Sunday, November 13, 2016

500 ( व्यंग्य )


                                                         पॉंच सौ का नोट
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            अचानक उस सुबह रामलाल की धर्मपत्नि नें उन्हें उठाया । उन्होंने ऑख खोली तो सामने वही पुरानी बीबी को अपने चीरपरिचित अंदाज में पाया । ‘‘ अब उठ भी जाओ , कब तक कुम्भकरण की तरह सोते रहोगे ।  ’’ वो बोल रही थी या चिल्ला रही थी यह बताना मुस्किल ही था । ‘‘ घर पर दूध नहीं है अब चाय काहे से बनाउ । ’’ रामलाल झटपट उठ गए । मुंह पर पानी मारा और निकल गए दूध लेने । दूध की दुकान पर भारी भीड़ थी । रामलाल को लगा कि ये पत्नि पीडि़तों की भीड़ थी परन्तु ये क्या यहॉ तो जेब में पड़े पॉंच सौ के नोट ने दम ही तोड़ दिया । रामलाल को दूधवाले ने बताया कि ‘‘ अब पॉंच सौ और हजार के नोट कागज के टुकड़े हो गए है । ’’ खैर .....  दूध तो उधार मिल गया लेकिन जेब में पड़ा अकेला नोट पूरे निरादर के साथ वापस जेब में चला गया । 
           रामलाल ने वापस आकर सारा वृतांत अपनी पत्नि को बताया । पत्नि को विष्वास ही नहीं हुआ । वो बोली ‘‘ आप भी अनोखी बात करते हो , कभी ऐसा भी होता है क्या ? ’’ रामलाल बोले ‘‘ भागवान ... जमाना बदल रहा है , जो न हो वह थोड़ा है । ’’ खैर .... टी.व्ही. पर समाचार देख कर वे समझ गए कि अब सभी पॉंच सौ और हजार के नोटों की औकात दो कौड़ी की हो चुकी है । रामलाल की पत्नि का मुंह लटक गया । रामलाल सोचने लगे अब क्या करें , घर में तो केवल एक मात्र यह न चलने वाला पॉंच सौ का नोट ही है और पैसे आने के सारे साधन सरकार द्वारा अगले एक - दो दिनों के लिए बंद कर दिए गए है । 
           घर में सब्जी भी नहीं थी । रामलाल को लगा शायद कोई इस नोट से सब्जी दे ही दे । उन्होंने झोला उठाया और सब्जी बाजार का रूख किया । जाते हुए पेट्रोल पंप पर भारी भीड़ को देख कर वहॉं रूक कर माजरा देखने लगे । रामलाल की ही तरह सब की जेबें पॉंच सौ और हजार के नोट उगल रही है । वे नोट जो कभी जेबों की शोभा हुआ करती थी आज सबके लिए बोझ साबित हो रही थी । देने वाला इसे जल्दी अलविदा कहना चाहता था और लेने वाला उसके स्वागत के लिए तैयार ही नहीं था । रामलाल सब्जी बाजार में घूमते रहे , बाजार में रौनक फीकी पड़ी थी । सब इन नोटों से कन्नी काट रहे थे । लौटते समय रामलाल का झोला खाली और पॉंच सौ का नोट वैसा ही लाचार पड़ा था । रामलाल ने सोचा कोई बेकार का सामान ही ले लें तो इस पॉंच सौ के नोट से छुटकारा तो मिले और कुछ छोटे नोट आ जाए । वे अपने इस प्रयास में किराना , फल और चाय - नाष्ते की दुकानों पर घूमते रहे लेकिन ये नोट था कि पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था । फिर वे एक सामुदायिक केन्द्र याने पान की दुकान पर रूक गए । उन्हें मालूम था कि यहॉ कुछ नहीं होने वाला । यहॉं उनके जैसे और भी लोग थे । कुछ सौ- सौ के नोटों वाले अमीर लोग थे तो बहुत से पॉच सौ और हजार के नोटों वाले गरीब लोग । एक अमीर आदमी ने तो खुलेआम रामलाल के पॉच सौ के नोट को कम कीमत में खरीदने की पेषकष भी कर ड़ाली । रामलाल को मालूम है कि पॉंच सौ कमाने के लिए उसने कितना खून - पसीना बहाया है , वो इसे कम में दे तो कैसे ? 
               खाली थैले और भरी जेब के साथ रामलाल घर पहुॅचा तो पत्नि ने सब्जी के विषय में पूछा भी नहीं । बड़े ही प्रेम से चाय ला कर दी , फिर धीरे से बोली ‘‘ क्यो जी अब ये नोट कभी नहीं चलेंगे क्या ? ’’ रामलाल ने चाय की चुस्की ली और न में सिर हिलाया । वो बोली ‘‘ आपको बताऊ .... मैने धीरे धीरे करके आपकी चोरी से इन्हीं नोटों में कुछ पैसे बचाए है ; अब उनका क्या होगा ? ’’ रामलाल को अब अपनी पत्नि के शांत लहजे और तुरंत प्राप्त चाय का राज़ समझ में आ गया । रामलाल धीरे से बोले ‘‘ कितने ? ’’ वो बोली ‘‘ यही कोई बीस ..... बीस हजार है । ’’ रामलाल सोचने लगे इतना काला धन वो भी मेरी सफेद कमाई का मेरे ही घर में ।  वो फिर बोली ‘‘बताईए.......बताईए न अब इन नोटों का क्या होगा ? ’’ राम लाल बोले ‘‘ देखते है क्या होता है ; जो सबके साथ होगा वही हमारे साथ भी होगा । ’’ 
            अगले दिन देष में समाजवाद आ गया । छोटे नोटों वाला अमीर और बड़े नोटों वाला भिखारी हो गया । कालीनों और फर्षों में छुपे नोटों की रातों-रात गिनती होने लगी । अब हर कोई रामलाल की पत्नि की तरह ही पूछ रहा था ‘‘ अब इनका क्या होगा ?’’ रामलाल तो अपने इकलौते पॉच सौ के नोट को ले  कर यहॉ - वहॉ चक्कर लगाते रहे , उसे न टूटना था और न टूटा । यह अलग बात है कि रामलाल के कुछ अमीर मित्रों ने उसे और वैसे ही नोट ले कर अपने बैंक खाते में जमा करवाने को कहा । इस काम के लिए उसे लालच भी दिया । रामलाल को लगा पिछले दो-तीन दिनों से एक अकेले पॉच सौ के नोट ने तो पीछा नहीं छोड़ा , फिर इतने सारे नोट तो न जाने क्या हाल करेंगे । रामलाल को लगा अब केवल बैंक जा कर ही इस नोट से पीछा छुड़ाया जा सकता है लेकिन उसे लगा कि वहॉ तो मंत्री-संत्री , नेता और अफसर बहुत सारे नोटों के साथ आए होगें । बैंक में तो शायद उसे घुसने भी न दिया जाए । बैंक पहुॅच कर वो अवाक रह गया यहॉं तो हजारों लोग जमा थे लेकिन उन लोगों का कहीं अता-पता भी नहीं था जिनके वहॉ होने की सम्भावना थी । उसे लगने लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं सारा काला धन इन छोटे लोगों के पास ही रहा हो ।  अब वहॉ खड़े ही थे कि एक पत्रकार ने अपना माईक अड़ा कर पूछ लिया ‘‘ बताईए ये सब जो हो रहा है कैसा है ? ’’ रामलाल बोले ‘‘ मुझे क्या मालूम सब कहते है अच्छा है तो अच्छा ही होगा , मेरे लिए तो सबसे अच्छा तब होगा जब मै अपनी कमाई को अपनी आवष्यकतानुसार खर्च कर पाऊगा । ’’ 
                                                                                                                       आलोक मिश्रा