Sunday, February 2, 2014

कस्बे का आर्इ.सी.यू. (व्यंग्य )

कस्बे का आर्इ.सी.यू.
         ये एक छोटा सा कस्बा है । इस कस्बे में एक सरकारी अस्पताल भी है । जहां कुछ ड़ाक्टर केवल इसलिए आ जाया करते है कि उनकी तनख्वाह के साथ-साथ घरेलू दवाखाना भी चलता रहे । अस्पताल की सिथति  ऐसी है कि मरीज बस आ कर भर्ती होता है , उसे दवा ,डाक्टर और नर्सों का खर्च स्वयं ही उठाना होता है । खैर ... ये तो हमारे कस्बे के गरीब लोगों के लिए व्यवस्था है । अमीर लोगों के साथ ही साथ अमीर दिखने की चाहत रखने वाले मध्यमवर्गियों के लिए कस्बे के सरकारी डाक्टरों के बडे़-बड़े दवाखाने है। ये दवाखाने सरकारी अस्पतालों की बदहाली , दवाओं और पैथेालाजी आदि के कमीषनों से खड़े है ।
       कुछ समय पहले हमारे शहर का एक छुटभर्इया सरकारी अस्पताल में मर गया। बड़े नेताओं ने आंसू बहाए । कुछ ने कहा ''गरीबों के लिए सरकारी अस्पताल में आर्इ.सी.यू. होना चाहिए।  किसी ने पता करके बताया कि सरकारी अस्पताल में पिछले दस वर्षों से आर्इ.सी.यू. है , उसका उदघाटन भी मंत्री जी ने किया था। कुछ को तो ये भी याद आ गया कि मरे हुए छुटभर्इये ने उसमें कितना कमीषन खाया था । आज इस सरकारी आर्इ.सी.यू. के उपकरण खराब पडे़ है या अस्पताल से बाहर कही है । इन सब बातों के बीच एक डाक्टर साहब को अंदाज हो गया कि यदि उनकी क्लीनिक में आर्इ.सी.यू. की सुविधा हो तो कितना लाभकारी व्यवसाय हो सकता है। सरकारी अस्पताल का आर्इ.सी.यू. तो आज भी बंद पड़ा है । डाक्टर साहब ने अपने एक हाल को आर्इ.सी.यू. में बदल ड़ाला । अब इस आर्इ.सी.यू. में दस-बारह मरीजों को किसी जनरल वार्ड की ही तरह रखा जा सकता है ।
        इस आर्इ. सी.यू. का बड़े ही भव्य तरीके से शुभारम्भ हुआ । इसमे बड़े-बड़े नेता और अधिकारी भी पधारे । इसे कस्बे की शान निरुपित किया गया । खैर साहब ... अब हमारे कस्बे को भी अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त होने का भ्रम होने लगा है । अब बीमारी कोर्इ भी हो डाक्टर के अस्पताल में मरीज को कम से कम तीन दिन आर्इ.सी.यू. में रहना ही पड़ता है । एक साहब की उंगली में फांस गड़ गर्इ , वे उसे साधारण तरीके से नहीं निकाल  पाए । वे जैसे ही क्लीनिक पहुंचे डाक्टर साहब ने उन्हें  बताया कि मामला बहुत ही गंभीर है । यदि शाम तक आपरेषन नहीं हुआ तो वे अल्लाह को प्यारे हो सकते है । मरीज जो चलता हुआ आया था और अपने आपको तंदरुस्त समझ रहा था , अब घबरा गया । उसे डाक्टर साहब में खुदा दिखने लगा । डाक्टर साहब ने सबसे पहले मरीज को आर्इ.सी.यू. के हवाले किया ; फिर ढेर सारे टेस्ट लिखे और बताया कि कहां से करवाने है । फिर दवाओं कि एक लम्बी लिस्ट लिख दी। डाक्टर साहब जानते है कि जितनी अधिक दवाएं उतना अधिक कमीषन के साथ-साथ मरीज और उसके रिष्तेदारों के लिए अधिक गंभीर रोग । अब मरीज आर्इ.सी.यू. में और उसके रिष्तेदार बाहर मोबाइल पर सब को खबर कर रहे है कि ''लाला आर्इ.सी.यू. में भर्ती है । यह खबर दूसरे शहर के रिष्तेदारों को भी की गर्इ । कुछ तो आर्इ.सी.यू. सुन कर तेरह दिन के लिए घर से फुर्सत हो कर निकले । कुछ बेमन से मोबाइल को कोसते हुए मजबूरी में चल दिए । कुछ आस-पास के लोग मरीज को देखने से अधिक आर्इ.सी.यू. को देखने के लिए भागे-दौड़े से पहुंचे ।
       '' देखो भार्इ मरीज को डिस्टर्ब नहीं करना है ,मिलने का समय है एक घंटा शाम को; तभी सबको मिलने दिया जाएगा  नर्स ने बताया । अब बाहर भीड़ लगने लगी एक बोला '' बताइए.... छोटी सी फांस से भी कितनी परेषानी हो गर्इ । सबको अपनी-अपनी ही पड़ी है दूसरा बोला '' सही कहते है आप  फांस तो इन्हे गड़ी है और हम आ रहे है परेषान हो के दो सौ किलो मीटर से। लोग बातचीत करते बैठे रहे । कोर्इ ऐसी बीमारियों से मरने वालों के बारे में बता कर ड़राता ,तो कोर्इ हिम्मत बढ़ाता और कोर्इ अपने को डाक्टर से काबिल मानते हुए इलाज के अपने नुस्खे बताता ।
       आर्इ.सी.यू. के अंदर केबिन में कुछ जूनियर डाक्टर नर्सों के साथ समोसे खाते और ताष खेलते हुए बात कर रहे थे '' वो एक नंबर वाला है न उसे कोर्इ परेषानी नहीं है डाक्टर का कहना है उसे ड़रा कर रखो मोटा आसामी है   एक बोला । दूसरा बोला '' सात नंबर वाला तो खुद ही जाना नहीं चाहता सुना है गिरफतारी वारंट निकला है । तीसरा बोला ''डाक्टर तो मरीज लाने पर भी कमीषन की बात कर रहे थे लेकिन कोर्इ भी बेड खाली नहीं रहना चाहिए । खैर .....शाम को बाहर से आए लोगों ने मरीज को कम आर्इ.सी.यू. को अधिक देखा । बाहर आए तो किसी ने पूछा '' क्या हाल है ... लाला के ? वे बोले '' ठीक है ... लेकिन क्या मस्त ठंडी हवा है , क्या मषीनें ,दिन रात नर्से और डाक्टर .... इसे कहते है आर्इ.सी.यू.... सब रर्इसी के चोचले है भार्इ ।
       अब आर्इ.सी.यू. रुपी छूत की बीमारी पूरे कस्बे के प्राइवेट क्लीनिकों में फैल गर्इ । अब जनरल वार्ड की तरह ही हमारे कस्बे में लोग आर्इ.सी.यू. में भर्ती होते है । ऐसा लगने लगा है कि आर्इ.सी.यू. क्लीनिक की सीमाआें को लांघ कर पूरे कस्बे में छा गया है । अब आम आदमी आर्इ.सी.यू. को  हिन्दी में डाक्टरों का कथन ''मैं देख लुंगा समझने लगे है ।      
                              आलोक मिश्रा