Monday, February 11, 2019

उपवास कैसे रखें ...... व्यंग्य


उपवास कैसे रखें ......    व्यंग्य

          अब साहब आपके ये दिन आ गए कि कोई  मुझ जैसा अदना सा व्यक्ति आपको यह बताए कि उपवास कैसे रखें ? बात बिलकुल भी वैसी नहीं है जैसी आप समझ रहें है । आप किसी भी धर्म या मजहब के हो उसके अनुसार आपको उपवास की पद्धति मालूम है । आपके धर्म के अनुसार ही आपको यह भी मालूम है कि उपवास कब करना है या नहीं करना है । आप यदि लोकतंत्र के नए धर्म अर्थात राजनीति को मानते है या कभी सोचा है कि इस धर्म को अपना सकते है तो आपके लिए इसकी उपवास पद्धति से परिचित होना आवष्यक है । वैसे यदि इस लोकतंत्र में आपकी कोई हैसियत न भी हो याने आप आम जनता हों तब भी सामान्य ज्ञान के लिए आपको इस पद्धति के विषय में मालूम होना ही चाहिए ; न जाने कब इस पर प्रश्न पटवारी या चपरासी की चयन परीक्षा में आ ही जाए । खास लोगों के उपवास के कारण और प्रकार के विवेचन हेतु भी आपको राजनैतिक उपवास पद्धति का ज्ञान होना ही चाहिए ।

       आपको यह बताना भी मै अपना फर्ज समझता हुॅ कि जो कुछ नहीं कर सकते वे ही उपवास करते है यह सोच कर कि शायद भगवान ही कुछ कर दे । यह बात सभी तरह के उपवास पर लागू होती है ।राजनैतिक उपवास के लिए सबसे पहले यह खोजना होता है कि उपवास कब रखें । यह खोज कोई सामान्य खोज तो है नहीं । इस खोज के लिए देष के घटना चक्र से अधिक दूसरी पार्टियों के क्रियाकलापों का ध्यान रखना होता है । अब समझ लीजिए कि दूसरी पार्टी के नेता को छींक आ गई तो आपको खुद छींकते हुए उपवास की घोषणा कर ही देनी चाहिए । फिर आपको सोचना होगा कि वोटों की फसल काटने के लिए आपका अकेले ही उपवास करना पर्याप्त है या यह कार्य भी सामूहिक रूप से किया जाए । ऐसे उपवास पार्टी को एक करने , ध्यान बटाने और बिना कारण भी किए  जा सकते है । इस बारे में राजनैतिक चिकित्सकोंं की राय है कि ये हानिकारक नहीं होते । कभी - कभी  आप उपवास के विरूद्ध भी उपवास कर सकते है। कारणों का विवेचन ही अपने आप में महाकाव्य का रूप ले सकता है इसलिए कम लिखा, ज्यादा बांचें ।

         अब आपको यह भी सोचना होगा कि आप उपवास करने कहॉ जायेंगें । सामान्य आदमी उपवास अपने घर या पूजास्थल पर ही करता है । राजनैतिक लोग उपवास करने अलग-अलग शहरों के मंच पर जाते है । ऐसे मंचों पर जहॉ बसों में भर - भर कर , खिला -पिला कर लोगों को लाया गया हो । राजनैतिक व्यक्ति का उपवास वोटरों को दिखाने के लिए होता है अतः इसकी अवधि उतनी ही होती है जितनी देर उपवासकर्ता मंच पर बैठा है । इससे पहले या बाद में आप आराम से कुछ भी खा या पी सकते है । इस तरह के उपवास से अल्लाह , ईश्वर या गॉड प्रभावित हो या न हो जनता पर प्रभाव तो पडता ही है । एक बात और है कि यदि आप सत्ता में है और अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पा रहे है तो भी आप उपवास रख कर इसके लिए किसी दूसरे को दोषी कह सकते है ।

          अब आप राजनैतिक उपवास के विषय में कुछ बातें जान चुके है । प्रत्येक  कार्य की कुछ सावधानियॉ होती है । सावधानी बतौर आपको बता ही दूॅ कि आपको गलती से जनता के वास्तविक मुद्दों जैसे गरीबी ,बेरोजगारी और भ्रष्टाचार पर उपवास नहीं करना है । इन पर उपवास करने के लिए आम जनता है न । कुछ ऐसे लोग है जो इन मुद्दों पर आमरण अनसन तक कर सकते है लेकिन वे पागल है , सार्थक तो बस एक दिन का उपवास है ।

                                  आलोक मिश्रा


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Sunday, February 10, 2019

मेरी कीमत क्या है

मेरी कीमत क्या है ?      (व्यंग्य)

        हम  ठहरे एक आम आदमी ........नहीं ... नहीं , जनता..... अरे......नहीं...... फिर राजनैतिक हो गया । खैर आप तो समझ ही गए है कि हम और आप एक जैसे है । अब हमारे नामों पर ही राजनैतिक दल चलने लगे है जिन्होंने हमारा ही नाम बदनाम कर दिया है । तो साहब अब अपने जैसे लोगों को अक्सर ही झोला ले कर बाजारों में देखा जा सकता है । हम भी एक दिन ऐसे ही बाजार में झोले के साथ विचरण करते हुए कुछ सस्ता और सस्ता खोज रहे थे । हमारी मुलाकात जुम्मन भाई से हो गई । जुम्मन भाई आलू और प्याज का धंधा करते है । दुआ सलाम के बाद वे बोल पड़े ‘‘ मिश्रा जी हमारी कीमत क्या है ? ’’ हम तो अचकचा ही गए । सोचने लगे ‘‘हमारी कीमत ....... ।’’ हम जब तक जवाब देते उन्होंने उसके पहले ही दूसरा सवाल दाग दिया ‘‘ अच्छा आप तो षिक्षक हो , वो भी गणित के , ये बताओ सौ करोड़ में कितने शून्य होते है ? ’’ हम मन ही मन शून्य  गिनने में लग गए । जुम्मन भाई शायद आज किसी भी सवाल का जवाब सुनने के मूड में नहीं थे । वे किसी राजनैतिक पार्टी के प्रवक्ता के समान ही केवल और केवल प्रष्न पूछना चाह रहे थे । वे आगे बढ़ कर और प्रष्न मेरी ओर उछालने लगे ‘‘ आप समाचार सुनते हो क्या ? ’’ इसमें सोचना क्या था, बस हमने अपना सिर हाॅं में हिला दिया । वे बोले ‘‘तो आपने सुना तो होगा ही चुनाव के बाद विधायक सौ करोड़ में बिक रहे है ।’’ हमने भी ईमानदारी से अपना सर फिर हाॅं में झटक दिया । वे अब अपनी लय में बोलने लगे ‘‘ बताईए वो चुनाव के पहले अपने आपको ईमानदार बताते है ,वोट हम ड़ालते है और वो  जीतते है, फिर बिक जाते है । यहाॅं हम और आप है झोला ले कर बाजार में घूमते रहते है । ’’ मै बोल ही पड़ा  ‘‘ तो आप ही बताओ क्या करना चाहिए ? ’’  उन्होंने हमारे प्रष्न को जैसे अनसुना ही कर दिया आखिर उन पर प्रवक्तापन जो सवार था । वे बोले ‘‘ अब आप ही बताओ आप की कीमत क्या है ?  ’’ मै अपनी कीमत आंकता उसके पहले ही उन्होने बता दी ‘‘ दो कौड़ी की .........कोई आपको हजार दो हजार में न खरीदे । ’’ हमें अपनी कीमत जान कर बुरा लगा । हमने बुरा सा मॅुह बनाया तो शायद वे समझ गए वे बोले ‘‘ अरे ..... आप बुरा न मानें लेकिन आपकी और हमारी यही कीमत है । माना आप कुछ हमसे अधिक ही कमाते हांेगे लेकिन आपको और हमको कौन खरीदेगा ? बस हमारी कीमत दो कौड़ी की ही है । ’’ जब उन्होने अपने आपको भी हमारे साथ शामिल किया तो हमारे अहम् को संतुष्टि मिली । वे बोले जा रहे थे ‘‘ हम तो अच्छे लोग है और अच्छा कौन होता है ? वही न जो दूसरों के लाभ का कारण बने । बस हम भी अच्छे बन कर इनके लाभ के लिए वोट ड़ाल आते है और वो है जो लाभ कमाते है । ’’ हम सोचने लगे हम जैसे लोगों के पास विकल्प ही क्या है ? हर बार  बेईमानों में से किसी कम बेईमान को चुनने की कोषिष करो और फिर उससे ये अपेक्षा करो कि वो हमारे हित में काम करेगा । जुम्मन भाई सही है जो अब अपनी कीमत पूछने लगे है । उन्होंने तो मुझे भी मेरी कीमत बता दी । मैनें बात बदलने के लिए उनसे पूछा ‘‘ जुम्मन भाई आलू क्या भाव है ?’’ वे बोले ‘‘ आलू के भाव वही है जो कल थे , आपकी हमारी ही तरह । भाव बदले है तो केवल उनके । ’’ हमें लगने लगा आज वे सौ करोड़ के सदमे से बाहर नहीं निकलने वाले । हमने उनसे आलू तौलने को कहा । वे आलू तौलते हुए बोले जा रहे थे‘‘ अब तो साहब हमें भी अपनी कीमतें तय ही कर लेनी चाहिए । अबकी चुनाव आने दो ,  मैने अपनी कीमत न उन्हें बताई तो मेरा नाम भी जुम्मन नहीं । ’’ हम आलू तो ले आए लेकिन सोचते रहे क्या वो लोग सही है शराब और पैसे में बिक कर उन्हें चुनते है और फिर उन्हें मौका देते है बिकने का ? या वो लोग सही है जो जुम्मन जैसों  को धोखा दे कर चुने जाते है  और खुद बिक जाते है ? इस मंड़ी मे सब खुले आम होता है हो सकता है सब सही हों ? इस पूरे नाटक में यह भी तो सही है कि मेरी कीमत दो कौड़ी की है ।

                                                  आलोक मिश्रा


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मेरी कीमत क्या है ?      (व्यंग्य)

        हम  ठहरे एक आम आदमी ........नहीं ... नहीं , जनता..... अरे......नहीं...... फिर राजनैतिक हो गया । खैर आप तो समझ ही गए है कि हम और आप एक जैसे है । अब हमारे नामों पर ही राजनैतिक दल चलने लगे है जिन्होंने हमारा ही नाम बदनाम कर दिया है । तो साहब अब अपने जैसे लोगों को अक्सर ही झोला ले कर बाजारों में देखा जा सकता है । हम भी एक दिन ऐसे ही बाजार में झोले के साथ विचरण करते हुए कुछ सस्ता और सस्ता खोज रहे थे । हमारी मुलाकात जुम्मन भाई से हो गई । जुम्मन भाई आलू और प्याज का धंधा करते है । दुआ सलाम के बाद वे बोल पड़े ‘‘ मिश्रा जी हमारी कीमत क्या है ? ’’ हम तो अचकचा ही गए । सोचने लगे ‘‘हमारी कीमत ....... ।’’ हम जब तक जवाब देते उन्होंने उसके पहले ही दूसरा सवाल दाग दिया ‘‘ अच्छा आप तो षिक्षक हो , वो भी गणित के , ये बताओ सौ करोड़ में कितने शून्य होते है ? ’’ हम मन ही मन शून्य  गिनने में लग गए । जुम्मन भाई शायद आज किसी भी सवाल का जवाब सुनने के मूड में नहीं थे । वे किसी राजनैतिक पार्टी के प्रवक्ता के समान ही केवल और केवल प्रष्न पूछना चाह रहे थे । वे आगे बढ़ कर और प्रष्न मेरी ओर उछालने लगे ‘‘ आप समाचार सुनते हो क्या ? ’’ इसमें सोचना क्या था, बस हमने अपना सिर हाॅं में हिला दिया । वे बोले ‘‘तो आपने सुना तो होगा ही चुनाव के बाद विधायक सौ करोड़ में बिक रहे है ।’’ हमने भी ईमानदारी से अपना सर फिर हाॅं में झटक दिया । वे अब अपनी लय में बोलने लगे ‘‘ बताईए वो चुनाव के पहले अपने आपको ईमानदार बताते है ,वोट हम ड़ालते है और वो  जीतते है, फिर बिक जाते है । यहाॅं हम और आप है झोला ले कर बाजार में घूमते रहते है । ’’ मै बोल ही पड़ा  ‘‘ तो आप ही बताओ क्या करना चाहिए ? ’’  उन्होंने हमारे प्रष्न को जैसे अनसुना ही कर दिया आखिर उन पर प्रवक्तापन जो सवार था । वे बोले ‘‘ अब आप ही बताओ आप की कीमत क्या है ?  ’’ मै अपनी कीमत आंकता उसके पहले ही उन्होने बता दी ‘‘ दो कौड़ी की .........कोई आपको हजार दो हजार में न खरीदे । ’’ हमें अपनी कीमत जान कर बुरा लगा । हमने बुरा सा मॅुह बनाया तो शायद वे समझ गए वे बोले ‘‘ अरे ..... आप बुरा न मानें लेकिन आपकी और हमारी यही कीमत है । माना आप कुछ हमसे अधिक ही कमाते हांेगे लेकिन आपको और हमको कौन खरीदेगा ? बस हमारी कीमत दो कौड़ी की ही है । ’’ जब उन्होने अपने आपको भी हमारे साथ शामिल किया तो हमारे अहम् को संतुष्टि मिली । वे बोले जा रहे थे ‘‘ हम तो अच्छे लोग है और अच्छा कौन होता है ? वही न जो दूसरों के लाभ का कारण बने । बस हम भी अच्छे बन कर इनके लाभ के लिए वोट ड़ाल आते है और वो है जो लाभ कमाते है । ’’ हम सोचने लगे हम जैसे लोगों के पास विकल्प ही क्या है ? हर बार  बेईमानों में से किसी कम बेईमान को चुनने की कोषिष करो और फिर उससे ये अपेक्षा करो कि वो हमारे हित में काम करेगा । जुम्मन भाई सही है जो अब अपनी कीमत पूछने लगे है । उन्होंने तो मुझे भी मेरी कीमत बता दी । मैनें बात बदलने के लिए उनसे पूछा ‘‘ जुम्मन भाई आलू क्या भाव है ?’’ वे बोले ‘‘ आलू के भाव वही है जो कल थे , आपकी हमारी ही तरह । भाव बदले है तो केवल उनके । ’’ हमें लगने लगा आज वे सौ करोड़ के सदमे से बाहर नहीं निकलने वाले । हमने उनसे आलू तौलने को कहा । वे आलू तौलते हुए बोले जा रहे थे‘‘ अब तो साहब हमें भी अपनी कीमतें तय ही कर लेनी चाहिए । अबकी चुनाव आने दो ,  मैने अपनी कीमत न उन्हें बताई तो मेरा नाम भी जुम्मन नहीं । ’’ हम आलू तो ले आए लेकिन सोचते रहे क्या वो लोग सही है शराब और पैसे में बिक कर उन्हें चुनते है और फिर उन्हें मौका देते है बिकने का ? या वो लोग सही है जो जुम्मन जैसों  को धोखा दे कर चुने जाते है  और खुद बिक जाते है ? इस मंड़ी मे सब खुले आम होता है हो सकता है सब सही हों ? इस पूरे नाटक में यह भी तो सही है कि मेरी कीमत दो कौड़ी की है ।

                                                  आलोक मिश्रा