Sunday, February 4, 2018

वो कहां गया .... ( कविता )




जीवन की आपाधापी में वो कहां गया, वो किधर गया ।

वो सखा बचपन का था वो कहां गया,वो किधर गया ।।

         वो साथ ही मेरे हंसता था ।
         वो मेरे साथ ही रोता था  ।
         वो सोता था तो दिखता था ।
         वो उठता था तो दिखता था
वो चेहरा था अनमोल न जाने कहां गया, वो किधर गया ।।
         वो साथ ही खेला करता था ।
         वो साथ ही लड़ता रहता था ।
         वो छीन के मुझसे खाता था ।
         मंै उसको मारा करता था  ।
वो पेट की आग बुझाने को न जाने कहां गया, वो किधर गया ।।
         वो चोर तो मंसिपाही बन जाता ।
         वो राजा तो मंै मंत्री कहलाता  ।
         वो मेरे कंचें तोड़ा करता था ।
         वो मेरे भौरे फोड़ा करता था ।
वो खेलों की मस्त ड़गर छोड़ न जाने  कहां गया, वो किधर गया ।।
         वो अमरार्इ में आमों सा ।
          वो बेरियों में कांटों सा  ।
        वो कटहल की भीनी खुशबू सा ।
      वो चार की दोहरी परतों सा ।
वो हम चोरों के इस उपवन को छोड़ न जाने कहां गया, वो किधर गया ।।
      वो मिला अचानक चौराहे पर ।
      वो गले लग कर रोया था    ।
      वो खुशबू खुली छोड़ गया था ।
      वो यादें ताजा कर गया था   ।
वो यादों के समंदर में छोड़ न जाने कहां गया, वो किधर गया ।।

जीवन की आपाधापी में वो कहां गया, वो किधर गया ।वो सखा बचपन का था वो कहां गया, वो किधर गया ।।

                                 
आलोक मिश्रा