से भरे हुए नारों का प्रयोग बमों और मिसाइलों की ही तरह करते है । ये सारे नारे आपने कभी न कभी तो अवश्य ही सुने होगें जैसे - ‘‘ जो हमसे टकराएगा ... मिट्टी में मिल जाएगा ’’, ‘‘हमें नहीं तो तुम्हें नहीं .... चैन नहीं आराम नहीं ’’,‘‘माॅंग हमारी पूरी होे....... चाहे जो मजबूरी हो ’’,  ‘‘जो हिटलर की चाल चलेगा..... वो कुत्ते की मौत मरेगा’’ । इनके अलावा वे बीच-बीच में अपनी एकता को भी जिन्दाबाद करते रहते है । ऐसे स्थानों पर नारे लगाने में विशेषज्ञता रखने वालों की पूछ-परख अधिक ही होती है । ये विशेषज्ञ भी अपनी पूरी प्रतिभा,लगन और खास स्टाइल के साथ नारे लगवा कर अपनी विशेषज्ञता का प्रर्दशन करते है। ऐसे ही एक विशेषज्ञ एक खास नारा ‘‘कर्मचारी एकता ....’’ अपने विशेष अंदाज और स्वर में लगाते तो सुनाई देता ‘‘ चाय गरम समोसा ....’’ बाकी लोग जोर से साथ देते ‘‘.... जिन्दाबाद .. जिन्दाबाद ’’ । नारे लगाने वाले भी अलग- अलग प्रकार के होते है । कुछ अतिउत्साहियों को लगता है कि इधर जोर से नारा लगाया और बस मांग पूरी हुई । ऐसे लोग अपनी मांग पूरी करवाने के लिए महिला हो या पुरुष पूरा जोर लगा कर नारे लगाते है। कुछ लोग तो बस दूसरों को दिखाने के लिए ही नारे लगाते है ; दिखावा बंद तो नारे भी बंद । कुछ तो इतनी बार अंगड़ाईयाॅं ले चुके होते है कि उनके लिए लड़ना तो दूर नारा लगाना भी भारी पड़ता है । यह पूरा का पूरा समुदाय दो प्रकार के लोगों का होता है । एक हाथ लहराते या नमस्कार की मुद्रा के नेता या नेता जैसे लोग ; दूसरे उनके पीछे चलते नारे लगाने वाले लोग ।
        प्रश्न वहीं का वहीं है कि ये आंदोलन कर्ता केवल अंगड़ाईयाॅं ही क्यों लेते रहते है ?
आप तो जानते ही है कि हम जहाॅं है जो कर रहे है उसमें कुछ न कुछ समस्याऐं जरुर है यदि समस्याऐं न भी हों तो कुछ तो ऐसा है जिसे हम पसंद नहीं करते । हमारी इसी मानसिकता के चलते आंदोलन , धरने और प्रर्दशनों को आधार प्राप्त होता है । ऐसे में कुछ लोग हमारी भावनाओं को बल देकर नेता बन जाते है । कभी-कभी नेता उसी समुदाय का होता है जिसकी समस्या है । अक्सर तो नेता न जाने कैसे, क्यों और कब बाहर से आकर समूह का नेता बन जाता है । इसके उदाहरण के लिए अपने आस-पास नजर दौड़ा कर देखें तो आपको मजदूर संगठन के नेता के रुप में कर्मचारी और कर्मचारी संगठन के नेता के रुप में राजनैतिक व्यक्ति दिखाई दे जाएंगे । ऐसे नेता मांग करने वालों और मांग पूरी करने वालों के बीच हमेशा ही संपर्क में रहते है । वे अक्सर तो इन दोनों के बीच अपने दलाली के धंधे को चलाते हुए ही दिखाई देते है । उन्हें जब भी ऊपर वालों से कुछ घोषणा के संकेत प्राप्त होते है तो उनका दिल नेतागिरी चमकाने की नियत के साथ अंगड़ाईयाॅं लेने का मचलने लगता है । बस वे ढेर सारी मांगों के साथ अंगड़ाईयाॅं लेने लगते है । बस सधे-बधे तरीके से दो-चार मांगे पूरी होने का दिखावा हो जाता है और अंगड़ाई से लड़ाई टल जाती है ।
          चुनाव के पहले कुछ सोए और कुछ कब्र में गड़ें संगठन भी अचानक ही अंगड़ाई लेने लगते है । ऐसे समय देने वाले मजबूर और लेने वाले बिना लड़े केवल दिखावे से मिलने की अपेक्षा रखते है । इस आंदोलन या अंगड़ाई के मंचन मात्र से दो पक्षों के रिश्ते मजबूत होते ही है उनका महत्व भी बढ जाता और नेतागिरी भी चमक जाती है । अब तो स्थिति इतनी खराब है कि अपने वेतन ,भत्ते और मजदूरी के लिए भी अंगड़ाई लेने की चेतावनी देनी पड़ सकती है । चूंकि इस तरीके से देने वाले  का महत्व भी बढता है इसलिए कुछ समय बाद कोई भी किसी को कुछ भी तभी देगा जब वो अंगड़ाई लेने की धमकी देगा ।
        नारे लगाना हमारा राष्ट्रीय गुण होता जा रहा है । हम विश्व में नारे लगाने और बनाने में सबसे आगे है । अभी अनौपचारिक रुप से स्कूल और काॅलेजों में समय-समय पर नारे लगाने का प्रशिक्षण दिया जाता है । हमारे छात्रों को रैलियों की प्रेक्टिस भी बचपन से ही करवाई जाती है । हो सकता है भविष्य में इन्हें पाठ्यक्रम में शामिल ही कर लिया जाए । अब तक राजनैतिक लोग समाज के नारे लगाने और आंदोलन करने जैसे गुणों का उपयोग अपने हित में करते रहे हैं । अब लोग उन्हें धमकियाॅं देने लगे है तो वे संवैधानिक पदों की आड़ में छुपे-छुपे फिरते है ।
           अब आप अंगड़ाई वाला गाना और नारा साथ -साथ सुनें तो मेरे समान भ्रमित न हो और बुद्धिवादी बनने की कोशिश न करे । गाने पर कंसन्ट्रेट करे कुछ मनोरंजन तो हो ही जाएगा । बेवकूफ बनने से अच्छा तो मनोरंजन करना हो ही सकता है ।
                                     आलोक मिश्रा
                                    
    


Thursday, June 10, 2021

गरीबी सम्मेलन

      शहर के एक आलीशान होटल में गरीबी सम्मेलन का आयोजन किया गया है । देश-विदेश से इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया । अधिकांश विशेषज्ञों ने गरीबों को केवल तस्वीरों में देखा और आंकड़ों में समझा था । उन्हें यह मालूम है कि गरीब राशन की दुकानों से सामान खरीदते हैं । उन्हें आधुनिक लोगों की तरह अधिक कपड़ों की जरूरत नहीं होती । उन्हें मालूम है कि देश में लगभग चालीस करोड़ गरीब रहते हैं । उन्हें यह भी मालूम है कि शहरों में प्रतिदिन बत्तीस रूपये और गांव में छब्बीस रूपये खर्च करने वाले लोग गरीब होते हैं । इस सम्मेलन में कुछ गरीबों को भी बुलाया गया है । उनकी गरीबी के लिए उन्हें सम्मानित जो करना है ‌
     शहर को इस आयोजन के लिए पिछले कई दिनों से तैयार किया जा रहा था ‌ शहर से भिखारियों को पकड़ कर दूर कहीं भेजा जा रहा था । सभी रास्तों पर बंदनवार सजाए गए थे ‌ देश-विदेश के अतिथियों की सुरक्षा के लिए पुलिस व्यवस्था चाक-चौबंद थी । शहर को साफ-सुथरा दिखाने के लिए फुटपाथ पर दुकान लगा कर रोजी कमाने वालों को भी हटा दिया गया था । विशेषज्ञों की विशेष फरमाईश पर उन्हें एक गरीब बस्ती में भ्रमण के लिए ले जाना था । इस बस्ती में भी रातों-रात बिजली, पानी और सड़क की व्यवस्था की जा रही है । हालांकि इस बस्ती में भी चार-पांच परिवार ही वास्तविक रुप से गरीब हैं ।
        आखिर समारोह प्रारंभ हो गया ।  गरीबी सम्मान पाने के लिए सेठ करोड़ीमल के सुपुत्र विशेष रुप से गरीबों की वेशभूषा में समारोह स्थल पर पहुंचे । उनका नाम गरीबों की सूची में जो शामिल है । गरीबों पर होने वाले इस कार्यक्रम में अधिकांश वक्ताओं ने अंग्रेजी में ही भाषण दिए । सब सभ्रांत समझे जाने वाले भीड़ नुमा लोगों ने जहां समझ में आया वहां भी और जहां नहीं समझ में आया वहां भी तालियां बजाई । सेठ करोड़ीमल के पुत्र को समारोह में अमीर पिता के गरीब पुत्र होने के कारण सम्मानित किया गया ‌। उन्होंने बताया कि आलीशान हवेली में रहते हुए भी गरीब कैसे हैं । सभी भाषणों  से उक्ताए  हुए थे, उन्हें तो बस भाषणों के बाद होने वाले डिनर का इंतजार था । आखिर वह समय भी आ गया डिनर के लिए विशेष रुप से झोपड़ी का सेट बनाया गया था । सभी सभ्य दिखने वाले लोग लाखों की झोपड़ी में दाखिल होकर ,गरीब हो गए । आब सबके हाथों में प्लेटें थी और वे स्टॉल-स्टॉल घूम कर खाना खोज रहे थे । लिपस्टिक पुते होठों को बचा कर खाना खाती महिलाएं बीच-बीच में पुअर-पुअर कहती जा रही थी । वह अब गरीबों के बारे में नहीं, खाने के विषय में बोल रही थी । लकदक सूट में घूमते युवा ही नहीं बुजुर्गों का भी पूरा ध्यान उन्हीं की ओर था ।
       समारोह के बाद सभी लोगों को गरीबों से मिलने उनकी बस्ती में जाना था ‌‌। कुछ को तो इस विचार से ही मितली आने लगी । कुछ ने बहाने बनाकर इस कार्यक्रम से किनारा कर लिया लेकिन अनेकों के लिए उनकी गरीब नवाज की छवि महत्वपूर्ण थी ।  उन्होंने ढेर सा परफ्यूम अपने रुमाल पर डाला और गाड़ियों में सवार हो गए । गाड़ियों का एक बड़ा सा काफिला गरीब बस्ती में रुका।  हैंड पंप पर नहाते लोग , घरों के सामने बर्तन धोती महिलाएं , शौच के लिए बैठे हुए बच्चों सहित बस्ती के सभी लोग उन्हें देखने के लिए जमा होने लगे । नाक पर रुमाल रखे लोग गाड़ियों से उतरे तो लगा दो भारत आमने-सामने हैं ‌। एक विशेषज्ञ को बीड़ी फूंकता बेफिक्र बुड्ढा अच्छा लगा  तो दूसरे को ओपन एयर बाथरूम में नहाती हुई महिला । वे कैमरे को जूम कर  के फोटो लेने का प्रयास करने लगे । भद्र सी दिखने वाली महिलाएं शौच के लिए बैठे बच्चों को देखकर शेम-शेम कहने कहने लगी । बच्चे टुकुर-टुकुर ताकते अपने काम में लगे रहे ।बस्ती वालों को लगा की गाड़ी वाले कुछ देंगे । सब लोगों ने गरीबों के साथ फोटो खिंचाई और अपने लिए कुछ ले ही लिया ।
        समारोह समाप्त हुआ सब कुछ पहले जैसा है । भिखारी फिर शहर में हैं ,वह दो सौ से ढाई सौ रुपया कमा लेते हैं । उन्हें मालूम है वे गरीब नहीं है । फुटपाथ पर दुकान लगाने वाले अब अपनी रोजी - रोटी कमा पा रहे हैं । गरीबी देखने के लिए होटल के पीछे चलना होगा । यहां बचा हुआ खाना फेका गया है । सूअर और कुत्ते के साथ साथ कुछ बच्चे अपना हिस्सा प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं ‌। बच्चों को भूख लगी है । वे नहीं जानते कि वह गरीब हैं या नहीं ।
    आलोक मिश्रा "मनमौजी"

Wednesday, June 9, 2021

भैंस की उड़ान ( व्यंग्य )

        कहावत तो सुनी होगी " अकल बड़ी या भैंस ।" हमारे आस पास बहुत से लोग हैं जिनके लिए भैंस ही बड़ी होती है । उनके लिए भैंस कहां और अकल कहां ? उन्हीं में से एक है हमारे  श्यामलाल जी । श्यामलाल की अकल केवल रुपए पैसे वाले कामों में चलती है, बाकी समय तो वह अपनी भैंसों के साथ व्यस्त रहते हैं । उस दिन समाचार मिला कि एक हवाई जहाज भैंस से टकरा गया । संयोग से उसी दिन श्यामलाल जी के दर्शन हो गए । वे एकदम तपाक से " बोले अरे भाई साहब.... आपने सुना क्या भैस हवाई जहाज से टकरा गई ?" मैंने जवाब दिया " हां ...समाचार तो सुना था ।" वे पुनः पूछ बैठे " ऐसी कौन सी भैंस है जो उड़ती भी है ? " हम तो उनकी इस भैंस की उड़ान पर आवाक ही रह गए । उन्हें क्या जवाब देते ? जरूरी काम का बहाना बनाकर वहां से खिसक लिए ‌‌।
        अब हम सोच रहे हैं कि अकल उड़ान भरे या न भरे लेकिन भैंस उड़ान भरने लगी है । अक्ल वाले चाक और कलम घिसते रहते  हैं ,चप्पले चटकाते रहते हैं और मर जाते हैं ।भैंस वाले मुर्ग मुसल्लम खाते हैं , नाम कमाते हैं और मंच सजाते हैं । देखा जाए तो भैंस ही उड़ान भर रही है । भैंस की उड़ान के चक्कर में कुछ लोग निकल पड़े भ्रष्टाचार समाप्त करने, काला धन लाने और जनता को न्याय दिलाने । इन भैंस वालों को कौन समझाए की राजनीति और प्रशासन का तो अचार ही भ्रष्टाचार है । बिना अचार के आज तक कोई थाली सजी है क्या ? अब ऐसी उड़ान भरती भैंसे हवा जाए , हवाई जहाज से टकराए या जमीन पर धप्प से गिरे; इससे क्या फर्क पड़ता है । कुछ लोग इन्हीं भैंसों की उड़ान के साथ सिंहासन पकड़ लेते हैं , फिर वहां बैठ कर जनता को लंबे-लंबे भाषण देते हैं । वे यह बताना नहीं भूलते कि जनता के दिन फिरने वाले हैं लेकिन कितनी पंचवर्षीय योजनाओं के बाद वे तो बिल्कुल नहीं बताते । जनता तो बस तालियां बजा-बजा कर हथेली लाल कर लेती है  । खैर साहब .... जिसकी लाठी उसकी भैंस ।
        अब आपको लग रहा होगा चलो हम तो बचे, होंगे कोई भैंस वाले ‌। साहब चुनाव के समय आपकी अकल क्या भैंस चराने चली जाती है जो आप अपने घर बैठ कर टी.व्ही. का मजा लेते रहते हैं ।  कब आप सब पहुंचते हैं वोट डालने? फिर कहते हैं फंला नेता ऐसा है.... फला नेता वैसा है ।
       जब आप वोट ही नहीं डालते । अपनी पसंद का उम्मीदवार चुनते तो आप भी भैंस की उड़ान वालों की गिनती में शामिल हो जाते हो । आपको बुरा लगा क्या ?  बिल्कुल लगना भी चाहिए । बुरा लगा हो तो चुनाव हो मतदान करके अकल वालों में शामिल जरूर हो जाना ।
        हम सभी कभी न कभी भैंस वाले होते हैं। अक्सर दूसरों के मामलों में अक्ल वाले, स्वयं के मामलों में हम भैंस वाले बन जाते हैं । घर का कचरा साफ और गली में कचरे का ढेर भी भैंस वालों की निशानी है । पान, गुटखा खाकर यहां वहां थूकते , दीवारों के सहारे लघु शंका करते और खुले में शौच करते भैंस वालों से देश भरा पड़ा है । इन छोटे भैंस वालों को उचित व्यवस्था देकर न देकर कोरे वादे करने वाले बड़े-बड़े भैस वाले होते हैं ।
       दूसरों को सदाचार का पाठ पढ़ाने वाले , जब स्वयं दुराचार में लिप्त हो तो अकल को जेब में रखकर वे भैंस के साथ उड़ान भर रहे होते हैं । जब आपको सरकारी दफ्तर में कोई काम हो और आप अचार अर्थात भ्रष्टाचार का स्वाद चख ले तो समझें आप भी भैंस वालों में शामिल हो गए हैं । जब आप न्यायालय में पेशी बढ़ाने के लिए पैसे दे रहे होते हैं तो आपके दूसरे हाथ में भैंस की पूछ ही होती है ‌ जब प्रशासन किसी घटना विशेष से कुछ समय के लिए जाग जाता है और जनता की नींद हराम कर देता है तो समझ लेना बड़े अफसर भैंस के साथ उड़ान भर रहे हैं । कुछ दिनों के बाद पूरा प्रशासन भैंस की पीठ पर खर्राटे भरता हुआ नजर आएगा । हमारे पुरखे यह बात पहले ही जान गए थे कि धीरे-धीरे वो जमात बढ़ेगी जो भैंस को अकल से बड़ा  भले ही ना कहें लेकिन अकल का काम भैंस से ही लेने लगेंगे । वे अकल और भैस को समान अर्थों में मानते थे।  आज उनकी इस बात को जो मानता है । वह फल फूल रहा है।  मुझे जो कहना था वह मैं कह चुका । अब आप कुछ समझे या मैने केवल भैंस के आगे बीन बजाई ।
आलोक मिश्रा"मनमौजी" 

Monday, June 7, 2021

कोई समाचार नहीं...(व्यंग्य )

        भोलाराम जी को समाचार देखे ,सुने और पढ़े बगैर चैन ही नहीं मिलता । यही कारण है देश ही नहीं पूरी दुनिया के घटनाक्रम पर हमेशा ही पकड़ बनाए रखते हैं । उन्हें मुंह जबानी ही अनेक देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुद्राओं के विषय में ज्ञान प्राप्त हैं ।  वे देश और विदेश के घटनाक्रम को विस्तार  से समझते है और समझा भी सकते है ।अनेक छात्र जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे होते हैं सामान्य ज्ञान के लिए भोलाराम जी की संगत का लाभ उठाते हैं । भोलाराम जी को यूं देखा जाए तो वह कुल सात जमात तक ही पढ़े हैं । कहते हैं उन्हें कभी सरकारी नौकरी भी मिल गई थी परंतु उन्होंने अपना जीवनयापन फल और सब्जी की दलाली से ही किया । कुर्ता, पजामा और सफेद होती दाढ़ी के साथ अक्सर वे अपनी दुकान पर चलती हुई न्यूज़ चैनलों के सामने पाए जाते हैं । उनकी टी.व्ही. में ऐसा लगता है जैसे न्यूज़ चैनलों के अलावा कोई और चैनल है ही नहीं ।
      एक दिन सब्जी लेते हुए हम जब  उनकी दुकान के सामने से गुजरे तो आश्चर्य में रह गए आज तो भोलाराम जी की अपनी कुर्सी पर आराम से अधलेटे सास- बहू वाला सीरियल देखते हुए पाए गए । हमारे मन का कीड़ा
 कुलबुलाने लगा  । वैसे भी इस अनहोनी का राज़ जाने बगैर आपका यह खबरी कैसे लौट आता ?  सो हमने जोर से कहा " चच्चा प्रणाम।" चच्चा याने भोलाराम जी ने हमारी तरफ देखा और बड़े अनमने ढंग से अभिवादन का जवाब दिया । हम भी अपने सब्जी के थैले के साथ उनकी दुकान में जा धमके और खाली कुर्सी पर अपनी तशरीफ रखते हुए बोले "चच्चा क्या बात है ;आज सीरियल देखा जा रहा है?" भोलाराम जी को लगा जैसे किसी ने उन्हें बिना कपड़ों के देख लिया हो। वे खिसिया से गए और बोले "अमा यार  मिश्रा जी.... आप ही बताओ सीरियल ना देखें तो क्या करें ? टी.व्ही., रेडियो और अखबारों में आजकल कोई समाचार ही नहीं है । "
     कोई समाचार नहीं. ... !  हम सोच में पड़ गए और बोल पड़े " चच्चा कैसी बात करते हो? समाचार के बिना कोई टी.व्ही., रेडियो और अखबार चल भी सकते हैं  क्या ? " भोलाराम जी ने रिमोट उठा लिया और एक समाचार चैनल लगाते हुए बोले " चलिए तो फिर समाचार देखते हैं । " चैनल पर किसी राजनीतिक पार्टी की रैली का लाइव प्रसारण हो रहा था । भोलाराम जी ने और भी समाचार  चैनल बदले तो दूसरी चैनलों पर भी उसी पार्टी या किसी अन्य पार्टी कि चुनाव प्रचार को ही समाचारों के रूप में दिखाया जा रहा था । भोलाराम जी बोले " अमा यार मिश्रा जी. ..... अब आप ही बताइए किस पार्टी का चुनाव प्रचार आपको समाचार के रूप में देखना है ? " हम भी सोच में पड़ गए ।  हम तो आज तक इसे समाचार समझते रहे हैं ।‌ भोलाराम जी बोले  " अमा यार ...आप भी नहीं समझ पाए ? य लोग हमें समाचार  के नाम पर बेवकूफ बना रहे हैं और समाचार के नाम पर हमारे दिमाग को अपने बस में करने का प्रयास कर रहे हैं । मैं तो भोलाराम जी की बात से सन्न हीं रह गया और बोला " दिमाग को वश में कर सकते हैं क्या मतलब है ? " भोलाराम जी ने टी.व्ही. बंद कर दी अखबार उठा लिया और दिखाते हुए बोले " देखिए प्रथम पृष्ठ  पर चुनावी रैलियां, गाली -गलौज और चुनावी आंकड़ों को समाचार में छापा गया है । नौसेना प्रमुख की नियुक्ति का समाचार एक कोने में है ।चलो है तो ..... समाचार के नाम पर हमें केवल वही मिल रहा है जो वे हमें देना चाहते हैं । मैं सोचने लगा भोलाराम जी ने किसी डिबेट में बैठे नेता की तरह " वश में कर सकते हैं ?" वाले सवाल से किनारा कर लिया । मैं भी किसी तेजतर्रार  डिवेट संचालक की तरह बोला " ये वश में कर सकते है वाली  बात समझ में नहीं आई ? " भोलाराम जी बोले "अमा यार  ......आप भी न..... तो बताइए आप किसी पार्टी या सरकार को कैसे जानते हैं ? " मेरी ओर देखने लगे क्या बोलता..... लेकिन फिर भी बोला  " समाचार माध्यमों से क्योंकि वे तो  कभी मिलते ही नहीं इसी । " वे इसी  उत्तर की प्रतीक्षा में थे वे बोले " तो यही समाचार माध्यम आपको यह बताते हैं कि कौन अच्छा है और कौन बुरा मैं ने हां में मुंडी झटकी  तो वे  मुस्कुरा मुस्कुरा दिए और बोले  " यदि वे दिनभर एक ही को अच्छा कहने लगे  तो.....। " मैंने जवाब दिया "..... तो वो हमें अच्छा लगने लगेगा । "  भोलाराम जी  
" बोले तो बस हमें वही दिखा रहे हैं जिसमें इनका लाभ है  । कोई चैनल किसी पार्टी से जुड़ा है तो कोई अन्य किसी से वे हमें समाचार दिखाने के स्थान पर विज्ञापन दिखा रहे हैं । और हमारे विचारों को वश में करके प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं  । " मैं इस वार्ता को समाप्त करना चाहता था तो बोल पड़ा " तो अब हम क्या करें? " भोलाराम जी समझ गए अब मैं उठना चाहता हूं वव सुपारी के दो  गड़े हाथ पर रख कर मेरी बढ़ाते हुए बोले " अमा यार .....हमनें तो सोच- विचार कर ही निर्णय लेना है न  .....तो समाचार - समाचार छोड़ो सास - बहू के सीरियल देखते हैं  ।" 
    मैं सब्जी के थैले के साथ-साथ दार्शनिक मुद्रा में घर की ओर रवाना हो गया ।
आलोक मिश्रा "मनमौजी " 

Saturday, June 5, 2021

नो गधा बनाइंग ( व्यंग्य )

       गधा देश में यूं तो पूरे समय ही राजनीति की बहार रहती है परंतु चुनाव की आहट के साथ ही साथ गधों को गधा बनाने की पूरी राजनीति प्रारंभ हो जाती है । गधा देश के  नेता अपने आप को जनता से अलग समझते हैं । ऐसे नेता जनता को जनता न समझ कर वोट बैंक समझते हैं । ऐसे नेता देश के गधों को उनकी जाति और नस्लों में बांट कर देखते हैं । वे अलग-अलग नस्लों के  गधों को लुभाने के लिए अपनी पसंद का चारा चुनाव के समय उनके सामने डालने का प्रयास करते हैं । गधे को गधे तो ठहरे ।  उन्हें तो बस अपने सामने का चारा दिखाई देता है और वह भी वोट बैंक बनने को तैयार हो जाते हैं । ऐसे गधों का जितना बड़ा समूह होता है उस वोट बैंक को लूटने के लिए नेताओं में उतनी अधिक होड़ मची है।
      गधा देश में ऐसा नहीं कि केवल गधे ही रहते हैं । यहां अन्य प्रजाति के जानवर भी रहते हैं लेकिन वह अपने-अपने समूहों में  हैं। उनमें जातिवाद, नस्लवाद और सांप्रदायिकता दिखाई देती है । इस तरह देखा जाए तो अन्य जानवर भी गधों की तरह ही व्यवहार करते हैं । गधा देश में बातें तो गैर सांप्रदायिक होने की होती हैं वास्तव में यहां का तंत्र सांप्रदायिक ही है । यह समझना बहुत मुश्किल है कि यहां नेता गैर सांप्रदायिक होने का मुखौटा लगाकर क्यों घूमते हैं ।
    चुनाव की घोषणाओं के साथ ही बड़े-बड़े नेता विभिन्न जाति, प्रजाति और वर्गों को लेकर अपनी -अपनी बयानबाजियां तेज कर देते हैं । इससे वे यह जताना चाहते हैं की वह किस वर्ग के हितैषी हैं । गैर सांप्रदायिक देखकर व अन्य वर्गों को भी गधा बनाने का प्रयास करते रहते हैं । वास्तव में तो वे किसी वर्ग के हितैषी नहीं होते, उन्हें तो बस चुनाव जीतने और उसके बाद मलाई खाने की पड़ी होती है । सत्ता में बैठे नेता अलग-अलग वर्गों के लिए लाभकारी योजनाओं की घोषणा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए करने लगते हैं । वे सैकड़ों  योजनाओं का शिलान्यास एक दिन में करने लगते हैं । इसका असर भी दिखाई देता है । विभिन्न जातियों के मठाधीश अपनी - अपनी जातियों के लिए अपील  जारी कर ,किसी विशेष पार्टी को विजय दिलाने की सिफारिश करने लगते हैं । आम गधे और अन्य जीव यह समझने लगते हैं कि शायद इस में ही हमारा भला हो बस में खामोशी से कथित पार्टी के पीछे -पीछे चलने लगते हैं ।
   इधर नेता भी राजधानी के चक्कर लगाने लगते हैं । पार्टी में टिकट का जुगाड़ करने के लिए तिकड़म भीड़ाने लगते हैं । पैसे के लेन-देन से लेकर जाति , बिरादरी और दूसरों के लिए अड़ंगेबाजी का सहारा लेते हैं । पार्टियां भी अपने नेताओं को बहुत अच्छे से जानती हैं। वे उनकी आपराधिक प्रवृत्ति, उनकी जाति और खर्च करने की क्षमताओं को पहचानती है । सब कुछ देखते हुए पार्टियां जाति समीकरण को ध्यान में रखकर उम्मीदवार खड़ा करने का फैसला लेती है । उम्मीदवार यदि अपराधी है तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, बस उसके पास अपनी जाति का भरपूर समर्थन होना चाहिए। टिकट के वितरण के साथ ही यह गणना भी प्रारंभ हो जाती है कि किस जाति के कितने प्रतिशत मतदाता हैं और कौन सी जाति निर्णायक भूमिका निभाएगी इस पूरी रस्साकशी के बीच जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने का औचित्य ही समाप्त हो जाता है । चुनाव के पहले जिस महंगाई को कम करने की बात होती है । चुनाव के ठीक बाद वहीं महंगाई हमेशा बढ़ जाती है । सड़क, बिजली ,पानी, भूख और गरीबी ऐसे मुद्दे हैं जिसके लिए अनेकों वादे और घोषणाओं के बाद भी आज तक  गधा देश की बहुत बड़ी आबादी इन समस्याओं से जूझ रही है । हर चुनाव के पहले गधों को कोई लैपटॉप ,तो कोई चावल और कोई कंबल बांटता है । गधे इन वस्तुओं को अपने गले में लटका कर घूमते हैं और समस्याएं जहां की कहां रहती हैं । पार्टियों के घोषणा पत्रों को उठाकर देखें तो  बीस साल पहले की घोषणा है ;आज भी शब्दों के हेरफेर के साथ आपको दिखाई दी जाएंगी । याने आपके पिताजी को जिन वादों से बेवकूफ बनाया था ; आज आपको भी उन्हीं वादों और घोषणाओं से उल्लू और गधा बनाने की कोशिश की जा रही है  । अब बस ....बहुत हुआ आपने गधों को बहुत गधा बना लिया । अब तो हमें नया आइडिया आया है । अब आप जब भी हमसे मिलोगे हम अपनी समस्याओं के बारे में आपसे पूछेंगे ही । हम पूछेंगे आपने वादे पूरे क्यों नहीं कीए? हम यह भी पूछेंगे की हमारी सड़कें कहां गई ? हम यह भी पूछेंगे की हमारे हिस्से का पानी कहां गया ? हम यह भी पूछेंगे की हमारा रोजगार कहां है ? हम अब आपकी बकवास सुन - सुन कर उक्ता चुके हैं । अब आपको हमारी सुनना होगा; वरना जाना होगा । अब आप हमें जाति ,बिरादरी ,वर्ग और संप्रदाय के नाम पर गधा और उल्लू नहीं बना पाएंगे । अब हम आपसे खुलेआम कहते हैं..... सावधान नो गधा बनाइंग  नो उल्लू बनाइंग ।
    आलोक मिश्रा "मनमौजी" 

Thursday, June 3, 2021

समाज सेवक जी ( व्यंग्य )

     "समाज सेवा का मजा मेवा जिसने चखा, उसकी जिंदगी धन्य हो गई।" यह वाक्य हमारा नहीं मेवालाल जी का है। मेवालाल वैसे तो एक व्यापारी हैं लेकिन उन्हें सब लोग समाज सेवक के नाम से जानते हैं।  मेवालाल ऐसी सभी जगह पर पाए जाते हैं ,जहां सेवा करने का कोई अवसर हो । वे कभी सड़क पर पानी पिलाते पिला रहे होते हैं , कभी दरिद्र नारायण का भोज करा रहे होते है  और कभी सार्वजनिक कार्यक्रमों में पत्तलें उठा रहे होते हैं। उनको देख कर कभी ऐसा नहीं लगा कि उनकी सेवा में कोई स्वार्थ हो सकता है । वैसे शहर के नेता हमेशा ही उन से आशंकित रहते हैं । छुटभैया नेता अक्सर उन्हें या तो सेवा के अवसर से वंचित रखना चाहते हैं या फिर सेवा के बाद उनका गुणगान न हो इसलिए अपने नामों को आगे बढ़ाते हैं ।
        मेवालाल ठहरे सीधे और सरल आदमी उन्हें तो बस अपने कर्मों पर विश्वास है । उनके लिए तारीफ और निंदा कोई मायने नहीं रखती। एक दिन उनके मन में ख्याल आया क्यों न गरीब कन्याओं का सामूहिक विवाह करवाया जाए ? अपने इस विचार को अमलीजामा पहनाना चाहते थे । ये उनके अकेले के बूते की बात तो थी नहीं ,सो वे आस-पास के नेताओं, अधिकारियों और तथाकथित सामाजिक संगठनों से संपर्क करने लगे।  वे सुबह -सवेरे ही एक नेता जी के घर पहुंच गए । नेता जी मन ही मन बुदबुदाए" आ गया ....समाज सेवक कहीं का .....। " प्रगट में मुस्कुराते हुए बोले "अरे भाई मेवालाल जी सुबह-सुबह दर्शन देकर हमें धन ही कर दिया।  मेवालाल बोले "आप तो शर्मिंदा कर रहे हैं । दरअसल हम कुछ काम लेकर आए थे । नेताजी बुदबुदाए "अब आया ऊंट ...पहाड़ के नीचे ।"  परंतु उनके मुंह से उच्चारण निकले " हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं ? " मेवालाल जी ने अपनी योजना बता डाली। नेता जी धीरे से बोले " काम तो अच्छा है . ‌...लेकिन इससे हमें क्या लाभ होगा ?"  मेवालाल जी को इस जवाब की आशा नहीं थी । वे बुदबुदाए "लाभ....?" और बोले " सेवा और लाभ का क्या संबंध है?"  नेता जी बोले  "देखिए ... आपको तो समाज सेवा का कीड़ा है
लेकिन हम लोगों को राजनीति देखनी होती है। अभी तो चुनाव को भी बहुत समय है और इसमें कोई आर्थिक लाभ भी तो नहीं है ।" मेवालाल को लगा इन तिलों से तेल नहीं निकलने वाला । बस वे वहां से खिसक लिए फिर भी कई नेताओं से मिले । नेताओं को ऐसे कार्यों में चुनाव के दूर होने के कारण कोई रुचि नहीं थी । कुछ ने कहा "आप आगे बढ़ो हम दो-चार हजार की मदद कर दे ।" एक-दो छोटे नेताओं ने इसे चंदे की अच्छी योजना के रूप में देखा और मेवालाल को सेवा का मेवा बांट कर खाने की भी सलाह दे डाली ।
       अब मेवालाल ने अधिकारियों की ओर रूख किया । कुछ ने उनके काम में अरुचि दिखाई । कुछ ने दिखावटी रुचि के साथ इस काम में सहयोग के नाम पर इस योजना के अर्थतंत्र को समझने का प्रयास किया । कुछ ऐसे थे जो अपनी सरकारी नौकरी का हवाला देकर कन्नी काट गए । एकाध को लगा मेवालाल छुटभईया  पत्रकारों की भांति उनसे चंदा वसूलने आए हैं । उन्होंने सीधे पूछ " लिया आप कितना चंदा चाहिए? " कुछ लोगों ने  पूछा " आप किस पार्टी से हैं ? " मेवालाल को लगने लगा कि ये किसी मकड़ी के जाले में उलझते जा रहे हैं ।  जितने अधिकारी उतने बातें शर्मा जी बोले " मेवालाल जी आपके इस काम के लिए बड़ा पर चंदा चाहिए  । हमारी सीट तो कमाई वाली है नहीं । आप वर्मा जी के पास क्यों नहीं जाते ?" वर्मा जी बोले " देखिए हमने मंत्री जी को लंबा पैसा दिया है तब यह सीट मिली है । नेताओं ,पत्रकारों और ऊपर के अधिकारियों का हिस्सा निकालकर हमारे पास शर्मा जी से कम बचता है । आप शर्मा जी के पास क्यों नहीं जाते ? " एक अधिकारी तो गिड़गिड़ाने लगे " मेवालाल जी आपका परिचय तो ऊपर तक होगा । हमारा स्थानांतरण करवा दीजिए । हम आपकी योजना और आपकी पूरी सेवा के लिए तैयार है  । " मेवालाल ऑफिसों में घूमती फाइल की तरह इधर से उधर भटकते रहे । वे निराश होने वालों में से तो थे नहीं ।  उन्होंने सोचा शायद कोई समाज सेवी संगठन इस काम के लिए आगे आए । अब ऐसे संगठनों के स्वयंभू अध्यक्षों और सचिवों से मिलकर अपनी योजना समझाने लगे एक अध्यक्ष ने पूरी योजना ध्यान से सुनी फिर बोले  " मेवालाल जी बजट बनाया है  क्या ? मेवालाल जी ने "न " में  मुंडी हिला  दी ।  वे बोले " खैर ....  बजट कुछ भी हो हम अपने लोगों को दोगुना करके बता देंगे ।  बस शहर भर में चंदा होगा ।  आयोजन की सफलता की गारंटी हमारी । मुख्य अतिथि भी हमारे नेता जी होंगे । अधिकारी  कर्मचारियों की तो आप हम पर छोड़ दो इनकी तो हम नस-नस से वाकिफ है । बस आप यह बताओ आप क्या करना चाहते हो ।  मेवालाल जी बोले "सामूहिक विवाह.....।" अध्यक्ष बोले "अरे...आप समझे नहीं इस सेवा के मेवे के रूप में आपको क्या चाहिए?"  मेवालाल उनका मुंह देखते रहे  । बाकी अध्यक्ष और सचिव इस काम के लिए तैयार थे लेकिन अपने-अपने अर्थशास्त्री विवेचना के साथ किसी को पद की, किसी को मान की और किसी को माया की बिसात पर ही सेवा दिख पा रही थी । मेवालाल की सेवा के इस कुरूक्षेत्र में अपने आप को अकेला पा रहे थे  । हर किसी को सेवा के लिए मेवा चाहिए  । समाज में कोई भी किसी भी काम को शायद निस्वार्थ भाव से करना भूलता जा रहा है ।  अब जब दो  व्यक्ति मिल रहे होते हैं तो वास्तव में वह दो व्यक्ति न हो कर दो स्वार्थ होते हैं जो अपनी अपनी भाषा में अपने ही लिए काम कर रहे होते हैं । इन परिस्थितियों में मेवालाल जैसे लोगों को भी शक की नजरों से न देखें तो क्यों ?
   आलोक मिश्रा " मनमौजी" 

Wednesday, June 2, 2021

फाईल दौड़ (व्यंग्य)

               फाईल दौड़

     हमारे बाबू साहब अपने ऑफिस में बैठे पान की जुगाली कर रहे थे कि बस अचानक चार फाईलें में अपने आरंभ स्थल यानी स्टार्टिंग प्वाइंट यानी टेबल पर पहुंचकर स्थान लेने लगी। शाम होते ना होते फाईलें वार्म अप होकर दौड़ के लिए तैयार होने लगी । फाईलों को लग रहा था कि यह एक साधारण दौड़ है जिसमें अपनी दौड़ को समाप्त करके अपने लक्ष्य तक सामान्य तरीके से पहुंच जाएंगी । इन फाईलों को यह नहीं मालूम था की टेबलों के दूसरी ओर बैठे हुए उतने सज्जन नहीं है ,जितने भी दिखाई देते हैं । ये सारे महाशय फाईलों को दौड़ाने नहीं रोकने में माहिर है ।‌ बाबू साहब ने शाम होते ही सारी फाईलों को बांध कर रख दिया ।
    दूसरे दिन बाबू साहब काम ना होने के कारण बोर हो रहे थे ।  इस पूरे बोरियत को दूर करने के लिए वे दो बार पान दुकान के चक्कर लगा आए है । उसने सोचा चलो इन  बंधी फाईलों को देखा जाए । अब उन्हें फाइलों में चेहरे देखने लगे । पहली फाईल उठाई तो उसमें उन्हें कुर्ता और धोती पहने सर पर गमछा बांधे झुर्रियों से भरा दीन-हीन सा चेहरा हाथ जोड़ता हुआ सा महसूस हुआ । बाबू साहब जानते हैं कि ऐसे हाथ जोड़ने वाली फाईलों का क्या होता है । दूसरी फाईल में उन्हें आप जैसा एक मध्यमवर्गीय चेहरा दिखाई देने लगा । आपका चेहरा जब भी बाबू साहब देखते हैं वे जानते हैं कि आप अपने छोटे-मोटे काम तो परिचय और बड़े लोगों के संपर्क की ड़ींगों के आधार पर करवाने का प्रयास करते हैं । उसके बाद कुछ रुपए पैसे की बात करते हैं । कुछ तो ईमानदारी का पुतले बन कर लड़ने -झगड़ने और शिकायत वगैरह पर उतारू हो जाते हैं, वैसे इन सब से ना तो फाईलें दौड़ती हैं और ना आज दौडेंगी ‌।
    तीसरी फाईल का पेट कुछ मोटा सा है ;हाथ में सूटकेस और टैब है । यह सब ठेकेदार सा ठाठ लगता है।  इस  फाईल को अधिक रोका नहीं जा सकता । हां यह जरूर है कि इस फाईल के एक-एक दिन की कीमत अच्छी होगी । बाबू के मुंह से निकल निकल ही गया "यह तो काम की चीज है ।" चौथी फाईल को छूते ही वे झटका खा गए ,उन्हें तो बस चक्कर ही आ गए । फाईल का चेहरा देखकर कांपने लगे । उन्हें अब लगने लगा कि कल इसको ना देख कर बहुत बड़ी गलती हो गई।  बिना कुछ बोले और देर किए  फाईल के साथ  मझोले बाबू के पास पहुंचे फाइल को दिखाते हुए  बोले "क्या करते हो यार.... इतनी देर कर दी; अभी ही मंत्री जी का फोन बड़े साहब को आया था और हां और ठेकेदार वाली फाइल भी जल्दी कर देना ।"
       लो साहब फाईलों की दौड़ प्रारंभ हो गई । कुछ फाईलें अभी भी प्रारंभ स्थल पर और कुछ फर्राटा दौड़ लगाने लगी । नेताजी की फाईल शाम होते ना होते चार-पांच टेबल पार कर बड़े साहब की टेबल पर थी । ठेकेदार की फाईल अब छोटे साहब के पास है । आप पाठक याने मध्यम वर्ग की फाईल आवक -जावक पार कर पाई है । बेचारी फाईल अभी भी वही पड़ी है । 
       धोती कुर्ते वाले बुजुर्ग कुछ दिनों से रोज ही दफ्तर आते हैं । उनके सामने उनकी फाइल ढूंढी जाती है । फाईल है कि मिलती नहीं । वे बेचारे चले जाते हैं । फाईल अभी भी वहीं है पहली टेबल की दाहिनी दराज में । नेताजी वाला काम तो तीसरे दिन ही हो गया लेकिन नेताजी नाराज हैं । वे कहते हैं "बताइए हमारे काम को तीन दिन लग गए ये लोग आम जनता को कितना परेशान करते होंगे।" नेताजी के ऑफिसिया  चमचों ने छोटे बाबू पर देर होने का दोष माढ़ दिया और बताया कि उसने एक दिन फाईल अपने पास रखी थी । उस छोटे बाबू की तो शामत आ गई अब वह अपना स्थानांतरण रुकवाने के लिए रोज ही नेता जी के पैर छूता रहता है।
      ठेकेदार को कोई जल्दी और कोई देर का सवाल नहीं था। एक दिन कार से सीधा ऑफिस पहुंचा छोटे ,मझोले और बड़े जितने प्रकार के बाबू होते हैं से मिला। मिलना क्या लिफाफे थे और कुछ मिठाइयां डिब्बे सबको खैरात सा बांटता जा रहा था। उसके सामने सब भिखमांगों की तरह खड़े थे। यह सब उसने ऑफिस के छोटे ,मझोले और बड़े साहबों के साथ भी किया । जाते-जाते उसने पूछा "कब आऊं?" बड़े साहब बोले "अरे आपको तकलीफ करने की जरूरत नहीं है‌। हम तो दो-तीन दिन में कागज पहुंचा देंगे ।"
      अब साहब एक फाईल जो मिलती ही नहीं और दूसरी है जिसमें लगातार आपत्तियां लगाई जाती है । एक दिन कहा गया एक कागज कम है। अगले दिन बताया यहां "का"   के स्थान पर "की" होना चाहिए । आदि ....आदि.... इस दौड़ को प्रारंभ हुए बहुत समय हो गया । दो फाईलें दौड़ खत्म कर आराम कर रही है । वो बुजुर्ग जब भी आता है उसकी फाईल खोजी  जाती है या खोजने का नाटक किया जाता है । आप मध्यम वर्ग की फाईल कछुए की गति से अभी भी दौड़ में शामिल है । जब उसके सारे "का" और "की" समाप्त होंगे तब वह अपने लक्ष्य पर पहुंचेगी  लेकिन "का" और "की" है कि खत्म होने का नाम ही नहीं हो रहे ।  अब आप या मैं परेशान होकर क्या करते हैं ? बस फाईल के पीछे उस मध्यमवर्ग ने भी  शिकायत का सहारा लिया । आफिस में  शिकायत की फाइल पहले वाली फाइल से भी मोटी हो गई। वह मध्यमवर्गीय चेहरा बड़ा ही ठीढ़ है । अब वह धरना ,आंदोलन और भूख हड़ताल जैसी धमकियां देने लगा है । ऑफिस के अंदर बैठे लोग जानते हैं कि इन हथकंड़ों  से कितना काम बनता है और कितना बिगड़ता है । ये सब अभी जारी है और रहेगा । कई छोटे, मझोले और बड़े बाबू और साथ ही साथ छोटे ,मझोले और बड़े साहब मुझसे नाराज हैं ।  आखिर मेरी हिम्मत कैसे हुई उनके इस पुनीत कर्म को सार्वजनिक करने की । अब देखना होगा कि मेरी कोई फाईल कैसे दौड़ती है ?