Wednesday, April 17, 2024

गरीबी और झूठ ( व्यंग्य )

     मंडी के पास एक हम्माल दीनू और ठेला चलाने वाला छोटू कुछ देर बैठे थे । दीनू बोला "आज तो मंडी में माल ही नहीं आया, काम है ही नहीं।  है ....कि ...नहीं ।" छोटू ने उसकी हां में हां मिलाई और बोला " आज तो मुझे भी कोई काम नहीं मिला ;न जाने आज क्या होगा? " दीनू सर हिलाते हुए बोला " होगा क्या..... जो कुछ घर में है घर में बचा हो, वह बच्चों का खिलाओ और खुद भूखे सो जाओ; हमेशा की तरह‌। है.... कि.... नहीं। " हाथ ठेले वाला सर तो  हां में हिला रहा था लेकिन उसकी आंखें अनंत में कुछ तलाश कर रही थी ।  वह धीरे से बोला "  सुना है. ... कहीं पांच रूपये में खाना मिलता है वह भी पेट भर । " दीनू हम्माल ठहाके के साथ बोल पड़ा " लो कल्लो बात पांच रूपय में खाना..... हा हा हा । तुम्हारा दिमाग तो ठीक है?  है.... कि.... नहीं।" छोटू भी अपनी बात पर अड़ गया " मैंने सेठ जी की दुकान में टी वी. पर ऐसा कुछ सुना था।" दीनू ने भी जमाना देखा था । वह समझाने पर उतर आया " पहली बात तो यह कि ऐसा हो नहीं सकता; दूसरे तुमने सुना ही है तो वह जरूर ही किसी नेता का भाषण होगा । है‌...  कि . ..नहीं ‌। " छोटू को अपने देखे पर विश्वास था । वह बोला " नहीं यार.... वो तो  चिल्ला-चिल्ला कर बोल रहा था ....दिल्ली में पांच रूपय  में भर पेट खाना । हम्माल बीच में ही बोल पड़ा "  तो खाना खाने दिल्ली चलें ?  है...  कि... नहीं । " छोटू खींझ कर बोला 
" सुनता वुनता तो है नहीं  । दिल्ली हम क्या जाएंगे  ? दिल्ली तो हम भेजते हैं ।  वे जरूर ही सस्ता में खाने के लिए चुनाव लड़ते होंगे है ! खैर.... टी.वी.  पर वह बोल रहा था मुंबई में बारह रूपय में खाना...... । "  अपने शहर का भाव बताया क्या ? "  दीनू बात काटते हुए बोल पड़ा । छोटू को लगा कि दीनू उसका मजाक उड़ा है,वो  तेज आवाज में बोला "  तेरे कूं तो मजाक लगता है तो चल सेठ जी से  पूछवा देता हूं । "  दीनू हम्माल फीकी सी हंसी के साथ हंस दिया और बोला " यार मैं और तू क्या मजाक करेंगे और क्या समझेंगे ? हमारा मजाक तो ये लोग ही उड़ाते हैं । है ...कि... नहीं । "  छोटू को कुछ समझ नहीं आया उसने पूछ लिया " वो कैसे ? " दीनू  की आंखों के सामने झोपड़ी दिखने लगी वह धीरे-धीरे बुदबुदाने  लगा " ये लोग कहते हैं कि हम गरीब लोग कम हो रहे हैं ।  है.... कि... नहीं ‌।  मुझे तो नहीं लगता जहां पहले दो झोपड़े थे वहां आज चालीस- पचास हैं । पहले शहर में दो भिखारी थे । अब गिनना मुश्किल है ...और ये  कहते हैं गरीब कम हो रहे हैं । है  ...कि ...नहीं।"  छोटू को अब कुछ समझ में आने लगा वो कैसे पीछे रहता हाथ मटका कर बोला  " यार तू सही कहता है, पिछली बार वो मुझे और मेरे ठेले के मालिक दोनों को ही गरीब कहते थे ‌। अब मैं गरीब नहीं हूं ...लेकिन वो गरीब है । "  हम्माल को उस पर तरस आने लगा वह बोला  " तेरे पास साइकिल है ...कि... नहीं  । छोटू ने जवाब दिया " है न कबाड़ेवाले  से ली थी  न यार .....‌ ।" दीनू समझदारों की तरह बोलने लगा  " जब तेरे घर सरकारी आदमी..... अरे यार तुम्हारे स्कूल के मास्टर जी आए थे तो तुमने सच ही बोला होगा। है... कि... नहीं । "  छोटू को तो अपनी सच्चाई और ईमानदारी पर बहुत ही नाज है बोला "  हां ...  कैसी बात करता है यार; हम और सच न बोलें । हम गरीबों के पास और है ही क्या ? " दिनू ठेंगा दिखाते हुए बोला " अब चाट अपने सच को .. । अब तू गरीब नहीं रहा ... । है ...कि... नहीं । "  ठेलेवाला छोटू बोला "  हां यार.. झूठ बोल देता तो आज मैं भी गरीब ही रहता । सच बोलने से तो कई गरीब अमीर हो गए होंगे... तो...तो  फिर जो बच गए वह कौन है यार ?है ... कि... नहीं ।  " छोटू जोर से हंसा और ताली ठोकते हुए बोला  "झूठे... हा हा हा...झूठे....हा हा हा ...। " दिनू अपना हिसाब- किताब लगाए जा रहा था  ।  धीरे-धीरे बोला  "अबे  तो फिर सब सच बोलने लगे तो देश में गरीबी नहीं रहेगी ! अबे यार देश अमीर हो जाएगा ....अमीर ...। है. .. कि... नहीं ‌ ।" उन्हें लगने लगा जैसे भी समस्या की जड़ में पहुंच गए । छोटू को देश की सोने की चिड़िया वाली बात याद आ गई । वह बोला " अब समझ में आया कि सोने की चिड़िया इन झूठ बोलने वालों के कारण उड़ गई है । तू क्या कहता है ?  देश की असली समस्या क्या है  झूठ या गरीब ?"।  दीनू दार्शनिक अंदाज में बोला " अबे हम क्यों देश के बारे में सोचें ? जब वह हमारे बारे में नहीं सोचता ।  हम गरीबों को मानव न मान कर एक संख्या माना जाता है  । फिर भी मुझे लगने लगा है ; असली समस्या की जड़ में तो वह भिखारी हैं जो हर पांच साल बाद हमारे दरवाजों पर भीख मांगने आ जाते हैं । असली गरीब तो वे ही हैं  । ....है ...कि... नहीं...। छोटू ने आते हुए ट्रक को देखा और बोला छोड़ यार माल आ गया चल कुछ काम धंधा कर लेते हैं ।
      आलोक मिश्रा "मनमौजी "

जुगाड़ ( व्यंग्य )

         अरे.....आप शीर्षक पढ़कर क्या सोचने लगे? चलिए तो फिर आपकी और हमारी सोच को ही आगे बढ़ाते हैं । हमारा समाज कुछ खास नियमों से चलता है। इन नियमों से हट कर यदि आपको कुछ करना हो तो करना होता है.. " जुगाड़" . . ।    गरीब हमेशा ही अपनी रोजी-रोटी के तो अमीर और पैसे के जुगाड़ में लगा रहता है । नेता वोट के, अभिनेता प्रसिद्धि के और बाबा लोग भक्तों के जुगाड़ में लगे रहते हैं ‌। देखा जाए आप और मैं भी कोई कम तो नहीं । आप इसी क्षण समय काटने के और मैं आपके द्वारा प्रशंसा के जुगाड़ में हूं । इस प्रकार हर कोई किसी न किसी जुगाड़ में लगा हुआ है ।
        इस शब्द के भाषाई विश्लेषण हेतु अनेकों भाषा शास्त्री एक दूसरे के बाल नोच कर और कपड़े फाड़ कर अपने वाद को भाषा के क्षेत्र में स्थापित करने और प्रसिद्धि पाने के जुगाड़ में हैं। यह भी अभी तक शोध का विषय ही है कि यह शब्द भाषा में पहले  आया या प्रयोग में ।
       अब भाषा के क्षेत्र में मेरे इस महान प्रयास के फलस्वरूप अनेकों लोग इस शब्द से जुड़े विषयों जैसे "शोध प्रबंधों में जुगाड़ की भूमिका"," हिंदी भाषा में जुगाड़ का महत्व" और "जुगाड़ू लेखन" आदि पर अपने  गाईड के घर की सब्जियां लाकर और बच्चे खिला कर डॉक्टर अवश्य बन जाएंगे । हमने सोलह कलाएं पढ़ी थी । उन कलाओं में जुगाड़ का उल्लेख भी नहीं था परंतु आज ऐसा लगता है कि इसे सत्रहवीं कला के रूप में मान्य करना ही होगा । इसे कला मान लेने मात्र से ही महामानव, सोलह कलाओं में निपुण कृष्ण से आज का आम आदमी एक कला आगे निकलता हुआ दिखाई देता है । खैर ....साहब सोलह कलाओं की बारीकियां कम ही लोगों को मालूम होगी लेकिन इस सत्रहवीं कला में तो बच्चा - बच्चा पारंगत दिखाई देता है। बीवी को साड़ी चाहिए ;जुगाड़ के लिए रूठ जाती है। पति भी मनाते हुए फंस जाता है । अब उसे भी पैसे का जुगाड़ करना होगा । वो दफ्तर में ही तो पैसे का जुगाड़ कर सकता है । दफ्तरों में भी भटकते, धक्के खाते और चप्पल चटकाते के लोग भी तो आखिर अपने - अपने कामों के जुगाड़ में होते हैं। इन सबके बीच बेचारा पति पैसों का और वे लोग अपने कामों का जुगाड़ बैठा ही लेते हैं । इस प्रकार आप समझ ही गए होंगे की जुगाड़ एक दूसरे से जुड़े होते हैं और पूरे भी होते हैं ।
      कुछ विघ्नसंतोषी लोग इस महति कला को  भ्रष्टाचार आदि नामों से जोड़कर देखते हैं लेकिन वह भूल जाते हैं कि इस कला ने ही तो हमें सामाजिक प्राणी बनाए रखा है । देखिए ना होली ,दिवाली जैसे समय पर बड़े - बड़े अफसरों को मिठाई आदि नहीं खरीदनी पड़ती  क्योंकि सारे जुगाड़ू महापुरुष अफसर के जुगाड़ को पूरा करने में अपना जुगाड़  पूरा होता देखते हैं  । ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएंगे जिन से जुगाड़ के कारण ही सामाजिकता का अनुभव होता है ।
       पिछले कुछ दिनों से हम एक बड़े देश से आर्थिक मदद लेने के जुगाड़ में थे । उनके बड़े नेताओं की खातिरदारी से आखिर जुगाड़ हो ही गया । बस फिर क्या था.... योजनाओं पर योजनाएं बनाई । इन योजनाओं के बहाने सब अपने-अपने जुगाड़ में लग गए  । नीचे बैठे गरीबों को लगा उसका भी जुगाड़ हो ही जाएगा  । बस इस तरह जुगाड़ के चलते ही पराया माल पूरा ही बट गया । ऊपर से लेकर नीचे तक चलने वाले इस अर्थशास्त्र  में जुगाड़ की भूमिका को नकार दें ऐसे निकम्मे को कोई भला अर्थशास्त्री कैसे कह सकता है ? 
      पिछले कुछ समय से देश की जनता कुछ अजीब मूड में है । वह किसी एक पार्टी को बहुमत देने से कतराती है । बस फिर क्या था सब नेता अपनी डफली अपना राग के तर्ज पर छोटी-छोटी पार्टियों में बंट गए लेकिन सरकार में बने रहने के जुगाड़ के साथ । इस प्रकार सरकारें भी जुगाड़ के भरोसे ही बनने लगी । अब नेता एक दूसरे के केवल और केवल जनता के सामने विरोधी दिखाई देते हैं । अब जुगाड़ूओं के दल मिलकर ही सरकार चलाते हैं जो जुगाड़ नहीं कर पाते वे सार्थक विपक्ष की भूमिका निभाते हैं । संसद में लड़ने झगड़ने के साथ ही साथ सड़कों पर धरने और  प्रदर्शन और आंदोलन करते रहते हैं । जब सरकारें ही जुगाड़ से चलने लगी हो तो राजनीति के क्षेत्र में इसके महत्व को नकारना नामुमकिन हो जाता है । 
      विज्ञान के क्षेत्र में केवल और केवल जुगाड़ का ही एहसानमंद होना चाहिए । आज विज्ञान की सारी प्रगति इंसानी जुगाड़ का नतीजा है । हमें जब भी कोई कमी महसूस हुई ,उसके जुगाड़ के लिए हमने अपने ज्ञान का प्रयोग किया । जुगाड़ करते - करते अब हम मंगल पर जाने का जुगाड़ करने में लगे हुए हैं । इस महत्वपूर्ण शब्द को अभी तक उपेक्षा ही झेलनी पड़ी है इसलिए वैज्ञानिक  सम्मान का और जुगाड़ू होना हिकारत का प्रतीक है । इस क्षेत्र में प्रयास करके आम जनता का इसमें कौशल विकास करना समाज के हित में ही होगा क्योंकि  अब समाज पढ़े-लिखे प्रतिभा संपन्न लोगों से अधिक जुगाड़ुओं की ओर देखता है । जुगाड़ू लोग ऊंचाइयां छूते हैं और प्रतिभाएं चप्पले चटका की घूमती हैं । आपको एक नेक सलाह दूं क्या  ? यदि आप भी प्रतिभावान हैं जैसा कि आप अपने आप को समझते हैं तो प्रतिभा को जुगाड़ के क्षेत्र में लगा कर देखिए... और फिर देखिए आप कहां से कहां पहुंचते हैं । आप कहीं भी हो इस मित्र को मत भूलिएगा कभी हमारे जुगाड़ भी एक दूसरे से पूरे हो सकते हैं ।
     आलोक मिश्रा "मनमौजी" 

ईमानदारी का कीड़ा

      हमारे आस-पास सामान्य लोगों की संख्या बहुत अधिक है । आज के समय में सामान्य वही है जो खुद खाता है औरों को खाने देता है। ले- दे के अपने और दूसरों के काम-काज निपटाना ही सामान्य व्यवहार है । बहुत ही थोड़ी संख्या में ही सही हमारे आसपास ईमानदार  के कीड़े से ग्रस्त बीमार लोग दिखाई देते रहते हैं । ऐसे लोग समाज, राजनीति और अर्थशास्त्र को बहुत बुरी तरह से प्रभावित करते हैं । ऐसे ही लोगों के कारण कुछ अच्छे लोगों को अनावश्यक रूप से जेलों में रहने के लिए विवश होना पड़ता है । ऐसे ही लोगों के कारण अक्सर अच्छी-खासी कुर्सियों से कुछ लोगों को हाथ धोना पड़ता है । ऐसे ही बीमार लोगों के कारण देश और विदेश की जनता को सत्ता के गिर जाने के कारण चुनाव जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है ।  इस भयानक बीमारी को लेकर बड़े-बड़े नेताओं ,अधिकारियों और उनके दलालों में चिंता व्याप्त है ।
     अभी-अभी विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त खबरों के अनुसार, वैज्ञानिकों ने भी इस रोग पर चिंता व्यक्त की है । उन्होंने यह निर्णय लिया है कि चेचक, पोलियो और मलेरिया की ही तरह ईमानदारी नामक इस रोग का उन्मूलन आवश्यक  है  । आज  मानव सभ्यता के विकास के लिए यह आवश्यक है कि प्रगति के पथ पर हम और आप  ईमानदारी नामक रोग से मुक्त होकर आगे बढ़े । वे इस रोग का टीका खोजने का प्रयास कर रहे हैं । वैसे जब तक वे ईमानदारी का टीका खोज नहीं लेते, तब तक हमें और आपको ईमानदारी के लक्षण वाले लोगों से सावधान रहने की चेतावनी दी गई है ।
     वैसे यदि इस रोग के इतिहास में जाएं तो पिछली शताब्दी में यह रोग महामारी की तरह फैला हुआ था परंतु न जाने कैसे इस के कीड़े कुछ कम सक्रिय हो गए । अब इस रोग के रोगी बहुत ही कम संख्या में हैं । पिछली शताब्दी में चूंकि यह सभी ओर फैला हुआ था इसलिए इससे ग्रसित व्यक्ति सामान्य ही माना जाता था। इसी कारण इसे रोगों की सूची में स्थान प्राप्त नहीं हो सका । अब क्योंकि ऐसे लोगों के कारण देश को प्रति वर्ष करोड़ों रुपए की हानि उठानी पड़ती है ;साथ ही अक्सर ही कार्यालयों में ऐसे लोगों के द्वारा शासकीय कार्य के बाधित होने से  रोग की भयावहता का अंदाज होता है।
       इस रोग के मुख्य लक्षण के रूप में रोगी का फटेहाल दिखाई देना ।अपने आप को सच्चा समझना । बात-बात पर नियमों और कानूनों का हवाला देना और किसी भी शासकीय  कार्य के मुफ्त में होने का दावा करना ।  ऐसे रोगी अक्सर लड़ते - झगड़ते हुए पाए जाते हैं  । ऐसे रोगियों को उनके यार -दोस्त ,नाते -रिश्तेदार और परिवार के लोग भी पसंद नहीं करते । जब यह रोग प्रारंभिक अवस्था में होता है तो वे केवल सच्चाई का और ईमानदारी का भाषण करने लगता है । दूसरी अवस्था में ऐसे रोगी स्वयं का अहित करते हुए सब काम ईमानदारी से करने का प्रयास करते हैं । इससे वे स्वयं को अपने और अपने समाज से काट लेते हैं और कभी कभी तनावग्रस्त हो जाते हैं । तीसरी और अंतिम अवस्था में ऐसा रोगी इस रोग को और फैलाने का संकल्प लेते हुए पूरे समाज को बदलने का प्रयास करने लग जाता है  । इस समय रोगी अपने दुश्मनों की संख्या बढ़ाने लगता है । जब लोग उसे समझाते तो उसे धमकी समझ कर और हट पर उतर आता है । इस तरह देखा जाए तो ऐसे लोग घोषित और अघोषित तरीके से आत्महत्या करने पर उतारू हो जाते हैं ।
      वैसे तो यह रोग अक्सर वंशानुगत ही होता है परंतु कभी-कभी कुछ सामान्य लोगों के परिवार में भी ऐसे बच्चे पैदा हो जाते हैं । कभी-कभी ना जाने किन कारणों से इस रोग से अचानक ही कुछ लोगों को ग्रस्त होते देखा गया है  । इस संबंध में कुछ लोगों का मत है कि हमारे आस पास कोई इमानदारी का कीड़ा पाया जाता है, जिसके काटने से यह रोग अचानक उत्पन्न हो जाता है । अभी तक ऐसे किसी कीड़े को खोजा नहीं जा सका है । यह रोग वैसे तो संक्रामक नहीं है लेकिन यदि ऐसे रोगियों की संगत अधिक समय तक की जाए तो यह रोग आपको भी छूत की बीमारी की तरह लग सकता है । कुछ ऐसे मरीज हैं जिनमें कभी तो इस रोग के लक्षण दिखते हैं और कभी एकदम गायब हो जाते हैं । ऐसे लोगों के बारे में यह कहना कठिन होता है कि वे रोग ग्रस्त है भी या नहीं । शोध करने पर ज्ञात हुआ कि इन मरीजों के व्यवहार के लिए उनकी कुर्सी में भेद छुपा है । मौका मिलते ही ये लोग सामान्य और बाकी समय रोगी बने रहते हैं । इनके विषय में यह कहना कि वह वास्तव में ईमानदारी के कीड़े से ग्रस्त हैं या नहीं कठिन हो जाता है । पिछले कुछ समय से सामान्य लोगों द्वारा भी इस रोग के रोगी होने का दिखावा करने का फैशन निकला है । नेता ,अधिकारी और कर्मचारी अक्सर ही इस रोग से ग्रस्त होने का दिखावा करते हैं लेकिन हद तो तब हो जाती है जब पुलिस वाले भी इस रोग के रोगी होने का दिखावा करने लगते हैं । इन मिलावटी मरीजों के कारण ही असली मरीजों को खोज पाना और कठिन हो जाता है । इस रोग से पूरी तरह मुक्ति पाने के लिए आज -कल असली रोगियों की खोज की जा रही है।  कुछ का इलाज तो हो सकता है लेकिन जो लाइलाज हैं उन्हें लोक कल्याण के लिए बलिदान कर दिया जाता है । इन रोगियों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा । एक दिन अवश्य आएगा जब मानवता ईमानदारी के रोग से पूरी तरह मुक्त हो जाएगी और इन लोगों को याद करेगी । अब समय आ गया है कि इस रोग और इसके कीड़े को जड़ से नष्ट कर दिया जाए अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब देश का अर्थशास्त्र जाए तेल लेने.... ‌ हमारे घरों का अर्थशास्त्र अवश्य बिगड़ जाएगा। वह दिन दूर नहीं जब हमें मजबूरन ही सही सारे काम इमानदारी से करने पड़ सकते हैं । अब हमें अपने भविष्य की चिंता है तो सबको मिलकर इस रोग और इस के कीड़े को नष्ट करने के प्रयास में लग जाना चाहिए यदि हम यह करने में सफल होते हैं तो कह सकेंगे कि हम सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे हैं ।
      आलोक मिश्रा "मनमौजी"

Monday, June 28, 2021

हिन्दी या हिग्लिश

        हिन्दी या हिग्लिश


         भाषाऐं रूप बदलती है, विलुप्त होती है और परिष्कृत होती हैं। भाषाओं के परिवर्तन का सिलसिला हमेशा जारी रहता है। वर्तमान में विश्व में लगभग सात हजार भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें से लगभग 1500 भाषाओं पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। जिन्हें विलुप्त होने से बचाने के लिए एण्टुरेन्स वाइस नाम का प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। बहुभाषी, सरल और अभिजात्य समझी जाने वाली भाषाएं अन्य भाषाओं के लिए विलुप्त होने का कारण बनती हैं। शोध के अनुसार कुछ भाषाएँ भौगोलिक परिस्थितियों, व्याकरण, बोलने वालों की अरूचि, लिपिगत कठिनाई और समय के साथ विकास न कर पाने के कारण लुप्त होती है। वर्तमान में हिन्दी के स्वरूप पर चिंतन आवश्यक हो गया है क्योंकि भले ही हिन्दी विलुप्त होने की  स्थिति में आज न भी हो, तो भी खतरे की ओर बढ़ती हुई दिखाई अवश्य दे रही हैं। हिन्दी के अंको का सर्वसम्मत तरीके से पठन पाठ्न से बाहर होना पहली कड़ी मे रूप में देख जा सकता है। साथ ही भारत में अभिजात्य समझी जाने वाली भाषा अंग्रेजी ने मोबाइल ओर कम्प्यूटर के माध्यम से हिन्दी को असामाजिक करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हैं। एस एम एस और ईमेल आदि में हिन्दी भाषा के लिए रोमन लिपी में लिखा जाना आम परंपरा हैं। इसके पीछे अंग्रेजी भाषा में टाइप करने की सरलता ही प्रमुख कारण हैं और दूसरा कारण हमारा अंग्रेजी प्रेम भी हैं। हिन्दी और अंग्रेजी के सम्मिश्रित रूप को न हिन्दी न इंग्लिश ; इसे तो हिंग्लिस कहा जा सकता हैं। जाने-अनजाने हम अपनी भाषा का रूप बदलने में सहायक हो रहे हैं। ऐसा नहीं कि दूसरी भाषा का प्रभाव किसी भाषा को नष्ट ही करता हो। ऐसे में भाषाएं परिष्कृत होती हैं या रूप भी बदल लेती हैं। पंद्रहवीं सदी में इंग्लैण्ड में फ्रैंच विद्वानों की
भाषा और अंग्रेजी अनपढ़ गंवारों की भाषा थी। आज हिन्दी में अंग्रेजी की ही तरह वे अंग्रेजी में फ्रैंच शब्द बोलकर विद्वता का परिचय देते रहते थे। बाद में फ्रैंच शब्द अंग्रेजी भाषा में घुलमिल कर उसे समृद्ध करने लगे। ऐसा ही आज हिन्दी व अंग्रेजी के संदर्भ में देखा जा सकता है। अंग्रेजी के अनेक शब्द ,हिन्दी भाषी अनपढ़ व्यक्ति भी सही अर्थ के साथ समझ लेता है। ऐसी स्थिती में संस्कृत भाषा की प्रतिबद्धता को तोड़कर हिन्दी ,इंग्लिश के साथ मिल कर हिग्लिश होने लगी है। अब आम बोलचाल के साथ ही सभी ओर हिग्लिश प्रचलित है, इस नवीन विकसित होती भाषा का व्याकरण स्वयं विकसित हो रहा है । जिसमें हिन्दी और अंग्रेजी के कठिन शब्द समाप्त होकर अनेक स्लेग प्रचलित हो रहे है जो शायद इस नवीन भाषा के लिए नींव का पत्थर साबित हो। इस भाषा की लिपी रोमन है क्योंकि इससे की पैड या की बोर्ड जैसी समस्याओं से निजात जो मिलता है। शब्दों के भाषाई बंधन से मुक्त हिग्लिश में क्षेत्रीय भाषाओं से लेकर अंग्रेज़ी तक के सरल और कठिन शब्दों का प्रयोग हो रहा है । नये समानंतर सिनेमा में मुख्य रूप से इसी भाषा का प्रयोग हो रहा है। धरावाहिक , समाचार माध्यम और लेखन के क्षेत्र में भी शुद्ध हिन्दी अपना स्थान खोती जा रही हैं। शुद्ध हिन्दी का प्रयोग करने वाला व्यक्ति अब परग्रहीय प्राणी सा लगता है। देश में भाषा के नाम पर एक दिवस मनाने से कुछ भी होगा ये सोचना बेईमानी हैं । अब तो इस चिंतन का समय हैं कि हमारी मूल स्वरूप खोती भाषा हिन्दी का क्या होगा .....विकास, विनाश या रूपांतरण।



आलोक मिश्रा "मनमौजी "

Monday, June 21, 2021

अवतार

                 अवतार


    आलेख सनातन अवतारवाद और विकासवाद के संबंध पर आधारित है । आख्यानों की अधिकता के बवजूद भी संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है । आख्यानों के विस्तार  को सुधी पाठक अलग से पढ़ सकते है ।आपका सहमत होना  जरूरी नहीं है ।  अपने अभिमत को अंकित अवश्य करें ।
       जीव विकास क्रम में वैदिक शास्त्रों के अनुसार जब-जब धर्म घटता है और अधर्म बढ़ता है तब-तब धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिये भगवान विष्णु अवतार लेते है। धर्म की व्याख्या यदि संक्षेप में की जाए तो जीवन जीने की वह कला जो सत्य व सनातन है, धर्म है।धर्म वो हो जो परिस्थितिगत कारणों से बदलता नहीं । धर्म वह स्थिर नियम है जो  किसी भी शृष्ठी के निर्माण के पूर्व ही बन जाता है । धर्म के लिए मानव की आवश्यकता नहीं है ।   विष्णु को जगत का पालनहार कहा जाता है, अतः विष्णु का स्वयं का धर्म जगत का पालन करता है। जीव तत्व को नवीन मार्ग दिखाना है, जिसके लिये ही वे बार-बार अवतार लेते हैं। कलियुग में होने वाले भविष्य के अवतार से पूर्व नौ अवतारों को यदि देखें तो वे जीवन के विकास क्रम के रूप में दिखते है। प्रथम मत्स्यावतार के रूप में सत्यव्रत को जीवन के प्रतीक रूप में बचाने का उल्लेख तो है ही विकासवादियों के दृष्टिकोण से भी जीवन को उत्पत्ति जलचर रूप से ही मान्य है। कच्छपावतार में भगवान अपनी पीठ पर मंदरांचल पर्वत को उठाकर समुद्र मंथन में सहभागी होते हैं। क्रमिक विकास की प्रक्रिया में मछली के पंख और गलफड़े का विकास, पैर और फेफड़े होने के साथ-साथ जल प्लावित धरती के समुद्र में खिसकने और नये क्षेत्रों से जुड़कर नयी और संभावनाओं को खोजा जाना दर्शाता है ‌। जैविक विकास के साथ ही साथ यह तत्थ आपको भूगोल और भूभौतिकि में भी विस्तार से मिल जाएगा । महाप्रलय का उल्लेख भी सभी धर्म के सहित्यों में मिलता है । वरहावतार के रूप में जलमग्न धरती के कारण जीवों के आवास हेतु समुद्र से धरती प्राप्त करना कथानक है। क्योंकि यहां जीवन समुद्र को छोड़कर चौपायों के रूप में धरती पर आश्रय बनाने लगे थे।  कछुआ या कच्छप इसका उत्तम प्रतीक हो सकता था । मानव रूप की सृष्टि से पूर्व है नरसिंहावतार, जो न मानव है और न ही पशु और जो दोनों का मिला-जुला रूप है , जो होमोसीपियंस की तरह अच्छे-बुरे विषय में है।  मानव विकासवादी डार्विन भी यही कहते है लेकिन वे मानव के विकास को बंदर से जोड़ते है ।  वामनावतार के रूप में मानव बौना अवश्य है परंतु ऊर्जावान इतना कि अपने पैरों से ही तीनों लोकों को नाप सकता है। यहां मानव निश्चित रूप से पैदल दुनिया को नापता रहा होगा और यदि आप वामन और मानव की शब्द सृष्टि पर ध्यान देंगे तो दोनों में भेद समाप्त होता दिखेगा।  अवतारवाद में यह इस शृष्ठि में वामनावतार मानव के रूप में भगवान विष्णु का प्रथम  अवतार था । जब मानव को अस्त्र-शस्त्र की आवश्यक्ता महसूस हुई होगी तब बलशाली विद्वान काया से परिपूर्ण, शस्त्रों को बनाने और चलाने की कला जानने वाला और शत्रुओं पर निर्दयतापूर्वक प्रहार करने वाले अवतार के रूप में परशुअवतार पूज्य है। विकसित होती मानव श्रंखला में वहीं तो विकास को प्राप्त कर सकता था जो बलशाली हो जो अपने बल और शस्त्रों से अपनी और अपने समुदाय की रक्षा कर सके ।  रामवतार इसी श्रृंखला को बढ़ाते हुए मानव को दस कलाओं में प्रवीण होने तथा कृष्ण को सोलह कलाओं के ज्ञाता होने के साथ आगे बढ़ता है। वस्तुत: कृष्ण को अवतारवाद  में परिपूर्ण मानव माना जा सकता । राम और कृष्ण में कलाओं का अंतर है जिन कलाओं को राम निसिद्ध मानते थे उन्हें ही कृष्ण की परिपूर्णता कहा जा सकता है ।  नवम अवतार के रूप में बुद्धावतार मान्य है। मानव की मुक्ति का मार्ग मानव देह में ही प्राप्त हो  बुद्धावतार यही करते दिखते है । कलियुग में ढाई हजार वर्ष पूर्व मानव समस्याओं के निदान खोजने के पृथक मार्ग ढूंढता हुआ दिखता है। आज भी नित नये अविष्कार, धर्म, पंथ, विचार धाराएं और वाद  बुद्धावतार की विचारवादी आस्थाओं का प्रतीक है। भविष्य के अवतार के रूप में कलकि अवतार घोर कलियुग के अंतिम चरण में ठीक उन्हीं परिस्थितियों में जिनमें भगवान अवतार लेते हैं अवतरित होंगे। उनके पैदा होने के स्थान का नाम संभल ग्राम, संभल का प्रतीक भी हो सकता है। उनका नाम विष्णु यश होगा। लेकिन उनके नाम के प्रथम व अतिम वर्ण का उच्चारण विनाशक विश (विष) है जो कि प्रतीक भी हो सकता है। वे अपने अस्त्र-शस्त्र से दुष्टों का नाश करेंगे परंतु तत्तसमय संतगुणी कोई न होगा अतः संपूर्ण विनाश या प्रलय के बाद नवीन अवतारों के साथ नयी धरती जीव का विकास होगा।

आलोक मिश्र "मनमौजी"

Saturday, June 12, 2021

अभी तो ये अंगड़ाई है ....( व्यंग्य )

अभी तो ये अंगड़ाई है ....


        एक दिन शहर की एक रैली में लोग जोर-जोर से नारे लगा रहे थे ‘‘ अभी तो ये अंगड़ाई है.....आगे और लड़ाई है ।’’ सड़क के किनारे एक दुकान पर उतनी ही जोर से गाना बज रहा था ‘‘ अंगड़ाईयाॅं लेती हूॅं जो मैं जोर-जोर से ......।’’मैं सोचने लगा कि किसकी अंगड़ाई पर कंसन्ट्रेट करुॅं ? मेरे बुद्धिवादी होने के भ्रम के कारण मेरा ध्यान रैली की ओर मुड़ गया । हम और आप बचपन से ही राजनैतिक,सामाजिक,मजदूर और कर्मचारी आंदोलनों के समय नारा ‘‘ अभी तो ये ....’’ सुनते आ रहे है । हम तो बचपन से जवान हो कर बुढापे की ओर कूच भी करने लगे और वे है जो तब से ले कर आज तक अंगड़ाईयाॅं ही ले रहे है । हम इतिहास को बनते देखने के लिए दम साधे बैठे है कि बस लड़ाई अब शुरु हुई कि तब शुरु हुई । वे है कि लड़ाई- वड़ाई करते ही नहीं ।
     नारा वीर आंदोलनकर्ता हमेशा ही धमकियों से भरे हुए नारों का प्रयोग बमों और मिसाइलों की ही तरह करते है । ये सारे नारे आपने कभी न कभी तो अवश्य ही सुने होगें जैसे - ‘‘ जो हमसे टकराएगा ... मिट्टी में मिल जाएगा ’’, ‘‘हमें नहीं तो तुम्हें नहीं .... चैन नहीं आराम नहीं ’’,‘‘माॅंग हमारी पूरी होे....... चाहे जो मजबूरी हो ’’,  ‘‘जो हिटलर की चाल चलेगा..... वो कुत्ते की मौत मरेगा’’ । इनके अलावा वे बीच-बीच में अपनी एकता को भी जिन्दाबाद करते रहते है । ऐसे स्थानों पर नारे लगाने में विशेषज्ञता रखने वालों की पूछ-परख अधिक ही होती है । ये विशेषज्ञ भी अपनी पूरी प्रतिभा,लगन और खास स्टाइल के साथ नारे लगवा कर अपनी विशेषज्ञता का प्रर्दशन करते है। ऐसे ही एक विशेषज्ञ एक खास नारा ‘‘कर्मचारी एकता ....’’ अपने विशेष अंदाज और स्वर में लगाते तो सुनाई देता ‘‘ चाय गरम समोसा ....’’ बाकी लोग जोर से साथ देते ‘‘.... जिन्दाबाद .. जिन्दाबाद ’’ । नारे लगाने वाले भी अलग- अलग प्रकार के होते है । कुछ अतिउत्साहियों को लगता है कि इधर जोर से नारा लगाया और बस मांग पूरी हुई । ऐसे लोग अपनी मांग पूरी करवाने के लिए महिला हो या पुरुष पूरा जोर लगा कर नारे लगाते है। कुछ लोग तो बस दूसरों को दिखाने के लिए ही नारे लगाते है ; दिखावा बंद तो नारे भी बंद । कुछ तो इतनी बार अंगड़ाईयाॅं ले चुके होते है कि उनके लिए लड़ना तो दूर नारा लगाना भी भारी पड़ता है । यह पूरा का पूरा समुदाय दो प्रकार के लोगों का होता है । एक हाथ लहराते या नमस्कार की मुद्रा के नेता या नेता जैसे लोग ; दूसरे उनके पीछे चलते नारे लगाने वाले लोग ।
        प्रश्न वहीं का वहीं है कि ये आंदोलन कर्ता केवल अंगड़ाईयाॅं ही क्यों लेते रहते है ?
आप तो जानते ही है कि हम जहाॅं है जो कर रहे है उसमें कुछ न कुछ समस्याऐं जरुर है यदि समस्याऐं न भी हों तो कुछ तो ऐसा है जिसे हम पसंद नहीं करते । हमारी इसी मानसिकता के चलते आंदोलन , धरने और प्रर्दशनों को आधार प्राप्त होता है । ऐसे में कुछ लोग हमारी भावनाओं को बल देकर नेता बन जाते है । कभी-कभी नेता उसी समुदाय का होता है जिसकी समस्या है । अक्सर तो नेता न जाने कैसे, क्यों और कब बाहर से आकर समूह का नेता बन जाता है । इसके उदाहरण के लिए अपने आस-पास नजर दौड़ा कर देखें तो आपको मजदूर संगठन के नेता के रुप में कर्मचारी और कर्मचारी संगठन के नेता के रुप में राजनैतिक व्यक्ति दिखाई दे जाएंगे । ऐसे नेता मांग करने वालों और मांग पूरी करने वालों के बीच हमेशा ही संपर्क में रहते है । वे अक्सर तो इन दोनों के बीच अपने दलाली के धंधे को चलाते हुए ही दिखाई देते है । उन्हें जब भी ऊपर वालों से कुछ घोषणा के संकेत प्राप्त होते है तो उनका दिल नेतागिरी चमकाने की नियत के साथ अंगड़ाईयाॅं लेने का मचलने लगता है । बस वे ढेर सारी मांगों के साथ अंगड़ाईयाॅं लेने लगते है । बस सधे-बधे तरीके से दो-चार मांगे पूरी होने का दिखावा हो जाता है और अंगड़ाई से लड़ाई टल जाती है ।
          चुनाव के पहले कुछ सोए और कुछ कब्र में गड़ें संगठन भी अचानक ही अंगड़ाई लेने लगते है । ऐसे समय देने वाले मजबूर और लेने वाले बिना लड़े केवल दिखावे से मिलने की अपेक्षा रखते है । इस आंदोलन या अंगड़ाई के मंचन मात्र से दो पक्षों के रिश्ते मजबूत होते ही है उनका महत्व भी बढ जाता और नेतागिरी भी चमक जाती है । अब तो स्थिति इतनी खराब है कि अपने वेतन ,भत्ते और मजदूरी के लिए भी अंगड़ाई लेने की चेतावनी देनी पड़ सकती है । चूंकि इस तरीके से देने वाले  का महत्व भी बढता है इसलिए कुछ समय बाद कोई भी किसी को कुछ भी तभी देगा जब वो अंगड़ाई लेने की धमकी देगा ।
        नारे लगाना हमारा राष्ट्रीय गुण होता जा रहा है । हम विश्व में नारे लगाने और बनाने में सबसे आगे है । अभी अनौपचारिक रुप से स्कूल और काॅलेजों में समय-समय पर नारे लगाने का प्रशिक्षण दिया जाता है । हमारे छात्रों को रैलियों की प्रेक्टिस भी बचपन से ही करवाई जाती है । हो सकता है भविष्य में इन्हें पाठ्यक्रम में शामिल ही कर लिया जाए । अब तक राजनैतिक लोग समाज के नारे लगाने और आंदोलन करने जैसे गुणों का उपयोग अपने हित में करते रहे हैं । अब लोग उन्हें धमकियाॅं देने लगे है तो वे संवैधानिक पदों की आड़ में छुपे-छुपे फिरते है ।
           अब आप अंगड़ाई वाला गाना और नारा साथ -साथ सुनें तो मेरे समान भ्रमित न हो और बुद्धिवादी बनने की कोशिश न करे । गाने पर कंसन्ट्रेट करे कुछ मनोरंजन तो हो ही जाएगा । बेवकूफ बनने से अच्छा तो मनोरंजन करना हो ही सकता है ।
                                     आलोक मिश्रा
                                    
    


Thursday, June 10, 2021

गरीबी सम्मेलन

      शहर के एक आलीशान होटल में गरीबी सम्मेलन का आयोजन किया गया है । देश-विदेश से इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया । अधिकांश विशेषज्ञों ने गरीबों को केवल तस्वीरों में देखा और आंकड़ों में समझा था । उन्हें यह मालूम है कि गरीब राशन की दुकानों से सामान खरीदते हैं । उन्हें आधुनिक लोगों की तरह अधिक कपड़ों की जरूरत नहीं होती । उन्हें मालूम है कि देश में लगभग चालीस करोड़ गरीब रहते हैं । उन्हें यह भी मालूम है कि शहरों में प्रतिदिन बत्तीस रूपये और गांव में छब्बीस रूपये खर्च करने वाले लोग गरीब होते हैं । इस सम्मेलन में कुछ गरीबों को भी बुलाया गया है । उनकी गरीबी के लिए उन्हें सम्मानित जो करना है ‌
     शहर को इस आयोजन के लिए पिछले कई दिनों से तैयार किया जा रहा था ‌ शहर से भिखारियों को पकड़ कर दूर कहीं भेजा जा रहा था । सभी रास्तों पर बंदनवार सजाए गए थे ‌ देश-विदेश के अतिथियों की सुरक्षा के लिए पुलिस व्यवस्था चाक-चौबंद थी । शहर को साफ-सुथरा दिखाने के लिए फुटपाथ पर दुकान लगा कर रोजी कमाने वालों को भी हटा दिया गया था । विशेषज्ञों की विशेष फरमाईश पर उन्हें एक गरीब बस्ती में भ्रमण के लिए ले जाना था । इस बस्ती में भी रातों-रात बिजली, पानी और सड़क की व्यवस्था की जा रही है । हालांकि इस बस्ती में भी चार-पांच परिवार ही वास्तविक रुप से गरीब हैं ।
        आखिर समारोह प्रारंभ हो गया ।  गरीबी सम्मान पाने के लिए सेठ करोड़ीमल के सुपुत्र विशेष रुप से गरीबों की वेशभूषा में समारोह स्थल पर पहुंचे । उनका नाम गरीबों की सूची में जो शामिल है । गरीबों पर होने वाले इस कार्यक्रम में अधिकांश वक्ताओं ने अंग्रेजी में ही भाषण दिए । सब सभ्रांत समझे जाने वाले भीड़ नुमा लोगों ने जहां समझ में आया वहां भी और जहां नहीं समझ में आया वहां भी तालियां बजाई । सेठ करोड़ीमल के पुत्र को समारोह में अमीर पिता के गरीब पुत्र होने के कारण सम्मानित किया गया ‌। उन्होंने बताया कि आलीशान हवेली में रहते हुए भी गरीब कैसे हैं । सभी भाषणों  से उक्ताए  हुए थे, उन्हें तो बस भाषणों के बाद होने वाले डिनर का इंतजार था । आखिर वह समय भी आ गया डिनर के लिए विशेष रुप से झोपड़ी का सेट बनाया गया था । सभी सभ्य दिखने वाले लोग लाखों की झोपड़ी में दाखिल होकर ,गरीब हो गए । आब सबके हाथों में प्लेटें थी और वे स्टॉल-स्टॉल घूम कर खाना खोज रहे थे । लिपस्टिक पुते होठों को बचा कर खाना खाती महिलाएं बीच-बीच में पुअर-पुअर कहती जा रही थी । वह अब गरीबों के बारे में नहीं, खाने के विषय में बोल रही थी । लकदक सूट में घूमते युवा ही नहीं बुजुर्गों का भी पूरा ध्यान उन्हीं की ओर था ।
       समारोह के बाद सभी लोगों को गरीबों से मिलने उनकी बस्ती में जाना था ‌‌। कुछ को तो इस विचार से ही मितली आने लगी । कुछ ने बहाने बनाकर इस कार्यक्रम से किनारा कर लिया लेकिन अनेकों के लिए उनकी गरीब नवाज की छवि महत्वपूर्ण थी ।  उन्होंने ढेर सा परफ्यूम अपने रुमाल पर डाला और गाड़ियों में सवार हो गए । गाड़ियों का एक बड़ा सा काफिला गरीब बस्ती में रुका।  हैंड पंप पर नहाते लोग , घरों के सामने बर्तन धोती महिलाएं , शौच के लिए बैठे हुए बच्चों सहित बस्ती के सभी लोग उन्हें देखने के लिए जमा होने लगे । नाक पर रुमाल रखे लोग गाड़ियों से उतरे तो लगा दो भारत आमने-सामने हैं ‌। एक विशेषज्ञ को बीड़ी फूंकता बेफिक्र बुड्ढा अच्छा लगा  तो दूसरे को ओपन एयर बाथरूम में नहाती हुई महिला । वे कैमरे को जूम कर  के फोटो लेने का प्रयास करने लगे । भद्र सी दिखने वाली महिलाएं शौच के लिए बैठे बच्चों को देखकर शेम-शेम कहने कहने लगी । बच्चे टुकुर-टुकुर ताकते अपने काम में लगे रहे ।बस्ती वालों को लगा की गाड़ी वाले कुछ देंगे । सब लोगों ने गरीबों के साथ फोटो खिंचाई और अपने लिए कुछ ले ही लिया ।
        समारोह समाप्त हुआ सब कुछ पहले जैसा है । भिखारी फिर शहर में हैं ,वह दो सौ से ढाई सौ रुपया कमा लेते हैं । उन्हें मालूम है वे गरीब नहीं है । फुटपाथ पर दुकान लगाने वाले अब अपनी रोजी - रोटी कमा पा रहे हैं । गरीबी देखने के लिए होटल के पीछे चलना होगा । यहां बचा हुआ खाना फेका गया है । सूअर और कुत्ते के साथ साथ कुछ बच्चे अपना हिस्सा प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं ‌। बच्चों को भूख लगी है । वे नहीं जानते कि वह गरीब हैं या नहीं ।
    आलोक मिश्रा "मनमौजी"