गज़ल
जब दर्द- ऐ -ऐहसास हद से गुज़रने लगा
मै बेशाख़ता* तन्हाईयों मे हंसने लगा ।
मै बेशाख़ता* तन्हाईयों मे हंसने लगा ।
ज़प्त कर जाउंगा अपने ऐहसास को
लो फिर उसी गली से गुज़रने लगा ।
लो फिर उसी गली से गुज़रने लगा ।
तेरी बदकारियों* का गुमान* है हमें
क्या करूं मोहब्बत मै करने लगा ।
क्या करूं मोहब्बत मै करने लगा ।
तेरे ख़यालों में रहते है हर लम्हा
अब तो वक्त युंहीं गुजरने लगा ।
अब तो वक्त युंहीं गुजरने लगा ।
क्या किस्सा है तमाशा बरपा है क्यों
हुजूम में ईमानवाला दिखने लगा ।
हुजूम में ईमानवाला दिखने लगा ।
औधें मुह गिरे राह में जख्म भी हुए
बद्दूआओं का असर दिखने लगा ।
बद्दूआओं का असर दिखने लगा ।
ऊंचाईयों पर रुक सोचा जो एक बार
जमाने का हर सख्स छोटा लगने लगा ।
जमाने का हर सख्स छोटा लगने लगा ।
बहुत टीस देती है तुम्हारी यादें
फिर जख्मों को कुरेदने लगा ।
फिर जख्मों को कुरेदने लगा ।
इंसानों की दुनियाँ में "बुत"बन के खड़ा हुँ मै
अब तो इंसानों से भरोसा भी उठने लगा ।
अब तो इंसानों से भरोसा भी उठने लगा ।
आलोक मिश्रा बुत
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बदकारियों* -बुराईयाँ
बेशाख़ता*- अचानक
गुमान* - अनुमान
ज़प्त* - सहन करना
बेशाख़ता*- अचानक
गुमान* - अनुमान
ज़प्त* - सहन करना