Monday, December 10, 2018

प्रश्‍नों के चक्रव्‍युह

प्रश्‍नों के चक्रव्‍युह

वो कौन थी ?

वो कैसे मरी ?

उसके साथ क्‍या हुआ ?

क्‍या ऐसा रोज होता है ?

ऐसा कब तक होता रहेगा ?

ये लोग कौन है ?

क्‍या उस लड़की के रिश्‍तेदार है ?

ये क्‍यों नाराज है ?

क्‍यों इनके हॉथ हवा में लहराते है ?

ये क्‍यो नारे लगाने को मजबूर है ?

क्‍या ये जनता है ?

क्‍या इसका गुस्‍सा नाजायज है ?

क्‍या ये नासमझी है ?

क्‍या इन्‍हें किसी ने भडकाया है ?

क्‍या इसमें  विदेशी ताकतों का हॉथ है ?

क्‍या ये माओवादी है ?

क्‍या ये आतंकवादी है ?

क्‍या ये देशद्रोही है ?

फिर इनसे उन्‍हे डर क्‍यों लगता है ?

वे जनता पर लाठी क्‍यों चलवाते है ?

क्‍यो आवाज दबाते है ?

फिर वे मांफी क्‍यों मांगते है ?

क्‍या वे जनता से डरते है ?

क्‍या वे जनता से बात करने से डरते है ?

क्‍या वे जनता के बीच आने से डरते है ?

फिर वे जनता के कैसे प्रतिनिधी है ?

क्‍या जनता उन्‍हें अपना प्रतिनिधी मानती है ?

वे क्‍यों डरते है ?

वे  मौन क्‍यों है ?

वे कुछ करते क्‍यों नहीं ?

क्‍या वे कुछ करना नहीं चाहते ?

क्‍या वे कुछ कर ही नहीं सकते ?

क्‍या उनकी इच्‍छाशक्‍ति ही न कहीं है ?

वे किसे बचा रहे है ?

क्‍या वे अपने आप को बचा रहे है ?

वे अपने आप को क्‍यों बचा रहे है ?

उन पर कितनी हत्‍याओं के केस है ?

क्‍या वे हत्‍यारे है ?

क्‍या वे हत्‍यारों के दलाल है ?

उन पर कितनी महिलओं ने आरोप लगाए है ?

उन का कितनी बार डीएनए टेस्‍ट हुआ ?

क्‍या वे बलात्‍कारी है ?

क्‍या वे बलात्‍कारीयों के दलाल है ?

क्‍या वे खदानों के दलाल है ?

क्‍या वे संसद के लड़ाके लाल है ?

क्‍या वे संसद में नोट लहराते है ?

क्‍या वे सरेआम घूस खाते है ?

   क्‍या वे फर्जी कम्‍पनीयॉं बनाते है ?

          क्‍या वे देश का पैसा विदेश पहुँचाते है?

क्‍या दंगे करवाते है ?

क्‍या वे बंदे मरवाते है ?

क्‍या वे देशद्रोही है ?

क्‍या वे देशप्रेमी है ?

क्‍या वे  पकड़े जाऐंगे ?

वे कब तक बच पाएंगे ?

क्या तब समस्‍या का हल होगा ?

क्‍या फिर अमन होगा ?

प्रश्‍न ?

प्रश्‍न ?

प्रश्‍न ?
    मूल प्रश्‍न क्‍या है ?

क्‍या घटना प्रश्‍न है ?

क्‍या लड़की प्रश्‍न है ?

क्‍या जनता प्रश्‍न है ?

क्‍या व्‍यवस्‍था प्रश्‍न है ?

क्‍या राजनीति प्रश्‍न है ?

क्‍या देश प्रश्‍न है ?

क्‍या संसद प्रश्‍न है ?

क्‍या राष्‍ट्रप्रेम प्रश्‍न है ?

क्‍या राष्‍ट्रद्रोह प्रश्‍न है ?

प्रश्‍नों के उत्‍तर कहॉं है ?

उत्‍तर क्‍या हैं ?

तो क्‍या उत्‍तर खोजना है ?

तो क्‍या प्रश्‍नों को फिर से पढ़ना होगा ?

आलोक मिश्रा

बालाघाट म.प्र.

Saturday, December 8, 2018

गड्ढा (व्यंग्य)

                गड्ढा

    पहले चुनाव और अब कौन जीतेगा या कौन हारेगा के शोर में हम और आप लोकतंत्र की सड़क पर पड़े उस बड़े से गड़्ढे को भूल ही गए थे , जिसका इतिहास है कि सरकार कोई भी बनें वो तो वहीं रहता है ।  हाॅ उसका भूगोल अवष्य ही बदलता रहता है । वैसे कुछ लोगों का कहना है कि यह गड़्ढा तब भी वहीं था जब ये सड़क नहीं बनी थी । गड़्ढा है तो उसका सड़क के बीचांे बीच होना तो लाजमी है । बस इस गड़्ढे की महिमा के चलते अक्सर कुछ लोग जो इस गड़्ढे में जाते है  सीधे अस्पताल ही पहुॅचते हैं, कुछ लोग तो उससे भी आगे निकल गए और सीधे स्वर्ग पहुॅच गए । वैसे यदि आप इस गड़्ढे को ध्यान से देखेंगे तो आपको दुनिया के सारे विज्ञान इसी में दिख जाऐंगे । जैसे इस गड़्ढे का रसायन नम मौसम में विलयन के रूप में तो सूखे मौसम में कीचड़ के रूप में होता है । वैसे इसकी भौतिकी भी हमेषा ही गति के नियमों को चुनौती देने में लगी रहती है । बारीकी से देखेंगे तो इस गड़्ढे में गणित, सांख्यिकी, समाजषास्त्र और मनोविज्ञान भी दिखाई दे जाऐंगे । वैसे इस गड़्ढे का जनक तो अर्थषास्त्र ही है , यह वही अर्थषास्त्र है जिसका प्रयोग ठेकेदार अधिकारियों को और अधिकारी नेताओं और मंत्रियों को खुष करने में करते है । ऐसे अर्थषास्त्र से अक्सर ही गड़्ढों का जन्म होता है ।

      इस गड़्ढे पर राजनीति तब प्रारम्भ हुई जब एक विपक्षी नेता की उपपत्नी इस गड़्ढे से होते हुए अस्पताल पहुॅच गई । बस चैनलों को मसाला मिल गया उनके लिए यह खबर देष की समस्याओं में सबसे पहले दिखने लगी । बस वाद-विवादों का दौर प्रारम्भ हो गया । सरकार के प्रवक्ता ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि ‘‘ यह गड़्ढा उस समय का है जब वर्तमान विपक्ष सत्ता में था इस कारण इस गड़्ढे को भरने में कम से कम दस - पंद्रह साल तो लगेंगे ही । ’’ उनका कहने का मतलब बिलकुल ही साफ था कि गड़्ढा तो हम भरेंगे लेकिन दो- तीन बार सत्ता का सुख भोगने के बाद । विपक्ष के प्रवक्ता का कहना था ‘‘ हम स्वीकार करते है कि यह गड़्ढा हमारे समय का ही है लेकिन ये रोड़ भी तो हमने ही बनवाई थी । ’’ बहस और तेेेेेेेेेेज हुई तो गड़्ढे का जाति और धर्म भी बताया जाने लगा । इस बहस की दिषा ऐसी बदली कि कुछ लोगों ने इस गड़्ढे को सांप्रदायिक साजिष बता दिया । ऐसा करके वे केवल और केवल अपनी- अपनी भेेड़ों को अलग करने का प्रयास कर रहे थे । इस गड़्ढे पर जितना समय चैनलों पर वाद-विवाद हुआ उस से कम समय में वो गड़्ढा भरा भी जा सकता था । इन लम्बी -लम्बी बहसों में अक्सर तो गड़्ढा दृष्य से गायब ही रहता । कभी- कभी नेता आपस में गाली-गलौज करते , एक दो बार तो वे हाथापाई पर भी उतर आए। चैनलों को यह मसाला दिन भर दिखाने के लिए पर्याप्त होता ।

          बहस से कहीं गड़्ढे भरते है बस गड़्ढा वहीं का वहीं है, जस का तस । फिर किसी ने उस गड़्ढे पर एक बोर्ड लगा दिया ‘‘दुनिया में अभियांत्रिकी का अजूबा --- यह सड़क बिना गड़्ढा हटाए बनाई गई । ’’ बेरोजगारी के कारण लोगों के पास फुरसत भी बहुत है और लोगों को तमाषा देखने का शौक भी । बस अब उस गड़्ढे के आस-पास भीड़ जमा होने लगी । एक बोला ‘‘यार मै तो रोज इधर से जाता हूॅ मेरा कभी ध्यान ही नहीं गया । ’’ दूसरा बोला ‘‘ मैं तो एक दो बार गिर भी चुका हूॅ।’’ अब लोगों का उस गड़्ढे से जुड़ाव होने लगा , देखते - देखते वो गड़्ढा दर्षनिय हो गया ।

      सरकार भी इस मौके को कैसे अपने हाथ से जाने देती प्रवक्ता जी बोले ‘‘ देखिये ये गड़्ढा तो सालों से यहाॅ था लेकिन हम ही है जिसने उसे आज इज्जत दिलाई । ’’ विपक्ष कब चुप रहने वाला था वे बोले ‘‘ आप हमारी उपलब्धि को अपना बता रहे है यह तो हमारा था और हमारा ही रहेगा।’’ गड़्ढा वहीं है । यह गड़्ढा ठीक वहीं है जहाॅ लोकतंत्र की सड़क के पहले हुआ करता था । यह गड़्ढा अब बड़ा और बड़ा होता जा रहा है । कुछ लोग इस गड़्ढे को भरना भी नहीं चाहते बस वे सेवा का कालीन इसी गड़्ढे पर बिछाकर बैठते है ।

                                      आलोक मिश्रा   


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                  ।स्व्ज्ञ डप्ैभ्त्।
             
                 ठ।स्।ळभ्।ज् ;डण्च्ण्द्ध
   
                डव्ण्छव्ण् .9425138926

बिना मुद्दे की बकवास ( व्यंग्य)


बिना मुद्दे की बकवास      ( व्यंग्य)
    नमस्ते ....आदाब....सत्तश्रीअकाल....आज फिर शाम के छः बज रहे है और मैं खवीश हाजिर हुँ बिना मुद्दे की बकवास के साथ । आप को बता दें कि यही एक शो है जिसमें मुद्दे को छोड़ कर बाकी सब बातें होती हैं । आज हमेशा की ही तरह हमारा मुद्दा वही है बेरोजगारी,महंगाई,भ्रष्टाचार और विकास । आज हमारे बीच में सरकार की तरफ से बकवास करने के लिए है सम्मानित जी , विपक्ष से सूरपनखा जी और साथ ही साथ कुछ दिखावे के ऐक्सपर्ट होगें जसलोक जी, नोकमेंट जी और बड़बोले जी ।
       तो हम प्रारम्भ करते है मुद्दे को भटकाने के लिऐ सम्मानित जी से " तो सम्मानित जी आपका इन मुद्दों पर क्या विचार है ?" सम्मानित जी ने अपनी जवाबदारी को निभाते हुए प्रारम्भ से ही मु्द्दे को भटकाने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया वे बोले "देखिए ये समस्याऐं हमेशा से ही रही हैं। इन समस्याओं पर बोलनें से चुनाव के समय अच्छे वोट मिलते हैं लेकिन अगर हम इन समस्याओं को हिन्दूओं में हल कर  दें देश प्रगति करेगा और हम ही है जिसने यह करने का साहस किया है ।..."  सूरपनखा जी बीच में कूद पड़ी और बोलने लगीं " आप यहाँ भी हिन्दू-मुस्लिम ले आए और मुस्लमानों का क्या ?" सम्मानित जी बात काटते हुए बोले " देखिए ....देखिए .... हिन्दू शब्द सुन कर ही इनके पेट में दर्द होने लगा । देखो हिन्दू भाईयों ये आपका भला नहीं चाहते ।.... " वे बोले जा रहे थे । सूरपनखा जी भी बोलने लगी "ये मुद्दे से भटका रहे हैं ... हम है उनके हितैषी ......" दोनों बोले जा रहे थे । उनके लिए महत्वपूर्ण यह नहीं था कि उन्हें कोई सुने ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह था कि दूसरे को कोई भी न सुन पाए । खबीश पहले तो मजा लेते रहे फिर चिल्ला-चिल्ला कर दोनों को चुप कराया ।
       अब खबीश को दोनों को फिर से लड़वाना था । खबीश बोला " देखिए बहस बहुत ही सार्थक हो रही है । अब यह बताईए कि इन मुद्दों का मंदिर -मस्जिद से क्या संबंध है । पहले सम्मानित जी बोलें ।सम्मानित जी बोले " देखिए मंदिर-मस्जिद पूरी तरह से इन मुद्दों से जुड़े है । वे लाखों बेरोजगार ही तो है जो मंदिर - मस्जिद पर लड़ने मरने को तैयार हैं और आप को बता दें कि मंदिर-मस्जिद में फंसे लोग महंगाई और भ्रष्टाचार की तो बात भी नहीं करते । मंदिर मस्जिद ही है जिसके कारण देश में दूसरी समस्याओं पर लोग धरना,प्रदर्शन और आंदोंलन करने से बचे रहते है.....।" सूरपनखा जी " बस....बस... आप लोगों को भटकाते है । आपके लिए मंदिर-मस्जिद मुद्दा है महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है । " सम्मानित जी चिल्लाते हुए बोल पड़े " देखिए....देखिए देश की आस्था से खिलवाड़ करने वालों को , चोरी करके घर भरने वालों को ,इनके लिए मंदिर-मस्जिद मुद्दा नहीं है । अच्छा इतना ही बता दें कि मंदिर बनाना है या मस्जिद ? " सूरपनखा जी फिर फंस गई बोली" देखिए ये हमारे लिए भी आस्था का प्रश्न है लेकिन यहाँ यह मुद्दा नहीं ..... " सम्मानित जी चीख पड़े "देखिये इनके पास जवाब नहीं है । ये तो जलेबी बना रहीं है ......। " फिर दोनों में सरेआम तू तू मैं मैं होने लगी ।
    बिचारे एक्सपर्ट खिड़कियों से झांकते विद्वता का परिचय देने के प्रयास में लगे थे । अब खबीश को उन पर तरस आ ही गया । खबीश बड़बोले जी की ओर इशारा कर के बोले " देखिए इस सार्थक बहस में आप भ्रष्टाचार पर बोलिए ।" बड़बोले जी तैयारी के साथ आए थे बोलने लगे " देश में महंगाई की दर.... प्रतिशत है ,बेरोजगारी की दर ....प्रतिशत है और भ्रष्टाचार को नापने का कोई पैमाना नहीं है ....। " खबीश बीच में ही बोल पड़े " बड़बोले जी हमारा दर्शक मनोरंजन के लिए बैठा है और आप है कि उसे आंकड़ों में उलझा रहे है । साफ-साफ बताईए कि इन समस्याओं का हिन्दू- मुस्लमान से क्या संबंध है ? " बड़बोले जी की विद्वता की सीमा के बाहर का प्रश्न होने के कारण वे चुप ही रहे । खबीश जी ने नोकमेंट  जी से राय मांगी तो वे बोले " देखिए हिन्दू मुस्लिम से देश का भला ही हो रहा है । देश की सारी योजनाओं को धर्म, जाति और साम्प्रदाय में ही चलाना चाहिए । इससे वोटों का गणित सही रहता है । " अब बड़बोले जी को बुरा लग गया वे बोले " ये क्या बात हुई इससे तो देश धर्म, जाति और सम्प्रदायों में बंट जाएगा । सम्मानित जी और सूरपनखा जी को कोई समझ नहीं है ।   " अब विद्वान भी आपस में लड़ने लगे ।
          सूरपनखा जी और सम्मानित जी भी चिल्लाने लगे बड़बोले ने उनके विषय में जो आपत्तिजनक शब्द कहें हैं वापस लें। खबीश भी चिल्ला-चिल्ला कर सब को शांत करने का प्रयास करता रहा ।
             और अंत में खबीश संयत मुद्रा में " तो यह था हमारा शो बिना मुद्दे की बकवास । यह शो दर्शकों के मनोरंजन के लिए था । इसमें कही गई किसी भी बात को दर्शक गंभीरता से न लें । कल फिर मिलेंगे किसी नए मुद्दे में हिन्दू -मुस्लिम तलाशने । नमस्कार ..... आदाब...... सतश्रीअकाल ।
                             आलोक मिश्रा"मनमौजी"