Monday, January 29, 2018

कालीपुतली बोल रही हूं




                 ये गांव से विकसित होता छोटा सा कस्बा था । इस शहर में कुछ सड़कें ऐसी भी थी जिन पर रातों को लोग जाने से कतराते थे । आज मै जहां हूं वहां से ही कभी शहर का वीराना प्रारम्भ होता था । इस शहर कें कुछ कलाकारों नें मुझे कागज पर उकेरा । चि़त्र से निकाल कर मुझे अपने घड़े से छलकते पानी और उसमें भीगते हुए वस्त्रों के साथ फौहारे के बीच चौराहे पर बिठा दिया गया । मेरे काले रुप ने मुझे एक अलग ही आकर्षण और कलात्मक रुप प्रदान कर दिया । फिर न जाने किसने मुझे नाम दे दिया ''कालीपुतली। तब से आज तक मैं बस आप लोगों को आते-जाते हुए देख रही हुं । आज यह चौक मेरे ही नाम से जाना जाता है । मै दुनिया भर में और कहीं भी नहीं केवल और केवल यहीं हूं । विश्वस्तरीय कलाकरों की नज़र मुझ पर नहीं पड़ी । इसका कारण मेरी या मेरे बनाने वाले की कोर्इ कमी न होकर इस क्षेत्र का अपेक्षाकृत पिक्षड़ा होना है । कभी मंै सोचती थी कि कला के कद्रदान जरुर ही मेरे आसपास जमा हुआ करेंगे लेकिन ऐसा हो न सका ।
अब बदलते प्रशासनों के बीच कभी मैं जगमगाती रोशनी में रोज ही नहाती हुं तो कभी पानी की एक बूंद और रोशनी को तरस जाती हुं । कुछ लोग मुझे नारी के अपमान के रुप में देखते है उन्हें मेंरा यहां बैठे रहना अच्छा नहीं लगता तो कुछ लोग मुझे यहां की संस्कृति से जोड़ कर देखते है । मेरे लिए विवादों का होना या न होना कोर्इ मायने नहीं रखता । मंै चुपचाप अपने घड़े के साथ एक पैर आगे की ओर किए हुए उठने को उ़द्धयत निर्विकार भाव से नवनिर्मित अहिंसा द्वार की ओर निहारती हुर्इ बैठी हुं । मुझे किसी की प्रतिक्षा नहीं है पर लगता है कि मंै किसी की अनंत प्रतिक्षारत हूं ।
                  अब मेरे आसपास पहले सा शांत वातावरण नहीं रहा । शहर के कोलाहल से मेरे साथ ही साथ बड़े-बड़े महान लोग जो चौराहों पर विराजमान है अब परेशान दिखार्इ देते है । शहर भर में होने वाले धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक कार्यक्रम मेरे सम्मुख आए बिना समाप्त ही नहीं होते । वे डी.जे. की धुन पर शैतानों की तरह नाचने का पुनीत कर्म करते हुए आस-पास के लोगों की तकलीफों को भूल जाते है । यातायात रुकता है तो रुके उनकी बला से ..... उन्हें नाचना है....... तो बस नाचना है । उस पर तुर्रा यह कि मेरे आस-पास कान फोडू फटाके फोड़ना भी आवश्यक ही है । यदि इस दौरान कोर्इ चैनल या समाचार पत्र का कैमरा नज़र आ जाए तो समझ लीजिए गदर ही हो गया । बाजू वाले को धक्का दे दो उसकी पीठ पर चढ जाओ लेकिन कैमरे में दिखना जरुरी है ।
                 ऐसा नहीं कि मेरे आस-पास केवल इसी तरह के आयोजन होते है । आजकल मेरे ठीक सामने कुछ धरने प्रदर्शन और आंदोलनों के पंड़ाल भी लगाए जाने लगे है । ये धरने, प्रदर्शन और आंदोलन ,प्रशासन और उन लोगों तक आवाज पहुंचाने के लिए होते तो उन अधिकारियों के दफतर या उन लोगों के घरों के सामने होते । ये सारे आंदोलन तो आपको गुमराह करने के लिए या अपनी नेतागिरी चमकाने की नियत से होते है । इन पंडालों में अधिकांशत: तो पाच -दस लोग ही बैठ कर पूरे शहर या क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते है । मेरे सामने बैठने वालों को रास्ता चलने वालों की भीड़ मुफत में मिल जाती है और मुफत का माल कोर्इ छोड़ता है क्या ?
              मेरे आस -पास जिंदाबाद -मुर्दाबाद के नारे लगाते लोगों की भीड़ अक्सर ही आती- जाती रहती है । कभी-कभी तो भीड़ अपने किसी नाते- रिश्तेदार का पुतला लाकर किसी शमशान घाट की तरह ही मेरे सामने जलाती है या जलाने का प्रयास करती है । ऐसे पुतले अक्सर ही भीड़ से अधिक पुलिस को प्रिय होते है इसलिए उसके जलते ही उसे बचाने के लिए पुलिसवाले बड़ी ही बेर्इज्जती के साथ जूतों से रौंद -रौंद कर उसे बुझाने का प्रयास करते देखे जाते है । ऐसे समय पर यदि आप पुतले से नज़र हटा कर मेरे चेहरे की ओर देखें तो आपको मेरी मुस्कान भी साफ दिखार्इ देगी । अब मेरे आस-पास मेरी कुछ संगी- साथी भी सब्जी -भाजी बेच कर गुजर -बसर करने का प्रयास करने लगी है । उनके होने से मेरा अकेलापन दूर हो जाता है । आजकल विज्ञापनों के जमाने में लोग मेरे आस-पास इतने अधिक बैनर और पोस्टर लगाते है कि आप लोगों का ध्यान मुझ पर जा ही नहीं पाता ।
             शामों को मेरे दाहिनी ओर से अध्ययन करके लौटते छात्र जहां मन को प्रसन्न कर देते है वहीं बायीं ओर जाम से जाम टकराने वाली टोलियां मुझे शर्मिन्दा करती है ।मेरी पीठ की ओर से आती हुर्इ सड़क को मेरे लिए देख पाना सम्भव नहीं हो पाता । उस ओर से आने वाले लोगों की नज़रें मुझे अपनी पीठ पर चुभती हुर्इ लगती है तेा मै शर्म से पानी -पानी हो जाती हूं । गंदगी से बजबजाते पार्क से कुछ दूर ठेलों और खोमचे वालों की धमाचौकड़ी और अस्तव्यस्त से आवागमन के बीच मंै बैठी हूं । मंै कालीपुतली बोल रही हूं ..... इस वातावरण में मंै बैठी हूं ........ऐसा आपको लगता है । एक बार ध्यान से देखिए........ मैं बैठी हूं....... या ......उठने का प्रयास कर रही हूं । यदि आपकी नज़रों में कला को देखने और परखने की योग्यता है और आप कला, सौन्दर्य और संस्कृति के स्वरुप को एक ही स्थान पर देखना चाहते है तो एक नज़र मुझ पर ड़ालें । मैं कलीपुतली हूं..........।

आलोक मिश्रा — with Abha Mishra and 18 others.


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Sunday, January 14, 2018

मोहब्बत ( व्यंग्य )

   
            आजकल  मजनु बहुत ही उदास है । वो खोया-खोया रहता है । रेडि़यो पर बज रहे जुदार्इ के गीत तो उसे रुला ही देते है । उसके यार-दोस्त भी हैरान और परेशान हैं। ये लैला -मजनु का किस्सा कुछ ही दिनों पहले आटा चक्की से प्रारम्भ हुआ । यहां मजनु को लैला मिली ; और लैला को मजनु । बस बातों ही बातों में मोबार्इल नम्बरों का आदान-प्रदान हो गया और साथ ही किस्सा चल निकला । मजनु पुराने जमाने का तो था नहीं जो सैकड़ों बार लैला के घर के चक्कर लगाता ; प्यार- मोहब्बत के वादों से भरे प्रेमपत्र लिखता । वो तो एकदम आधुनिक था उसे तो बस एक एस.एम.एस. अर्थात ''शार्ट में समझ या ''लघु समझ संदेश ही करना था । सेकेंड़ों में ही लैला ने हां में जवाब भेज दिया । अब मजनु पर सतारा के गुटके के साथ ही साथ मोबार्इल के काल और एस.एम.एस. जैसे अतिरिक्त खचोर्ं का बोझ और आ पड़ा । अब अक्सर लैला भी उसके मोबार्इल पर भी बैलेंस ड़लवाने का आग्रह कर देती । मजनु को अपने मोबार्इल के साथ ही साथ लैला के मोबार्इल के बैलेंस की भी चिन्ता करनी पड़ती । फिर वे कभी कभार स्कूल ,कोचिंग और दोस्तों के घर जानें के बहाने मिला करते । ऐसे मौकों पर लैला अपना पूरा मुह ढांक कर ही आया करती । इस अवस्था में उसे उसके घर वालों के लिए पहचानना तो कठिन ही था, अक्सर तो मजनु भी पहचान नहीं पाता । फिर वे यहां-वहां घूमते और एक दूसरे से जीने मरने के वादे किया करते । मजनु को भी मालूम है कि उसे पड़ोस के शहर तक जाना भी भारी पड़ता है लेकिन वो चांद-तारों तक जाकर लैला के लिए तोड़ लाने का दम भरता । लैला को भी मालूम है ऐसा झूठ बोलने की पुरानी परम्परा रही है । वो चांद तारों का करेगी भी क्या सो मजनु से पिक्चर , चाट और सूट जैसी हाथ के मैल से खरीदी जा सकने वाली तुच्छ चीजें ही मांगा करती । मजनु तो ठहरा मजनु........... ,उसकी हर मांग को पूरा करने का हर सम्भव प्रयास करता । 
            इस बीच मजनु अपने ही पिता की जेब पर हाथ साफ करते हुए पकड़ा गया । लानत- मलानत के साथ ही पिता जी ने अपनी जेब की सुरक्षा व्यवस्था बढा दी । बस विश्व अर्थ व्यवस्था की ही तरह मजनु के लिए भी आर्थिक संकट का दौर शुरु हो गया । विदेशी सहायता के नाम पर भी दोस्तों से उधार कब तक मिलता ? मजनु की प्रेम कहानी में अब आर्थिक तंगी के चलते वादों का दम निकलने लगा । उसके लिए चांद-तारे तो क्या चाट लाना भी कठिन होने लगा । लैला के तेवर भी बदलने लगे । वो भी अब मिलने के झूठे वादे करने लगी ।  अब वो जब भी मिलने का वादा करती तो न जाने कहीं गायब ही हो  जाती । ऐसे समय उसका मोबार्इल तो अक्सर ही बंद रहता । मजनु अब र्इश्क की दीवानगी में परेशान सा यहां -वहां घूमता । अरे नहीं ............ मजनु पागल-वागल नहीं हुआ है ; वो तो  बस लैला को खोजने और किसी और के साथ पकड़ पाने के अंदेशे में ही पूरे शहर की खाक छानता रहता है । मजनु को एक दिन पता लग ही गया कि लैला ने अपने नम्बर के साथ ही साथ मजनु भी बदल लिया है । मजनु ने बहुत बक-झक की लेकिन लैला भी तो लैला ही थी । अब वो किसी के साथ कार में जाया करती और बड़े-बड़े होटलों में खाया करती । मजनु निराश-हताश उसे अकेले में भी गालियां दिया करता । 
        अब मजनु बेवफार्इ के गीत ,गज़ल और कविताएं लिखता । गम गलत करता हुआ मधुशालाओं में देखा जाता । एक दिन मधुशाला में उसे उसके जैसा ही एक आदमी मिला । जैसे को तैसा ...............मुलाकातें पैमानों से दोस्ती में बदलती है ...... सो वे दोनों भी दोस्त हो गए । उसने अपना नाम रांझा बताया । उसकी कहानी भी मजनु से कुछ ख़ास अलग न थी । दोनों ठुकराए हुए आशिक थे ,दोनों ही मोहब्बत के मारे थे और दोनों ही अब तक नशे में थे । मजनु ने रांझा से पूछ ही लिया '' मोहब्बत क्या है ? रांझा ने कहा '' मै जो हीर से करता हु वही मोहब्बत है ।  मजनु बोला '' अबे ...... तो मै क्या करता रहा ? रांझा भी तुनक गया '' तेरी तू जान मैने तो मोहब्बत की है ...... बस । मजनु बोला '' लैला और हीर ने जो किया वो क्या है ? रांझा झट से बोला '' बेवफार्इ .....बेवफार्इ । मजनु ने आगे पूछा '' अब वो जो दूसरों के साथ कर रही है वो क्या है ? रांझा को कोर्इ जवाब न सूझा । 
         तभी रोमियो उधर से गुजरा वो पूरी तरह से खुश था और चहक रहा था । रांझा उसे पहले से ही जानता था । उसने उसे भी अपनी टेबल पर ही बुला लिया । रांझा ने रोमियो से पूछा  '' कैसी कट रही है तुम्हारी और जूलियट की आजकल ? रोमियो झटके के साथ बोला '' कौन ...... कौन जूलियट ....? अरे यार ...... वो किस्सा तो पुराना हो गया । उसके बाद तो रीटा,टीना और उर्मिला भी जा चुकी । अब तो रोजी और रोमियो के किस्से आम है । ये किस्सा भी कितने दिन चलेगा कहा नहीं जा सकता । रांझा और मजनु हैरान
रह गए '' ये कैसी मोहब्बत है ? दोनों के मुंह से एक साथ ही निकला । रोमियो अदा के साथ बोला '' क्या यार............. तुम लोग उन्हीं पुराने किस्सों  में उलझे हो । पुराना जमाना गया ....... जब मोहब्बत बस एक ही बार होती थी । उस मोहब्बत में दो ही विकल्प होते थे ......... सफल हुए तो शादी और असफल हुए तो मयखाना मिलता था । मोहब्बत का आधुनिक काल तो बहु विकल्प वाला है ; अब तो रोज ही मोहब्बत बदली जा सकती है । मोहब्बत को जितना बांटिए उतना ही बढती है साथ ही इस विचार से हम आधुनिक भी बने रहते है ।  मजनु और रांझा को लगा उन्हें गुरु मिल गया दोनों ने एक साथ ही पूछा '' हमें भी कुछ ज्ञान दें प्रभु । रोमियो ज्ञानियों सी मुद्रा में बोलने लगा '' तुम लोग बेवकूफ हो ....... बोलो हां......तुम अभी भी पुराने जमाने में जीने की कोशिश कर रहे हो । अबे........... अब एक लैला या हीर खोजो तो हजारों मिलती है । ये क्या ..........एक से मिले और इश्क - इश्क करने लगे । खोजो और मजे करो ...........वो भी तो आधुनिक हो गर्इ है न .....। अब मोहब्बत बेवकूफी का नाम है  ........ समझे ........... । अब मजनु और रांझा अपनी नर्इ खोज में लग गए है । उन्हें आधुनिक समय में सफल आशिक जो बनना है ।
                                        आलोक मिश्रा
                                          



Monday, January 8, 2018

मेरे पिता



पंछी उवाच (व्यंग्य कथा )'


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      ये जंगल बहुत ही अच्छा और सुंदर था । कल-कल करती नदियॉ , हरे-भरे पेड़ों से लदे पहाड़ और जानवरों की बहुतायत । हम जानवरों को सब कुछ इसी जंगल से ही मिलता था । इस जंगल की खासियत यह थी कि अभी इसमें दो पैरों पर चलने वाले जानवरों की घुसपैठ कम ही थी । वैसे भी वे दो पैर पर चलने वाले जानवर अपने लिए अलग ही तरह के कांक्रीट के जंगल बना कर रहते है । हम जानवरों को यदि सबसे अधिक ड़र लगता है तो बस इन्हीं दो पैरों पर चलने वाले जानवरों से ।  ये जानवर सीमाऐं बनाते है , हथियारों का प्रयोग करते है और सबसे बड़ी बात वे हमारे साथ ही साथ अपनी जाति के भी दुश्मन होते है । इन जानवरों में से कभी कभार ही कुछ जानवर इस जंगल में दिखते थे । उनके दिखते ही हम सब जानवर एक दूसरे को इशारा कर देते और छुप जाते ।
     हमारे जंगल में भालू दादा सबसे सयाने और विद्वान है । वे कभी दो पैर वाले जानवरों के इशारों पर नाचा करते थे फिर वहॉ से भाग कर हमारे बीच आ गए । वे बताते है कि जंगलों में जो कभी कभार दो पैर वाले जानवर दिखते है उन्हे सैनिक कहते है । सैनिक याने क्या ? हमें क्या मालूम ? इस पर उन्होने बताया कि दो पैरों के जानवरों में बहुत से भेद है जन्म से , पद से और नियमों से । ये सैनिक बड़े ही जांबाज दो पैरों वाले जानवर होते है ये उनकी सीमाओं की रक्षा और विस्तार के लिए हमेशा प्राण देने को तैयार रहते है । अब हम जानते है कि ये सैनिक हमारे लिए कम और  अपनी जाति के लिए अधिक घातक है ।
    एक दिन अचानक दोनों ओर से बहुत सारे सैनिक जंगल की ओर बढने लगे बड़ी - बड़ी गाडि़यों के साथ । भालू दादा ने बताया कि दो पैरों वाले जानवरों में सीमा को ले कर कुछ विवाद हो गया है इसलिए उनमें युद्ध हो सकता है । यह समझना तो कठिन था कि इस युद्ध में उनका कौन-कौन मरेगा परन्तु हम में से कोई भी मर सकता था । बस हम सब अपनी-अपनी जान बचा कर भाग लिए । हम ड़रे सहमे से छुपे रहे । हमें धमाकों की आवाजें और चीखों का शोर सुनाई देता तथा धुए का गुबार हम दिखाई देता । कुछ दिनों तक यह सब चलता रहा फिर रुक गया । तब हमें पता चला कि हमारे जंगल के बीचो बीच से दोनों ही देषों की सीमा जाती है । अब नदी दूसरे देश  में थी और हमारे घोषले दूसरे देश  में ।
    समय बीतते न बीतते जंगल के बीचो बीच से कठीले तार लग गए । इस ओर कुछ दो पैरों वाले जानवर अपनी मांद में बैठ कर दूसरी ओर के जानवरों को ताकते , वहीं दूसरी ओर भी दो पैर वाले जानवर भी वैसा ही करते । हम जंगल के जानवर उन्हे देखते और हंसते रहते । अब हमें भी तकलीफ होने लगी । हाथीयों का झुण्ड़ जो पानी पीने नदी पर जाया करता था अब दूर के तालाबों पर जाने लगा । भालू दादा अब हमारे न रहे , वे अब तारों के उस पार नदी के छोर पर रहते है । इस बटवारे ने हमें भी बांट दिया । बस हम पंछी है जिन्हें इससे अधिक फर्क नहीं पड़ा । हम सुबह - सवेरे ही उधर चले जाते दाना चुगते और रात को अपने बसेरों पर लौट आते । हमें जाते और आते देख कर दोनों ही ओर के दो पैर वाले जानवर हमें भी शंका से देखते रहते ।
    एक दिन हमारी वजह से भी दो पैर वाले जानवर लड़ने लगेंगे ये हमने कभी सोचा भी नहीं था । हुआ यूं कि एक अवाबील को शरारत सूझी । उसने दाना चुग कर लौटते समय एक अण्ड़ा सीमा पर ही छोड़ दिया । सुबह इस इलाके में गहमा- गहमी थी । उस अण्ड़े को ले कर सीमा पर दो पैर वाले जानवरों के बीच विवाद होने लगा । सीमा पर रखे उस अण्ड़े पर दोनों ओर के सैनिक अपना होने का दावा कर रहे थे । सैनिकों का जमावड़ा बढने लगा । दोनों ही ओर से अण्ड़े पर अधिकार करने के लिए तोप कहलाने वाली गाडि़यों बढने लगी । हम जंगल के जानवरों को लगने लगा कि ये दो पैर वाले जानवर इस छोटे से अण्ड़े के लिए हमारी भी शांति भंग कर देंगे । अब हम सब जानवर एक ओर जमा होकर आनी जान की सलामती के लिए विचार करने लगे । उधर वे जानवर अपने पूरे जानवरपन के साथ मरने - मारने को तैयार हो रहे थे । अब वो अण्ड़ा अण्ड़ा न हो कर दोनों देशों के लिए शान और विजय का प्रतीक बन गया था । धमाकों और गोलियों की आवाजों के बीच दोनों सेनाए अण्ड़े तक पहुॅचने का प्रयास करने लगी । एक देश  की सेना कुछ ही घंटों में वहॉ पहुॅच भी गई लेकिन ...... लेकिन ..... अण्ड़ा कहॉ है ? अण्ड़ा तो एक नेवला ले भागा उसे मालूम जो था कि सारे फसाद की जड़ यही  अण्ड़ा है । दोनों ही देष के बादशाहों ने इस विजय में अपनी फतह की घोषणा कर दी । अवाबील का असली अण्ड़ा तो नेवला ले भागा था लेकिन दोनों ही देषों में और दो अण्ड़ें आज भी उस युद्ध की जीत की याद दिलाते है । हम जानवरों ने इस क्षेत्र की शांति के लिए संकल्प कर लिया कि कोई आस्तीन का सांप भले ही सीमा पर अण्ड़े दे तो दे परन्तु इस जंगल का कोई सांप भी वहॉ अण्ड़े नहीं देगा ।
                                       आलोक मिश्रा
 


Saturday, January 6, 2018

प्रभु जी........ (व्यंग्य)

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   बहुत दिनों से देख रहे हैं कि आप कितने महान है । आपकी महानता के चर्चे दूर-दूर तक है । आप तो वो पारस है जो लोहे को भी छू ले तो सोना बना दे । आपकी महानता के कारण ही अनेंक लोग आपके आस-पास भिनभिनाते रहते है । कुछ लोग तो ऐसे है जो केवल और केवल आपके नाम के सहारे ही समाज में प्रतिष्ठित है । ऐसे लोगों की प्रतिष्ठा वास्तव में उनकी नहीं है ये तो प्रभु आप और आपका नाम है जो उन्हें प्रतिष्ठित बनाए हुए है । प्रभु आपकी प्रभुताई के चलते आपके चम्मच रूपी भक्त ऐसे ऐसे तीर मार सकते है जिनके विषय में सामान्य आदमी तो सोच भी नहीं सकता । वैसे हम भी जनता है और आप तो जानते ही है कि ये जनता है ये सब कुछ जानती है । हमसे आपके चम्मचों की लीलाऐं छुपी नहीं है । आपके कुछ चम्मच तो ऐसे भी है जो यदि आपके चम्मच न होते तो हमारे कस्बे के लोग उन्हें  शहर के बाहर ही कर देते लेकिन प्रभु यह तो आपका ही प्रताप है कि वे चम्मच न केवल शहर में है अपितु सम्मान जनक अवस्था में भी पाए जाते है । आपके कुछ चम्मच अपनी चमचागिरी के दम पर बड़े ठेकेदार हो गए और पहले जो पंचर जोड़ते थे अब लाखों में खेल रहे है । प्रभु कुछ चम्मच आपकी राह पर निकल पड़े है और अब नेता बन गए है । हालाकि उनके नेता बनने में आपके आशीर्वाद की ही प्रमुख भूमिका है परन्तु आपको अपने ऐसे चम्मचों से सावधान तो रहना ही चाहिए ।
     प्रभु आप इस काल में हमारे कस्बे के लिए अवतार है इसलिए आपके भक्तों की भी कोई कमी नहीं है। लोग है कि आपके इन भक्तों को ही चम्मच कहते है । वैसे तो आप भी जानते ही है कि कोई निस्वार्थ भाव से तो चम्मच बनना नहीं चाहता । चम्मच का काम ही होता है स्वयम् की स्वार्थपूर्ति  । प्रभु मैंने देखा है कि आपके चम्मच अपने भगवान से भी पहले आपके पास आ कर आपके दर्शन प्राप्त करते है । आप भी आपके चम्मचों का बहुत ख्याल रखते है । आप उनके कामों के लिए कभी फोन करते है  ,कभी पत्र लिखते है तो कभी स्वयम् सीधे जा कर अपनी लीला द्वारा काम करवा देते है । वैसे प्रभु आपके चमचे भी आपका पूरा खयाल रखते है । उनका काम हुआ नहीं कि वे आपके दरबार में उपस्थित हो कर  आपका चढावा आपको समर्पित कर देते है । प्रभु और भक्त का यह सहसम्बन्ध केवल और केवल हमारे कस्बे में ही देखने को मिलता है ।
       प्रभु आप आश्चर्यचकित न हों कि आज मै अचानक आपका स्तुति गान क्यों करने लगा ? प्रभु मैं ठहरा सामान्य सा आदमी फटेहाल और बेरोजगार । आप नहीं जानते प्रभु इस दुनियॉ में मुझ जैसे लोगों का जीना कितना कठिन है जो किसी का भी चम्मच न हो । मैने ऐसा जीवन जिया है प्रभु और मैं ऐसे जीवन की कठिनाईयों को अच्छी तरह जानता भी हुॅ । कोई अधिकारी तो क्या बाबू और चपरासी भी घास नहीं ड़ालता इसलिए किसी भी आफिस में उसके लिए छोटे से छोटा काम करवाना भी पहाड़ उठाने के समान होता है । ऐसे मनुष्य को पुलिस वाले भी सड़क पर थूकने के जुर्म में ही पकड़ लेते है जबकि आपके चम्मचों को सात खून माफ होते है । ये तो कुछ भी नहीं घर पर घरवाली भी उलाहनें देती कि तुम्हारी तो कोई पहुॅच ही नहीं है । प्रभु मै अपनी इस बेकार सी जिंदगी से तंग हो चुका  हुॅ । अब बचे -खुचे दिन मान- सम्मान और कमाते-धमाते बिताना चाहता हुॅ । प्रभु आप मुझे अपनी शरण में ले लो । मै आपके सब अच्छे और बुरे काम करूॅगा । आप दिन को अगर रात कहेंगे तो मैं भी रात ही कहुॅगा । बस अब आप मुझे अपने चरणों में स्थान दे दो । बस प्रभु आप मुझे अपना चमचा बना लो ............प्रभु ................. ।
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                                                                                      आलोक मिश्रा