Saturday, March 24, 2018

चूहा घोटाला (व्यंग्य)


        फाईल मंत्रालय में मंत्री जी को ज्ञात हुआ कि पुराने घोटाले की एक फाईल को चूहों ने कुतर दिया , केवल इतना ही होता तो ठीक था परन्तु चूहों ने एक कमीशन की फाईल को भी नहीं छोड़ा । मामला गंभीर था इसलिए चूहा मंत्रालय को सूचित किया गया । चूहा मंत्री जो केवल जातिय समन्वय हेतु मंत्री थे, को कुछ काम मिल गया । चूहा मंत्री ने अपने एक कार्यकर्ता को इस काम हेतु उपयुक्त पाया क्योकि वो दिन भर में दो-चार लोगों से मारपीट तो करता ही था । अब जो आदमी मारने से नहीं हिचकता चूहे तो मार ही सकता है । बस उसे चूहे मारने का ठेका दे दिया गया । 
    एक हफ्ते में मंत्रालय के सवा तीन लाख चूहे मारे गए , याने एक मिनट में लगभग तीन सौ चूहे । यह बात मंत्री जी को बिल से मालूम चली । मंत्री जी को चूहों की संख्या पसंद आई लेकिन बिल की राशि  नहीं । उन्होने राशि को देखते हुए इस अभियान को एक हफ्ते के लिए बढा दिया । अब चूहे भी दुगने थे और राशि  भी । फटाफट भुगतान हुआ , सबने अपना - अपना हिस्सा लिया और सब खुश  हो गए । इतने सारे चूहे मारे जाने की खबर जब बिल्लियों को लगी तो वे नाराज हो गई । इतने चूहे मरे और उन्हें एक भी नसीब नहीं हुआ । बस उन्होने बवाल खड़ा कर दिया । बिल्लियों के अपने चैनल और अखबार थे । वे चूहा घोटाला पर अखबारों में छापने लगी और चैनलों पर विवाद करने लगी । मामला संगीन होता गया । आखिर मुख्यमंत्री को जाॅच की बात स्वीकारनी पड़ी । चूहा मंत्री मान रहे थे कि इतने चूहे मारे गए है । वहीं फाईल मंत्री कह रहे थे कि इतने चूहे मरे है या नहीं उन्हें नही मालूम लेकिन प्रति चूहा एक चूहा मार गोली क्रय की गई है , जिसका बिल लगा है । 
      कुछ राष्ट्रभक्त कुत्ते भी थे । वे बिल्लियों से अलग सोच रखते थे । उनका मानना था कि पाॅच-छः लाख तो चूहा घोटाले में चले ही गए , अब यदि इसकी जाॅच की जाती है तो पचास-साठ लाख जाॅच घोटाले में भी जा सकते है । वे मानते थे कि हर बात की जाॅच करना गलत है । ऐसे मामलों में मंत्री जी को खुद ही स्वयम् को साफ सुथरा घोषित कर देना चाहिए । मुख्यमंत्री को आने वाले चुनावों की फिक्र थी इसलिए वे अपने आपको और मंत्रियों को बेदाग  साबित करना चाहते थे । उन्होने निष्पक्ष जाॅच कुत्तों को सौप दी । जाॅच समिति के समक्ष अनेक प्रष्न थे । क्या चूहे मारना आवश्यक था  ? क्या इतने ही चूहे थे ? क्या सही में इतने ही चूहे मारे गए ? चूहे मारने की विधि क्या थी ? मारे गए चूहों की डेडबाॅडी का क्या हुआ ? आदि ..........आदि । 
      जाॅच समिति अपनी जाॅच में जुट गई । जाॅच समिति ने फाईल मंत्री , चूहा मंत्री से लेकर बिल्लियों और बचे हुए चूहों तक के बयान लिए । चुनाव को देखते हुए जाॅच समिति को रिपोर्ट जल्दी देनी थी । बस आनन- फानन में रिपोर्ट तैयार हो गई । जाॅच समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि ‘‘ मंत्रालय में चूहों की संख्या बहुत बढ़ गई थी । ये चूहे पूराने सत्ता रूढ दल के समर्थक थे इसलिए वे उनके द्वारा किये गए घोटालों की फाईलों को चुन -चुन कर खा रहे थे । भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए इन चूहों को मारना जरूरी था । इन चूहों को मारने के लिए बहुत ही अनुभवी व्यक्ति को यह कार्य सौपा गया था । इस अनुभवी व्यक्ति पर पूर्व से ही दस हत्या के आरोप है अतः उसके अनुभव पर शक नहीं किया जा सकता । 
       चूहों को मारने की प्रक्रिया बहुत ही वैज्ञानिक थी । इसके लिए पहले सर्वे किया गया  और चूहों की गिनती हो गई । इसके बाद चूहों को मारने के लिए गोलियों का क्रय किया गया । अब सभी चूहों की एक आमसभा माननीय चूहा मंत्री की अध्यक्षता में आयोजित की गई । इस आयोजन में चूहों को राष्ट्रहित में बलिदान करने हेतु प्ररित किया गया । उन्हे गोली देने के पहले बताया गया कि गोली तीस मिनट में असर करेगी अतः गोली खाने के बाद उन्हें मरने से पहले समुद्र तक पहुॅच कर उसमें कूदना है । इससे वे मरते- मरते भी स्वच्छता अभियान में भागीदारी भी कर सकेंगे और देष हित में उनकी डेडबाडी को फेकने का खर्च भी बचेगा । 
     इस पूरी रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि यह काम राष्ट्रहित में पूरी मितव्ययता और ईमानदारी से किया गया । भ्रष्टाचार मिटाने के लिए यह कार्यवाही आवष्यक थी । रही बात बिल्लियों की तो वे राष्ट्रविरोधी है । बिल्लियों पर अलग से कार्यवाही की जानी चाहिए । ’’ सरकार इस रिर्पोट से खुश  है और अब बिल्लियांे को मारने की योजना बना रही है । 
                     आलोक मिश्रा   

Sunday, March 18, 2018

कोतवाल की गर्दन ( व्यंग्य )


      एक नगर था, छोटा सा । इस नगर में रहने वाले लोग बहुत ही भोले- भाले थे । वे सुनी बातों को सत्य समझते और जो दिखता उसे परमसत्य । इस नगर का कोतवाल भोला सा दिखता था और इतनी बड़ी दाढ़ी रखता कि उसकी गर्दन दिखाई ही नहीं देती । वैसे भी वो शरीफ लोगों के सामने इस तरह से आता कि गर्दन दिखाई ही न दे । नगर के लोग उसे बिना गर्दन का कोतवाल कहते । एक सर्वे के मुताबिक जिनकी गर्दन नहीं होती वे कुछ भी नहीं खाते , अरे भाई गर्दन में ही तो गला पाया जाता है और कुछ खाना ही हो तो बिना गले कोई क्या और कैसे खाए ? 
    नगर  के लोगों के पास भी उनकी अपनी-अपनी गर्दनें थी परन्तु आम आदमी की गर्दनें हमेशा  ही तीन काम आती है ; पहला सिर का बोझ उठाने के ,दूसरा नारे लगाने के लिए और तीसरा रैली और सभाओं में भीड़ बढ़ाने के लिए । इन कामों के अलावा वो इसी गर्दन से पेट भी भर लेता है । नगर के लोगों को कोतवाल की गर्दन कभी दिखाई न दी ; बस बातों - बातों में यह बात आम हो गई कि कोतवाल कुछ नहीं खाता .......नहीं खाता माने कि ईमानदार है । नगर में कोतवाल की गर्दन न होने और उसकी ईमानदारी के चर्चे आम थे । भोले- भाले लोग इस कोतवाल को अपना आदर्ष मानने लगे । चोर - उचक्कों की बात और थी , वे कभी कोतवाल के सामने न आते , उन्हे अक्सर पीछे से कोतवाल की गर्दन दिखाई दे जाती । वे जानते थे कि कोतवाल दाढ़ी की आड़ में गर्दन छुपा कर खाता है और जम कर खाता है । इन चोर-उचक्कों ने कई बार नगर के भोले -भाले लोगों को समझाने का प्रयास किया परन्तु उन्हें तो कोतवाल की गर्दन कभी दिखाई ही नहीं दी फिर वो कैसे मानते ? 
     एक दिन रात के अंधेरे में चोरों ने एक ऐसी चोरी की कि सारे नगर में सनसनी फैल गई । वे रात में कोतवाल की दाढ़ी ही ले उड़े । कोतवाल अब बिना दाढ़ी का था , एक दम सफाचट । अब उसकी गर्दन सबको दिखाई देने लगी । यह बात नगर में जंगल की आग की तरह फैली कि कोतवाल की गर्दन है । लोग कोतवाल की गर्दन देखने के लिए कोतवाली की ओर चल पड़े । भीड़ इतनी  कि पुलिस को लाठियॉ भांजनी पड़ी । लोगों का विश्वास टूटा था , अब उन्हे मालूम था कि कोतवाल की भी गर्दन है कोतवाल इसे छुपा कर रखता था । गर्दन है तो खाता भी होगा याने कोतवाल भी बेईमान है । सबने कप्तान साहब के पास जा कर कोतवाल की षिकायत की । मामले को तूल पकड़ता देख आनन- फानन में कोतवाल की गर्दन और भ्रष्टाचार पर एक जांच समिति बना दी गई । 
    जांच समिति में भी सब विषिष्ट लोग थे वो भी लम्बी - लम्बी गर्दन वाले  । सो जनता का समिति पर से भरोसा जाता रहा । बस नगर की जनता ने एक आंदोलन खड़ा कर दिया । उनकी मांग थी कि जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और जांच समिति में बिना गर्दन वाले लोग हो । नगर ही क्या पूरे राज्य में सभी मंत्रियों और अधिकारियों कि गर्दनें थी , किसी की छोटी किसी की बड़ी , किसी की पतली तो किसी की मोटी । अब इस मसले के लिए क्या कोई अपनी गर्दन कटवा लें । बहुत हुई बकवास , करने दो आंदोलन । इधर जनता को लगा कि सवाल गर्दन का है तो क्यो न वे अपनी-अपनी गर्दनों का प्रयोग करना ही बंद कर दें । बस जनता भूख. हड़ताल पर बैठ गई । 
        इधर जनता भूखी थी उधर नेताओं को अपनी- अपनी गर्दनों की चिन्ता हो रही थी । आंदोलन लम्बा खिचा तो गई भैस पानी में । चुनाव में भी तो जनता को मुह दिखाना है । मांगें मानी तो परेशानी फिर किसकी गर्दन बचेगी और किसकी फंसेगी । आखिर कप्तान साहब ने हल सुझाया । वे जनता से बोले ‘‘ देखिए आप लोगों की भी तो गर्दनें है लेकिन वे अक्सर ही भूख हड़तालों  के ही काम आती है । आप लोगों से ईमानदार इस राज्य में और कौन हो सकता है ? बस यह तय रहा कि आप लोगों की ही समिति कोतवाल की गर्दन की जांच करेगी । ’’ जनता खुष हो गई । अब उनके ही लोग जनपाल होगे । इस भोली- भाली जनता में भी गर्दन होने की बीमारी के चलते कुछ लोग थे जो अधिकारी और नेताओं से साठ- गांठ करके अपनी गर्दन का प्रयोग अक्सर ही खाने के लिए करते रहते थे । बस ऐसे ही लोगों को पकड़ कर जनपाल बना दिया गया । अब जनता भी खुष और नेता भी । जनपाल अपनी जांच में जुट गया । बंगले में रहता, गाड़ियां  में घूमता और सरकारी सुविधाआें का उपभोग करता । समय बीतता रहा ; जॉच के लिए बनी जनपाल समिति सुविधा लेती रही , जॉच पूरी होती तो सुविधा छिन जाती , बस जॉच चलती रही । जनता के लिए कोतवाल और उसकी गर्दन बीते जमाने का किस्सा होता गया । अब किस्से कहानियों में कभी उस कोतवाल और आंदोलन की बातें हो जाया करती  । 
       एक दिन एक राहगीर उस नगर से गुजर रहा था । उसे एक कचरे के ड़िब्बे में एक पुरानी फाईल मिली । ये वही जांच फाईल थी जिसे जनता भी भूल चुकी थी । राहगीर ने उसे पढा । उसमें लिखा था ‘‘ कोतवाल की गर्दन पर दाढ़ी का नकाब था केवल इसलिए कि उसकी गर्दन कप्तान की गर्दन से जुड़ी थी । कप्तान की गर्दन नेताओं की गर्दनों से और नेताओं की गर्दन मंत्रियों की गर्दन से जुड़ी हुई थी । जॉच समिति के सदस्यों की गर्दनें भी इसी जाल में उलझी हुई थी । इन सब गर्दनों के एक बड़़े जाल में उलझे होने के कारण जांच को तब तक चलता हुआ दिखाया जाए जब तक जनता इसे भूल न जाए । ’’ राहगीर अब सब जानता है लेकिन जनता अब  भी जांच रिर्पोट का इन्तजार कर रही है और गर्दनों के जाल में उलझी है । 
                          आलोक मिश्रा 

Sunday, March 11, 2018

चौराहे का बुत (व्यंग्य)

     

     मै चौराहे का बुत बोल रहा हंॅु । मै वही बुत या मूर्ति हुॅ जिसे स्थापित करते समय भारी भीड़ आई थी । कुछ लोगों ने उस समय मेरे लिए बड़े-बड़े कसीदे गढ़े थे । आज मै अकेला खड़ा हुॅ इसी चौराहे पर । लोग आस-पास से गुजर जाते ,मुझे अनदेखा करते हुए । कभी कुछ लोग आते है भीड़ के साथ और माला पहना जाते है । मै खड़ा रहता हुॅ यहीं अकेला । जब शहर सो जाता है तब भी मै यहीं होता हुॅ । तेज बारिश और तपती हुई धूप में भी मै यहीं खड़ा रहता हुॅ । मेरे कई रूप हो सकते है मै गॉधी हो सकता हुॅ , मै अंबेडकर हो सकता हुॅ और मै लेलिन भी हो सकता हुॅ । 
     मै कोई भी होउॅ , मेरा इस मूर्ति से पहले भी अस्तित्व था , जीता - जागता और विचारवान । मै जिस भी रूप में था विचारों के साथ था । यदि मै गॉधी था तो सत्य और अंहिसा के प्रयोग कर रहा था , यदि मै अंबेडकर था तो जातिप्रथा के विरोध में खड़ा था और यदि मै लेलिन था तो पूंजीवाद का विरोध कर रहा था । ये करने में मेरी सोच और विचार ही मेरे आगे- आगे चलते थे । विचार जिन्हें विचारों से ही हराया जा सकता है । विचार जो किसी व्यक्ति को इतना महान बना देता है कि लोग उसकी मूर्ति चौराहे पर स्थापित कर देते है । 
     मैने कुछ सालों पहले सुना था कि तालिबान ने बुद्ध की मूर्ति को बम से उड़ा दिया । फिर सुनने में आया कि ईराक में सद्दाम के पतन के बाद उसके रूप में मुझे गिराया गया । अनेंक घटनाऐं इधर-उधर होती रही और लोग किसी न किसी रूप में मुझे तोड़ते रहे । इस देश में हम खुश थे क्योंकि यहॉ ऐसा कोई पागल ही कर सकता है । अब ऐसा लग रहा है हमारे  यहॉ भी पागलपन बढ़ने लगा है । अब दिन में  चारों ओर से लोग गुजरते है तो अच्छा लगता है लेकिन रात के अंधेरे में ड़र लगने लगता है । ड़र इस बात का कि रात के अंधेरे में कोई समूह अंधेरे से निकल कर आएगा और मुझे तोड़ देगा । मुझे अपने टूटने का ड़र बिलकुल भी नहीं है । मुझे ड़र इस बात का है कि कुछ लोग जो शायद मुझे दिखावे के लिए ही सही मुझसे जुड़े चेहरे के विचारों को मानते है की भावनाएॅ आहत हो जाऐंगी । फिर वो निकल पड़़ेंगे दूसरों की भावनाओं को आहत करने । ये सिलसिला कुछ मौतां और दंगों पर भी समाप्त हो सकता है । ये सब मुझसे जुड़े चेहरे के विचारां की पराजय है । 
      मुझे ड़र लगता है कि मेरे विरोधी मुझे तोड़ कर विरोध जता सकते है । मुझे ड़र लगता है कि मेरे कुछ समर्थक भी मुझे तोड़ कर भीड़ जुटा सकते है । मुझे ड़र इसलिए भी  लगता है कि विचारशून्यता के इस युग में अब मेरे विचार किताबों में बंद हो कर न रह जाऐं । वो किताब जो कभी पढ़ी नहीं जाती । वो किताब जो किसी अलमारी में बंद है और उस पर ताला पड़ा है । अब तो वो ताला भी जंग खाने लगा है । भीड़ के इस युग में  विचारों से भी बड़ा वो है जो बड़ी भीड़ जुटा लेता है । इसी भीड़ को जुटाने के लिए कभी लोग मुझे बनाते है और कभी तोड़ते है । मुझे जीवन काल में गॉधी होने पर कभी अंग्रजों से ड़र नहीं लगा ,  अंबेडकर होने पर सवर्णों से भय नहीं लगा और सुभाष होने पर युद्ध से भय नहीं लगा । आज अपनों से भय लगता है, शांति काल में भय लगता है। मेरे अलग- अलग चेहरों में भी मतभेद थे परन्तु यदि वे समकालीन थे तो साथ-साथ काम भी करते रहे । आज जो लोग मूर्तियॉ तोड़ रहे है यदि वे मेरे चेहरे के समकालीन होते तो  वे उन्हे जीवित भी न रहने देते , इस डर से  वे न तब भागे  और न आज भागने की स्थिति में है । हवा का रूख देख कर लगता है कि ये तो बस तालिबानी युग की शुरूआत भर है ।
                           आलोक मिश्रा 

Sunday, March 4, 2018

बुरा तो मानो होली है (व्यंग्य )


बुरा तो मानों...... होली है   

                                                ( व्यंग्य)


           लो साहब होली आ गई । सब ओर नारा लगने लगा ‘ बुरा न मानो .... होली है । वैसे भी हम भारतियों की परंपरा रही है कि होली हो या न हो हम बुरा नहीं मानते । देश का पैसा कोई माल्या या कोई मोदी ले भागता है , हमें बुरा नहीं लगता । हमें तब भी बुरा नहीं लगता जब गाय के लिए इन्सान को मार दिया जाता है और तो और पाकिस्तान हमारे सैनिकां को मारता रहता है तब भी हमें बिलकुल बुरा नहीं लगता । हम इस वाक्य को अपने जीवन में इस कदर उतार चुके है कि जब हम खुद अपने दफ्तर या स्कूल -कालेज देर पहुॅचते है तो हमें बिलकुल बुरा नहीं लगता । हम रिश्वत देने या लेने में भी बुरा नहीं मानते । ये अलग बात है कि हम हमेशा ही रिश्वत को बुरा बताते रहते है । 

               अब केवल होली में बुरा न मानना छोटी - मोटी बात है । हम तो इतने महान है कि अपने नेताओं के बचकाने बयान रोज सुन कर भी बुरा नहीं मानते । नेता जी जो पिछली बार चुनाव जीत गए थे ,पॉच साल तक गायब रहने के बाद पुनः चुनाव के समय आपके चरणस्पर्ष करते तो बुरा मानना तो दूर की बात है ; आप तो खुश हो जाते है । प्रवचन देने वाले पाखंडी धर्म गुरूओं के उनकी षिष्याओं के साथ रंगरेलियों के किस्से जब आम होते है तो लोग उसे चट्खारे ले कर पढते, सुनते और चर्चा करते है , बुरा नहीं मानते । कुछ लोग जब यह कहते है कि हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख्ख और इसाई हम सब है भाई-भाई परन्तु हमें आपस में एक दूसरे खतरा है तो भी हमें बुरा नहीं लगता । किसी सरकारी काम के पूरा होने पर पता लगता है कि इस काम में केवल दस प्रतिशत का ही घोटाला हुआ है तो आपको और हमें बहुत संतोष होता है , बुरा नहीं लगता । 
              हम लोगों ने बुरा मानना छोड़ ही दिया है । हम तो यह मानते है कि जो हुआ अच्छा हुआ , जो हो रहा है अच्छा हो रहा है और जो होगा अच्छा ही होगा । इस विचार के साथ हम बड़े ही दार्शनिक अंदाज में अपने आप को सकारात्मक सोच वाला बताने में नहीं चूकते । कुछ लोग इस बात को धार्मिक दृष्टिकोण से भी लेते है । ये दोनों ही विचारों ने हमें बुरा न मानने के लिए ही प्रेरित किया है । वैसे एक और व्यवहारिक दृष्टिकोण भी है जिसके कारण आप और हम लोग बुरा मानने से बचते रहते है । वो है कि यदि आप बुरा मान भी गए तो किसका क्या बिगाड लेंगे ? ये सारे के सारे दृष्टिकोण ही हमें बुरा मानने से दूर रखते है । बस इसी चक्कर में हमें बहुत सी बुरी लगने वाली चीजें बुरी नहीं लगती ।
             अब समय आ गया है जब आम जनता को बुरा मानना प्रारम्भ कर देना चाहिए । अब हमारा और आपका नारा यह होना चाहिए कि ‘‘बुरा तो मानों ....... होली है ..... या नहीं है । ’’ ओ भाई होली है तो क्या नशा करोगे , होली है तो क्या लड़कियों से छेड़खानी करोगे और होली है तो क्या अभद्र भाषा बोलोगे ? बुरा तो माना ही पड़ेगा यदि बुरा न माना तो यह सब स्विकार्य हो जाएगा । होली में ही क्यों हमें तो बुरी बातों पर हमेशा ही बुरा माना होगा । घोटाले , कालाधन और रिश्वत पर बुरा मानना हमारा अधिकार है , इन पर बुरा लगना ही चाहिए । अफसरों और नेताओं की सांढ-गांढ , भाई - भतीजावाद और जातिवाद या सांप्रदायवाद पर बुरा मानना ही होगा । जो लोग हमें इन्सान न मान कर वोट और जाति मानते है उन्हें बुरा कहने में कोई बुराई नहीं होनी चाहिए । 
              अब हमें बुरा मानने की परंपरा प्रारम्भ करनी ही होगी । आपको बुरा लगे तो दूसरे को बताओ , वो तीसरे को बताऐगा । इस तरह हमारे आस - पास बुरी चीजें बुरी और अच्छी चीजें अच्छी बनी रह सकती है । बुराई और अच्छाई का अन्तर ही आपके बुरा मानने पर ही निर्भर करता है । अब आप होली मनालो इस नारे के साथ ‘‘ बुरा तो मानों ........ होली है। 
आलोक मिश्रा