Thursday, October 17, 2019

दर्द ( गज़ल)


गज़ल
जब दर्द- ऐ -ऐहसास हद से गुज़रने लगा
मै बेशाख़ता* तन्हाईयों मे हंसने लगा ।
ज़प्त कर जाउंगा अपने ऐहसास को
लो फिर उसी गली से गुज़रने लगा ।
तेरी बदकारियों* का गुमान* है हमें
क्या करूं मोहब्बत मै करने लगा  ।
तेरे ख़यालों में रहते है हर लम्हा
अब तो वक्त युंहीं गुजरने लगा ।
क्या किस्सा है तमाशा बरपा है क्यों
हुजूम में  ईमानवाला दिखने लगा ।
औधें मुह गिरे राह में जख्म भी हुए
बद्दूआओं का असर दिखने लगा ।
ऊंचाईयों पर रुक सोचा जो एक बार
जमाने का हर सख्स छोटा लगने लगा  ।
बहुत टीस देती है तुम्हारी यादें
फिर जख्मों को कुरेदने लगा ।
इंसानों की दुनियाँ में "बुत"बन के खड़ा हुँ मै
अब तो इंसानों से भरोसा भी उठने लगा ।
आलोक मिश्रा बुत
*

बदकारियों*  -बुराईयाँ
बेशाख़ता*- अचानक
गुमान* - अनुमान
ज़प्त* - सहन करना


सच कहता.हुँ (कविता)


दिल की बातें लिखता हुँ मै
दिल की बातें कहता हुँ मै।
झूठ को झूठ कहता हुँ मै
सच को सच कहता हुँ मै।
                        सच कहता हुँ मै सच कहता हुँ मै ।

         भाषा का जंजाल नही
          कल्पना का संसार नहीं
            आदर्श का दिखावा नहीं
                         धारातल का संसार लिखता हुँ मै

दिल की बातें लिखता हुँ मै
दिल की बातें कहता हुँ मै।
झूठ को झूठ कहता हुँ मै
सच को सच कहता हुँ मै।
                   सच कहता हुँ मै सच कहता हुँ मै ।

         शब्दों की मर्यादा नहीं
         साहित्य की समझ नहीं
          व्याकरण का अनुसरण नहीं
                                 मन की कहानी लिखता हुँ मै

दिल की बातें लिखता हुँ मै
दिल की बातें कहता हुँ मै।
झूठ को झूठ कहता हुँ मै
सच को सच कहता हुँ मै।
                  सच कहता हुँ मै सच कहता हुँ मै ।

          छंदो में हो रस नहीं
           रागों में हो स्वर नहीं
           तुक से सरोकार नहीं
                              गीत दर्द के लिखता हुँ मै

दिल की बातें लिखता हुँ मै
दिल की बातें कहता हुँ मै।
झूठ को झूठ कहता हुँ मै
सच को सच कहता हुँ मै।
               सच कहता हुँ मै सच कहता हुँ मै ।

          तख्त की परवाह नहीं
           वैभव की पनाह नहीं
            वाह की भी चाह नहीं
                                दुख की कराह लिखता हुँ मै

 दिल की बातें लिखता हुँ मै
दिल की बातें कहता हुँ मै।
झूठ को झूठ कहता हुँ मै
सच को सच कहता हुँ मै।
                  सच कहता हुँ मै सच कहता हुँ मै ।

             जो अब तक बोले नहीं
              जिन्होंने लब खोले नहीं
               दुख सहे पर ड़ोले नहीं
                                    उनकी आवाज  लिखता हुँ मै

दिल की बातें लिखता हुँ मै
दिल की बातें कहता हुँ मै।
झूठ को झूठ कहता हुँ मै
सच को सच कहता हुँ मै।
                 सच कहता हुँ मै सच कहता हुँ मै ।

              आस पास है पर दिखते नहीं
                जो गरीब है पर बिकते नहीं
               जो हार कर भी रूकते नहीं
                                    उस  हौसले की कथा लिखता हुँ मै

दिल की बातें लिखता हुँ मै
दिल की बातें कहता हुँ मै।
झूठ को झूठ कहता हुँ मै
सच को सच कहता हुँ मै।
                   सच कहता हुँ मै सच कहता हुँ मै ।

              चारण की कथा नहीं
               प्रेयसी  की व्यथा नहीं
               कल्पना अथाह नहीं  
                                  आप पास की बातें लिखता हुँ मै

दिल की बातें लिखता हुँ मै
दिल की बातें कहता हुँ मै।
झूठ को झूठ कहता हुँ मै
सच को सच कहता हुँ मै।
                    सच कहता हुँ मै सच कहता हुँ मै ।

             नायक कोई राजा नहीं
              नायिका कोई रानी नहीं
               ये तो  प्रेम कहानी नहीं
                             राह चलते की बात लिखता हुँ मै

दिल की बातें लिखता हुँ मै
दिल की बातें कहता हुँ मै।
झूठ को झूठ कहता हुँ मै
सच को सच कहता हुँ मै।

  सच कहता हुँ मै सच कहता हुँ मै ।

  

आलोक मिश्रा बुत


Sunday, September 8, 2019

एक जानवर का सच

           एक जानवर का सच  

एक सर्वे के अनुसार इन्टरनेट और मोबाइल के कारण अपराध और परिवारों का टूटना बढ़ा है इसके पीछे क्या कारण हो सकते है ? इसे जानने के लिए कृपा करके आप एक प्रश्न का जवाब ईमानदारी से स्वयं को दे। प्रश्न यह है कि यदि आप गायब (अदृश्य) होकर मनुष्य की तरह कर्म कर सके तो सबसे पहले क्या करोगे ? ........... सोचे ........... सोचे ........ सोच लें उसके बाद ही आगे पढ़े .............।
वास्तव में मनुष्य एक जानवर ही है एक ऐसा जानवर जिसने अपनी आदिम प्रवृत्तियों को सामाजिक नियमों के कारण अंदर छुपा लिया है। हर व्यक्ति समाज के भय से अच्छा दिखने का ढोंग करता दिखता है। जब उसे यह आभास हो जाता है कि उसे अब कोई देख नहीं पाएगा तो उसके अंदर का जानवर कपड़े फाड़कर नग्न अवस्था में आ जाता है। इंटरनेेेट और मोबाइल पर उपयोगकर्ता को यह लगता है कि वो आसपास के वातावरण से अलग हो गया है इसलिए इंटरनेट और मोबाइल पर झूठ, फरेब, मक्कारी और अपराध भी अधिक है। साथ ही ये दोनों माध्यम बिना किसी की निगाह में आए मनमानी करने की छूट भी देते है इसलिए पूरा परिवार अपने को तुष्ट करने हेतु अलग-अलग इन्हीं का उपयोग कर रहे है। जिससे साथ बैठे व्यक्ति से अधिक दूर के किसी व्यक्ति से लगाव बढ़ रहा है। ऐसे में सामाजिक नियमों में बँधे परिवार का टूटना तो स्वभाविक ही है।
देखा जाए तो मनुष्य अदृश्य होकर अपनी आदिम और गैर सामाजिक इच्छाओं की तुष्टी ही चाहता है क्योंकि ऐसे में न उसे समाज के कानूनों का खतरा होता है और न ही सजा और अपमान का भय। कोई अदृश्य तो शायद ही हो पाए परन्तु जब भी उसे लगता है कि उसे कोई भी देखने वाला नहीं है तो अपनी दमित इच्छाओं की पूर्ति करने का प्रयास करता है क्योंकि उसके अंदर का जानवर 6 करोड़ सालों में भी मरा नही है अभी भी वो पूरा मानव नहीं बन पाया है। ये गाायब होने जैसी परिस्थितियों में घर, दफ्तर, जंगल का एकांत तो है ही साथ ही महानगर, मेलें, उत्सव के भीड़ भरे वातावरण में गायब होना भी शामिल है जहाँ नवसीखिये प्रथम स्थिति में स्वयं को गायब मानते है तो शातिर अपराधी अपने आप को भीड़ में अदृश्य कर लेते है। महानगरों में इसी तरह के अपराध बहुत होते है।
अब आपने प्रारम्भ में स्वयं को ईमानदारी से यदि जवाब दिया था तो उसके विषय में भी सोचिए। लेख लिखने के पूर्व उक्त प्रश्न लेखक द्वारा अनेकों व्यक्तियों से पूछा गया उनके जवाब समाज की इस आदिम प्रवृत्ति की ओर इशारा करते है । जिस दिन हम अदृश्य होकर भी सामाजिक नियमों को मानने लगेंगे उस दिन हम पूर्णतः पशुत्व से छुटकारा पा कर मनुष्यत्व को प्राप्त कर लेंगे।
विश्व में अपराध समाप्त हो जाएँगे शायद किसी कानून की भी आवश्यकता न हो लेकिन शायद हम निकट भविष्य में पूर्ण मानव नहीं बनने वाले है ! अतः तब तक डर से ही सही हमें मानव दिखते रहना होगा।


आलोक मिश्रा





Saturday, August 24, 2019

चार हाईकू

जिन्‍दगी यूहीं
कट गई मेरी तो
मिला न स्‍नेही

मधुशाला थी
पिया मधु कर्म का
पाठशाला थी

राजनीति में
दल पद नेता है
जोड तोड में

गुलाब बोला
सीखो कुछ कॉंटों से
मै  तो हॅुं भोला

चुनाव आए
अब नेता फिर से
दिखे टर्राए



Saturday, April 13, 2019

बुरा तो मानों ...... होली है (व्यंग्य)



बुरा तो मानों...... होली है ( व्यंग्य)



    लो साहब होली आ गई । सब ओर नारा लगने लगा ‘ बुरा न मानो .... होली है ।  वैसे भी हम भारतियों की परंपरा रही है कि होली हो या न हो हम बुरा नहीं मानते । देश का पैसा कोई माल्या या कोई मोदी ले भागता है , हमें बुरा नहीं लगता । हमें तब भी बुरा नहीं लगता जब गाय के लिए इन्सान को मार दिया जाता है  और तो और पाकिस्तान हमारे सैनिकों को मारता रहता है तब भी हमें बिलकुल बुरा नहीं लगता । हम इस वाक्य को अपने जीवन में इस कदर उतार चुके है कि जब हम खुद अपने दफ्तर या स्कूल -कालेज देर पहुॅचते है तो हमें बिलकुल बुरा नहीं लगता । हम रिश्वत देने या लेने में भी बुरा नहीं मानते । ये अलग बात है कि हम हमेषा ही रिश्वत बुरा बताते रहते है ।



    अब केवल होली में बुरा न मानना छोटी - मोटी बात है । हम तो इतने महान है कि अपने नेताओं के बचकाने बयान रोज सुन कर भी बुरा नहीं मानते । नेता जी जो पिछली बार चुनाव जीत गए थे ,पॉच साल तक गायब रहने के बाद पुनः चुनाव के समय आपके चरणस्पर्श करते तो बुरा मानना तो दूर की बात है ; आप तो खुश हो जाते है । प्रवचन देने वाले पाखंडी धर्म गुरूओं के उनकी शिष्याओं के साथ रंगरेलियों के किस्से जब आम होते है तो लोग उसे चट्खारे ले कर पढते, सुनते और चर्चा करते है , बुरा नहीं मानते । कुछ लोग जब यह कहते है कि हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख्ख और इसाई हम सब है भाई-भाई परन्तु हमें आपस में एक दूसरे खतरा है तो भी हमें बुरा नहीं लगता । किसी सरकारी काम के पूरा होने पर पता लगता है कि इस काम में केवल दस प्रतिशत का ही घोटाला हुआ है तो आपको और हमें बहुत संतोष होता है , बुरा नहीं लगता ।



     हम लोगों ने बुरा मानना छोड़ ही दिया है । हम तो यह मानते है कि जो हुआ अच्छा हुआ , जो हो रहा है अच्छा हो रहा है और जो होगा अच्छा ही होगा । इस विचार के साथ हम बड़े ही दार्शनिक अंदाज में अपने आप को सकारात्मक सोच वाला बताने में नहीं चूकते । कुछ लोग इस बात को धार्मिक दृष्टिकोण से भी लेते है । ये दोनों ही विचारों ने हमें बुरा न मानने के लिए ही प्रेरित किया  है । वैसे एक और व्यवहारिक दृष्टिकोण भी है जिसके कारण आप और हम लोग बुरा मानने से बचते रहते है । वो है कि यदि आप बुरा मान भी गए तो किसका क्या बिगाड लेंगे ? ये सारे के सारे दृष्टिकोण ही हमें बुरा मानने से दूर रखते है । बस इसी चक्कर में हमें बहुत सी बुरी लगने वाली चीजें बुरी नहीं लगती ।



     अब समय आ गया है जब आम जनता को बुरा मानना प्रारम्भ कर देना चाहिए । अब हमारा और आपका नारा यह होना चाहिए कि ‘‘बुरा तो मानों ....... होली है ..... या नहीं है । ’’ ओ भाई होली है तो क्या नषा करोगे , होली है तो क्या लड़कियों से छेड़खानी करोगे और होली है तो क्या अभद्र भाषा बोलोगे ? बुरा तो माना ही पड़ेगा यदि बुरा न माना तो यह सब स्विकार्य हो जाएगा । होली में ही क्यों हमें तो बुरी बातों पर हमेशा ही बुरा माना होगा । घोटाले , कालाधन और रिश्वत पर बुरा मानना हमारा अधिकार है , इन पर बुरा लगना ही चाहिए । अफसरों और नेताओं की सांढ-गांढ , भाई - भतीजावाद और जातिवाद या सांप्रदायवाद पर बुरा मानना ही होगा । जो लोग हमें इन्सान न मान कर वोट  और जाति मानते है उन्हें बुरा कहने में कोई बुराई नहीं होनी चाहिए ।



    अब हमें बुरा मानने की परंपरा प्रारम्भ करनी ही होगी । आपको बुरा लगे तो दूसरे को बताओ , वो तीसरे को बताऐगा । इस तरह हमारे आस - पास बुरी चीजें बुरी और अच्छी चीजें अच्छी बनी रह सकती है । बुराई और अच्छाई का अन्तर ही आपके बुरा मानने पर ही निर्भर करता है । अब आप होली मनालो इस नारे के साथ ‘‘ बुरा तो मानों ........ होली है।



       आलोक मिश्रा





..

Monday, April 8, 2019

पाक स्थान (व्यंग्य)


पाक स्थान      (व्यंग्य)

आपने षीर्षक तो ध्यान से पढा है न ? यहॉं हम अपने उस पडोसी की बात नहीं कर रहे है जिसे लाख कोषिषों के बाद भी हम बदल नही सके । हमारा पडोसी पाकिस्तान हमेषा ही हमें अपने दिल में सजाए रखता है । उसके लिए हम इतने महत्वपूर्ण है कि वो जान जाए जलेबी खाए को चरितार्थ करते हुए हमेषा ही घुसपैठ की कोषिष में लगा रहता है अब इसमें उसके कुछ लोग मरते है तो मरते रहे । हमारे इस पडोसी को जब मन आए दीवाली मनाने लगता है । हम हैं कि अपने पड़ोसी की इस हिमाकत पर जल -भुन कर राख होते रहते हैं। हमारे दुबले-पतले कवि कभी पड़ोसी को  धूल चटाते हैं, कभी  नामोनिषान मिटाते है और कभी सबक सिखाने  की बात करते है। ये वे ही हैं जो कभी शायद काकरोच भी नही मार सकते परन्तु उन्हे तो बस जनता को उकसाना हैं और वे उकसाते भी हैं। हमारे हुक्मरान भी ईट का जवाब पत्थर से देने की बातें करते रहते है। अब जब सब कुछ हो ही रहा है तो हमारा ये पड़ोसी अंग्रेजो के जमाने के जेलर की तरह सुधरता क्यों नही है ?

                 आम जनता के पास तो पाकिस्तान को जवाब देने का

कोई तरीका ही नहीं हैं लेकिन हमारी आम जनता ने भी उस पड़ोसी की कारगुजारियों को अपने दिल में बसा कर रखा हुआ हैं । हालत यहॉ तक है कि अब तो हर घर मे पाक स्थान को लेकर सरकार भी चिंतित दिखाई देती है। जिनके घरां में पाक स्थान हैं, वे तो सुबह -सुबह वहॉ  जाकर दो चार बम गिराकर मन को हल्का कर ही लेते हैं। जिनके घरों में पाक स्थान नहीं है वे अक्सर ही सुबह और शाम में पाक स्थान की खोज में सडकों ,खेतों और रेल लाईनों की तरफ लोटा ले कर जाते हुए दिखाई देते है । जब वे पाक स्थान पर बमबारी कर रहे होते है तो उनकी बदले की भावना इतनी बलवती होती है कि वे अपनी शर्म और दूसरां की लाज तक भूल जाते है ।

         साहब , पाक स्थान हमारे घरों का अभिन्न हिस्सा है । किसी महात्मा ने तो इसे मंदिरों से भी अधिक महत्वपूर्ण बताया है । वैसे ऐसा भी ज्ञात हुआ है कि जल्दी ही एक आंदोलन खडा होने वाला है जिसमें किसी महापुरुष के पाक स्थान को पुनः स्थापित करने का संकल्प लिया जा रहा है । अब वे लोग शपथ ले रहे है कि पाक स्थान वहीं बनेंगा । कब बनेगा और कैसे बनेगा ये बाद की बात हैं, लेकिन बनेगा जरुर । वो बने या न बने नारे तो लगाने होगें यही नारे तो सत्ता के गलियारों में स्थान दिलाते है । पाक स्थान  वह जगह है जहॉं आप यदि समय पर पहुॅच जाए तो पाक याने पवित्र हो जाते है ं और देर हो जाए तो नापाक याने अपवित्र उसके साथ ही साथ अधोवस्त्र बदल कर स्नान ध्यान करना होता है । कुछ लोगों को सारा का सारा संसार ही पाक स्थान दिखाई देता है वे जहॉं बैठ गए बस उसे कर दिया पवित्र । अब बाद में उस स्थान से जाने वाला नाक पर रुमाल रख कर जाए तो जाए उनकी बला से । किसी-किसी गॉंव में तो पूरा का पूरा गॉंव ही पाक स्थान को खोजता है और वहॉ इस चक्कर में आज भी बारुदी सुरंगें सुबह और शाम को सडकां के किनारे प्राप्त हो ही जाती है । इस चक्कर में अक्सर ही लोग घायल होते रहते है । वैसे मैं आपको बता ही दूॅ कि अब पाक स्थान हर गॉव में घर-घर तक पहुॅच गया है लेकिन केवल सरकारी कागजों में ।  आपको अब भी लोग पाक स्थान खोजते हुए या बाकायदा  बम गिराते हुए मिल सकते है । इन पाक स्थानों के बनाने वाले अमले का हाजमा अच्छा है क्यांकि जो लोग बाहर पाक स्थान खोज रहे है उनके पाक स्थान इस अमले के पेट में न जाने कब चले गए ये बात किसी को भी नहीं मालूम है । अब यदि हम सीमा की बात करे तो सीमा पर इस अमले को भेज  देना चाहिए इन्होनें पाक स्थान खाए है, ये पाकिस्तान को भी .......................।

                                आलोक मिश्रा



                 
               
             
   
               9425138926

Monday, February 11, 2019

उपवास कैसे रखें ...... व्यंग्य


उपवास कैसे रखें ......    व्यंग्य

          अब साहब आपके ये दिन आ गए कि कोई  मुझ जैसा अदना सा व्यक्ति आपको यह बताए कि उपवास कैसे रखें ? बात बिलकुल भी वैसी नहीं है जैसी आप समझ रहें है । आप किसी भी धर्म या मजहब के हो उसके अनुसार आपको उपवास की पद्धति मालूम है । आपके धर्म के अनुसार ही आपको यह भी मालूम है कि उपवास कब करना है या नहीं करना है । आप यदि लोकतंत्र के नए धर्म अर्थात राजनीति को मानते है या कभी सोचा है कि इस धर्म को अपना सकते है तो आपके लिए इसकी उपवास पद्धति से परिचित होना आवष्यक है । वैसे यदि इस लोकतंत्र में आपकी कोई हैसियत न भी हो याने आप आम जनता हों तब भी सामान्य ज्ञान के लिए आपको इस पद्धति के विषय में मालूम होना ही चाहिए ; न जाने कब इस पर प्रश्न पटवारी या चपरासी की चयन परीक्षा में आ ही जाए । खास लोगों के उपवास के कारण और प्रकार के विवेचन हेतु भी आपको राजनैतिक उपवास पद्धति का ज्ञान होना ही चाहिए ।

       आपको यह बताना भी मै अपना फर्ज समझता हुॅ कि जो कुछ नहीं कर सकते वे ही उपवास करते है यह सोच कर कि शायद भगवान ही कुछ कर दे । यह बात सभी तरह के उपवास पर लागू होती है ।राजनैतिक उपवास के लिए सबसे पहले यह खोजना होता है कि उपवास कब रखें । यह खोज कोई सामान्य खोज तो है नहीं । इस खोज के लिए देष के घटना चक्र से अधिक दूसरी पार्टियों के क्रियाकलापों का ध्यान रखना होता है । अब समझ लीजिए कि दूसरी पार्टी के नेता को छींक आ गई तो आपको खुद छींकते हुए उपवास की घोषणा कर ही देनी चाहिए । फिर आपको सोचना होगा कि वोटों की फसल काटने के लिए आपका अकेले ही उपवास करना पर्याप्त है या यह कार्य भी सामूहिक रूप से किया जाए । ऐसे उपवास पार्टी को एक करने , ध्यान बटाने और बिना कारण भी किए  जा सकते है । इस बारे में राजनैतिक चिकित्सकोंं की राय है कि ये हानिकारक नहीं होते । कभी - कभी  आप उपवास के विरूद्ध भी उपवास कर सकते है। कारणों का विवेचन ही अपने आप में महाकाव्य का रूप ले सकता है इसलिए कम लिखा, ज्यादा बांचें ।

         अब आपको यह भी सोचना होगा कि आप उपवास करने कहॉ जायेंगें । सामान्य आदमी उपवास अपने घर या पूजास्थल पर ही करता है । राजनैतिक लोग उपवास करने अलग-अलग शहरों के मंच पर जाते है । ऐसे मंचों पर जहॉ बसों में भर - भर कर , खिला -पिला कर लोगों को लाया गया हो । राजनैतिक व्यक्ति का उपवास वोटरों को दिखाने के लिए होता है अतः इसकी अवधि उतनी ही होती है जितनी देर उपवासकर्ता मंच पर बैठा है । इससे पहले या बाद में आप आराम से कुछ भी खा या पी सकते है । इस तरह के उपवास से अल्लाह , ईश्वर या गॉड प्रभावित हो या न हो जनता पर प्रभाव तो पडता ही है । एक बात और है कि यदि आप सत्ता में है और अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पा रहे है तो भी आप उपवास रख कर इसके लिए किसी दूसरे को दोषी कह सकते है ।

          अब आप राजनैतिक उपवास के विषय में कुछ बातें जान चुके है । प्रत्येक  कार्य की कुछ सावधानियॉ होती है । सावधानी बतौर आपको बता ही दूॅ कि आपको गलती से जनता के वास्तविक मुद्दों जैसे गरीबी ,बेरोजगारी और भ्रष्टाचार पर उपवास नहीं करना है । इन पर उपवास करने के लिए आम जनता है न । कुछ ऐसे लोग है जो इन मुद्दों पर आमरण अनसन तक कर सकते है लेकिन वे पागल है , सार्थक तो बस एक दिन का उपवास है ।

                                  आलोक मिश्रा


..


Sunday, February 10, 2019

मेरी कीमत क्या है

मेरी कीमत क्या है ?      (व्यंग्य)

        हम  ठहरे एक आम आदमी ........नहीं ... नहीं , जनता..... अरे......नहीं...... फिर राजनैतिक हो गया । खैर आप तो समझ ही गए है कि हम और आप एक जैसे है । अब हमारे नामों पर ही राजनैतिक दल चलने लगे है जिन्होंने हमारा ही नाम बदनाम कर दिया है । तो साहब अब अपने जैसे लोगों को अक्सर ही झोला ले कर बाजारों में देखा जा सकता है । हम भी एक दिन ऐसे ही बाजार में झोले के साथ विचरण करते हुए कुछ सस्ता और सस्ता खोज रहे थे । हमारी मुलाकात जुम्मन भाई से हो गई । जुम्मन भाई आलू और प्याज का धंधा करते है । दुआ सलाम के बाद वे बोल पड़े ‘‘ मिश्रा जी हमारी कीमत क्या है ? ’’ हम तो अचकचा ही गए । सोचने लगे ‘‘हमारी कीमत ....... ।’’ हम जब तक जवाब देते उन्होंने उसके पहले ही दूसरा सवाल दाग दिया ‘‘ अच्छा आप तो षिक्षक हो , वो भी गणित के , ये बताओ सौ करोड़ में कितने शून्य होते है ? ’’ हम मन ही मन शून्य  गिनने में लग गए । जुम्मन भाई शायद आज किसी भी सवाल का जवाब सुनने के मूड में नहीं थे । वे किसी राजनैतिक पार्टी के प्रवक्ता के समान ही केवल और केवल प्रष्न पूछना चाह रहे थे । वे आगे बढ़ कर और प्रष्न मेरी ओर उछालने लगे ‘‘ आप समाचार सुनते हो क्या ? ’’ इसमें सोचना क्या था, बस हमने अपना सिर हाॅं में हिला दिया । वे बोले ‘‘तो आपने सुना तो होगा ही चुनाव के बाद विधायक सौ करोड़ में बिक रहे है ।’’ हमने भी ईमानदारी से अपना सर फिर हाॅं में झटक दिया । वे अब अपनी लय में बोलने लगे ‘‘ बताईए वो चुनाव के पहले अपने आपको ईमानदार बताते है ,वोट हम ड़ालते है और वो  जीतते है, फिर बिक जाते है । यहाॅं हम और आप है झोला ले कर बाजार में घूमते रहते है । ’’ मै बोल ही पड़ा  ‘‘ तो आप ही बताओ क्या करना चाहिए ? ’’  उन्होंने हमारे प्रष्न को जैसे अनसुना ही कर दिया आखिर उन पर प्रवक्तापन जो सवार था । वे बोले ‘‘ अब आप ही बताओ आप की कीमत क्या है ?  ’’ मै अपनी कीमत आंकता उसके पहले ही उन्होने बता दी ‘‘ दो कौड़ी की .........कोई आपको हजार दो हजार में न खरीदे । ’’ हमें अपनी कीमत जान कर बुरा लगा । हमने बुरा सा मॅुह बनाया तो शायद वे समझ गए वे बोले ‘‘ अरे ..... आप बुरा न मानें लेकिन आपकी और हमारी यही कीमत है । माना आप कुछ हमसे अधिक ही कमाते हांेगे लेकिन आपको और हमको कौन खरीदेगा ? बस हमारी कीमत दो कौड़ी की ही है । ’’ जब उन्होने अपने आपको भी हमारे साथ शामिल किया तो हमारे अहम् को संतुष्टि मिली । वे बोले जा रहे थे ‘‘ हम तो अच्छे लोग है और अच्छा कौन होता है ? वही न जो दूसरों के लाभ का कारण बने । बस हम भी अच्छे बन कर इनके लाभ के लिए वोट ड़ाल आते है और वो है जो लाभ कमाते है । ’’ हम सोचने लगे हम जैसे लोगों के पास विकल्प ही क्या है ? हर बार  बेईमानों में से किसी कम बेईमान को चुनने की कोषिष करो और फिर उससे ये अपेक्षा करो कि वो हमारे हित में काम करेगा । जुम्मन भाई सही है जो अब अपनी कीमत पूछने लगे है । उन्होंने तो मुझे भी मेरी कीमत बता दी । मैनें बात बदलने के लिए उनसे पूछा ‘‘ जुम्मन भाई आलू क्या भाव है ?’’ वे बोले ‘‘ आलू के भाव वही है जो कल थे , आपकी हमारी ही तरह । भाव बदले है तो केवल उनके । ’’ हमें लगने लगा आज वे सौ करोड़ के सदमे से बाहर नहीं निकलने वाले । हमने उनसे आलू तौलने को कहा । वे आलू तौलते हुए बोले जा रहे थे‘‘ अब तो साहब हमें भी अपनी कीमतें तय ही कर लेनी चाहिए । अबकी चुनाव आने दो ,  मैने अपनी कीमत न उन्हें बताई तो मेरा नाम भी जुम्मन नहीं । ’’ हम आलू तो ले आए लेकिन सोचते रहे क्या वो लोग सही है शराब और पैसे में बिक कर उन्हें चुनते है और फिर उन्हें मौका देते है बिकने का ? या वो लोग सही है जो जुम्मन जैसों  को धोखा दे कर चुने जाते है  और खुद बिक जाते है ? इस मंड़ी मे सब खुले आम होता है हो सकता है सब सही हों ? इस पूरे नाटक में यह भी तो सही है कि मेरी कीमत दो कौड़ी की है ।

                                                  आलोक मिश्रा


..
थ्त्व्ड रू.
                  ।स्व्ज्ञ डप्ैभ्त्।
               
                 ठ।स्।ळभ्।ज् ;डण्च्ण्द्ध
   
                डव्ण्छव्ण् .9425138926

.......... थ्वतूंतकमक उमेेंहम ..........
थ्तवउरू ष्।सवा डपेीतंष् ढउपेीतंसवावा/हउंपसण्बवउझ
क्ंजमरू 19.डंल.2018 4रू34 च्ड
ैनइरमबजरू चतांेदंतजी
ज्वरू ष्ठींजज ैंीेइष् ढचंकउमेीदमूे/हउंपसण्बवउझए ढमउेमउे6/हउंपसण्बवउझए ढेंरइचमगच31/हउंपसण्बवउझए ष्तंेीजतंदंउंद/लउंपसण्बवउष् ढतंेीजतंदंउंद/लउंपसण्बवउझ
ब्बरू

मेरी कीमत क्या है ?      (व्यंग्य)

        हम  ठहरे एक आम आदमी ........नहीं ... नहीं , जनता..... अरे......नहीं...... फिर राजनैतिक हो गया । खैर आप तो समझ ही गए है कि हम और आप एक जैसे है । अब हमारे नामों पर ही राजनैतिक दल चलने लगे है जिन्होंने हमारा ही नाम बदनाम कर दिया है । तो साहब अब अपने जैसे लोगों को अक्सर ही झोला ले कर बाजारों में देखा जा सकता है । हम भी एक दिन ऐसे ही बाजार में झोले के साथ विचरण करते हुए कुछ सस्ता और सस्ता खोज रहे थे । हमारी मुलाकात जुम्मन भाई से हो गई । जुम्मन भाई आलू और प्याज का धंधा करते है । दुआ सलाम के बाद वे बोल पड़े ‘‘ मिश्रा जी हमारी कीमत क्या है ? ’’ हम तो अचकचा ही गए । सोचने लगे ‘‘हमारी कीमत ....... ।’’ हम जब तक जवाब देते उन्होंने उसके पहले ही दूसरा सवाल दाग दिया ‘‘ अच्छा आप तो षिक्षक हो , वो भी गणित के , ये बताओ सौ करोड़ में कितने शून्य होते है ? ’’ हम मन ही मन शून्य  गिनने में लग गए । जुम्मन भाई शायद आज किसी भी सवाल का जवाब सुनने के मूड में नहीं थे । वे किसी राजनैतिक पार्टी के प्रवक्ता के समान ही केवल और केवल प्रष्न पूछना चाह रहे थे । वे आगे बढ़ कर और प्रष्न मेरी ओर उछालने लगे ‘‘ आप समाचार सुनते हो क्या ? ’’ इसमें सोचना क्या था, बस हमने अपना सिर हाॅं में हिला दिया । वे बोले ‘‘तो आपने सुना तो होगा ही चुनाव के बाद विधायक सौ करोड़ में बिक रहे है ।’’ हमने भी ईमानदारी से अपना सर फिर हाॅं में झटक दिया । वे अब अपनी लय में बोलने लगे ‘‘ बताईए वो चुनाव के पहले अपने आपको ईमानदार बताते है ,वोट हम ड़ालते है और वो  जीतते है, फिर बिक जाते है । यहाॅं हम और आप है झोला ले कर बाजार में घूमते रहते है । ’’ मै बोल ही पड़ा  ‘‘ तो आप ही बताओ क्या करना चाहिए ? ’’  उन्होंने हमारे प्रष्न को जैसे अनसुना ही कर दिया आखिर उन पर प्रवक्तापन जो सवार था । वे बोले ‘‘ अब आप ही बताओ आप की कीमत क्या है ?  ’’ मै अपनी कीमत आंकता उसके पहले ही उन्होने बता दी ‘‘ दो कौड़ी की .........कोई आपको हजार दो हजार में न खरीदे । ’’ हमें अपनी कीमत जान कर बुरा लगा । हमने बुरा सा मॅुह बनाया तो शायद वे समझ गए वे बोले ‘‘ अरे ..... आप बुरा न मानें लेकिन आपकी और हमारी यही कीमत है । माना आप कुछ हमसे अधिक ही कमाते हांेगे लेकिन आपको और हमको कौन खरीदेगा ? बस हमारी कीमत दो कौड़ी की ही है । ’’ जब उन्होने अपने आपको भी हमारे साथ शामिल किया तो हमारे अहम् को संतुष्टि मिली । वे बोले जा रहे थे ‘‘ हम तो अच्छे लोग है और अच्छा कौन होता है ? वही न जो दूसरों के लाभ का कारण बने । बस हम भी अच्छे बन कर इनके लाभ के लिए वोट ड़ाल आते है और वो है जो लाभ कमाते है । ’’ हम सोचने लगे हम जैसे लोगों के पास विकल्प ही क्या है ? हर बार  बेईमानों में से किसी कम बेईमान को चुनने की कोषिष करो और फिर उससे ये अपेक्षा करो कि वो हमारे हित में काम करेगा । जुम्मन भाई सही है जो अब अपनी कीमत पूछने लगे है । उन्होंने तो मुझे भी मेरी कीमत बता दी । मैनें बात बदलने के लिए उनसे पूछा ‘‘ जुम्मन भाई आलू क्या भाव है ?’’ वे बोले ‘‘ आलू के भाव वही है जो कल थे , आपकी हमारी ही तरह । भाव बदले है तो केवल उनके । ’’ हमें लगने लगा आज वे सौ करोड़ के सदमे से बाहर नहीं निकलने वाले । हमने उनसे आलू तौलने को कहा । वे आलू तौलते हुए बोले जा रहे थे‘‘ अब तो साहब हमें भी अपनी कीमतें तय ही कर लेनी चाहिए । अबकी चुनाव आने दो ,  मैने अपनी कीमत न उन्हें बताई तो मेरा नाम भी जुम्मन नहीं । ’’ हम आलू तो ले आए लेकिन सोचते रहे क्या वो लोग सही है शराब और पैसे में बिक कर उन्हें चुनते है और फिर उन्हें मौका देते है बिकने का ? या वो लोग सही है जो जुम्मन जैसों  को धोखा दे कर चुने जाते है  और खुद बिक जाते है ? इस मंड़ी मे सब खुले आम होता है हो सकता है सब सही हों ? इस पूरे नाटक में यह भी तो सही है कि मेरी कीमत दो कौड़ी की है ।

                                                  आलोक मिश्रा